हाल ही में इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों की घटना याद होगी… जानकर हैरानी होगी कि दुनिया भर के शहरों में जल प्रदूषण लगातार खतरनाक रूप ले रहा है. पढ़ें कैसे यह संकट पैदा हुआ और कैसे शहरों में सुरक्षित पानी सुनिश्चित किया जा सकता है.
शहरों में जल संकट की समस्या कई तरह से दिख सकती है. पानी की कमी, असमानता और प्रदूषण. इनमें से दूषित पानी की समस्या पर बहुत कम ध्यान दिया गया है. सार्वजनिक सर्वेक्षणों से पता चलता है कि जल प्रदूषण विश्व स्तर पर सबसे बड़ी पर्यावरणीय समस्या है. दिसंबर 2025 में इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों का आंकड़ा 15 से ज्यादा हो चुका है. इंदौर वैसे तो देश का सबसे स्वच्छ शहर माना जाता है, लेकिन प्रदूषित पानी से हुई मौतों की वजह से ये शहर गलत कारणों से चर्चा में है. इसने जल प्रदूषण के मुद्दे को फिर सुर्खियों में ला दिया है. नगर पालिका द्वारा की जा रही जलापूर्ति में माइक्रोबॉयल का प्रकोप फैल गया. यह कोई अलग-थलग घटना नहीं है. अमेरिका के फ्लिंट में जल संकट से लेकर शिमला में 2016 में फैले हेपेटाइटिस के प्रकोप तक की घटनाएं बताती हैं कि नल कनेक्शन की उपलब्धता जैसे सतही मापदंडों और ज़मीनी हकीक़त के बीच कितना अंतर है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमान के अनुसार, वैश्विक स्तर पर 1.7 अरब लोग मल-मूत्र से दूषित जल स्रोतों से पानी का सेवन करते हैं जिसके कारण हर साल लगभग 5 लाख से ज़्यादा लोगों की डायरिया से मौत हो जाती है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में 96 प्रतिशत घरों को पीने के पानी के बेहतर स्रोत की सुविधा उपलब्ध है. हालांकि, इंदौर जैसी घटनाएं इस बात की स्पष्ट चेतावनी देती हैं कि गुणवत्तापूर्ण जल सुनिश्चित किए बिना सिर्फ पानी मुहैया करा देना पर्याप्त नहीं है. इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो शहरी जल प्रदूषण कोई छिटपुट विफलता नहीं है, बल्कि यह शासन व्यवस्था का नाकामी का एक व्यापक परिणाम है.
इंदौर में दूषित पानी का गंभीर संकट फैल गया, जिससे दस्त और उल्टी की महामारी फैल गई. भागीरथपुरा में कम से कम 15 लोगों की मौत हो गई और कई लोग इससे प्रभावित हुए. इस त्रासदी के बाद, नगर निगम ने नर्मदा नदी से आपूर्ति किए जा रहे पानी के पाइपलाइनों में कई रिसावों की मरम्मत की है. माना जाता है कि पास के सीवेज नेटवर्क से रिसाव के कारण इन पाइपलाइनों में दूषित पानी आ रहा था. जांच में पता चला कि एक सार्वजनिक शौचालय ब्लॉक मुख्य जल आपूर्ति पाइपलाइन के ठीक ऊपर स्थित है, जिसमें रिसाव हो रहा था. हादसे के बाद अब पाइपलाइन की नियमित निगरानी के तहत पानी के नमूनों की जांच की जा रही है, साथ ही लोगों को अपने घरों के नल बंद रखने और सार्वजनिक आपूर्ति वाले पानी का इस्तेमाल ना करने के लिए भी कहा गया है. इस बीच, पूरे इलाके में टैंकरों द्वारा पानी की आपूर्ति की जा रही है, जिसे पीने से पहले उबालना और छानना आवश्यक है. कुछ ही महीने पहले, भोपाल के पास स्थित वेल्लोर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (वीआईटी) विश्वविद्यालय के छात्रों ने परिसर में पानी की खराब गुणवत्ता और पीलिया के बढ़ते मामलों के विरोध में प्रदर्शन किया था.
इंदौर वैसे तो देश का सबसे स्वच्छ शहर माना जाता है, लेकिन प्रदूषित पानी से हुई मौतों की वजह से ये शहर गलत कारणों से चर्चा में है. इसने जल प्रदूषण के मुद्दे को फिर सुर्खियों में ला दिया है. नगर पालिका द्वारा की जा रही जलापूर्ति में माइक्रोबॉयल का प्रकोप फैल गया.
इंदौर की घटना के बाद, गांधीनगर, ग्रेटर नोएडा और हैदराबाद में सीवेज और अन्य रोगाणुओं से पेयजल के दूषित होने के कारण टाइफाइड के प्रकोप की ख़बरें लगातार आती रही. केरल में भी नल के पानी में फेकल कोलीफॉर्म पाए गए, जो मानव मल में पाया जाता है. यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है कि जल प्रदूषण मुख्य रूप से पुराने बुनियादी ढांच और खराब रखरखाव के कारण होता है. गुजरात के गांधीनगर में नई बिछाई गई पाइपलाइनों में रिसाव पाया गया, जिससे शहर की पेयजल आपूर्ति में सीवेज का पानी मिल गया.
2016 में, शिमला में अश्वनी खड्ड के दूषित पानी के कारण पीलिया का प्रकोप देखा गया. यह शहर में पीने के पानी का एक प्रमुख स्रोत है और रोज़ाना 10.8 मिलियन लीटर पानी की आपूर्ति करता है. अश्वनी खड्ड में जल प्रदूषण 4 किलोमीटर ऊपर स्थित मलाया सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में खराबी के कारण हुआ. यह घटना जल स्रोत के इतने पास सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की स्थापना से उत्पन्न मानक डिजाइन और योजना की विफलता को दिखाती है. सीवेज प्लांट में रिसाव और दूषित पानी की वजह से शिमला में पानी की आपूर्ति बाधित हुई और कई महीनों तक गंभीर जल संकट बना रहा.
दुनिया के कई शहरों में इस तरह के प्रदूषण के मामले बार-बार सामने आए हैं. 2014 में मिशिगन में हुआ फ्लिंट जल संकट, समकालीन अमेरिकी इतिहास में पर्यावरणीय प्रदूषण की एक महत्वपूर्ण घटना थी. फ्लिंट शहर ने अपने जल स्रोत को ह्यूरन झील से बदलकर फ्लिंट नदी कर दिया, जबकि इस दौरान ह्यूरन झील से जुड़ने वाली नई पाइपलाइन पर काम चल रहा था. ये पाइपलाइन फ्लिंट शहर को करेग्नोन्डी जल प्राधिकरण (केडब्ल्यूए) से जोड़ती, लेकिन लागत संबंधी विचारों के आधार पर ये फैसला लिया गया. यह पाया गया कि फ्लिंट नदी औद्योगिक अपशिष्टों से प्रदूषित थी. उद्योगों से निकलने वाले कचरे से नदी दूषित हो गई थी. आखिरकार यहां से सप्लाई होने वाली पानी को लेकर लोगों ने गंदे और खराब स्वाद वाले पानी की शिकायत की. इसके अलावा, खुजली, चकत्ते और बाल झड़ने जैसी समस्याएं उत्पन्न हुईं. पानी में क्लोरीन की कमी के कारण जीवाणु पनपने लगे, जिससे 2014-2015 में लेजिओनेयर्स रोग का प्रकोप फैल गया. प्रदूषित पानी की वजह से 80 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई, और सैकड़ों निवासी संक्रमित हो गए. शहर की पुरानी पाइपलाइनों में रिसाव हुआ, और दूषित तत्व आपूर्ति वाले पानी में मिल गए. शहर के पेयजल में सीसा घुल गया. इससे पहले, 1998 में सिडनी की जल आपूर्ति में क्रिप्टोस्पोरिडियम और जियार्डिया का प्रकोप पाया गया था. लोगों को पानी उबालकर पीने की सलाह दी गई, साथ ही कुछ स्वास्थ्य संबंधी चेतावनियां जारी की गई थीं. 2025 में, पेरिस समेत फ्रांस के कई शहरों में नल से जल की आपूर्ति में ट्राइफ्लोरोएसिटिक एसिड और पॉलीफ्लोरोएल्काइल पाए गए थे. यह प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं, और कुछ प्रकार के कैंसर का कारण बन सकते हैं.
दुनियाभर में दूषित पानी के यह मामले दिखाते हैं कि शहरी जल प्रदूषण छिटपुट या भौगोलिक रूप से विशिष्ट समस्या नहीं है. यह समस्या शहरों द्वारा अपने जल और सीवेज ढांचे की योजना बनाने, निर्माण करने और प्रबंधन करने के तरीके में ही शामिल है. खराब ढंग से डिज़ाइन किए गए नेटवर्क, कमज़ोर निगरानी, सीवरेज और पेयजल प्रणालियों का ठीक तरीके से अलग-अलग ना होना, इस समस्या को और बढ़ा देता है.
अधिकारी आमतौर पर अनियमित जल आपूर्ति प्रणाली को सीवेज के बैक साइफनेज का कारण मानते हैं, खासकर तब जब पानी की आपूर्ति के समय के बीच पाइप खाली हों या उनमें दबाव कम हो. आम तौर पर भारत के ज़्यादातर शहरों में हर सुबह पानी आता है, या फिर सुबह और शाम. बीच के खाली समय में बैक साइफनेज की समस्या पैदा होती है. इस समस्या के समाधान के लिए, कई शहरों ने 24 घंटे जल आपूर्ति प्रणाली जैसे क्रांतिकारी तकनीकी उपाय अपनाए हैं, जो सीवेज रिसाव को रोकने के लिए नेटवर्क में हर समय पानी का पूरा दबाव सुनिश्चित करते हैं. हालांकि, ऐसे मॉडल में बहुत ज़्यादा पूंजी लगती है. उदाहरण के लिए, नागपुर में 24 घंटे जलापूर्ति की पायलट परियोजना में कुल आपूर्ति का 27 प्रतिशत गैर-राजस्व जल दर्ज किया जा रहा है, जबकि लक्ष्य 15 प्रतिशत है. दूसरी ओर, शिमला में 24 घंटे जलापूर्ति की परियोजना एक अपारदर्शी बोली प्रक्रिया और अस्पष्ट लागत वृद्धि में फंसी हुई है. इसी तरह, चंडीगढ़ के मनीमाजरा में हर समय जल की पायलट परियोजना भी उम्मीदों के मुताबिक सफल नहीं रही. लागत में तीन गुना बढ़ोत्तरी, पानी के दबाव में कमी, पुरानी पाइपलाइनों और मौजूदा घरेलू सेवा कनेक्शनों को ना बदलने को लेकर उसकी आलोचना हुई.
2014 में मिशिगन में हुआ फ्लिंट जल संकट, समकालीन अमेरिकी इतिहास में पर्यावरणीय प्रदूषण की एक महत्वपूर्ण घटना थी. फ्लिंट शहर ने अपने जल स्रोत को ह्यूरन झील से बदलकर फ्लिंट नदी कर दिया, जबकि इस दौरान ह्यूरन झील से जुड़ने वाली नई पाइपलाइन पर काम चल रहा था.
शहरों में पानी की बढ़ती मांग की वजह से दूर के जल स्रोतों की खोज करनी पड़ रही है. उदाहरण के लिए, बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) की गरगई परियोजना का उद्देश्य 200 किलोमीटर से अधिक दूर स्थित पालघर जिले से अतिरिक्त 440 एमएलडी पानी की आपूर्ति करना है. इस परियोजना को पिछले ही साल मंजूरी मिली थी. पाइपलाइन जितनी लंबी होगी, उसे बनाने की लागत उतनी ही ज़्यादा होगी और रिसाव का ख़तरा भी उसी हिसाब से बढ़ जाएगा. जब पानी की लागत बढ़ जाती है, तो कम आय वाले समूहों तक जल आपूर्ति करना मुश्किल हो जाता है.
ये उदाहरण दिखाते हैं कि लालफीताशाही वाली प्रौद्योगिकी-प्रधान शासन व्यवस्था विकास संबंधी पूर्वाग्रहों को बढ़ावा देती है. इससे एकीकृत शासन और समानता की आवश्यकताएं छिप जाती हैं. ऐसे दृष्टिकोण ज़ोखिम को कम करने के बजाय, विस्तारित नेटवर्क लंबाई, उच्च रिसाव संभावनाओं, बढ़ती लागतों और महंगी शुल्क व्यवस्थाओं के माध्यम से नई कमज़ोरियों को जन्म दे सकते हैं.
शहरी जल प्रदूषण को एक ऐसी आकस्मिक खराबी के रूप में नहीं देखा जा सकता, जिसका समाधान आपातकालीन प्रतिक्रियाओं या प्रायोगिक तकनीकी उपायों के ज़रिए कर लिया जाएगा. चूंकि यह खंडित संस्थागत व्यवस्थाओं, पुरानी अवसंरचना, खराब रखरखाव, कमज़ोर निगरानी प्रक्रियाओं, पारिस्थितिक और समानता संबंधी विचारों की निरंतर उपेक्षा से गहराई से जुड़ा हुआ है. इसलिए इस समस्या के समाधान के लिए व्यावहारिक, साक्ष्य-आधारित हस्तक्षेपों की ज़रूरत होगी.
भारत के जल आपूर्ति ढांचे में एक मौलिक बदलाव की ज़रूरत है. अब विकास-केंद्रित, तकनीकी शहरी जल प्रबंधन से हटकर एक पारिस्थितिक रूप से एकीकृत और समानता-प्रथम शासन ढांचे की ओर बढ़ना होगा. यह परिवर्तन ना सिर्फ जन स्वास्थ्य की रक्षा के लिए ज़रूरी है, बल्कि सतत विकास लक्ष्यों को बनाए रखने और जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीले और अनुकूल शहरों के निर्माण के लिए भी आवश्यक है.
जल आपूर्ति, गुणवत्ता और सीवेज प्रबंधन पर संस्थागत समन्वय से नियामक खामियों को कम किया जा सकता है. राज्यों को रासायनिक और सीवेज प्रदूषण के लिए जल आपूर्ति स्रोतों और वितरण नेटवर्क का व्यवस्थित ऑडिट करना चाहिए. ज़ोखिम वाली पाइपलाइनों की नियमित रूप से पहचान, मरम्मत या उन्हें बदलना चाहिए. जल गुणवत्ता निगरानी को ट्रीटमेंट प्लांट्स से आगे बढ़कर नजदीक के वितरण बिंदुओं तक विस्तारित किया जाना चाहिए. इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि आपूर्ति किया गया जल गुणवत्ता मानकों को पूरा करता है.
हालांकि दबाव परीक्षण, ध्वनिक रिसाव का पता लगाना, जमीन में प्रवेश करने वाले रडार, रीयल टाइम में रिसाव का पता लगाने वाली प्रणालियां और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल से रिसाव का पता लगाना ज़्यादा सटीक और आसान हो चुका है, लेकिन इतना ही काफ़ी नहीं है. रिसाव की मरम्मत और रोकथाम से आगे बढ़कर एक व्यापक जल गुणवत्ता शासन ढांचा स्थापित करने की ओर बढ़ने की ज़रूरत है. दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे शहरों में शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) और अर्ध-सरकारी जल प्राधिकरणों को समन्वित शहरी नियोजन सुनिश्चित करना चाहिए ताकि सड़क खुदाई, पाइपलाइन बिछाने और बुनियादी ढांचे के विस्तार के दौरान जल और सीवरेज नेटवर्क को अनजाने में होने वाले नुकसान से बचाया जा सके. इसके अलावा, सभी शहरों में आकस्मिक योजनाएं यानी जल आपूर्ति के वैकल्पिक स्रोत होने चाहिए, जिससे मुख्य आपूर्ति लाइन या स्रोत के दूषित होने की स्थिति में पूरी जल आपूर्ति प्रभावित न हो.
कुल मिलाकर, भारत के जल आपूर्ति ढांचे में एक मौलिक बदलाव की ज़रूरत है. अब विकास-केंद्रित, तकनीकी शहरी जल प्रबंधन से हटकर एक पारिस्थितिक रूप से एकीकृत और समानता-प्रथम शासन ढांचे की ओर बढ़ना होगा. यह परिवर्तन ना सिर्फ जन स्वास्थ्य की रक्षा के लिए ज़रूरी है, बल्कि सतत विकास लक्ष्यों को बनाए रखने और जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीले और अनुकूल शहरों के निर्माण के लिए भी आवश्यक है.
सोमा सरकार ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के अर्बन स्टडीज़ प्रोग्राम में एसोसिएट फेलो हैं.
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Soma Sarkar is an Associate Fellow with ORF’s Urban Studies Programme. Her research interests span the intersections of environment and development, urban studies, water governance, Water, ...
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