Author : Vivek Mishra

Published on Jun 03, 2022 Updated 6 Hours ago

एशिया के अपने पहले दौरे के ज़रिए बाइडेनने प्रशांत क्षेत्र के अपने सहयोगियों को ये विश्वास दिलाने की कोशिश कि अमेरिका इस इलाक़े पर लगातार ध्यान दे रहा है.

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन का पहला एशिया दौरा: हिंद-प्रशांत के अहम साझीदारों को भरोसे में लेने की कोशिश

राष्ट्रपति के तौर पर एशिया के अपने पहले दौरे में राष्ट्रपति जो बाइडेन ने एशिया के दो सबसे अहम साझीदार देशों की यात्रा की. इस दौरे की अहमियत इस बात में छिपी है कि अमेरिका ने फिर से एशिया पर अपना ध्यान केंद्रित किया है. असल में रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध के चलते अमेरिका के ज़्यादा संसाधन और सामरिक ध्यान यूरोप पर लगा हुआ था. रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध से अचानक बदले हालात और इसके चलते पैदा हुई सामरिक ज़रूरतों ने बाइडेन  प्रशासन को इस बात के लिए मजबूर किया कि वो यूरोपीय मोर्चे पर ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान दें. हालांकि हिंद प्रशांत क्षेत्र को भी इस बात की दरकार बनी हुई है, कि अमेरिका इसे लगातार तवज्जो देता रहे. फिर चाहे चीन के आक्रामक क़दम हों, ताइवान पर चीन के हमले का मंडराता ख़तरा हो या फिर उत्तर कोरिया द्वारा अपने मिसाइल कार्यक्रम और परमाणु ज़ख़ीरे का लगातार विस्तार करना हो. हिंद प्रशांत क्षेत्र में ऐसे मुद्दों की कमी क़तई नहीं है, जिन पर यूरोप में चल रहे युद्ध के बावजूद, अमेरिका को ध्यान देने की आवश्यकता है. इसी वजह से, भले ही बाइडेन  का एशिया दौरा, उनके कार्यकाल में तुलनात्मक रूप से देर से हुआ, मगर इसके ज़रिए अमेरिका ने दो मक़सद साधने की कोशिश की: प्रशांत क्षेत्र के अहम गठबंधनों को लेकर अमेरिका की प्रतिबद्धता को दोहाराना- जो उनके पूर्ववर्ती राष्ट्रपति  डॉनल्ड ट्रंप के शासन काल में उनके तौर-तरीक़ों और इरादों की वजह से कमज़ोर लग रही थी- और यूरोप में युद्ध के बीच हिंद प्रशांत के दो महत्वपूर्ण साझीदारों की ये चिंता दूर करना कि अमेरिका का ध्यान इस क्षेत्र से बंट रहा है.

हिंद प्रशांत क्षेत्र में ऐसे मुद्दों की कमी क़तई नहीं है, जिन पर यूरोप में चल रहे युद्ध के बावजूद, अमेरिका को ध्यान देने की आवश्यकता है. इसी वजह से, भले ही बाइडेन  का एशिया दौरा, उनके कार्यकाल में तुलनात्मक रूप से देर से हुआ, मगर इसके ज़रिए अमेरिका ने दो मक़सद साधने की कोशिश की

रूस के खिलाफ एकजुट मोर्चा बनाकर अमेरिका ने अटलांटिक के आर-पार अपने गठबंधन को और मज़बूत भले कर लिया है. मगर, इससे हिंद प्रशांत क्षेत्र के साझीदारों को ऐसा लगने लगा था, कि अमेरिका प्रशांत क्षेत्र के प्रति उस तरह से वचनबद्ध नहीं है.  डॉनल्ड ट्रंप के धमकी देने वाले शासन काल के बाद प्रशांत क्षेत्र के अमेरिकी साझीदार ये अपेक्षा कर रहे थे कि बाइडेन  के राज में स्थिति बदलेगी. इन परिस्थितियों में एशिया में अमेरिका के दो सबसे अहम साझीदारों जापान और दक्षिण कोरिया का बाइडेन का दौरा इस बात का संकेत है कि अमेरिका ने अपना ध्यान एक बार फिर से एशिया पर केंद्रित किया है. इस साल की शुरुआत में लाई गई अपनी हिंद प्रशांत रणनीति के अनुरूप, बाइडेन  ने हिंद प्रशांत के अपने साझीदारों को ये यक़ीन दिलाने की कोशिश की, कि इस क्षेत्र के हर कोने पर अपनी नज़र बनाए रखने का अमेरिका का वादा खोखला नहीं है और यूरोप में रूस द्वारा पैदा की गई नई चुनौतियों के बावजूद  अमेरिका, हिंद प्रशांत क्षेत्र से अपना ध्यान हटाने नहीं जा रहा है.

मोटे तौर पर जो बाइडन का एशिया दौरा तीन मज़बूत बुनियादों पर टिका था: हिंद प्रशांत क्षेत्र के अपने साझीदारों के साथ मज़बूत भागीदारी के ज़रिए, देश और विदेश में आर्थिक सुरक्षा के हालात सुधारना; उत्तर कोरिया से लगातार बढ़ रहे ख़तरे के बीच कोरियाई प्रायद्वीप में स्थिरता बनाए रखना; हिंद प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभुत्व के बीच इस बात पर ज़ोर देना कि अमेरिका का सामरिक दबदबा और भय बना रहे.

एशिया में अमेरिका के दो सबसे अहम साझीदारों जापान और दक्षिण कोरिया का बाइडेन का दौरा इस बात का संकेत है कि अमेरिका ने अपना ध्यान एक बार फिर से एशिया पर केंद्रित किया है.

अमेरिका और दक्षिणी कोरिया (ROK) के रिश्ते, हिंद प्रशांत क्षेत्र का अहम सामरिक कोण बनाते हैं. प्रतीकात्मक रूप से दक्षिण कोरिया में किसी नए राष्ट्रपति के कार्यकाल में अमेरिका के राष्ट्रपति बाइडेन का ये दौरा सबसे जल्द हुआ दौरा था. ये कहा जा सकता है कि कई मायनों में बाइडेन  ने इस दौरे के माध्यम से अमेरिका की हिंद प्रशांत रणनीति में दक्षिण कोरिया की भूमिका बढ़ाने की कोशिश की है. दक्षिण कोरिया में बाइडेन  ने कट्टरपंथी पीपुल्स  पावर पार्टी (PPP) के नए राष्ट्रपति यूं  सुक-योल  की सरकार को ये विश्वास दिलाने की कोशिश कि अमेरिका उनके साथ लगातार खड़ा है. बाइडेन  को ऐसा इसलिए करना पड़ा क्योंकि दक्षिण कोरिया को ये लग रहा है कि उत्तर कोरिया को बातचीत की टेबल पर लाने के लिए अमेरिका पर्याप्त प्रयास नहीं कर रहा है. अमेरिका में भी बहुत से लोगों के बीच ये आशंका घर कर गई है कि राष्ट्रपति यूं  के नेतृत्व में दक्षिण कोरिया, उत्तर कोरिया और चीन को लेकर अपने नज़रिए में सख़्ती नहीं रखेगा. इसके अलावा, चीन ने दक्षिण कोरिया से दोस्ती बढ़ाने में फ़ुर्ती दिखाते हुए, हाल ही में वहां की नई सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में अपने सबसे शीर्ष के अधिकारियों में से एक को भेजा था. बाइडेन  का दक्षिण कोरिया दौरा, राष्ट्रपति यूं  के उस दावे को भी एक जवाब है कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति  डॉनल्ड ट्रंप के शासन काल में अमेरिका और दक्षिण कोरिया के रिश्ते कमज़ोर हो गए थे क्योंकि दक्षिण कोरिया, चीन के ज़्यादा क़रीब होता जा रहा था. राष्ट्रपति चुनाव के प्रचार के दौरान राष्ट्रपति यूं ने चीन को लेकर कड़ा रुख़ अपनाया था. ऐसे में उनके कार्यकाल की शुरुआत में ही राष्ट्रपति बाइडेन  का ये दौरा, यूं को चीन के ख़िलाफ़ अपने घरेलू मोर्चे पर सख़्त रुख़ अपनाने में मददगार साबित होगा.

बाइडेन  के दक्षिण कोरिया दौरे में आर्थिक मोर्चे पर भी काफ़ी कुछ दांव पर लगा हुआ था. हिंद प्रशांत और हिंद प्रशांत आर्थिक रूप-रेखा में दक्षिण कोरिया के लिए ख़ास जगह बनाने के इरादे से बाइडेन प्रशासन ने ये स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका और दक्षिण कोरिया के गठबंधन का विस्तार हो रहा है. अब ये साझेदारी सिर्फ़ सुरक्षा की मजबूरियों पर ही निर्भर नहीं है, बल्कि ‘एक सामरिक आर्थिक और तकनीकी साझेदारी के निर्माण के लिए भी है, जो नवाचार और तकनीक की अहमियत को दर्शाती है. दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय बातचीत के दौरान, नवाचार  को बढ़ावा देने, अहम और उभरती हुई तकनीकों के मामले में साझेदारी, रक्षा उद्योग, आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन के मुद्दों पर सहयोग को मज़बूत करने पर ख़ास तौर से चर्चा हुई. अमेरिका और दक्षिण कोरिया ने विशेष रूप से सेमीकंडक्टर उद्योग और इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बैटरी और माइक्रोचिप के मामले में लक्ष्य आधारित सहयोग का लक्ष्य निर्धारित किया है. इस यात्रा के दौरान, राष्ट्रपति बाइडेन  और हुंडई  मोटर ग्रुप के कार्यकारी अध्यक्ष ने अमेरिका के जॉर्जिया राज्य के सवाना में हुंडई  द्वारा इलेक्ट्रिक गाड़ियां और बैटरी बनाने के नए कारखाने में निवेश के फ़ैसले पर भी चर्चा की. दक्षिण कोरिया दौरे के पहले दिन 19 मई को राष्ट्रपति बाइडेन  ने राष्ट्रपति यूं के साथ सैमसंग की प्योंगताएक  कारखाने का भी दौरा किया था. दोनों देशों के बीच हुए समझौते से निर्माण के क्षेत्र में 11 अरब डॉलर का निवेश होने और अमेरिका में रोज़गार के आठ हज़ार अवसर पैदा होने की उम्मीद है. 

अब ये साझेदारी सिर्फ़ सुरक्षा की मजबूरियों पर ही निर्भर नहीं है, बल्कि ‘एक सामरिक आर्थिक और तकनीकी साझेदारी के निर्माण के लिए भी है, जो नवाचार और तकनीक की अहमियत को दर्शाती है’

उत्तर कोरिया द्वारा अपने परमाणु हथियारों के ज़ख़ीरे को लगातार बढ़ाते जाना, अमेरिका के लिए चिंता का एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है. बाइडेन  के दक्षिण कोरिया दौरे का एक मक़सद ये भी था कि उनकी सरकार कोरियाई प्रायद्वीप के परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए लगातार प्रतिबद्ध है.

जापान

जापान में बाइडेन के सामने दो बड़े अहम मसले थे. जापानियों के बीच उस बढ़ती आशंका को दूर करना कि हिंद प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका अब जापान को एक अहम साझीदार के तौर पर नहीं देखता और न ही जापान के हितों का ध्यान रखते हुए चीन से मुक़ाबले की सूरत में उसे विश्वास दिलाने में यक़ीन रखता है. नीचे का ग्राफ़ ये दिखाता है कि ट्रंप के शासन काल में जापानियों का ये भरोसा कितना कम हो गया था

Source: https://www.pewresearch.org/global/2018/11/12/views-of-the-u-s-and-president-trump/

एशिया दौरे के जापानी हिस्से में बाइडेन  प्रशासन ने द्विपक्षीय संबंधों के साथ-साथ बहुपक्षीय मुद्दों को भी बराबर तरज़ीह दी. द्विपक्षीय तौर पर अमेरिका ने जापान को सुरक्षा की गारंटी का भरोसा दिया और जापान को अपनी हिंद प्रशांत सुरक्षा रणनीति का केंद्र बिंदु बताया. बहुपक्षीय मोर्चे पर बाइडेन  ने अपने हिंद प्रशांत आर्थिक ढांचे की शुरुआत के लिए टोक्यो को चुना. इसके अलावा उन्होंने यूक्रेन में युद्ध को लेकर रूस के ख़िलाफ़ G7 देशों में एकजुटता बनाए रखने में जापान का सहयोग मांगा. टोक्यो में क्वाड शिखर सम्मेलन की मेज़बानी करके, अमेरिका ने दिखाया कि भले ही उसका ध्यान यूरोपीय मोर्चे पर लगा हुआ है. लेकिन, हिंद प्रशांत क्षेत्र में उसके पास एक अतिरिक्त मोर्चा भी है.

बाइडेन के इस दौरे से स्पष्ट हो गया कि प्रशांत क्षेत्र को लेकर अमेरिका के स्वतंत्र और मुक्त नज़रिए के लिहाज़ से जापान उसका एक मज़बूत भागीदार बना हुआ है. दोनों देश क्वॉड, आसियान को केंद्र बनाने, ऑकस और अन्य बहुपक्षीय साझीदारियों और मंचों को लेकर भी समान विचार रखते हैं. जापान और अमेरिका के बीच हुई बातचीत में व्यापक मुद्दों जैसे कि समुद्री क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों, समुद्र के क़ानूनों को लेकर संयुक्त राष्ट्र की संधि (UNCLOS) और दोनों देशों के बीच आपसी सहयोग और सुरक्षा की संधि को दोहराते हुए दुश्मन में भय का माहौल बनाने की बात दोहराने जैसे कई मुद्दों और व्यवस्थाओं पर चर्चा हुई. इसके अलावा दोनों देशों से सुरक्षा सलाहकार समिति/सिक्योरिटी कंसल्टेटिव कमेटी (SCC) और एक्सटेंडेड  डिटरेन्सडेटरेंस डायलॉग पर भी चर्चा की.

जापानियों के बीच उस बढ़ती आशंका को दूर करना कि हिंद प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका अब जापान को एक अहम साझीदार के तौर पर नहीं देखता और न ही जापान के हितों का ध्यान रखते हुए चीन से मुक़ाबले की सूरत में उसे विश्वास दिलाने में यक़ीन रखता है

आज जब अमेरिका अपने यहां ज़्यादा रोज़गार पैदा करने को तवज्जो दे रहा है, तो आर्थिक ताक़त बढ़ाने को हिंद प्रशांत में अमेरिका के उस मक़सद का हिस्सा माना जा रहा है कि वो जापान और दक्षिण कोरिया की चीन पर बढ़ती व्यापारिक निर्भरता को कम करना चाहता है. हाल के वर्षों में जापान और दक्षिण कोरिया दोनों की चीन पर व्यापारिक निर्भरता बढ़ गई है

Source: https://www.sc.com/en/feature/china-japan-and-south-korea-time-to-reinforce-not-break-complementarity/

बाइडेन के पहले एशिया दौरे का सबसे बड़ा मुद्दा शायद हिंद प्रशांत आर्थिक ढांचे का ऐलान था. अमेरिका का हिंद प्रशांत आर्थिक ढांचा, दक्षिण कोरिया और जापान दोनों को एक व्यापक भू-आर्थिक नज़रिए के दायरे में ले आता है, जो फौरी तौर पर ये ज़ाहिर करने की कोशिश है कि अमेरिका का पूरा ध्यान सिर्फ़ यूरोपीय मोर्चे पर नहीं है और हिंद प्रशांत क्षेत्र को उसका नुक़सान नहीं उठाना पड़ेगा. वहीं, दूरगामी तौर पर इसका एक मक़सद चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के मुक़ाबले में एक आर्थिक और सामरिक विकल्प खड़ा करना है.

प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के दो सबसे अहम साझीदारों का बाइडेन  का ये एशिया दौरा इस बात का भी प्रतीक है कि दोनों देश यूक्रेन में रूस के अभियान के सख़्त ख़िलाफ़ हैं. इसका एक मक़सद इन दोनों को रूस के प्रति वैसा रवैया अपनाने से रोकना भी था, जिस तरह भारत ने एक संतुलित रुख अपनाया हुआ है. हालांकि, अन्य मुद्दों पर क्वाड पूरी तरह से एकजुट है.

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