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Published on Mar 07, 2026 Updated 2 Days ago

अमेरिका-इज़रायल के हमले और ख़ामेनेई की मौत के बाद ईरान ने मिडिल ईस्ट में जवाबी वार कर इस टकराव को अस्तित्व की लड़ाई बना दिया है. अब खाड़ी देश असमंजस में हैं- तनाव कम कराएं या खुलकर किसी एक पक्ष के साथ खड़े हों.

ईरान बनाम अमेरिका-इज़रायल: सुनिए मिडिल ईस्ट की

28 फरवरी को अमेरिका-इज़रायल ने एक साथ मिलकर ईरान पर सैन्य हमले शुरू किए. अपने आठ मिनट के वीडियो संबोधन में डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि इस अभियान का- जिसका नाम ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” है- मक़सद ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना है. ट्रंप ने कहा कि उनका उद्देश्य “ख़तरों को ख़त्म कर अमेरिका के लोगों की रक्षा करना’ है. ईरान ने इसका जवाब मिडिल ईस्ट में जवाबी हमले से दिया. इस अभियान में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत की पुष्टि हुई. ORF के मिडिल ईस्ट विशेषज्ञ आगे इन घटनाक्रमों के बारे में अपनी त्वरित राय रख रहे हैं. 

अमेरिका की कूटनीतिक चाल और खाड़ी देशों का असंभव विकल्प

अमेरिका-इज़रायल के हमले अप्रत्याशित नहीं थे. जनवरी से ही अमेरिका ऑपरेशन इराक़ी फ्रीडम के बाद से मिडिल ईस्ट में सबसे बड़ी सेना जमा कर रहा था. इसलिए ये सवाल नहीं था कि ट्रंप हमले का आदेश देंगे या नहीं बल्कि ये था कि कब देंगे. हमले से पहले कूटनीतिक बातचीत भी हो रही थी. 26 फरवरी को जेनेवा में परमाणु वार्ता का तीसरा दौर समाप्त हुआ जिसके बाद ट्रंप ने कहा कि वो ‘ख़ुश नहीं’ हैं जबकि ओमान के मध्यस्थों ने दावा किया कि बातचीत में ‘महत्वपूर्ण प्रगति’ हुई है. ओमान के लिए ये असामान्य बात थी. ओमान के विदेश मंत्री बद्र बिन हमाद अल्बुसैदी ने सार्वजनिक रूप से ऐलान किया कि दोनों पक्षों ने “समस्या का समाधान तलाश लिया है” और ईरान यूरेनियम का भंडार हटाने के लिए तैयार हो गया है. 

ट्रंप ने कहा कि उनका उद्देश्य “ख़तरों को ख़त्म कर अमेरिका के लोगों की रक्षा करना’ है. ईरान ने इसका जवाब मिडिल ईस्ट में जवाबी हमले से दिया. इस अभियान में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत की पुष्टि हुई.

इस बात पर चर्चा हो सकती है कि अल्बुसैदी को तुरंत ख़तरा लगा होगा और उन्होंने मजबूर होकर ये बयान दिया. लेकिन ये स्पष्ट है कि अमेरिका की कूटनीति एक चाल थी, ठीक उसी तरह की चाल जो  पिछले साल जून में “ऑपरेशन मिडनाइट हैमर” के दौरान चली गई थी जब अमेरिका ने बातचीत के पांच चरणों के बाद ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला किया और दावा किया कि उसने ईरान के परमाणु कार्यक्रम का “नामोनिशान मिटा दिया” है. 

दरअसल दोनों देशों के बीच बुनियादी गतिरोध दूर करना असंभव था. ईरान परमाणु हथियार बनाने को रोकने और संवर्धित यूरेनियम का भंडार कम करने के लिए तैयार हो सकता था लेकिन वो अपने बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को रोकने या अपने प्रॉक्सी नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए कभी तैयार नहीं हो सकता था जबकि अमेरिका इस पर अड़ा था. ऐसे में हमला होना तय था. 

ईरान का पलटवार अमेरिकी सैन्य अड्डों के अलावा खाड़ी देशों के बुनियादी ढांचे पर भी हुआ. रियाद, बहरीन के एरा टावर और दुबई इंटरनेशन एयरपोर्ट पर निशाना साधा गया. ख़ामेनेई की मौत की पुष्टि के साथ ट्रंप ने सत्ता परिवर्तन के लिए कहा है, ऐसे में ईरान इसे अपने अस्तित्व की लड़ाई के रूप में देख रहा है. इससे खाड़ी के अरब देश, जिन्होंने ईरान के साथ तनाव कम करने के लिए वर्षों तक प्रयास किए हैं, एक असंभव सी स्थिति में आ गए हैं: या तो वो अमेरिका पर तनाव कम करने के लिए दबाव डालें या ईरान के हमलों की निंदा करें और अमेरिका-इज़रायल के अभियान के साथ जुड़ने के लिए कदम उठाएं.

ईरान ने दुबई पर निशाना क्यों साधा: आर्थिक प्रतिरोध की सीमाएं

ईरान का ऑपरेशन ट्रूथफुल प्रॉमिस 4 तेज़ और सुनियोजित था. साथ ही इसमें सोच-समझकर  निशानों को चुना गया था. इसकी तेज़ी पहले से तय रणनीति का संकेत देती है: उस जगह पर हमला करना जहां वैश्विक अर्थव्यवस्था को अधिकतम नुकसान पहुंचाया जा सके. ईरान ने सोच-समझकर दुबई को चुना. उसे ये पता था कि वहां हमला करने से बाज़ार में तुरंत दहशत फैल जाएगी और UAE को अमेरिका पर तुरंत संयम बरतने के लिए दबाव डालने को मजबूर होना पड़ेगा. 

दशकों से दुबई एक मूलभूत सोच पर काम कर रहा था कि आर्थिक समृद्धि भू-राजनीतिक स्थिरता के लिए मज़बूत प्रोत्साहन पैदा करती है. दुबई का तर्क था कि दुनिया की बड़ी शक्तियां सामूहिक रूप से अमीरात की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगी. 

ईरान ने सोच-समझकर दुबई को चुना. उसे ये पता था कि वहां हमला करने से बाज़ार में तुरंत दहशत फैल जाएगी और UAE को अमेरिका पर तुरंत संयम बरतने के लिए दबाव डालने को मजबूर होना पड़ेगा. 

लेकिन हाल की घटनाओं ने आर्थिक रूप से तैयार स्थिरता की कमज़ोरियों को उजागर कर दिया है. आर्थिक प्रतिरोध साझा विवेक पर आधारित होता है. वो ये मानकर चलता है कि सभी पक्ष वैचारिक या अस्तित्व से जुड़ी ज़रूरतों की तुलना में वित्तीय संरक्षण को ज़्यादा महत्व देते हैं. ये सोच नाकाम लगती है. UAE, ईरान के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक है लेकिन इसके बावजूद ईरान नहीं रुका. जब अस्तित्व सर्वोपरि हो जाता है तो आर्थिक परस्पर निर्भरता प्रतिरोध के रूप में काम करना बंद कर देती है. इसलिए मज़बूत सुरक्षा का कोई व्यावहारिक विकल्प नहीं है.

ईरान का ख़त्म होता दायरा: भू-राजनीतिक उभार से अस्तित्व के लिए युद्ध तक

ईरानी शासन अपने अस्तित्व के लिए जो युद्ध लड़ रहा है, उसे दो चरणों के ज़रिए समझा जा सकता है. 

पहले चरण में ईरान भू-राजनीतिक रूप से मज़बूत हुआ. इराक में अमेरिकी दखल (2003-2011) ने ईरान के उस राजनीतिक नेटवर्क को सशक्त किया जो उसने ईरान-इराक़ युद्ध (1980-1988) के बाद  तैयार किया था. फिर 2012 के बाद सीरिया के गृहयुद्ध ने ईरान को लेवांत क्षेत्र में अपनी पकड़ मज़बूत करने में सक्षम किया. अमेरिका के साथ 2015 के परमाणु समझौते ने अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में आंशिक रूप से ईरान के जुड़ने की संभावना के बारे में बताया. 

इस उभार के बाद तेज़ी से रणनीतिक उलटफेर हुआ जो दूसरा चरण है. 2018 में ट्रंप परमाणु समझौते से हट गए और उन्होंने ‘अधिकतम दबाव’ बनाने के लिए ईरान पर व्यापक आर्थिक प्रतिबंध लगाए. 2020 के बाद अब्राहम अकॉर्ड और नागोर्नो-काराबाख में अज़रबैजान की जीत ने ईरान के पड़ोस में इज़रायल की स्थिति मज़बूत की. 7 अक्टूबर 2023 के बाद ईरान को कई झटके लगे. जुलाई 2024 में तेहरान में इस्माइल हानिया की हत्या की गई. फिर हिज़्बुल्लाह कमज़ोर हुआ और सितंबर 2024 में हसन नसरुल्लाह की हत्या हुई. दिसंबर 2024 में सीरिया में असद के शासन का पतन हुआ और जून 2025 में 12 दिन का युद्ध हुआ. ईरान के “रणनीतिक धैर्य” का सिद्धांत ध्वस्त हो गया जिसकी वजह से वहां का शासन बेनकाब हो गया. 

2018 में ट्रंप परमाणु समझौते से हट गए और उन्होंने ‘अधिकतम दबाव’ बनाने के लिए ईरान पर व्यापक आर्थिक प्रतिबंध लगाए. 2020 के बाद अब्राहम अकॉर्ड और नागोर्नो-काराबाख में अज़रबैजान की जीत ने ईरान के पड़ोस में इज़रायल की स्थिति मज़बूत की. 7 अक्टूबर 2023 के बाद ईरान को कई झटके लगे. जुलाई 2024 में तेहरान में इस्माइल हानिया की हत्या की गई

इसके साथ-साथ घरेलू हालात भी बिगड़ते गए. न तो “प्रतिरोध की अर्थव्यवस्था” और न ही ब्रिक्स के साझेदारों की तरफ झुकाव (जिनमें चीन प्रमुख है) प्रतिबंधों के झटकों को झेल सका. उसके बाद हिंसक प्रदर्शनों की लहर ने शासन और समाज के बीच दरार को और गहरा कर दिया. 

संघर्ष में फंसे खाड़ी देशों के लिए तनाव कम करने का छोटा रास्ता  

अगर खाड़ी के देश इस संघर्ष में घसीटे जाते हैं तो नतीजे गंभीर होंगे. अगर ईरान इसे अपने पड़ोसी देशों के साथ सीधे युद्ध के रूप में पेश करता है तो खाड़ी देशों में ईरान समर्थक प्रवासी समुदायों और शिया आबादी को राजनीतिक रूप से लामबंद किया जा सकता है. बहरीन इस मामले में विशेष रूप से संवेदनशील है. सोशल मीडिया पर जो वीडियो आ रहे हैं, उनमें देखा जा सकता है कि ईरान के समर्थक हमलों पर ख़ुशी जता रहे हैं और प्रशासन ने कई लोगों को हिरासत में लिया है. 

फिलहाल खाड़ी देश इस युद्ध के अप्रत्यक्ष शिकार बने हुए हैं लेकिन अगर चुपचाप रहने की कीमत बदलते ईरान के ख़तरों से अधिक होगी तो वो भी युद्ध के सक्रिय भागीदार बन सकते हैं.


महदी घुलोम ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) - मिडिल ईस्ट में जूनियर फेलो (भू-राजनीति) हैं. 

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Clemens Chay

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Dr Clemens Chay is Senior Fellow for Geopolitics at ORF Middle East. His research focuses on the history and politics of the Gulf Arab states ...

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Samriddhi Vij

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Samriddhi is an Associate Fellow, Geopolitics at ORF Middle East, where she focuses on producing research and furthering the dialogue on regionally relevant foreign policy ...

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Akram Zaoui

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Akram Zaoui is Chargé de Mission to the Executive President, Policy Center for the New South. ...

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Mahdi Ghuloom

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Mahdi Ghuloom is a Junior Fellow at the Observer Research Foundation (ORF) – Middle East. He focuses on the Gulf States, with an eye on ...

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