Author : Chaitanya Giri

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Published on Feb 16, 2026 Updated 1 Days ago

स्टारलिंक जैसी सैटेलाइट तकनीक दूर-दराज के स्कूलों तक इंटरनेट पहुंचाकर डिजिटल शिक्षा को बदलने की क्षमता रखती है लेकिन यह पहल जितने अवसर लेकर आई है, उतने ही सुरक्षा और तकनीकी निर्भरता के सवाल भी खड़े कर रही है. जानिए कैसे.

स्कूलों में स्टारलिंक: समाधान या चुनौती?

स्टारलिंक इंडिया दुनिया भर में लो-अर्थ-ऑर्बिट इंटरनेट देने वाली कंपनी की भारतीय शाखा है. इसने हाल ही में गुजरात और महाराष्ट्र सरकारों के साथ दो समझौते किए हैं, जो कानूनन किसी को मजबूर नहीं कर सकते. इनका मकसद स्टारलिंक की लास्ट-माइल कनेक्टिविटी खासियत का इस्तेमाल करके राज्य के स्कूलों को मजबूत टेलीकॉम सपोर्ट देना है. इसके साथ ही इसे दूर-दराज के इलाकों में मौजूद स्कूलों को इंटरनेट से जोड़ना है. यह कोशिश देश के उस बड़े लक्ष्य से जुड़ी है जिसमें डिजिटल खाई को पाटना, गांव और शहर के बीच फर्क को घटाना और ग्रामीण क्लासरूम को डिजिटल पढ़ाई की जगह बनाना शामिल है. इरादे तो अच्छे हैं और सरकारों की कोशिश भी काबिले-तारीफ है लेकिन जिस तकनीक के सहारे यह बदलाव लाने की बात हो रही है, वह अपने आप में कई बड़े सवाल खड़े करती है.

टेली-एजुकेशन का सफर

भारत और दुनिया के कई देशों ने स्कूलों को सेटेलाइट से जोड़ने का काम 2G आने से बहुत पहले ही शुरू कर दिया था. उस दौर में इसे टेली-एजुकेशन कहा जाता था. लंबे समय तक यह सिस्टम जियोस्टेशनरी सैटेलाइट पर चलता रहा. पृथ्वी की निचली कक्षा में रहने वाले LEO सैटेलाइट नेटवर्क बाद में आए और अभी भी इन्हें कदर नई तकनीक माना जाता है.

यूरोप में यूटेलसैट कनेक्ट नाम का एक हाई-कैपेसिटी सैटेलाइट ग्रामीण और पहाड़ी इलाकों के स्कूलों को 100 Mbps या उससे ज्यादा स्पीड वाला इंटरनेट देता है. स्कॉटलैंड से लेकर ग्रीस तक और आल्प्स व पिरेनीज जैसे कठिन इलाकों तक इसकी पहुंच है. वहीं लक्जमबर्ग की कंपनी SES, एस्ट्रा नाम की सैटेलाइट सीरीज चलाती है, जो जर्मनी, आयरलैंड और पूर्वी यूरोप के ग्रामीण स्कूलों के लिए डिजिटल वीडियो ब्रॉडकास्टिंग देती है.

स्टारलिंक की लास्ट-माइल कनेक्टिविटी खासियत का इस्तेमाल करके राज्य के स्कूलों को मजबूत टेलीकॉम सपोर्ट देना है. इसके साथ ही इसे दूर-दराज के इलाकों में मौजूद स्कूलों को इंटरनेट से जोड़ना है. यह कोशिश देश के उस बड़े लक्ष्य से जुड़ी है जिसमें डिजिटल खाई को पाटना, गांव और शहर के बीच फर्क को घटाना और ग्रामीण क्लासरूम को डिजिटल पढ़ाई की जगह बनाना शामिल है.

स्टारलिंक भी यूरोप में मौजूद है, लेकिन वहां के देश अब अपनी सैटेलाइट कम्युनिकेशन आजादी तय करने में लगे हैं. इसके लिए IRIS-2 नाम का एक प्रोग्राम तैयार किया जा रहा है, जो मीडियम-अर्थ-ऑर्बिट सैटेलाइट नेटवर्क होगा. इसका मकसद यह है कि यूरोप के पास खुद का सैटकॉम यानी सैटेलाइट कम्युनिकेशन सिस्टम हो और उसे बाहरी कंपनियों पर कम निर्भर रहना पड़े. माना जा रहा है कि 2030 तक करीब 290 सैटेलाइट वाला यह सिस्टम स्कूलों की कनेक्टिविटी का मुख्य आधार बन जाएगा.

यूरोप के देशों ने ग्रामीण स्कूलों में डिजिटल कनेक्टिविटी के लिए अच्छा-खासा बजट भी रखा है. ब्रिटेन ने 2025 में कनेक्ट दि क्लासरूम प्रोग्राम के तहत 45 मिलियन पाउंड दिए, जिनसे Wi-Fi अपग्रेड हुआ और ऑप्टिकल फाइबर बिछाए गए. जहां फाइबर नहीं पहुंच सकता, वहां सरकार हाई-स्पीड सैटेलाइट टर्मिनल लगाने का खर्च उठाती है. इस काम में यूटेलसैट और स्टारलिंक जैसी कंपनियां आपस में मुकाबला करती हैं.

स्पेन का यूनिको रूरल डिमांड प्रोग्राम सभी ग्रामीण सरकारी स्कूलों को सस्ता 100 Mbps ब्रॉडबैंड देने की कोशिश कर रहा है. ऊंचे पहाड़ी इलाकों जैसे जिन इलाकों में फाइबर पहुंचाना मुश्किल है, वहां सैटेलाइट टर्मिनल लगाने का पूरा खर्च सरकार देती है, जो 150 से 600 यूरो तक होता है. जर्मनी ने डिजिटल एजुकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए 5 बिलियन यूरो का बजट बनाया है. इसमें से 2.9 बिलियन से ज्यादा ब्रॉडबैंड पर खर्च हो रहे हैं. जहां फाइबर डालना पर्यावरण या पैसे की वजह से मुश्किल है, वहां सैटेलाइट विकल्प दिया जाता है. फ्रांस भी अपने कोहेसियन न्यूमेरिक डेस टेरिटोयर्स स्कीम के तहत ग्रामीण स्कूलों को 150 से 600 यूरो तक की मदद देता है. जब तक IRIS-2 पूरी तरह तैयार नहीं होता, वहां के देश यूरोपियन रीजनल डेवलपमेंट फंड से स्कूलों का डिजिटल ढांचा मजबूत कर रहे हैं और नए सिस्टम की टेस्टिंग भी कर रहे हैं.

भारत रहा है लीडर

भारत टेली-एजुकेशन के मामले में दुनिया से आगे रहा है. 1975–76 में ISRO के SITE प्रयोग ने छह राज्यों के 2,400 गांवों को जोड़ा था. यह अपने तरह का सबसे बड़ा सामाजिक प्रयोग माना गया. इसमें पढ़ाई एक अहम हिस्सा थी.

इसका मकसद यह है कि यूरोप के पास खुद का सैटकॉम यानी सैटेलाइट कम्युनिकेशन सिस्टम हो और उसे बाहरी कंपनियों पर कम निर्भर रहना पड़े. माना जा रहा है कि 2030 तक करीब 290 सैटेलाइट वाला यह सिस्टम स्कूलों की कनेक्टिविटी का मुख्य आधार बन जाएगा.

2004 में ISRO ने GSAT-3 यानी EDUSAT लॉन्च किया. यह पहला सैटेलाइट था, जिसने इंटरैक्टिव डिस्टेंस एजुकेशन की इमारत बनाई. इंटरैक्टिव टर्मिनल और सिर्फ रिसीव करने वाले क्लासरूम टर्मिनल के जरिए पढ़ाई होने लगी. NCERT, राज्य शिक्षा बोर्ड और IGNOU जैसी संस्थाओं को इसका सीधा फायदा मिला. अपने चरम पर EDUSAT 26 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों तक पहुंचा. करीब 56,000 क्लासरूम इससे जुड़े, जिनमें लगभग 51,000 रिसीव-ओनली और करीब 5,000 इंटरैक्टिव टर्मिनल थे. हर साल करीब ढाई करोड़ छात्रों तक इसकी पहुंच थी. आज भी केंद्र और राज्य सरकारें कई फ्री एजुकेशनल चैनल चलाती हैं. पीएम -विद्या, स्वयं प्रभा, केरल का VICTERS चैनल, गुजरात के वंदे गुजरात चैनल और UGC के चैनल-ये सभी GSAT के जरिए प्राइमरी से लेकर पोस्ट ग्रेजुएट तक पढ़ाई उपलब्ध कराते हैं.

विदेशी LEO सैटेलाइट के खतरे

भारत के पास पहले से मजबूत, भरोसेमंद और सब्सिडी वाला टेली-एजुकेशन सिस्टम है, जो GSAT जैसे जियोस्टेशनरी सैटेलाइट पर टिका है. सैटेलाइट वहां पहुंचते हैं जहां फाइबर नहीं पहुंच पाता. डिजिटल खाई कम करने की रणनीति इसी सोच पर आधारित होनी चाहिए.

LEO सैटेलाइट यानी पृथ्वी की निचली कक्षा में रहने वाले सैटेलाइटों को लेकर उत्सुकता बढ़ रही है, लेकिन इस ऊर्जा को देश में बने सुरक्षित LEO या MEO नेटवर्क बनाने में लगाना ज्यादा समझदारी होगी. सरकारों को समझना होगा कि अगर टेली-एजुकेशन देशी सैटेलाइट, लास्ट-माइल कनेक्टिविटी, ऑप्टिकल फाइबर और नए कम्युनिकेशन नेटवर्क के मिश्रण पर टिका रहेगा, तो ज्यादा सुरक्षित रहेगा. विदेशी और अविश्वसनीय LEO सिस्टम पर जरूरत से ज्यादा भरोसा नई कमजोरियां पैदा कर सकता है. यूरोप और चीन भी इस खतरे को समझ चुके हैं.

साइबर और ऑपरेशनल खतरे

LEO नेटवर्क एक टेलीकॉम डिवाइस है, इसलिए इसे दूरसंचार अधिनियम 2023 के तहत भारत की संप्रभुता, अखंडता और सुरक्षा के सभी पैमानों पर परखा जाना चाहिए. अगर देश विदेशी नेटवर्क पर निर्भर हो गया, तो ऑपरेटर के फैसले से पूरा सिस्टम एक ही जगह से ठप हो सकता है. ग्रे-जोन वॉरफेयर जैसे हालात में, जिनके प्रति भारत संवेदनशील है, विदेशी डिवाइस शिक्षा व्यवस्था को कमजोर करने का जरिया बन सकते हैं. भारतीय कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम की एडवाइजरी के मुताबिक खतरे इस तरह हैं :

सिग्नल जामिंग : ताकतवर जामिंग से एजुकेशनल सैटेलाइट बंद हो सकते हैं. इससे बड़े पैमाने पर इंटरनेट ठप हो सकता है और स्कूल बंद करने पड़ सकते हैं. फाइबर वाले स्कूल और सैटेलाइट वाले स्कूलों के बीच फर्क सामाजिक तनाव भी बढ़ा सकता है. रूस–यूक्रेन युद्ध में रूसी फोर्सेज ने यूक्रेन के लिए काम कर रहे कई स्टारलिंक सैटेलाइट जाम किए थे. ऐसा शांति के समय में भी हो सकता है.

सरकारों को समझना होगा कि अगर टेली-एजुकेशन देशी सैटेलाइट, लास्ट-माइल कनेक्टिविटी, ऑप्टिकल फाइबर और नए कम्युनिकेशन नेटवर्क के मिश्रण पर टिका रहेगा, तो ज्यादा सुरक्षित रहेगा. विदेशी और अविश्वसनीय LEO सिस्टम पर जरूरत से ज्यादा भरोसा नई कमजोरियां पैदा कर सकता है.

स्पूफिंग और गलत कंटेंट : दुश्मन सिग्नल पकड़कर असली पढ़ाई की जगह डीपफेक लेक्चर, गलत जानकारी, राजनीतिक प्रचार या फर्जी इमरजेंसी अलर्ट चला सकते हैं. इससे स्कूलों का सुरक्षित माहौल बिगड़ सकता है और लोगों का भरोसा घट सकता है. 2024 में वाल्ट डिज्नी के बेबी टीवी चैनल पर ऐसा हमला हुआ था, जहां उसकी जगह रूसी सेना की फुटेज चला दी गई.

हार्डवेयर ब्रिकिंग : मालवेयर डालकर स्कूलों के टर्मिनल बेकार किए जा सकते हैं. इससे सरकार पर नए उपकरण लगाने का भारी खर्च आएगा और छात्रों की पढ़ाई भी रुक सकती है. 2017 में ब्रिकरबॉट मालवेयर ने एमटीएनएल और बीएसएनएल के हजारों राउटर बंद कर दिए थे. लेटेंसी और जिटर हमले : सैटेलाइट में दखल देकर वीडियो धीमा किया जा सकता है, क्वालिटी गिराई जा सकती है और लाइव क्लास में रुकावट पैदा की जा सकती है. इससे बड़े ऑनलाइन कोर्स चलाना मुश्किल हो जाएगा. यहां तक कि हल्के हमले भी लाइव पढ़ाई बंद करवाने पर मजबूर कर सकते हैं, जिससे गांवों में शिक्षा और कौशल पर असर पड़ेगा.

सुरक्षित तो रखना होगा

स्कूलों की पढ़ाई, डिजिटल खाई को पाटना और इंटरनेट तक बराबरी की पहुंच देना विकास की सबसे अहम जरूरतों में है. केंद्र और राज्य सरकारें भरोसेमंद टेक्नोलॉजी साझेदारों के साथ मिलकर इस दिशा में काम कर रही हैं. लेकिन यह मान लेना खतरनाक साबित हो सकता है कि अच्छी नीयत से शुरू की गई पहलें अपने आप सुरक्षित हैं और उनमें राष्ट्रीय सुरक्षा का कोई जोखिम नहीं है.

स्कूल हमेशा से संवेदनशील जगह माने जाते हैं-सिर्फ शारीरिक हमलों के लिए नहीं, बल्कि हाइब्रिड वॉरफेयर, अंदरूनी तोड़फोड़ और वैचारिक हमलों के लिए भी. अगर डिजिटल नेटवर्क सुरक्षित न हों तो खतरा और बढ़ जाता है. इसलिए भारत की शिक्षा व्यवस्था को राष्ट्रीय जीवन का सबसे पवित्र और अहम हिस्सा मानकर उसकी देखभाल और सुरक्षा दोनों जरूरी है, ताकि देश दोबारा किसी तकनीकी 'मैकाले की चाल' में न फंस जाए.


चैतन्य गिरि ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर सिक्योरिटी, स्ट्रेटेजी एंड टेक्नोलॉजी में फेलो हैं.

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