वेनेज़ुएला में सत्ता परिवर्तन ने वैश्विक तेल बाज़ार को हिला दिया है लेकिन सबसे गहरा असर चीन की तेल कंपनियों पर पड़ा है. कभी ‘तेल के बदले कर्ज़’ की साझेदारी रही यह कहानी अब भू-राजनीतिक टकराव, प्रतिबंध और अनिश्चित भविष्य में कैसे बदल गई इस लेख में पढ़ें.
3 जनवरी 2026 को अमेरिकी सेना के द्वारा वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को सत्ता से बेदखल करने के बाद वेनेज़ुएला में पैदा राजनीतिक संकट दुनिया के ऊर्जा भंडार और उसके प्रवाह को नया आकार दे रहा है. वेनेज़ुएला में हाल के राजनीतिक घटनाक्रम और बदलती विश्व व्यवस्था ने वैश्विक तेल बाज़ार में विदेशी निवेशकों की कमज़ोरियों को उजागर किया है. वैसे तो वेनेज़ुएला के तेल बाज़ार में दुनिया की कई कंपनियां मौजूद हैं लेकिन इस घटनाक्रम का सबसे ज़्यादा असर चीन की कंपनियों पर पड़ा है जो पिछले दो दशकों के दौरान वेनेज़ुएला के तेल क्षेत्र और व्यापक बुनियादी ढांचे के विकास में प्रमुख भूमिका निभा रही हैं. ऊर्जा सुरक्षा पर आधारित एक समय की सामरिक साझेदारी अब भू-राजनीतिक टकराव, प्रतिबंधों और शासन की अस्थिरता के कारण अनिश्चितता का सामना कर रही है.
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वेनेज़ुएला के तेल उत्पादन में काफी गिरावट दर्ज की गई है. 90 के दशक में वेनेज़ुएला में 35 लाख बैरल प्रति दिन का उत्पादन होता था जो गिरकर पिछले साल लगभग 11 लाख बैरल रह गया. इसका कारण कुप्रबंधन, कम निवेश और हाल के दिनों में अमेरिकी प्रतिबंध हैं. चाइना पेट्रोलियम एंड केमिकल कॉरपोरेशन (SINOPEC) और चाइना नेशनल पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (CNPC) जैसी चीन की कंपनियां वेनेज़ुएला के भारी कच्चे तेल की प्रमुख ख़रीदार हैं. मॉर्गन स्टेनली के अनुसार, चीन के सरकारी क्षेत्र की दोनों कंपनियों के पास विदेशी कंपनियों में सबसे ज़्यादा तेल का भंडार है जो क्रमश: 2.8 अरब बैरल और 1.6 अरब बैरल है. 2016 से चीन की कंपनियों ने वेनेज़ुएला के तेल क्षेत्र में 2.1 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश किया है. चीन की बड़ी सरकारी कंपनी CNPC 2019 में अमेरिकी प्रतिबंध लागू होने से पहले प्रमुख निवेशक थी. वो अभी भी सिनोवेंसा (जो CNPC और वेनेज़ुएला की सरकारी तेल कंपनी PDVSA के बीच एक ज्वाइंट वेंचर है) के ज़रिए कच्चा तेल निकालती है. प्रतिबंध के बाद CNPC ने वेनेज़ुएला से सीधे तेल की ढुलाई रोक दी है लेकिन व्यापारियों और दूसरी सरकारी कंपनियों के ज़रिए उसका काम-काज अभी भी जारी है. अमेरिकी प्रतिबंधों से जो खालीपन आया है, उसे भरने के लिए उसने निवेश और उत्पादन के क्षेत्रों में वेनेज़ुएला की सरकारी तेल कंपनियों के साथ-साथ चीन की अन्य प्रमुख कंपनियों (जिनमें चाइना कॉनकॉर्ड रिसोर्स कॉर्प, केरुई पेट्रोलियम और अनहुई एरहुआन पेट्रोलियम ग्रुप शामिल हैं) का फायदा उठाया है.
वेनेज़ुएला के तेल बाज़ार में दुनिया की कई कंपनियां मौजूद हैं लेकिन इस घटनाक्रम का सबसे ज़्यादा असर चीन की कंपनियों पर पड़ा है जो पिछले दो दशकों के दौरान वेनेज़ुएला के तेल क्षेत्र और व्यापक बुनियादी ढांचे के विकास में प्रमुख भूमिका निभा रही हैं.

स्रोत: मॉर्गन स्टेनली रिसर्च, वुड मैगज़ीन
चीन और वेनेज़ुएला के बीच ‘तेल के बदले कर्ज़’ के ढांचे के ज़रिए घनिष्ठ आर्थिक संबंध हैं. इसके तहत चीन के बैंक बाज़ार दर से कम पर तेल उत्पादन के लिए बड़े पैमाने पर पैसा मुहैया कराते हैं. इस कर्ज़ की शर्त ये होती है कि तेल और कंपनी का हिस्सा चीन की कंपनियों को बेचा जाएगा. इस ढांचे के तहत लंबे समय के लिए कच्चे तेल की सप्लाई के बदले अरबों डॉलर का कर्ज़ दिया गया है. इसके नतीजतन चीन के लिए वेनेज़ुएला भारी कच्चे तेल का एक प्रमुख सप्लायर बनकर उभरा है. वहीं चीन की कंपनियों ने ज्वाइंट वेंचर साझेदारी के तहत वेनेज़ुएला में तेल क्षेत्रों, रिफाइनरी, पाइपलाइन और सेवाओं में भारी निवेश किया है. लेकिन मादुरो को लेकर हाल के घटनाक्रम के बाद वेनेज़ुएला में नेतृत्व की अनिश्चितता, अमेरिका दबाव और तेल के निर्यात नियंत्रण में बदलाव से पैदा मौजूदा संकट ने इस व्यवस्था को बाधित किया है. वेनेज़ुएला के तेल निर्यात को अमेरिका की तरफ मोड़ने के हाल के कदम चीन के लिए उपलब्ध तेल की मात्रा को कम करने का ख़तरा पैदा करते हैं जो लैटिन अमेरिका में चीन की ऊर्जा कूटनीति के एक प्रमुख स्तंभ के लिए चुनौती है. चूंकि तेल निर्यात वेनेज़ुएला में चीन के वाणिज्यिक हितों की रीढ़ है, ऐसे में उत्पादन या निर्यात में लंबे समय की रुकावट का चीन की रिफाइनरी और व्यापारियों पर तुरंत असर पड़ेगा. वेनेज़ुएला का भारी कच्चा तेल (जो छूट की वजह से आकर्षक था) प्रतिबंधों, बीमा से जुड़ी पाबंदियों और लॉजिस्टिक की दिक्कतों के कारण निर्यात के लिए तेज़ी से मुश्किल होता जा रहा है. चीन की कंपनियों के लिए इससे दो बड़े ख़तरे हैं. पहला, सप्लाई की अनिश्चितता रिफाइनरी कंपनियों को मिडिल ईस्ट या अफ्रीका के महंगे विकल्पों की तरफ मोड़ेगी. दूसरा, भविष्य में तेल उत्पादन से जुड़े कॉन्ट्रैक्ट (जिनका उपयोग अक्सर कर्ज़ चुकाने के लिए किया जाता है) में देरी हो सकती है या नई राजनीतिक व्यवस्था के तहत उनकी शर्तों पर फिर से बात हो सकती है जिससे मुनाफा कम हो सकता है.
वेनेज़ुएला के तेल निर्यात को अमेरिका की तरफ मोड़ने के हाल के कदम चीन के लिए उपलब्ध तेल की मात्रा को कम करने का ख़तरा पैदा करते हैं जो लैटिन अमेरिका में चीन की ऊर्जा कूटनीति के एक प्रमुख स्तंभ के लिए चुनौती है.
वेनेज़ुएला के तेल सेक्टर में सबसे बड़ी हिस्सेदारी चाइना नेशनल पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (CNPC) और चाइना पेट्रोलियम एंड केमिकल कॉरपोरेशन (SINOPEC) की है. वेनेज़ुएला की सरकारी तेल कंपनी PDVSA के साथ इन कंपनियों का दीर्घकालिक ज्वाइंट वेंचर है, विशेष रूप से ओरिनोको बेल्ट में जहां दुनिया में भारी तेल का सबसे बड़ा भंडार है. अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुमान के मुताबिक यहां मौजूदा तकनीकों से 380 से 652 अरब कच्चा तेल निकाला जा सकता है. वेनेज़ुएला का संकट इन कंपनियों के लिए कई चुनौतियां पेश करता है. पहला, राजनीतिक अस्थिरता और प्रतिबंधों से उत्पन्न परिचालन की रुकावटों ने भारी कच्चे तेल के प्रसंस्करण के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण सामानों की उपलब्धता को सीमित कर दिया है. दूसरा, सप्लाई चेन की अनिश्चितता एक और चिंता है. वैसे तो ऐतिहासिक रूप से वेनेज़ुएला के ज़्यादातर कच्चे तेल का इस्तेमाल चीन की छोटी रिफाइनरी में हो जाता था, लेकिन ब्लेंडिंग और व्यापार परिचालन के लिए SINOPEC और CNPC भी इस तेल पर निर्भर करती हैं. लंबे समय तक निर्यात में रुकावट से ख़रीद की लागत बढ़ सकती है और रिफाइनरी का लाभ कम हो सकता है. अंत में, वित्तीय जोखिम बहुत ज़्यादा है. चीन की ऊर्जा कंपनियां वेनेज़ुएला के साथ सरकार द्वारा समर्थित कर्ज की व्यवस्था से नज़दीकी तौर पर जुड़ी हुई हैं. नई सरकार के तहत कर्ज़ के किसी भी पुनर्गठन से कॉन्ट्रैक्ट में बदलाव, संपत्ति का फिर से मूल्यांकन और देरी से भुगतान का ख़तरा हो सकता है. इससे बड़ी सरकारी कंपनियों की बैलेंस-शीट पर भी असर हो सकता है. चीन की व्यापक आर्थिक मंदी के बीच इसके दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं.
तेल क्षेत्र के अलावा भी चीन की वित्तीय देनदारी बहुत ज़्यादा है. वेनेज़ुएला के कर्ज (जो ज़्यादातर चीन के बैंकों से लिया गया है) दुनिया में सबसे जटिल अनसुलझे सॉवरेन डिफॉल्ट में से एक बने हुए हैं. 2026 की शुरुआत में वेनेज़ुएला पर चीन का बकाया कर्ज़ 10 से लेकर 20 अरब अमेरिकी डॉलर के बीच है. चीन ने 2000 से 2023 के बीच वेनेज़ुएला को लगभग 106 अरब अमेरिकी डॉलर कर्ज़ के रूप में दिया है. इस तरह वेनेज़ुएला, चीन का कर्ज़ हासिल करने के मामले में चौथे नंबर पर है. लेकिन जनवरी के पहले हफ़्ते में राजनीतिक उथल-पुथल के बाद चीन के शीर्ष वित्तीय रेगुलेटर नेशनल फाइनेंशियल रेगुलेटरी एडमिनिस्ट्रेशन (NFRA) ने घरेलू बैंकिंग सेक्टर को सुरक्षित करने के लिए तत्काल निर्देश जारी किए.
SINOPEC और CNPC जैसी दिग्गज ऊर्जा कंपनियों के लिए दांव पर बहुत कुछ लगा हुआ है. अन्य कंपनियों के लिए जोखिम कम है लेकिन उनके हित कर्ज़ पुनर्गठन के परिणाम से नज़दीकी तौर पर जुड़े हुए हैं.
राजनीतिक मोर्चे पर देखें तो वेनेज़ुएला का संकट एक व्यापक भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का अखाड़ा बन गया है. पश्चिमी गोलार्ध में चीन के प्रभाव को कम करने के अमेरिकी प्रयासों से वेनेज़ुएला में काम कर रही चीन की कंपनियों के लिए रेगुलेटरी और कानूनी अनिश्चितताएं पैदा हो रही हैं. ट्रंप प्रशासन इस क्षेत्र में चीन, रूस और ईरान के प्रभाव को कम करने के लिए “डॉनरो ड्रॉक्ट्रिन” को लागू कर रहा है. अमेरिका ने ज़ोर देकर कहा है कि वो वेनेज़ुएला में तब तक नए तेल उत्पादन की इजाज़त नहीं देगा, जब तक कि वो अमेरिका के राष्ट्रीय हितों को पूरा नहीं करेगा. इस संकट का फायदा उठाकर अमेरिका, वेनेज़ुएला के कच्चे तेल का निर्यात अमेरिकी बाज़ार की तरफ मोड़ना चाहता है ताकि ऊर्जा बाज़ार में अमेरिकी वर्चस्व को फिर से बहाल कर सके.
वेनेज़ुएला का संकट राजनीतिक रूप से अस्थिर माहौल में काम कर रही चीन की कंपनियों के लिए एक गंभीर परीक्षा है. SINOPEC और CNPC जैसी दिग्गज ऊर्जा कंपनियों के लिए दांव पर बहुत कुछ लगा हुआ है. अन्य कंपनियों के लिए जोखिम कम है लेकिन उनके हित कर्ज़ पुनर्गठन के परिणाम से नज़दीकी तौर पर जुड़े हुए हैं. चीन की सरकार के समर्थन और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से तुरंत झटके नहीं लगेंगे लेकिन ये प्रकरण बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच विदेशों में रणनीतिक निवेश के ख़तरे के बारे में बताता है.
अमित रंजन आलोक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च इंटर्न हैं.
The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.
Amit Ranjan Alok is a Research Intern at ORF. He is a second-year PhD candidate in Chinese political economy at the Centre for East Asian ...
Read More +