जैव सुरक्षा व रासायनिक ख़तरों को लेकर अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते तनाव से भारत के सामने मुश्किलें पैदा हो रही हैं और मौके भी उभर रहे हैं. भारत के पास वैश्विक जैव प्रौद्योगिकी व सुरक्षा में अपनी भूमिका बढ़ाने का अवसर है.
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अप्रैल 2025 में, अमेरिका की संघीय सरकार ने ‘लैब लीक्स’ नाम से एक सरकारी वेब पेज बनाया, जिसमें आरोप लगाया गया कि कोरोना वायरस का ‘असल’ जन्म चीन के वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ़ वायरोलॉजी की एक प्रयोगशाला में हुआ है. जिन पुराने वेब पेजों को हटाकर यह नया वेब पेज बनाया गया है, उनमें उपयोगकर्ताओं को स्वास्थ्य सुविधाओं के बारे में बताया जाता था. दरअसल, बीते कुछ वर्षों से अमेरिका ने चीन को अनवरत और संस्थागत ख़तरे के रूप में देखना शुरू किया है. जैव सुरक्षा के मामले में भी उसका यही रवैया है, जो ट्रंप प्रशासन की COVID-19 महामारी को लेकर पहले के फ़ैसलों से भी ज़ाहिर होता है. अमेरिका के साथ बढ़ते संबंधों को देखते हुए भारत पर भी जैव सुरक्षा को लेकर ख़तरे हैं, क्योंकि हमारी सीमाएं उस देश के साथ मिलती है, जिसका इस मामले में सबसे अधिक विवादास्पद रुख़ रहा है. हालांकि, इसी वज़ह से जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विश्व में एक प्रभावशाली देश का रुतबा हासिल करने के लिए हमारे पास अमेरिका के साथ मिलकर काम करने का मौका भी है.
जून 2025 में, वुहान के डॉक्टरेट छात्र चेंगशुआन हान को अमेरिकी सीमा सुरक्षा बल ने डेट्राइट मेट्रोपॉलिटन हवाई अड्डे पर अमेरिका में अघोषित जैविक सामग्री ले जाने के आरोप में गिरफ्तार किया. शुरुआती संघीय रिपोर्टों के अनुसार, उस सामग्री में परजीवी गोलकृमियों (राउंडवर्म) के नमूने थे, जो वास्तव में ऐसे जीव होते हैं, जिनका लोगों की सेहत और कृषि जैव सुरक्षा, दोनों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है. हिरासत में लिए जाने से पहले हान ने मिशिगन यूनिवर्सिटी के एक व्यक्ति को भी एक पैकेट भेजा था. बेशक, गोलकृमियों का उपयोग आमतौर पर जैविक और आनुवंशिक विज्ञान शोधों में किया जाता है, लेकिन ज़रूरी जैव सुरक्षा दस्तावेज़ों या संस्थानों की अनुमति के बिना उनकी बिना लाइसेंस वाली ख़रीद-बिक्री चिंता का कारण मानी जाती है.
फ्यूज़ेरियम ग्रैमिनीरम एक ऐसा फफूंद जनित रोगज़नक है, जो अनाज, ख़ास तौर से गेहूं और जौ में हेड ब्लाइट (फसल के सिरों में संक्रमण) बीमारी पैदा करने के लिए कुख्यात है. इस रोगज़नक को भी शोध के लिए मिशिगन यूनिवर्सिटी लाया गया था.
इस घटना को असाधारण बनाया उसके समय और उसमें दिखे एक ख़ास पैटर्न ने. यह गिरफ़्तारी उसी महीने की शुरुआत में हुई एक और गिरफ़्तारी के तुरंत बाद हुई. उस घटना में आरोपी फ्यूज़ेरियम ग्रैमिनीरम से जुड़ी जैविक सामग्री की तस्करी कर रहा था. फ्यूज़ेरियम ग्रैमिनीरम एक ऐसा फफूंद जनित रोगज़नक है, जो अनाज, ख़ास तौर से गेहूं और जौ में हेड ब्लाइट (फसल के सिरों में संक्रमण) बीमारी पैदा करने के लिए कुख्यात है. इस रोगज़नक को भी शोध के लिए मिशिगन यूनिवर्सिटी लाया गया था. इन दोनों मामलों ने अमेरिकी अधिकारियों के मन में संदेह पैदा किया. उनका मानना है कि चीन गुपचुप फंडिंग करके और जैव अनुसंधान द्वारा अमेरिका के राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के लिए संकट पैदा करना चाहता है.
संघीय जांच ब्यूरो (FBI) के निदेशक काश पटेल ने तो सार्वजनिक रूप से यह कहा कि इन मामलों का संबंध ऐसी किसी गैर-कानूनी जैव अनुसंधान गतिविधि से हो सकता है, जो किसी सरकार-प्रायोजित प्रयासों का हिस्सा हो, हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि मामला अभी जांच के अधीन है और मंशा स्पष्ट नहीं है.
वुहान के एक ही शोध प्रयोगशाला से जुड़े होने और एक के बाद दूसरी घटित इन दोनों घटनाओं ने गृह सुरक्षा विभाग, राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान और FBI जैसी एजेंसियों में शक पैदा कर दिया है, जिस कारण उन्होंने इस बात पर फिर से विचार करना शुरू कर दिया है कि प्रयोगशालाओं में किनको प्रवेश करने का अधिकार दिया जाए और विदेशी शोधकर्ताओं की निगरानी किस सीमा तक बढ़ाई जाए. राष्ट्रीय सुरक्षा और वैज्ञानिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाने की चुनौतीपूर्ण ज़िम्मेदारी की ओर भी ये घटनाएं इशारा करती हैं.
चीन को लेकर अमेरिकी चिंता की एकमात्र वज़ह शोध से जुड़ी जैविक सामग्रियों की गैर-कानूनी ख़रीद-बिक्री ही नहीं है. बल्कि, अमेरिका के लिए ओपिओइड संकट एक राष्ट्रीय आपातकाल बन चुका है, जिसे जन-स्वास्थ्य विशेषज्ञ और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अधिकारी अब महामारी बताने लगे हैं. माना जा रहा है कि साल 2023 में फेंटानिल से 75,000 लोगों की जान गई है. यह संख्या न सिर्फ़ इस दवा की ताक़त बता रही है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं में बढ़ती जटिलताओं का भी संकेत दे रही है, जिससे महामारी को बढ़ावा मिल रहा है.
चीन को अब सबसे बड़ा जैव सुरक्षा ख़तरा माना गया है, जिसकी वज़ह सिर्फ़ यही नहीं है कि उसके पास पर्याप्त संसाधन हैं, बल्कि इसलिए भी कि उसके यहाँ गैर-राज्यीय तत्व (non-state actors) सक्रिय पाए गए हैं, जिसका पता इन लोगों की गिरफ़्तारी से चलता है.
अमेरिका ने 2021 से पहले ही चीन को फेंटानिल के सबसे बड़े स्रोतों में एक बताया था. जैसे ही अमेरिकी अधिकारियों ने रासायनिक अनुसूची बनाकर और दंड के माध्यम से ख़ास-ख़ास कंपनियों और लोगों पर इस दवा के स्रोतों को लेकर कार्रवाई शुरू की, चीन के निर्माताओं और विक्रेताओं ने अपने कारोबार का ढर्रा बदल लिया. कई संचालक कानूनी खामियों का फ़ायदा उठाकर नए सिरे से अपना कारोबार चलाने लगे और अनियमित रूप से उन रसायनों को बेचने लगे, जो फेंटानिल जैसी संरचनाओं वाले थे और जिनको अनुसूची में शामिल नहीं किया गया था. 2021 के बाद से चीन से इस दवा की सीधी ख़रीद में कमी किए जाने के बावजूद, इन घातक दवाओं का उत्पादन और आपूर्ति (जिसमें अग्रदूत रासायन की आपूर्ति करने वाले चीनी नेटवर्क से लेकर मेक्सिको के ड्रग रैकेट तक, सभी शामिल हैं) अभी भी सिंथेटिक ड्रग्स को लेकर बढ़ती चिंता का एक संकेत मानी जा रही थी. कहा जाता है कि भारत भी इसमें द्वितीयक भूमिका या गौण भूमिका निभाता है. चीन और भारत ने अभी तक फेंटानिल को बनाने में इस्तेमाल किए जाने वाले नाइटाजीन की बिक्री पर रोक नहीं लगाई है. यह बिक्री आमतौर पर ई-कॉमर्स वेबसाइटों पर, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग सेवाओं द्वारा और डिजिटल भुगतान के बेनामी नेटवर्क का उपयोग करके की जाती है, जिस कारण उनका पता लगाना और नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है.
2024 के अंत में, अमेरिकी अधिकारियों ने वुहान स्थित कंपनियों से जुड़े एक और पैटर्न का खुलासा किया. इस बार एक रासायनिक कंपनी के शीर्ष अधिकारियों पर जानबूझकर अमेरिका में फेंटानिल के स्रोत रसायन को लाने का आरोप लगाया गया. इसी तरह, मार्च 2025 में एक भारतीय रासायनिक कंपनी और उसके भारतीय अधिकारियों पर फेंटानिल के स्रोत रसायन के अवैध आयात का आरोप लगाया गया. इसके बाद से वाशिंगटन ने रासायनिक निर्यात नियंत्रण की और भी कड़ी व्यवस्था लागू कर दी है.
हालांकि, चीन की मिलीभगत का कोई स्पष्ट सबूत नहीं मिला है, फिर भी चीन ने जानकारी होने के बावजूद अपराधियों पर कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की. कूटनीतिक रूप से उठाए गए वाशिंगटन की चिंताओं को लगातार टालने से भी उसके प्रति अविश्वास गहरा हुआ है. अमेरिका की प्रतिक्रिया अब सिर्फ़ घरेलू समाधान या सीमा पर नाकेबंदी तक सीमित नहीं है, बल्कि जैव सुरक्षा, नशीले पदार्थों और रासायनिक तस्करी के संदर्भ में वह अब चीन के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों की फिर से जांच करने लगा है.
चीन की लगभग 3.28 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर (2021-25) की जैव-अर्थव्यवस्था को एक आसन्न वैश्विक ख़तरे के रूप में देखा जा रहा है. जीनोमिक अनुक्रमण, स्वास्थ्य डेटा और जैव-विनिर्माण में भारी निवेश के साथ ही चीन जैव प्रौद्योगिकी क्रांति को नए सिरे से गढ़ना चाहता है. अमेरिकी नीति-निर्माताओं की चिंता है कि चीन फार्मास्यूटिक्लस और स्वास्थ्य डेटा पर अपने नियंत्रण का इस्तेमाल निर्यात को सीमित करने या आपूर्ति श्रृंखलाओं को नियंत्रित करने के लिए दबाव बनाने के तौर पर कर सकता है, जैसा कि दुर्लभ मृदा खनिजों पर उसके नियंत्रण के मामले में पहले ही हो चुका है.
भारत को अपने रासायनिक उत्पादन उद्योग को प्राथमिकता देनी चाहिए और फेंटानिल के अवैध स्रोतों से होने वाले अवैध उत्पादन से अपना हर रिश्ता तोड़ लेना चाहिए. भारत इस मौके का लाभ उठाकर जैव प्रौद्योगिकी और दवा उद्योग में चीनी वर्चस्व को ख़त्म करते हुए एक भरोसेमंद विकल्प के रूप में उभर सकता है.
2025 की रक्षा खुफ़िया आकलन (DIA) रिपोर्ट में इन घटनाओं से पैदा हो रहे ख़तरों को व्यापक भू-राजनीतिक चिंताओं के रूप में देखा गया है. इन चिंताओं में सैन्य आधुनिकीकरण, साइबर युद्ध और विरोधी सरकारों के साथ होने वाले अंतरराष्ट्रीय गठबंधन भी शामिल हैं. चीन को अब सबसे बड़ा जैव सुरक्षा ख़तरा माना गया है, जिसकी वज़ह सिर्फ़ यही नहीं है कि उसके पास पर्याप्त संसाधन हैं, बल्कि इसलिए भी कि उसके यहाँ गैर-राज्यीय तत्व (non-state actors) सक्रिय पाए गए हैं, जिसका पता इन लोगों की गिरफ़्तारी से चलता है.
फेंटानिल तस्करी नेटवर्क, जो आमतौर पर चीन से किया जाता है, अब अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़े ख़तरों में एक है. इसे ड्रग्स नेटवर्क के समान या उससे भी बड़ा ख़तरा माना जा रहा है. इस तरह के आपराधिक व्यापार और बढ़ रही रणनीतिक उलझनों से पुराने ज़माने की कूटनीति और प्रवर्तन बेकाम साबित होने लगे हैं.
वाशिंगटन में इसके ख़िलाफ़ कुछ आवाज़ें भी उठी हैं, जैसे- अमेरिकी वकील और कंजर्वेटिव टिप्पणीकार गॉर्डन चांग ने चीन के साथ अमेरिका के कूटनीतिक संबंध पूरी तरह तोड़ लेने की मांग की है, क्योंकि उनके मुताबिक, चीन कोविड-19 से भी ज़्यादा गंभीर जैविक ख़तरा पैदा करना चाहता है. हालांकि, ज़्यादा ज़ोर घरेलू चुनौतियों से लड़ने पर दिया गया है, जिसके लिए एक राष्ट्रीय जैव सुरक्षा ढांचे का गठन भी शामिल है, जो दवा आपूर्ति श्रृंखलाओं, कृषि सुरक्षा और डेटा प्रबंधन में तालमेल बिठाते हुए काम करे.
जैव सुरक्षा के क्षेत्र में, और विशेष रूप से नशीले पदार्थों और रासायनिक सुरक्षा के क्षेत्र में, अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते तनाव का भारत पर सीधा असर पड़ सकता है-
रणनीतिक जुड़ाव का दबाव
चीन पर वाशिंगटन की बढ़ रही निगरानी को देखते हुए यह माना जा रहा है कि भारत को अमेरिका रणनीतिक रूप से अधिक अहमियत दे सकता है. इसलिए, जैव सुरक्षा सहयोग, दवा आपूर्ति श्रृंखलाओं और प्रमुख बुनियादी ढांचों में आपसी सहयोग बढ़ने की संभावना है. विश्व मंच पर स्थापित होने के लिए, भारत को इसका लाभ रासायनिक स्रोतों के उत्पादन में उठाना चाहिए और जिम्मेदारपूर्ण व्यापार के लिए द्विपक्षीय समझौता करके घरेलू कंपनियों को प्रतिस्पर्धा में बढ़त दिलानी चाहिए. इस तरह के व्यापार में अवैध सिंथेटिक ड्रग्स के उत्पादन से कोई समझौता न किया जाए.
निर्यात नियंत्रण और भू-राजनीतिक अवसर
भारत पहले से ही फेंटानिल के पूर्ववर्ती रसायन से जुड़े कारोबार में अपनी छोटी, लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका के कारण सुर्खियों में है. मुमकिन है, इसको लेकर अलग से नियम बनाया जाए. अमेरिका और उसके बहुपक्षीय साझेदारों की कड़ी निगरानी के कारण निर्यात व्यवस्था और भी सख़्त हो सकती है, जिसका भारतीय रासायनिक और दवा उद्योग पर असर पड़ सकता है. भारत को अपने रासायनिक उत्पादन उद्योग को प्राथमिकता देनी चाहिए और फेंटानिल के अवैध स्रोतों से होने वाले अवैध उत्पादन से अपना हर रिश्ता तोड़ लेना चाहिए. भारत इस मौके का लाभ उठाकर जैव प्रौद्योगिकी और दवा उद्योग में चीनी वर्चस्व को ख़त्म करते हुए एक भरोसेमंद विकल्प के रूप में उभर सकता है. हालांकि, इसके लिए उसे अपने सुरक्षा मानकों को बेहतर बनाना होगा, प्रयोगशाला की सुरक्षा मज़बूत करनी होगी और जीनोमिक डेटा का एक मज़बूत शासकीय ढांचा तैयार करना होगा.
अमेरिका अब जैव सुरक्षा और रासायनिक सुरक्षा के क्षेत्र में चीन के उदय को सिर्फ़ एक प्रतिस्पर्धी नवाचार नहीं मानता, बल्कि, चीन को एक बहुआयामी और बड़े ख़तरे के रूप में देखता है. राष्ट्रीय सुरक्षा की तुलना में जैव सुरक्षा को दिए जा रहे अधिक महत्व का मतलब यही है कि दुनिया रणनीतिक मुकाबले के एक नए युग में प्रवेश कर चुकी है. भारत इसका उपयोग अपनी राष्ट्र-स्तरीय जैव सुरक्षा को आगे बढ़ाने में कर सकता है, ताकि वैश्विक जैव सुरक्षा, दवा और रासायनिक आवश्यकताओं में वह अपना योगदान बढ़ा सके.
(श्राविष्ठा अजयकुमार ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं)
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Shravishtha Ajaykumar is an Associate Fellow at the Centre for Security, Strategy, and Technology. Her research areas include Chemical, Biological, Radiological, and Nuclear (CBRN) strategy ...
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