युद्ध करता कोई और है लेकिन नुकसान झेलते आम लोग और निवेशक हैं यानी जिसकी गलती नहीं, कीमत वो चुकाता है. समस्या यह है कि अंतरराष्ट्रीय कानून में असली दोषी देश को पकड़ना मुश्किल है. जानिए क्या है वो अंतरराष्ट्रीय कानून और चुनौतियां.
हाल ही में इज़राइल, ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच हुए सैन्य टकरावों ने अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत बल प्रयोग की वैधता पर बहस को फिर से तेज कर दिया है. हालांकि इस चर्चा का बड़ा हिस्सा संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) के पालन पर केंद्रित रहता है लेकिन एक उतना ही महत्वपूर्ण सवाल अक्सर नजरअंदाज हो जाता है-अवैध बल प्रयोग की आर्थिक कीमत कौन चुकाता है?
यह स्थिति मौजूदा कानूनी ढांचे में एक संरचनात्मक कमी को उजागर करती है. जहां बल प्रयोग पर रोक अच्छी तरह स्थापित है, वहीं इसके बाद होने वाले आर्थिक नुकसान-खासतौर पर विदेशी निवेशकों के-अक्सर जिम्मेदार राज्य से नहीं जोड़े जाते. इसके बजाय, ऐसे नुकसान मेज़बान देशों और निजी पक्षों द्वारा द्विपक्षीय निवेश संधियों (BITs) के तहत संभाले जाते हैं, जहां इन्हें किसी विशेष राज्य द्वारा किए गए नुकसान के बजाय राजनीतिक या युद्ध संबंधी जोखिम माना जाता है.
इस व्यवस्था में, जहां संघर्ष से जुड़े नुकसान की जिम्मेदारी उस राज्य पर डाल दी जाती है जहां निवेश हुआ है, न कि उस राज्य पर जिसने वास्तव में नुकसान पहुंचाया, कई BITs में ‘वॉर क्लॉज’ शामिल होते हैं. उदाहरण के लिए, यूनाइटेड किंगडम मॉडल BIT का अनुच्छेद 4 कहता है कि युद्ध, सशस्त्र संघर्ष, क्रांति या आंतरिक अशांति के कारण नुकसान उठाने वाले निवेशकों को कम से कम वही व्यवहार मिलना चाहिए जो उस देश के नागरिकों या किसी तीसरे देश के निवेशकों को दिया जाता है.
पश्चिम एशिया में हाल के तनावों ने संप्रभुता, हस्तक्षेप और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के पालन जैसे सवालों को फिर से सामने ला दिया है. लेकिन आर्थिक प्रभाव का बोझ विदेशी निवेशकों पर पड़ता है. उन्हें अनुबंधों में बाधा, नीतिगत अनिश्चितता और अप्रत्याशित नुकसान का सामना करना पड़ता है, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय कानून अब भी केवल ‘साइड इफेक्ट’ के रूप में देखता है, न कि राज्य की जिम्मेदारी के रूप में.
हालांकि, ऐसे प्रावधानों की व्यावहारिक उपयोगिता सीमित है. ये मुख्य रूप से मेज़बान राज्य की जिम्मेदारियों को तय करते हैं, न कि बाहरी सैन्य कार्रवाई से हुए नुकसान के लिए जिम्मेदारी तय करते हैं. इसलिए, ये उन स्थितियों को संबोधित नहीं करते जहां नुकसान किसी तीसरे राज्य द्वारा किया गया हो, जो निवेश संधि के दायरे से बाहर हो. इसका वास्तविक दुनिया पर स्पष्ट प्रभाव पड़ता है. पश्चिम एशिया में हाल के तनावों ने संप्रभुता, हस्तक्षेप और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के पालन जैसे सवालों को फिर से सामने ला दिया है. लेकिन आर्थिक प्रभाव का बोझ विदेशी निवेशकों पर पड़ता है. उन्हें अनुबंधों में बाधा, नीतिगत अनिश्चितता और अप्रत्याशित नुकसान का सामना करना पड़ता है, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय कानून अब भी केवल ‘साइड इफेक्ट’ के रूप में देखता है, न कि राज्य की जिम्मेदारी के रूप में.
संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) के तहत बल प्रयोग पर प्रतिबंध है, सिवाय कुछ सीमित परिस्थितियों के-जैसे आत्मरक्षा या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति. यदि इस प्रावधान का उल्लंघन होता है, तो संबंधित राज्य जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. लेकिन व्यवहार में, ऐसे उल्लंघनों के लिए मुआवजा बहुत कम मिलता है और यह आमतौर पर स्पष्ट कानूनी अधिकार के बजाय राजनीतिक बातचीत पर निर्भर करता है.
परिणामस्वरूप, अवैध कृत्य और उससे होने वाले नुकसान की जिम्मेदारी के बीच एक अंतर पैदा हो जाता है. सामान्य अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत, अवैध बल प्रयोग करने वाला राज्य नुकसान के लिए जिम्मेदार होता है. लेकिन व्यवहार में, निवेशक अपने दावे मेज़बान राज्य के खिलाफ BIT के तहत करते हैं. इसका मतलब यह है कि संघर्ष के दौरान हुए नुकसान के लिए मेज़बान राज्य को जवाबदेह बनाया जाता है, जबकि वास्तविक कारण किसी तीसरे देश की सैन्य कार्रवाई होती है.
लीबिया की अस्थिरता यह दिखाती है कि निवेश कितने हद तक राजनीतिक और सुरक्षा हालात पर निर्भर होते हैं. हालांकि लीबिया कई BITs का हिस्सा है, ये संधियां उन स्थितियों में स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं देतीं, जहां नुकसान सीधे मेज़बान राज्य की कार्रवाई से नहीं, बल्कि संघर्ष के बाद की परिस्थितियों से उत्पन्न होता है.
नतीजतन, निवेशकों को अक्सर मेज़बान राज्य से ही मुआवजा मांगना पड़ता है, भले ही वास्तविक नुकसान व्यापक संघर्ष के कारण हुआ हो. यह अंतरराष्ट्रीय कानून की एक गहरी कमजोरी को दर्शाता है, जहां कड़े नियम तो मौजूद हैं, लेकिन उनके प्रभावी क्रियान्वयन के साधन कमजोर हैं. व्यवहार में, अवैध बल प्रयोग की आर्थिक कीमत निजी पक्षों पर डाल दी जाती है, जबकि जिम्मेदार राज्य अक्सर इससे बच निकलते हैं. अंतरराष्ट्रीय निवेश कानून भी इस समस्या को सुधारने में ज्यादा मदद नहीं करता, क्योंकि इसका ध्यान मुख्य रूप से BITs के तहत मेज़बान राज्य के आचरण पर ही केंद्रित रहता है.
सामान्य अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत, अवैध बल प्रयोग करने वाला राज्य नुकसान के लिए जिम्मेदार होता है. लेकिन व्यवहार में, निवेशक अपने दावे मेज़बान राज्य के खिलाफ BIT के तहत करते हैं. इसका मतलब यह है कि संघर्ष के दौरान हुए नुकसान के लिए मेज़बान राज्य को जवाबदेह बनाया जाता है, जबकि वास्तविक कारण किसी तीसरे देश की सैन्य कार्रवाई होती है.
विधिक शोध (scholarship यह बताता है कि भले ही द्विपक्षीय निवेश संधियाँ (BITs) सशस्त्र संघर्ष के दौरान लागू रह सकती हैं, लेकिन जब नुकसान मेज़बान राज्य के बजाय किसी तीसरे राज्य की कार्रवाई से होता है, तब ये बहुत कम मार्गदर्शन देती हैं. ऐसी स्थिति में यह स्पष्ट नहीं होता कि अंततः नुकसान की जिम्मेदारी किसकी होनी चाहिए.
मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने सशस्त्र संघर्ष से जुड़े निवेश नुकसान के मामलों पर बहुत कम विचार किया है. एक उदाहरण एशियन एग्रीकल्चरल प्रोडक्ट्स लिमिटेड बनाम श्रीलंका है, जिसमें न्यायाधिकरण ने काउंटर-इंसर्जेंसी ऑपरेशन के दौरान निवेश के विनाश पर विचार किया और संबंधित BIT के तहत मेज़बान राज्य की जिम्मेदारी का परीक्षण किया. हालांकि, इस तरह के मामले आमतौर पर मेज़बान राज्य के आचरण से जुड़े होते हैं. लेकिन जब निवेशकों का नुकसान किसी तीसरे राज्य की सैन्य कार्रवाई से होता है, तब जिम्मेदारी और भी अस्पष्ट हो जाती है.
निवेश संधियाँ मुख्य रूप से मेज़बान राज्यों को बाध्य करने के लिए बनाई जाती हैं, न कि हस्तक्षेप करने वाले राज्यों को. इसके परिणामस्वरूप, ‘फोर्स मेज्योर’ या ‘आवश्यकता’ जैसे सिद्धांत स्थिति को और जटिल बना देते हैं. यदि अस्थिरता बाहरी कारणों से उत्पन्न होती है, तो मेज़बान राज्य इन सिद्धांतों का सहारा लेकर अपनी संधि जिम्मेदारियों से विचलन को सही ठहरा सकता है. इससे मेज़बान राज्य की जिम्मेदारी कम हो सकती है, लेकिन यह उस राज्य पर जिम्मेदारी नहीं डालता जिसने वास्तव में नुकसान पहुंचाया. परिणामस्वरूप, एक कानूनी शून्य बन जाता है, जिसमें निवेशकों के पास कोई प्रभावी उपाय नहीं बचता-मेज़बान राज्य जिम्मेदारी से बच जाता है और हस्तक्षेप करने वाला राज्य BIT के दायरे से बाहर रहता है.
अंतरराष्ट्रीय कानून पूरी तरह से इस मुद्दे पर मौन नहीं रहा है. समय के साथ, कुछ कानूनी तंत्रों ने यह स्वीकार किया है कि गंभीर राज्यीय कृत्य केवल कूटनीतिक या राजनीतिक नुकसान ही नहीं, बल्कि व्यक्तिगत और आर्थिक हानि भी उत्पन्न कर सकते हैं. लेकिन जब आर्थिक नुकसान अवैध बाहरी बल प्रयोग से होता है, तब यह मान्यता अभी भी सीमित रहती है. ऐसी स्थिति में, अवैधता की कीमत धीरे-धीरे निजी पक्षों पर डाल दी जाती है, जिम्मेदारी बिखर जाती है और समाधान अप्रत्यक्ष ही रह जाते हैं.
यह परिणाम अंतरराष्ट्रीय कानून के कुछ बुनियादी सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है. Chorzów फैक्टरी मामला में यह स्थापित किया गया था कि अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन होने पर पूर्ण प्रतिकर देना अनिवार्य है. यही सिद्धांत अवैध बल प्रयोग से होने वाले आर्थिक नुकसान पर भी लागू होना चाहिए. लेकिन व्यवहार में, यह सिद्धांत मुख्य रूप से राज्यों के बीच के स्तर तक सीमित रहता है. निजी पक्षों के लिए, जो अवैध बल प्रयोग से प्रभावित होते हैं, उपाय अक्सर अप्रत्यक्ष होते हैं और कूटनीतिक संरक्षण या राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करते हैं.
जैसे संयुक्त राष्ट्र मुआवजा आयोग, जो इराक का कुवैत पर आक्रमण के बाद बनाया गया था, उसने दिखाया कि गलत करने वाले देश से ही पैसा लिया जा सकता है. आगे चलकर कानूनों को साथ मिलकर काम करना होगा, नहीं तो नुकसान हमेशा आम निवेशकों और मेज़बान देशों को ही उठाना पड़ेगा.
राज्य जिम्मेदारी के सिद्धांत के तहत, अवैध बल प्रयोग के आर्थिक परिणामों का बोझ हस्तक्षेप करने वाले राज्य पर होना चाहिए. लेकिन व्यवहार में, यह बोझ मेज़बान राज्य और निजी निवेशकों पर पड़ता है. हालांकि अंतरराष्ट्रीय कानून, विशेष रूप से पर्यावरणीय क्षति के मामलों में, यह मानता है कि गंभीर उल्लंघनों के लिए आर्थिक नुकसान की भरपाई होनी चाहिए, लेकिन इसे लागू करने के प्रभावी तंत्र अभी भी मौजूद नहीं हैं.
यह समस्या क्यों है
अवैध बल प्रयोग से जुड़ी गहरी समस्या केवल आर्थिक नहीं, बल्कि वैचारिक भी है. जब ऐसे नुकसान को कानूनी चोट के बजाय ‘बाजार जोखिम’ के रूप में देखा जाता है, तो जिम्मेदारी असल दोषी से हट जाती है. इस तरह, बल प्रयोग पर रोक तो औपचारिक रूप से बनी रहती है, लेकिन उसके परिणाम व्यवहार में कमजोर पड़ जाते हैं.
इस समस्या का समाधान करने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून में बड़े बदलाव जरूरी नहीं हैं, लेकिन यह समझना जरूरी है कि अलग-अलग कानूनी ढांचे आपस में कैसे काम करते हैं. कम से कम यह स्वीकार करना होगा कि अवैध बल प्रयोग के आर्थिक परिणाम केवल आकस्मिक नहीं हैं, बल्कि वे उस नुकसान का हिस्सा हैं जिसे अंतरराष्ट्रीय कानून को संबोधित करना चाहिए.
एक सरल तरीका यह है कि देश अपने निवेशकों की मदद के लिए जिम्मेदार देश के खिलाफ आवाज उठाएँ. दूसरा तरीका है कि युद्ध के बाद नुकसान की भरपाई के लिए एक पक्का सिस्टम बनाया जाए. जैसे संयुक्त राष्ट्र मुआवजा आयोग, जो इराक का कुवैत पर आक्रमण के बाद बनाया गया था, उसने दिखाया कि गलत करने वाले देश से ही पैसा लिया जा सकता है. आगे चलकर कानूनों को साथ मिलकर काम करना होगा, नहीं तो नुकसान हमेशा आम निवेशकों और मेज़बान देशों को ही उठाना पड़ेगा.
ज्योति सिंह दिल्ली स्थित एक वकील और शोधकर्ता हैं.उन्होंने भारत सरकार के कानूनी सलाहकार के रूप में काम किया है और कई निवेश संधि वार्ताओं में सक्रिय रूप से शामिल रही हैं.
The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.
Jyoti Singh is a Delhi-based advocate and researcher. She has worked as a legal consultant to the Government of India and has been actively involved ...
Read More +