भारत देश के भीतर तंबाकू के इस्तेमाल को कम करने की कोशिश करता है लेकिन बाहर के देशों में इसके उत्पादन और निर्यात के रिकॉर्ड बन रहे हैं. जानें कैसे यह नीति-विरोधाभास स्वास्थ्य हितों और वसुधैव कुटुंबकम की भावना पर सवाल खड़े करता है.
भारत एक ओर देश के भीतर तंबाकू के उपयोग को हतोत्साहित करता है, वहीं दूसरी ओर विदेशों में इसके उत्पादन और निर्यात को बढ़ावा देता है. यह दोहरी नीति न केवल वसुधैव कुटुंबकम की भावना को कमजोर करती है बल्कि रोकी जा सकने वाली स्वास्थ्य हानि को भी दूसरे देशों में निर्यात करती है. 2019 में किए गए ग्लोबल यूथ टोबैको सर्वे (GYTS-4) के अनुसार, भारत में 13-15 वर्ष आयु वर्ग के 2.8 प्रतिशत बच्चों ने ई-सिगरेट के इस्तेमाल की बात स्वीकार की थी. इसी वर्ष भारत सरकार ने ई-सिगरेट पर प्रतिबंध लगाया ताकि युवाओं को इसके दुष्प्रभावों से बचाया जा सके. यह प्रतिबंध इसलिए भी जरूरी था क्योंकि ई-सिगरेट निकोटिन की लत और आगे चलकर धूम्रपान की ओर ले जाने का रास्ता बनती है.
चित्र 1. 13-15 आयु वर्ग में तंबाकू का सेवन: जीवाईटीएस इंडिया 2003, 2006, 2009, 2019

Source: Observer Research Foundation (2025)
हालांकि, प्रतिबंध के बावजूद शहरी इलाकों में ई-सिगरेट का अवैध कारोबार बढ़ने की आशंका बनी हुई है जिससे युवाओं तक इसकी आसान पहुँच हो रही है. वर्तमान में चल रहा ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे (GATS-3), जो 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की आबादी को कवर करता है, देश में ई-सिगरेट के मौजूदा इस्तेमाल की स्पष्ट तस्वीर देगा. इससे पहले, GATS-2 (2016-17) में पाया गया था कि केवल 0.02 प्रतिशत लोग ई-सिगरेट का उपयोग करते थे.
चित्र 2. भारत में 15-49 आयु वर्ग के लोगों में तंबाकू सेवन के रुझान (एनएफएचएस)

Source: Observer Research Foundation (2025)
2019 में ई-सिगरेट पर लगाया गया प्रतिबंध युवाओं, विशेषकर बच्चों, में तंबाकू के सेवन को कम करने की दिशा में भारत सरकार का एक मजबूत और सराहनीय कदम था. बीते वर्षों में भारत ने तंबाकू नियंत्रण के लिए कई ठोस नीतिगत कदम उठाए. स्कूलों के पाठ्यक्रम में तंबाकू के नुकसान से जुड़ा विषय जोड़ा गया ताकि बच्चों में शुरू से ही सही सोच विकसित हो. मीडिया और सिनेमा के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाए गए जिससे लोगों तक इसके स्वास्थ्य जोखिमों की जानकारी पहुँची और नशा छोड़ने के प्रयासों को समर्थन मिला. इसके साथ ही, तंबाकू की बिक्री और प्रचार पर सख्त नियम बनाए गए जिससे बच्चों की पहुँच सीमित हुई. इन प्रयासों का असर यह हुआ कि पिछले दो दशकों में न केवल युवाओं बल्कि वयस्कों में भी तंबाकू के उपयोग में उल्लेखनीय कमी आई है.
स्कूलों के पाठ्यक्रम में तंबाकू के नुकसान से जुड़ा विषय जोड़ा गया ताकि बच्चों में शुरू से ही सही सोच विकसित हो. मीडिया और सिनेमा के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाए गए जिससे लोगों तक इसके स्वास्थ्य जोखिमों की जानकारी पहुँची और नशा छोड़ने के प्रयासों को समर्थन मिला.
इसी पृष्ठभूमि में, हाल ही में भारत सरकार ने तंबाकू नियंत्रण को और मजबूत करने के लिए नए कदम उठाए. 1 फरवरी से सिगरेट पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क बढ़ाया गया जो प्रति सिगरेट ₹2.05 से ₹8.50 तक है. साथ ही, जीएसटी ढांचे में तंबाकू को 40 प्रतिशत की सबसे ऊँची डिमेरिट श्रेणी में रखा गया. इन कदमों का उद्देश्य सिगरेट पर कुल कर बोझ को लगभग 53 प्रतिशत से बढ़ाकर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के सुझाए गए 75 प्रतिशत के स्तर के करीब लाना था. इसके अलावा, संसद ने हेल्थ सिक्योरिटी सेस / नेशनल सिक्योरिटी सेस अधिनियम, 2025 पारित किया जो सीधे तौर पर पान मसाले को निशाना बनाता है.
जहाँ एक ओर भारत ने राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम के तहत तंबाकू के सेवन को कम करने में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है, वहीं दूसरी ओर सरकार की कुछ संस्थाएं तंबाकू को अब भी एक महत्वपूर्ण आर्थिक अवसर के रूप में देखती हैं. यह दोहरी सोच भारत की तंबाकू नीति के भीतर मौजूद गहरे अंतर्विरोध को उजागर करती है. स्वास्थ्य नीति का उद्देश्य जहाँ तंबाकू के दुष्प्रभावों से जनता की रक्षा करना है, वहीं आर्थिक और व्यापारिक तंत्र इसे आय, निर्यात और आजीविका के स्रोत के रूप में आगे बढ़ा रहा है.
चित्र 3. भारत से तंबाकू और तंबाकू उत्पादों का निर्यात (मीट्रिक टन में)

Source: Prepared by the author using data compiled from The Tobacco Board
तंबाकू बोर्ड ऑफ इंडिया, जो एक अर्ध-सरकारी संस्था है, फ्ल्यू-क्योरड वर्जीनिटी (FCV) तंबाकू के उत्पादन, नीलामी और विपणन को नियंत्रित करता है. बोर्ड की भूमिका केवल नियामक तक सीमित नहीं है बल्कि वह तंबाकू की खेती को प्रोत्साहित करने में भी सक्रिय है. इसके अंतर्गत किसानों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सब्सिडी, तकनीकी सहायता, अनुसंधान सहयोग और बाज़ार तक सुनिश्चित पहुँच जैसी सुविधाएं दी जाती हैं. साथ ही, बोर्ड का एक प्रमुख उद्देश्य भारतीय तंबाकू के निर्यात को बढ़ावा देना भी है. इसी कारण हाल के वर्षों में भारत से तंबाकू और तंबाकू उत्पादों का निर्यात तेज़ी से बढ़ा है जिससे भारत विश्व के बड़े तंबाकू उत्पादक और निर्यातक देशों में शामिल हो गया है.
भारत की तंबाकू नीति कई मंत्रालयों और सरकारी स्तरों में बंटी हुई है. स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तंबाकू नियंत्रण और उपभोग में कमी पर ज़ोर देता है जबकि वाणिज्य, कृषि और वित्त से जुड़े विभाग राजस्व, निर्यात और किसानों की आय जैसे पहलुओं को प्राथमिकता देते हैं. इस बहु-संस्थागत ढाँचे के कारण स्वास्थ्य हितों और व्यापारिक हितों के बीच लगातार टकराव बना रहता है.
1 फरवरी से सिगरेट पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क बढ़ाया गया जो प्रति सिगरेट ₹2.05 से ₹8.50 तक है. साथ ही, जीएसटी ढांचे में तंबाकू को 40 प्रतिशत की सबसे ऊँची डिमेरिट श्रेणी में रखा गया.
सरकार यह भी दावा करती रही है कि तंबाकू बोर्ड का उद्देश्य केवल तंबाकू की खेती को बनाए रखना नहीं है बल्कि दीर्घकाल में किसानों को वैकल्पिक फसलों की ओर ले जाना है. इसी क्रम में 2019 में तंबाकू बोर्ड ने तंबाकू की खेती को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई थी. बोर्ड ने यह भी कहा कि वह केंद्रीय तंबाकू अनुसंधान संस्थान (CTRI) के साथ मिलकर किसानों के लिए आर्थिक रूप से टिकाऊ वैकल्पिक फसलों और आजीविका विकल्पों पर काम कर रहा है.
चित्र 4. कृषि उत्पादन: तंबाकू (लाख टन)

Source: Prepared by the author using data compiled from the Reserve Bank of India
हालाँकि, जमीनी हकीकत यह दिखाती है कि तंबाकू उत्पादन और निर्यात को मिलने वाला मजबूत संस्थागत समर्थन, किसानों को तंबाकू छोड़ने के लिए किए जा रहे प्रयासों से कहीं अधिक प्रभावशाली है. यही कारण है कि नीति के स्तर पर वैकल्पिक खेती की बात तो की जाती है लेकिन व्यवहार में तंबाकू अर्थव्यवस्था लगातार सशक्त होती जा रही है.
इसके साथ ही, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) के तहत फसल विविधीकरण कार्यक्रम (CDP) शुरू किया, जिसे 2015-16 से 10 तंबाकू उत्पादक राज्यों में लागू किया गया. इसका उद्देश्य तंबाकू किसानों को दूसरी फसलों की ओर प्रेरित करना था लेकिन इसके बावजूद, भारत में तंबाकू की खपत घटने के बाद भी इसका उत्पादन लगातार बढ़ता रहा है. दशकों के आंकड़े दिखाते हैं कि तंबाकू की खेती के क्षेत्रफल में कोई स्थायी कमी नहीं आई है. यह इस बात का संकेत है कि वैकल्पिक फसलों की योजनाएं उतनी प्रभावी नहीं रहीं, जितना कि तंबाकू उत्पादन और बाजार को मिलने वाला मजबूत सरकारी समर्थन.
चित्र 5. तंबाकू की खेती के अंतर्गत क्षेत्रफल (लाख हेक्टेयर)

Source: Prepared by the author using data compiled from the Reserve Bank of India
सरकारी सहायता, अनुसंधान और आधुनिक तकनीकों के व्यापक उपयोग से तंबाकू की खेती की उत्पादकता लगातार बढ़ी है. बेहतर बीज, उन्नत सिंचाई व्यवस्था और वैज्ञानिक खेती पद्धतियों ने प्रति हेक्टेयर उत्पादन को अधिक लाभकारी बना दिया है. जब किसी फसल से कम लागत में अधिक आय मिलने लगती है, तो किसान स्वाभाविक रूप से उससे जुड़े रहना पसंद करते हैं. ऐसी स्थिति में तंबाकू छोड़कर वैकल्पिक फसलों की ओर जाना किसानों के लिए जोखिम भरा और कम आकर्षक प्रतीत होता है. परिणामस्वरूप, तंबाकू से बाहर निकलने की प्रक्रिया और अधिक कठिन हो जाती है. आज स्थिति यह है कि सिंचाई सुविधाओं और खेती के विकल्प बढ़ने के बावजूद, तंबाकू को एक व्यवहार्य आजीविका के रूप में बनाए रखा जा रहा है. वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अनुसार, भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तंबाकू उत्पादक और निर्यातक देश है. मंत्रालय का यह भी दावा है कि पिछले पांच वर्षों में तंबाकू किसानों की आय दोगुनी हुई है और 2019-20 से 2023-24 के बीच तंबाकू निर्यात में 87 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.
चित्र 6. प्रति हेक्टेयर उपज: तंबाकू (किलोग्राम प्रति हेक्टेयर)

Source: Prepared by the author using data compiled from the Reserve Bank of India
यदि भारत यह मानता है कि तंबाकू से कैंसर, हृदय रोग और उत्पादकता में भारी नुकसान होता है, और इसलिए देश के भीतर इसके उपयोग को हतोत्साहित करता है, तो फिर इसे एक बड़े निर्यात उद्योग के रूप में बढ़ावा देना नैतिक रूप से उचित नहीं ठहराया जा सकता. वसुधैव कुटुंबकम की भावना के अनुसार, भारत एक ओर खुद को दुनिया की फार्मेसी के रूप में प्रस्तुत करता है, वहीं दूसरी ओर दुनिया का तंबाकू खेत बनने की दिशा में बढ़ता दिखता है.
हाल ही में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय चिकित्सा विज्ञान अकादमी की 2025 की रिपोर्ट ने तंबाकू बोर्ड और केंद्रीय तंबाकू अनुसंधान संस्थान को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की सिफारिश की है. भले ही यह तुरंत संभव न हो, लेकिन अब समय आ गया है कि सरकार एक समयबद्ध, अंतर-मंत्रालयी रणनीति के तहत तंबाकू नीति को स्वास्थ्य, कृषि और ग्रामीण विकास के लक्ष्यों के साथ एकरूप करे.
तंबाकू बोर्ड का मुख्य उद्देश्य निर्यात बढ़ाने से हटाकर किसानों के लिए एक व्यावहारिक और बड़े स्तर पर लागू होने योग्य वैकल्पिक आजीविका योजना तैयार करना होना चाहिए, जिसमें कृषि, ग्रामीण विकास मंत्रालय और राज्य सरकारें मिलकर काम करें. ऐसा करने से भारत दुनिया की फार्मेसी की अपनी भूमिका को बनाए रखते हुए दुनिया का तंबाकू खेत बनने से साफ तौर पर इनकार कर सकेगा.
ओम्मेन सी. कुरियन ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर फेलो और हेल्थ इनिशिएटिव के प्रमुख है.
The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.
Oommen C. Kurian is Senior Fellow and Head of the Health Initiative at the Inclusive Growth and SDGs Programme, Observer Research Foundation. Trained in economics and ...
Read More +