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बेलेम में हुई COP30 ने साफ़ कर दिया कि अब जलवायु कार्रवाई का फोकस सिर्फ़ लक्ष्य तय करने पर नहीं बल्कि उन्हें ज़मीन पर लागू करने पर है. सम्मेलन का संदेश है- उद्योग, व्यापार और संसाधन उपयोग ही अब जलवायु कूटनीति का असली केंद्र हैं. भारत के लिए यही बदलाव निर्णायक है क्योंकि ग्रीन ग्रोथ अब केवल विकल्प नहीं, विकास की अनिवार्यता है.
ब्राज़ील के बेलेम में आयोजित वैश्विक जलवायु परिवर्तन सम्मेलन COP30 संपन्न हो गया है. देखा जाए तो इस सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन को लेकर चर्चाओं का दौर चला और जो प्रस्ताव पास हुआ उसमें केवल लक्ष्य निर्धारित करने से आगे बढ़कर उपायों को ज़मीनी स्तर पर लागू करने पर ज़ोर दिया गया है. सम्मेलन के दौरान पेश किए गए वैश्विक हरित औद्योगिकीकरण पर बेलेम घोषणापत्र में इस बात को प्रमुखता से उठाया गया है कि किस प्रकार व्यापार, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और सामग्री के उपयोग से जुड़े मुद्दे अब जलवायु कूटनीति के केंद्र में आ चुके हैं और इन्हें अब दरकिनार नहीं किया जा सकता है. भारत के लिहाज़ से देखें तो दृष्टिकोण में आया यह परिवर्तन विशेष रूप से बेहद महत्वपूर्ण है. ज़ाहिर है कि भारत एक तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, दुनिया का बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की ओर अग्रसर है और शून्य कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए गंभीरता से काम कर रहा है. इसका साफ मतलब है कि दीर्घावधि में भारत की ग्रीन इकोनॉमी बनने की इस विकास यात्रा को केवल देश भर में लगाए गए सोलर पैनल की संख्या से नहीं आंका जाएगा बल्कि इससे आंका जाएगा कि वह स्टील, सीमेंट, एल्युमीनियम, प्लास्टिक और ग्रोथ के लिए ज़रूरी दूसरी चीज़ों का कितने बेहतर तरीक़े से इस्तेमाल करता है.
इससे यह भी साफ हो जाता है कि पर्यावरण एजेंडा में सेकेंडरी मैन्युफैक्चरिंग और सर्कुलर-इकोनॉमी सिस्टम कोई बाहरी विषय नहीं हैं बल्कि सही मायने में विकास के लिए और औद्योगिक नीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे हैं जिन्हें नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता है. भारत के शहरी क्षेत्रों में हर साल क़रीब 62 मिलियन टन म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट यानी ठोस कचरा निकलता है. इस ठोस कचरे के लगभग 82 प्रतिशत हिस्से को इकट्ठा किया जाता और इसमें से केवल 28 फीसदी कचरे का ही ट्रीटमेंट किया जाता है जबकि बाक़ी कूड़े-कचरे को खुले में ऐसे ही डंप करके फेंक दिया जाता है. अनुमानों के मुताबिक़ अगर कचरे की वृद्धि इसी प्रकार से बढ़ती रहती है तो साल 2030 तक सालाना कचरा उत्पादन बढ़कर क़रीब 165 मिलियन टन हो जाएगा, वहीं सदी के मध्य तक यानी 2050 तक यह 400 मिलियन टन से ज़्यादा हो सकता है. इसके साथ ही, भारत सरकार अब सर्कुरल इकोनॉमी को एक व्यापक आर्थिक वृद्धि के अवसर के रूप में देखती है यानी सरकार को लग रहा है कि कचरे और प्रदूषण को कम करने, कबाड़ हो चुकी चीज़ों का दोबारा उपयोग करने और संसाधानों को फिर से इस्तेमाल करने लायक बनाने से अर्थव्यवस्था को मज़बूत किया जा सकता है. आधिकारिक अनुमानों के मुताबिक़ सर्कुलर-इकोनॉमी में परिवर्तन से साल 2050 तक 2 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक मार्केट वैल्यू और लगभग एक करोड़ रोज़गार सृजित हो सकते हैं, साथ ही इससे वर्ष 2030 तक भी बहुत अधिक लाभ अर्जित किया जा सकता है.
“आधिकारिक अनुमानों के मुताबिक़ सर्कुलर-इकोनॉमी में परिवर्तन से साल 2050 तक 2 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक मार्केट वैल्यू और लगभग एक करोड़ रोज़गार सृजित हो सकते हैं.”
यही वजह है कि भारत के लिए अपने सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को हासिल करने और अपनी व्यापक ग्रोथ स्ट्रैटेजी के लिए सेकेंडरी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में प्रगति एवं सर्कुलर अर्थव्यवस्था में परिवर्तन बेहद आवश्यक है. सेकेंडरी मैन्युफैक्चरिंग यानी द्वितियक विनिर्माण का मतलब होता है नए कच्चे माल की जगह पर बेकार हो चुकी चीज़ों से प्राप्त सामग्री, जैसे कि स्क्रैप मेटल, रिसाइकिल्ड प्लास्टिक और पुरानी परियोजनाओं से मिले कंक्रीट व ईंटों से तैयार की गई निर्माण सामग्री से नए उत्पादों का निर्माण करना. ज़ाहिर है कि इन बेकार और कबाड़ हो चुकी चीज़ों को इस प्रक्रिया के ज़रिए औद्योगिक कच्चे माल में बदल दिया जाता है. इससे जहां कचरा प्रबंधन और औद्योगिक नीति के बीच एक व्यावहारिक सेतु तैयार होता है, वहीं निर्माण सामग्री की उपलब्धता बढ़ती है और ऊर्जा की खपत भी कम होती है. कहने का मतलब है कि इस तरह के क़दमों से न केवल आयातित कच्चे माल पर निर्भरता कम होती है, बल्कि कचरे और कबाड को एकत्र करने, उसकी छंटाई करने, मरम्मत करने और दोबारा से उसे बनाने में कामगारों की बहुत अधिक ज़रूरत होती है. इससे कहीं न कहीं विनिर्माण की लागत कम होती है और बड़ी तादाद में रोज़गार भी पैदा होते हैं.
“अनुमानों के मुताबिक़ अगर कचरे की वृद्धि इसी प्रकार से बढ़ती रहती है तो साल 2030 तक सालाना कचरा उत्पादन बढ़कर क़रीब 165 मिलियन टन हो जाएगा, वहीं सदी के मध्य तक यानी 2050 तक यह 400 मिलियन टन से ज़्यादा हो सकता है.”
सतत विकास लक्ष्यों में उल्लेख किए गए प्रावधानों के लिहाज़ से देखें तो एफिशिंयट मैटेरियल यानी ऐसी सामग्री जिसमें ऊर्जा का उपयोग कम होता है, जिनसे कचरा कम निकलता है और जिन्हें बनाने और इस्तेमाल के दौरान प्रदूषण कम होता है, साथ ही उच्च गुणवत्ता वाली रिसाइकलिंग कहीं न कहीं सीधे तौर पर SDG 12 के अनुरूप हैं. ज़ाहिर है कि SDG 12 पर्यावरण अनुकूल ज़िम्मेदार उपभोग और उत्पादन पर ज़ोर देता है. इतना ही नहीं, यह पर्यावरण कुशल सामिग्री और उच्च गुणवत्ता वाला पुनर्चक्रण SDG 8 के बेहतरीन कार्य, SDG 9 के इंडस्ट्री, इनोवेशन और इंफ्रास्ट्रक्चर, SDG 11 के टिकाऊ शहरों के निर्माण और SDG 13 के जलवायु कार्रवाई संबंधी प्रावधानों के भी मुताबिक़ है. नीति आयोग द्वारा संसाधन कुशलता पर किए गए एक अध्ययन में इस क्रॉस-कटिंग भूमिका को स्पष्ट रूप से पहचाना गया है. इस अध्ययन में कुशल संसाधन उत्पादकता को न केवल SDG 12 के लक्ष्यों को पाने के लिहाज़ से, बल्कि ऊर्जा, पानी, शहरीकरण और पारिस्थितिक तंत्र जैसे संबंधित लक्ष्यों को हासिल करने के लिए भी उचित और अनिवार्य माना गया है.
अगर एल्युमिनियम सेक्टर पर नज़र डालें तो यह साफ पता चलता है कि नई धातु से उत्पादों के निर्माण और बेकार हो चुके एल्युमिनियम से उत्पादों के निर्माण में पर्यावरण से लेकर ऊर्जा तक हर चीज़ का कितना ज़्यादा लाभ होता है. अंतर्राष्ट्रीय एल्युमिनियम संस्थान के वैश्विक आंकड़ों के मुताबिक़ बॉक्साइट से प्राइमरी एल्युमिनियम बनाने में हर एक टन में क़रीब 186 गीगाजूल ऊर्जा की खपत होती है, जबकि एक टन रिसाइकल एल्युमिनियम बनाने में केवल 8.3 गीगाजूल ऊर्जा ख़र्च होती है. मतलब ऊर्जा बचत के लिहाज़ से देखें तो कबाड़ से हर एक टन एल्युमिनिय मेटल तैयार करने पर लगभग 95.5 प्रतिशत ऊर्जा की बचत होती है. भारत में एल्युमिनियम स्मेल्टिंग यानी एल्युमिनिय मेटल निकालने के दौरान मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन से प्राप्त ऊर्जा यानी कोयला, तेल या प्राकृतिक गैस से पैदा होने वाली बिजली का उपयोग किया जाता है. ऐसे में ज़ाहिर है कि एल्युमिनियम तैयार के दौरान जितनी ज़्यादा बिजली की खपत होती है, उतना ही अधिक कार्बन उत्सर्जन होता है.
भारत में घरेलू एल्युमिनियम उद्योग इस वास्तविकता को पुख्ता करता है. एल्युमिनियम उद्योग के ताज़ा अनुमानों के अनुसार भारत में कुल एल्युमिनियम आपूर्ति में सेकेंडरी एल्युमिनियम की हिस्सेदारी अब 40 फीसदी पहुंच गई है. इसके अलावा, एल्युमिनियम को रिसाइकिल करने में प्राथमिक एल्युमिनियम बनाने की तुलना में 95 प्रतिशत कम बिजली की खपत होती है, साथ ही कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में भी 90 फीसदी से अधिक की कमी आती है. देखा जाए तो यह हरित औद्योगिकीकरण और कम कार्बन उत्सर्जन वाली निर्माण सामिग्री के उपयोग को बढ़ावा देने लिहाज़ से भी एकदम मुफीद है और निश्चित रूप से कम कार्बन उत्सर्जन होने से ज़्यादा वैल्यू वाले निर्यात बाज़ार तक अधिक से अधिक पहुंच सुनिश्चित होगी.
एल्युमिनियम की तरह की दूसरे सेक्टरों में भी सेकेंडरी मैन्युफैक्चरिंग बेहद लाभदायक होती है. इलेक्ट्रॉनिक कचरा यानी ई-वेस्ट, स्टील, प्लास्टिक और कंस्ट्रक्शन कचरे को लेकर नीति आयोग की हर सेक्टर के लिए सर्कुलर-इकोनॉमी कार्ययोजना जहां एक ओर कच्चे माल पर निर्भरता को कम करने पर ज़ोर देती है, वहीं ऊर्जा का कम से कम उपयोग करने और प्रतिस्पर्धा को बेहतर बनाने की क्षमता बढ़ाने पर बल देती है. यही वजह है कि चक्रीय अर्थव्यवस्था का मतलब केवल उन तरीक़ों और तकनीक़ों को अपनाना नहीं है, जो आखिर में कचरे को वातावरण में छोड़ने से पहले उनके अंतिम निपटान के लिए अमल में लाई जाती हैं. दरअसल, ये उत्पादन प्रक्रिया और आपूर्ति श्रृंखला का वो शुरुआती चरण है, जो विकास के दौरान ऊर्जा के उपयोग और सामिग्री के इस्तेमाल को कम से कम करता है, साथ ही वैश्विक स्तर पर कमोडिटी की क़ीमतों में उतार-चढ़ाव के लचीलेपन को बढ़ाता है.
“अंतर्राष्ट्रीय एल्युमिनियम संस्थान के वैश्विक आंकड़ों के मुताबिक़ बॉक्साइट से प्राइमरी एल्युमिनियम बनाने में हर एक टन में क़रीब 186 गीगाजूल ऊर्जा की खपत होती है, जबकि एक टन रिसाइकिल एल्युमिनियम बनाने में केवल 8.3 गीगाजूल ऊर्जा ख़र्च होती है.”
अगर भारत की एल्युमिनियम उद्योग की ताक़त पर नज़र डालें, तो यह देश में मौज़ूद बॉक्साइट की प्रचुर मात्रा, एकीकृत रिफाइनरियों और उनकी खुद की बिजली बनाने की क्षमता है. इस खूबी की वजह से भारत जहां एक ओर कम लागत में एल्युमिनियम का उत्पादन करता है, वहीं इसका अधिक मात्रा में निर्यात भी करता है. पर भारत का एल्युमिनियम उद्योग कहीं न कहीं कोयले पर बहुत अधिक निर्भर है. ज़ाहिर है कि एल्युमिनियम बनाने में जो कुल लागत आती है, उसमें क़रीब एक तिहाई ख़र्च बिजली का होता है. इतना ही नहीं, इसमें उपयोग की जाने वाली अधिकतर बिजली का उत्पादन कोयले से संचालित संयंत्रों में होता है. इस वजह से प्रति टन एल्यूमिनियम के उत्पादन के दौरान बहुत बड़ी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन होता है. यूरोपीय संघ (EU) के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म (CBAM) जैसे उपाय अब आयातित सामान पर उनके निर्माण के दौरान होने वाले कार्बन उत्सर्जन के आधार पर शुल्क लगाने लगे हैं. ऐसे में भारत के अत्यधिक कार्बन उत्सर्जन वाले एल्युमिनियम की लागत बढ़ने से इसे प्रमुख वैश्विक बाज़ारों में निर्यात करने में रुकावटें आएंगी. इसीलिए, प्राथमिक और डाउनस्ट्रीम उत्पादकों यानी उत्पाद को अंतिम रूप देने वालों और इन पर निर्भर कंपनियों के लिए एल्युमिनियम उत्पादन के दौरान इस्तेमाल की जाने वाली बिजली को न केवल धीरे-धीरे नवीकरणीय ऊर्जा में बदलना ज़रूरी हो गया है, बल्कि इनर्ट एनोड और कार्बन कैप्चर जैसी दूसरी नई स्वच्छ ऊर्जा तकनीक़ों को अपनाना भी अनिवार्य हो गया है. ऐसा करना सिर्फ़ पर्यावरण संरक्षण के लिए ही ज़रूरी नहीं है, बल्कि वैश्विक बाज़ार में टिके रहने के लिए भी यह आवश्यक है. इसके अलावा, इस सेक्टर में फैले रोज़गारों को सुरक्षित रखने एवं भारत की एल्युमीनियम आपूर्ति श्रृंखला को जलवायु प्रतिबद्धता के साथ संरेखित करने के लिए भी ऐसा करना अनिवार्य हो गया है.
एल्युमिनियम जैसी धातुओं के लिए एक फेयर इकोसिस्टम बनाने के लिए ज़रूरी है कि पूरी आपूर्ति श्रृंखला के सभी हितधारक, जैसे कि प्राथमिक, डाउनस्ट्रीम और सेकेंडरी उत्पादक एक ऐसे माहौल में काम करें जहां कोई भेदभाव न हो और जहां नियम-क़ानूनों को सही तरीक़े से लागू किया जाए. ज़ाहिर है कि प्राथमिक उत्पादकों को जहां बॉक्साइट, ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स तक सुरक्षित व पर्यावरण अनुकूल पहुंच की ज़रूरत होती है, वहीं डाउनस्ट्रीम निर्माताओं एवं MSMEs को प्राथमिक धातु और स्क्रैप की भरोसेमंद व पारदर्शी क़ीमतों पर उपलब्धता चाहिए. इसी प्रकार से सेकेंडरी उत्पादकों को स्क्रैप की निर्बाध आपूर्ति चाहिए, साथ ही उन्हें शुल्कों, मानकों और अनुपालन को लेकर स्पष्ट नियमों व नीतियों की ज़रूरत होती है.
इसके लिए नीतियां ऐसी होनी चाहिए, जो किसी एक श्रेणी के हितधारकों को फायदा पहुंचाने के बजाय पूरी आपूर्ति श्रृंखला में शामिल लोगों के हितों का ध्यान रखें और उनकी परेशानियों को कम से कम करें. यानी नीतियां ऐसी हो, जो अपस्ट्रीम में कड़े नियमों को लागू करें, ताकि खनन व सामुदायिक लाभों को साझा करने में कोई दिक़्क़त नहीं आए. नीतियां ऐसी हों, जो सप्लाई चेन के मिडस्ट्रीम में तर्कसंगत और अनुमानित क़ीमतें सुनिश्चित करें, साथ ही बाज़ार तक सुगम पहुंच बनाने का काम करें. इसके अलावा, नीतियां डाउनस्ट्रीम में स्क्रैप आयात की व्यवस्था सुनिश्चित करने में मददगार हों, गुणवत्ता मानकों को बनाएं और स्क्रैप इकट्ठा करने के लिए बेहतर व्यवस्था स्थापित करें. कुल मिलाकर सबसे ज़रूरी यह नहीं है कि प्राथमिक और सेकेंडरी उत्पादकों में से किसी एक को चुना जाए, बल्कि ज़रूरी यह है कि एक ऐसा पारिस्थितिक तंत्र बनाया जाए, जिसमें न केवल संसाधनों का सही इस्तेमाल हो और पर्यावरण का ध्यान रखा जाए, बल्कि घरेलू स्तर पर बने उत्पादों का अधिक से अधिक मूल्य मिले.
भारत में ग्रीन जॉब्स यानी हरित नौकरियों के भविष्य को समझने के लिए सबसे पहले देश की कंपनियों और उद्योगों पर एक नज़र डालना बेहद ज़रूरी है. आंकड़ों के मुताबिक़ भारत के MSME सेक्टर का देश की GDP में लगभग 29% योगदान है, जबकि निर्यात में इस सेक्टर की कुल हिस्सेदारी 40% से अधिक है. देश में 6.3 करोड़ से अधिक एमएसएमई कंपनियां हैं और इनमें लगभग 11.1 करोड़ लोगों को रोज़गार मिला है. इनमें से ज़्यादातार कंपनियां उन्हीं जगहों पर स्थापित हैं, जहां पर सर्कुलर अर्थव्यवस्था से जुड़ी गतिविधियां संचालित होती हैं. जैसे कि इन कंपनियों में स्क्रैप पर आधारित फाउंड्री यानी धातुओं के स्क्रैप को पिघलाने वाले कारखाने, छोटे री-रोलर कंपनियां, रिपेयर वर्कशॉप, पार्ट्स को फिर से बनाने वाली कंपनियां, प्लास्टिक को रिसाइकिल करने वाले इकाइयां और कंस्ट्रक्शन साइटों व बिल्डिंगों के मलबे से उपयोगी निर्माण सामग्री बनाने वाली कंपनियां शामिल हैं.
“स्क्रैप-संग्रह, रिसाइक्लिंग क्षमता वृद्धि + रिसाइकल्ड सामग्री का न्यूनतम उपयोग अनिवार्य होना चाहिए.”
वैश्विक स्तर पर देखें, तो कचरा प्रबंधन और रीसाइक्लिंग उद्योग में क़रीब 6.9 मिलियन लोगों को रोज़गार मिला हुआ है, जो कि दुनिया भर में कुल रोज़गार का 0.2 फीसदी है. भारत की बात करें तो, अनुमान जताया गया है कि यहां इस इंडस्ट्री में मध्यम अवधि में लगभग 14 मिलियन रोज़गार, जबकि साल 2050 तक 10 मिलियन तक अतिरिक्त हरित रोज़गार सृजित हो सकते हैं. यह अनुमान कहीं न कहीं वैश्विक अनुमानों के मुताबिक़ ही हैं. सेकेंडरी मैन्युफैक्चरिंग और सर्कुलर-इकोनॉमी की एक विशेषता यह होती है कि इसमें आमतौर पर बड़े पैमाने पर धातुओं के खनन एवं धातुओं को गलाने की तुलना में उत्पादों को बनाने के लिए व्यापक स्तर पर कामगारों की ज़रूरत होती है. इसके अलावा, सेकेंडरी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां ज़्यादातर कहीं एक जगह पर केंद्रित नहीं होती है, बल्कि ये शहरों और औद्योगिक क्लस्टरों में फैली होती हैं. अगर नीतियों को सोच-समझकर बनाया जाए, तो कबाड़ के उपयोग, मरम्मत और दोबारा इस्तेमाल पर आधारित आर्थिक गतिविधियां यानी सर्कुलर अर्थव्यवस्था भौगोलिक रूप से बड़े इलाक़े में फैले कामगारों के लिए न केवल बेहद फायदेमंद हो सकती है, बल्कि कम व मध्यम कौशल वाले श्रमिकों के लिए रोज़गार के ज़्यादा अवसर भी सृजित कर सकती है. इसके अलावा, यह असंगठित सेक्टर में काम करने वाले श्रमिकों को संगठित क्षेत्र में आजीविका कमाने का अवसर प्रदान कर सकती है, साथ ही उन्हें सुरक्षित एवं अधिक वेतन वाली नौकरियां उपलब्ध करा सकती है. इसके विपरीत, अगर सर्कुलर-इकोनॉमी से जुड़ी रणनीतियों को केवल कुछ ही ऑटोमेटेड संयंत्रों या औद्योगिक क्लस्टरों के इर्द-गिर्द सुविधाएं विकसित करने को ध्यान में रखकर आगे बढ़ाया जाता है, तो यह पर्यावरण के लिहाज़ से तो लाभदायक होगा, लेकिन इससे अधिक संख्या में रोज़गार पैदा नहीं हो पाएंगे और इसका फायदा कामगारों को नहीं मिल पाएगा.
बेलेम में आयोजित COP30 से जो राजनीतिक संदेश निकला है, वो श्रम बाज़ार की गतिशीलिता यानी बदलाव में साफ तौर पर दिख रहा है. ज़ाहिर है कि COP30 के बारे में पहले से ही कहा जा रहा था कि यह “इंप्लीमेंटेशन COP” है, यानी इसे कार्यान्वयन कॉप माना जा रहा था. इस बार के सम्मेलन में बड़े देशों ने इस बात को तवज्जो दी है कि जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को कम करने के लिए नए-नए लक्ष्यों का ऐलान करने पर फोकस नहीं किया जाए, बल्कि वर्तमान प्रतिबद्धताओं को सेक्टर के हिसाब से व्यावहारिक और पुख्ता बदलावों को अमल में लाकर पूरा किया जाए. भारत के लिहाज़ से देखें, तो उसके लिए सेकेंडरी मैन्युफैक्चरिंग और सर्कुलर इकोनॉमी पर फोकस करने के नज़रिए का मतलब यह होगा कि नई घोषणाएं करने के बजाय पहले से मौज़ूद कार्यक्रमों और नीतियों को कम-कार्बन सामग्री एवं ग्रीन नौकरियों के साथ बेहतर तरीक़े से तालमेल स्थापित किया जाए. व्यावहारिक तौर पर इसका मतलब यह है कि नियामक और वित्तीय ढांचे यानी नियम-क़ानून और टैक्स प्रणाली कम-कार्बन उत्सर्जन वाले उत्पादों को बनाने वालों और इस तरह की सामग्री का इस्तेमाल करने वालों को छूट देने वाली व उन्हें प्रोत्साहित करने वाली होनी चाहिए. इसके अलावा, सरकारी ख़रीद एवं बुनियादी ढांचा विकास से जुड़ी परियोजनों के निर्माण के दौरान सेकेंडरी मेटल, रिसाइकिल्ड प्लास्टिक और कम कार्बन उत्सर्जन वाली निर्माण सामग्री को प्राथमिकता देने की पहल भी की जा सकती है. ऐसा करने से उन कंपनियों के उत्पादों की मांग बढ़ सकती है, जो स्वच्छ तकनीक़ों में निवेश करती हैं.
कुल मिलाकर मेटल, प्लास्टिक, कंस्ट्रक्शन वेस्ट और ई-वेस्ट के लिए सेक्टर के मुताबिक़ सर्कुलर इकोनॉमी योजनाओं को कार्यान्वित करने के लिए देश में जहां स्क्रैप को इकट्ठा करने और उसे रिसाइकिल करने की क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता होगी, वहीं सभी बड़ी आपूर्ति श्रृंखलाओं में रिसाइकिल करके बनाई गई सामग्री के इस्तेमाल की एक न्यूनतम सीमा निर्धारित करनी होगी. इसके अलावा, इस दिशा में एमएसएमई सेक्टर की सहायता के लिए क्रेडिट गारंटी, किफायती ऋण, क्लस्टर आधारित इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास एवं टेक्नोलॉजी को अपग्रेड करने वाली योजनाओं को भी अमल में लाना चाहिए. ऐसा करने से छोटी कंपनियां कम मुनाफे वाले और ज़्यादा प्रदूषण फैलाने वाले उत्पादों को बनाने के बजाय आधुनिक रिसाइक्लिंग, अनुपालन और नए-नए उत्पादों के निर्माण में निवेश के लिए प्रोत्साहित होंगी. इसके साथ-साथ कचरा बीनने वालों, छोटे स्क्रैप डीलर्स और बगैर पंजीकरण के अवैध तरीक़े से रिसाइकिल करने वालों जैसे अनियमित और अस्थाई कामगारों व श्रमिकों को सहकारी समितियों, प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन एवं सामाजिक उद्यम मॉडल के तहत लाना भी बेहद ज़रूरी है. इससे न केवल सर्कुलर अर्थव्यवस्था में पुख्ता बदलाव सुनिश्चित होगा, बल्कि न्यायपूर्ण बदलाव यानी समावेशी परिवर्तन भी पक्का होगा. कुल मिलाकर देखा जाए तो COP30 सम्मेलन का जो निष्कर्ष है और वहां जो अंतिम रणनीति निकलकर सामने आई है, उसमें सेकेंडरी मैन्युफैक्चरिंग को जॉब कार्बन डिविडेंड के नज़रिए से देखा गया है. इसके अनुसार मेटल के उत्पादन में प्राथमिक की जगह सेकेंडरी मैन्युफैक्चरिंग का विकल्प चुनने से प्रत्येक टन के उत्पादन में न केवल कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी होती है, बल्कि इसमें तुलनात्मक रूप से अधिक लोगों को रोज़गार के अवसर भी मिलते हैं. ज़ाहिर है कि यह रणनीति भारत के लिए काफ़ी फायदेमंद साबित हो सकती है. इसके अलावा, यह रणनीति भारत को एक ऐसा रास्ता दिखाती है, जिसे अपनाकर और ज़रूरी नीतिगत बदलाव करके वह जहां अपने हरित औद्योगिक लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में तेजी से अग्रसर हो सकता है, वहीं एमएसएमई सेक्टर को गति दे सकता है, साथ ही सतत विकास लक्ष्यों को पाने से जुड़ी अपनी प्रतिबद्धताओं को भी पूरा कर सकता है.
सौम्य भौमिक ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमी डिप्लोमेसी (CNED) में वर्ल्ड इकोनॉमीज एंड सस्टेनेबिलिटी के फेलो और प्रमुख हैं.
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Dr. Soumya Bhowmick is a Fellow and Lead for World Economies and Sustainability at the Centre for New Economic Diplomacy (CNED) at the Observer Research ...
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