Expert Speak Raisina Debates
Published on Mar 12, 2026 Updated 4 Days ago

अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर हमला किया लेकिन ईरान सीधे नहीं लड़ रहा - वह खाड़ी देशों और अमेरिकी ठिकानों पर परोक्ष दबाव बना रहा है. समझें कि इसका मकसद क्या है और कैसे अमेरिका-इज़राइल ईरान की सैन्य व परमाणु ताकत को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं जिससे यह संघर्ष लंबा खिंच सकता है.

अमेरिका-इज़राइल को लेकर क्या है ईरान की चाल?

संयुक्त राज्य अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच शत्रुता 28 फरवरी 2026 को शुरू हुई, जब ईरान के नेतृत्व, परमाणु प्रतिष्ठानों और पारंपरिक सैन्य बलों पर बड़े पैमाने पर हमला किया गया. इस स्थिति में दो बातें खास हैं. पहली, ईरान ऐसी रणनीति अपना रहा है जिससे वह सीधे नहीं बल्कि दूसरे देशों के ज़रिए संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल पर दबाव डालना चाहता है. दूसरी, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकारें ईरान के अंदर की राजनीतिक अस्थिरता और आपसी मतभेदों का फायदा उठाने की कोशिश कर रही हैं.

ईरान के बढ़ते हमलों के कारण इन देशों को जवाब देना पड़ा है. उन्होंने अपनी रक्षा के लिए कदम उठाए हैं जैसे आने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों को रास्ते में ही रोकना और ड्रोन को जमीन तथा हवा से मार गिराना. इसके अलावा क़तर ने अपने क्षेत्र में सक्रिय इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के स्लीपर एजेंटों को गिरफ्तार किया है.

वर्तमान में लगभग सभी खाड़ी सहयोग परिषद देशों को ईरान ने निशाना बनाया है. इन अभियानों में मिसाइल हमलों से लेकर एक-तरफा ड्रोन मिशनों तक शामिल हैं. प्रभावित खाड़ी सहयोग परिषद देशों में संयुक्त अरब अमीरात, कतर, ओमान, बहरीन, सऊदी अरब और कुवैत शामिल हैं. ईरान के बढ़ते हमलों के कारण इन देशों को जवाब देना पड़ा है. उन्होंने अपनी रक्षा के लिए कदम उठाए हैं जैसे आने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों को रास्ते में ही रोकना और ड्रोन को जमीन तथा हवा से मार गिराना. इसके अलावा क़तर ने अपने क्षेत्र में सक्रिय इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के स्लीपर एजेंटों को गिरफ्तार किया है. अब तक ओमान ही एकमात्र खाड़ी सहयोग परिषद देश है जिसे ईरान ने सीधे निशाना नहीं बनाया, हालांकि रिपोर्टों के अनुसार ओमानी तट के पास उसके तेल टैंकरों पर ईरान ने हमला किया है.

ईरान की सैन्य ताकत

ईरान वर्तमान में अमेरिकियों और इज़राइलियों को पीछे हटने और अपने सैन्य हमले को रोकने के लिए मजबूर करने हेतु द्वितीय-स्तरीय दबाव का सहारा ले रहा है. ईरान के बढ़ते हमलों की वजह से इन देशों को अपनी सुरक्षा के लिए कदम उठाने पड़े. वे मिसाइलों को रास्ते में ही रोक रहे हैं और ड्रोन को गिरा रहे हैं. 

ईरान अभी अमेरिकियों और इज़राइलियों को पीछे हटने और अपने सैन्य हमले रोकने के लिए परोक्ष दबाव की रणनीति अपना रहा है. ईरान ने यही किया है-उसने क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य अड्डों और इज़राइल के साथ-साथ खाड़ी सहयोग परिषद के अरब देशों के नागरिक ठिकानों पर भी मिसाइल और ड्रोन से हमले किए हैं. तेहरान का मानना है कि खाड़ी सहयोग परिषद देशों पर हमले होने से वे वाशिंगटन और तेल अवीव पर दबाव डालेंगे. 

हालांकि फिलहाल तेहरान के हमले उल्टा असर करते दिखाई दे रहे हैं, क्योंकि अमेरिकी, इज़राइली और उनके खाड़ी सहयोग परिषद साझेदार अपनी रक्षा के लिए एकजुट हो गए हैं. फिर भी आने वाले दिनों और हफ्तों में यदि खाड़ी सहयोग परिषद देशों के लिए लागत बहुत अधिक हो जाती है, तो वे इज़राइल और संयुक्त राज्य पर शत्रुता समाप्त करने के लिए दबाव डाल सकते हैं. इसलिए इज़राइल और संयुक्त राज्य के लिए यह समय के खिलाफ एक दौड़ है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने प्रारंभ में संकेत दिया था कि यह सैन्य अभियान कम से कम चार से पाँच सप्ताह तक चल सकता है, लेकिन इससे अमेरिका को और लंबे समय तक सैन्य रूप से जुड़े रहना पड़ सकता है.

ईरान ने यही किया है-उसने क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य अड्डों और इज़राइल के साथ-साथ खाड़ी सहयोग परिषद के अरब देशों के नागरिक ठिकानों पर भी मिसाइल और ड्रोन से हमले किए हैं. तेहरान का मानना है कि खाड़ी सहयोग परिषद देशों पर हमले होने से वे वाशिंगटन और तेल अवीव पर दबाव डालेंगे. 

ईरान की धार्मिक शासन व्यवस्था का उद्देश्य संयुक्त अमेरिका-इज़राइल हवाई अभियान के खिलाफ टिके रहना और साथ ही वाशिंगटन के खाड़ी सहयोग परिषद साझेदारों को पर्याप्त नुकसान पहुँचाना है. ईरान की धार्मिक शासन व्यवस्था का उद्देश्य संयुक्त अमेरिका-इज़राइल हवाई अभियान के खिलाफ टिके रहना और साथ ही वाशिंगटन के खाड़ी सहयोग परिषद साझेदारों को पर्याप्त नुकसान पहुँचाना है.

दूसरा, अमेरिका और इज़राइल के सैन्य अभियान का उद्देश्य सीधे-सीधे सत्ता बदलना नहीं बताया गया है, लेकिन ईरान की सैन्य ताकत-जिसमें उसका परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम शामिल है-को कमजोर या खत्म करना इसका घोषित लक्ष्य है. सबसे आगे की स्थिति में सत्ता परिवर्तन इज़राइल का लक्ष्य हो सकता है, जबकि अमेरिका इस बात को लेकर पूरी तरह साफ नहीं है. इससे अमेरिका-इज़राइल की एकता और साथ मिलकर सैन्य कार्रवाई करने में दिक्कतें आ सकती हैं. इसलिए इज़राइल को कभी-कभी अकेले भी कदम उठाना पड़ सकता है. कुल मिलाकर, इस अभियान का मुख्य उद्देश्य ईरान की वह ताकत कम करना है जिससे वह अपनी सीमाओं के बाहर सैन्य प्रभाव दिखा सके. 

शायद एक छिपा हुआ मकसद यह भी हो कि विद्रोह को भड़काया जाए और कुर्द जैसे नाराज़ समूहों का समर्थन करके देश के अंदर अशांति फैलाई जाए. इन समूहों को संभावित रूप से केंद्रीय खुफिया एजेंसी (CIA) द्वारा हथियार और प्रशिक्षण दिया जा सकता है. ऐसी स्थिति में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) को कुर्द आक्रमण का सामना करने के लिए प्रतिक्रिया देनी पड़ेगी, जिससे उसके सैनिक खुले में आ जाएंगे. इससे इज़राइल और संयुक्त राज्य को हवाई हमलों के जरिए IRGC लड़ाकों को निशाना बनाने का अवसर मिलेगा.

कुर्दों के अलावा-जो ईरान की आबादी का लगभग 10 प्रतिशत हैं और अपने दम पर प्रभावी नहीं हो सकते-इज़राइल और संयुक्त राज्य को ईरान के असंतुष्टों और शासन-विरोधी जातीय समूहों की पहचान कर उन्हें सैन्य समर्थन देना होगा. नेतन्याहू सरकार की सैन्य रणनीति से परिचित एक पूर्व इज़राइली अधिकारी ने स्वीकार किया: ‘इसमें समय लगेगा, बहुत काम करना बाकी है. ईरान बहुत बड़ा है.’

ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री बारूदी सुरंगें बिछा रहा है और उसने संकेत दिया है कि वह अपने हमलों को रोकने वाला नहीं है तथा युद्धविराम की मांगों को ठुकरा रहा है. इसके अलावा खाड़ी सहयोग परिषद देशों के साथ उसे दीर्घकालिक परिणामों का भी सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि वे उसके हमलों को अनदेखा नहीं करेंगे

घरेलू अराजकता, यहाँ तक कि गृहयुद्ध की स्थिति-जिसे इज़राइल संभवतः उत्पन्न करना चाहता है- अगर इज़राइल और अमेरिका इसमें सफल होते हैं, तो वे ईरान की धार्मिक सरकार को काफी कमजोर कर सकते हैं. देश के अंदर अव्यवस्था, टूट-फूट या यहाँ तक कि गृहयुद्ध जैसी स्थिति-जिसे इज़राइल शायद पैदा करना चाहता है-ऐसी हालत बना सकती है कि बचे हुए शासक फिर से मजबूत सैन्य और परमाणु ताकत न बना सकें. इससे इज़राइल, अमेरिका और उनके क्षेत्रीय साझेदारों तथा सहयोगियों के लिए खतरा कम हो सकता है.

ईरान की रणनीति

यदि ईरान की सैन्य क्षमताएँ काफी हद तक कमजोर हो जाती हैं लेकिन शासन बना रहता है, तो ईरान अपने परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रमों के पुनर्निर्माण के प्रयासों को और तेज कर सकता है, जिससे उसके पड़ोसियों के लिए दीर्घकालिक खतरा उत्पन्न होगा. इसलिए इस परिणाम को रोकना आवश्यक है. परिणामस्वरूप अमेरिका-इज़राइल सैन्य अभियान को काफी अनुशासन और निरंतर प्रयास के साथ संचालित करना होगा. साथ ही इज़राइल और संयुक्त राज्य को अपने घरेलू राजनीतिक एकजुटता और जनसमर्थन को बनाए रखना होगा, क्योंकि यह सैन्य अभियान लंबा चल सकता है-जब तक कि वे आत्मसमर्पण न कर दें या बढ़ती लागत के कारण शत्रुता को समय से पहले समाप्त न कर दें.

ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री बारूदी सुरंगें बिछा रहा है और उसने संकेत दिया है कि वह अपने हमलों को रोकने वाला नहीं है तथा युद्धविराम की मांगों को ठुकरा रहा है. इसके अलावा खाड़ी सहयोग परिषद देशों के साथ उसे दीर्घकालिक परिणामों का भी सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि वे उसके हमलों को अनदेखा नहीं करेंगे और संभव है कि भविष्य में उसके खिलाफ अपने सैन्य सहयोग को और गहरा करें.


कार्तिक बोम्मकंती ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रेटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में सीनियर फेलो हैं.

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