संयुक्त राष्ट्र महासभा के 80वें सत्र में, अफ़्रीका सुधार, शांति और समानता को प्राथमिकता दे रहा है, ताकि वह उस विश्व व्यवस्था को नया रूप दे सके, जो लंबे समय से उसके हितों की अनदेखी कर रही है.
संयुक्त राष्ट्र महासभा का 80वां सत्र (UNGA 80) 9 सितंबर, 2025 से न्यूयॉर्क शहर में शुरू होने वाला है. इस बार इसकी थीम है- ‘एक साथ बेहतर- शांति, विकास और मानवाधिकारों के लिए 80 वर्ष और उससे भी अधिक’. इस आयोजन का मक़सद संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सहित विश्व के सभी नेताओं को एक मंच पर लाना है, ताकि ज़रूरी मुद्दों पर विचार-विमर्श किया जा सके और दुनिया के सामने मौजूद गंभीर चुनौतियों के समाधान के लिए आम सहमति बनाई जा सके. 54 सदस्य देशों का प्रतिनिधित्व करने के कारण अफ़्रीकी समूह (AG) इस महासभा का सबसे बड़ा क्षेत्रीय गुट है. यह महासभा अफ़्रीका के लिए अपने कूटनीतिक प्रभाव को आगे बढ़ाने और टिकाऊ विकास, शांति व शासन संबंधी सुधार की मांग करने का एक महत्वपूर्ण मंच है.
संयुक्त राष्ट्र महासभा में अफ़्रीका मुख्य रूप से इसलिए अपनी कूटनीतिक भागीदारी निभाता है, क्योंकि उसकी बहुपक्षवाद के प्रति अटूट निष्ठा है. इस महाद्वीप ने न सिर्फ़ संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDG) का लगातार समर्थन किया है, बल्कि पर्यावरण संबंधी स्थिरता को बढ़ावा देने, आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करने, गरीबी उन्मूलन और स्वास्थ्य सेवा एवं शिक्षा में सुधार लाने के उसके प्रयासों को भी आगे बढ़ाया है. वैश्विक नीतियों को आकार देने में भी अफ़्रीका का योगदान महत्वपूर्ण है और वह संरचनात्मक असमानताओं को दूर करने की कोशिशों में है, विशेष रूप से उन विषमताओं को, जो उपनिवेशवाद और ऐतिहासिक वज़हों से पिछड़ जाने के कारण अफ़्रीका को विरासत में स्थायी रूप से मिली हैं.
टिकाऊ विकास और मानवीय मदद से जुड़े मुद्दों पर एकजुट मोर्चा के रूप में खुद को पेश करने की अफ़्रीकी समूह की क्षमता वैश्विक शासन व्यवस्था में उसके प्रभाव के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. यह सामूहिक ताक़त अफ़्रीका के दीर्घकालिक लक्ष्यों—जैसे अंतरराष्ट्रीय बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार, पर्यावरण संरक्षण और संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में शांति स्थापना—को आगे बढ़ाने में अहम है.
अफ़्रीकी देश किसी सैन्य हस्तक्षेप के बजाय कूटनीतिक भागीदारी की वकालत करते हैं और इस बात को मानते हैं कि बाहरी शक्तियों के बजाय स्थानीय ताक़तों को समाधान निकालना चाहिए.
अफ़्रीका अपनी भौगोलिक सीमाओं के भीतर और बाहर सघर्षों से निपटने में लगातार जुटा है. यह महाद्वीप दुनिया के कुछ सबसे स्थायी और जटिल संकटों का भी ठिकाना है, जैसे कि कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC), सूडान, दक्षिण सूडान और पश्चिमी सहारा संकटों का. अफ़्रीकी समूह इन संघर्षों को ख़त्म करने और शांति को बढ़ावा देने के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच का उपयोग करना चाहता है. इसके अलावा, अफ़्रीकी संघ (AU) भी इन शांति प्रयासों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, जो अक्सर संयुक्त राष्ट्र और क्षेत्रीय संगठनों के साथ मिलकर काम करता है. उदाहरण के लिए, अफ़्रीकी संघ ने सूडान और सोमालिया जैसे संघर्ष वाले क्षेत्रों में शांति वार्ता और शांति अभियानों का नेतृत्व किया है. अफ़्रीका आमतौर पर आत्मनिर्णय के अधिकार पर ज़ोर देता है. अफ़्रीकी देश किसी सैन्य हस्तक्षेप के बजाय कूटनीतिक भागीदारी की वकालत करते हैं और इस बात को मानते हैं कि बाहरी शक्तियों के बजाय स्थानीय ताक़तों को समाधान निकालना चाहिए.
अफ़्रीका की कूटनीतिक रणनीति का एक अहम पहलू फिलिस्तीन मुद्दे पर उसका रवैया है, जिसके जड़ें उपनिवेशवाद और रंगभेद के साथ ही महाद्वीप के ऐतिहासिक अनुभवों में छिपी हैं. हालांकि, अधिकांश अफ़्रीकी देशों ने पारंपरिक रूप से फिलिस्तीन लोगों के आत्म-निर्णय के अधिकार का समर्थन किया है, फिर भी यहां वे ऐसे संतुलित नज़रिये पर बल देते हैं, जिसमें शांति, स्थिरता और इज़रायल-फिलिस्तीन संघर्ष का बातचीत से समाधान को प्राथमिकता दी गई हो.
बेशक, संयुक्त राष्ट्र महासभा के दायरे के भीतर, अधिकांश अफ़्रीकी राष्ट्र फिलिस्तीन आकांक्षाओं को आगे बढ़ाने का लक्ष्य रखते हैं, लेकिन संवाद को प्रोत्साहित करने और क्षेत्रीय सहयोग को आगे बढ़ाने पर भी वे ज़ोर देते रहे हैं. हालांकि, कभी-कभी कुछ प्रस्तावों को लेकर उनमें मतभेद भी उभर आते हैं, लेकिन अफ़्रीकी ब्लॉक का रुख़ शांति व सुलह को बढ़ावा देने और इससे जुड़े सभी पक्षों की उचित चिंताओं को दूर करने का ही रहा है.
बहुपक्षवाद की बात करें, तो इसको लेकर अफ़्रीका की प्रतिबद्धता इससे कहीं अधिक स्पष्ट हो जाती है कि वह संयुक्त राष्ट्र के उस व्यापक एजेंडे का समर्थन करता है, जिसमें ‘भविष्य के लिए समझौता’ भी शामिल है. इन एजेंडों का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य संकट और गरीबी उन्मूलन के लिए वैश्विक सहयोग को आगे बढ़ाना है. ऐसी पहलों के लिए अफ़्रीकी समूह का समर्थन करना इस बात का संकेत है कि यह महाद्वीप वैश्विक समस्याओं का आपसी सहयोग से समाधान चाहता है, ख़ास तौर से जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य सुविधाओं के अंतर को देखते हुए, जिसका अफ़्रीकी देशों पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है.
हालांकि, 'ग्लोबल साउथ' (वैश्विक दक्षिण) की ज़रूरतों को बहुपक्षीय समझौते पूरी कर सकें, इसे सुनिश्चित करना भी कोई आसान काम नहीं है और इसकी राह में कई चुनौतियां बनी हुई हैं. उदाहरण के लिए, अफ़्रीका वैश्विक जलवायु कार्रवाई का समर्थन करता है, लेकिन वह इस बात पर भी ज़ोर देता है कि ‘ग्लोबल नॉर्थ’ (वैश्विक उत्तर) को ऐतिहासिक कार्बन उत्सर्जन की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए और अफ़्रीकी देशों को उनकी जलवायु अनुकूलन व उत्सर्जन ख़त्म करने संबंधी रणनीतियों को आगे बढ़ाने के लिए आर्थिक मदद मिलनी चाहिए. इसी प्रकार, संसाधनों के दोहन के मामले में, अफ़्रीका ऐसी न्यायसंगत वैश्विक व्यापार प्रणाली पर ज़ोर देता है, जो उसके प्राकृतिक संसाधानों को दोहन न करे और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत बनाए.
संयुक्त राष्ट्र महासभा में, अफ़्रीका वैश्विक खाद्य सुरक्षा के बारे में भी अपनी चिंताएं बताना चाहता है. यह महाद्वीप भूख और कुपोषण से जुड़ी गंभीर चुनौतियों से लड़ रहा है, जिस कारण अफ़्रीकी देशों ने भोजन के अधिकार को एक सार्वभौमिक मानवाधिकार के रूप में मान्यता देने की मांग की है.
इन चुनौतियों के बावजूद, अफ़्रीका वैश्विक शांति और टिकाऊ विकास के लिए सबसे व्यावहारिक मार्ग के रूप में संयुक्त राष्ट्र के बहुपक्षीय ढांचों में अपनी प्रतिबद्धता दोहराता है. जलवायु संबंधी कार्रवाइयों, गरीबी उन्मूलन और स्वास्थ्य सेवा से जुड़े प्रस्तावों को अपनाने में अफ़्रीका की सक्रिय भूमिका बता रही है कि वह मिल-जुलकर अंतरराष्ट्रीय समाधान निकालने की इच्छा रखता है.
संयुक्त राष्ट्र महासभा में अफ़्रीका का एक प्रमुख उद्देश्य वैश्विक शासन संस्थाओं में, विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार करना भी है. वह लंबे समय से यह कहता रहा है कि सुरक्षा परिषद का ढांचा शीत युद्ध के बाद की दुनिया की जनसांख्यिकीय या भू-राजनीतिक सच्चाइयों का प्रतिनिधित्व नहीं करता है. 1.4 अरब से अधिक लोगों का नेतृत्व करने के बावजूद, अफ़्रीका के पास सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता नहीं है, जिस पर अफ़्रीकी नेता लगातार दुख जताते रहते हैं. अफ़्रीकी समूह सुरक्षा परिषद के भीतर अधिक समावेशी व समान प्रतिनिधित्व, और अफ़्रीकी देशों के लिए कम से कम दो स्थायी सीट की मांग करता है.
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों के अलावा, अफ़्रीका ने संयुक्त राष्ट्र और अफ़्रीकी संघ (AU) जैसे क्षेत्रीय संगठनों के बीच बेहतर सहयोग की मांग भी की है. शांति और सुरक्षा के लिहाज़ से यह ख़ासा महत्व रखता है. अफ़्रीकी संघ ने लंबे समय से अफ़्रीका के संघर्षों के समाधान में नेतृत्व की भूमिका निभाई है, और यह सोच बढ़ने लगी है कि क्षेत्रीय स्तर पर समाधान के प्रयासों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. हालांकि, फ़ैसले लेने वाले ढाचों के विस्तार और क्षेत्रीय संगठनों के साथ साझेदारी सुनिश्चित करने जैसे संरचनात्मक सुधारों के बिना संयुक्त राष्ट्र में अफ़्रीका का प्रभाव सीमित ही रहेगा.
संयुक्त राष्ट्र महासभा में अफ़्रीका का आर्थिक एजेंडा उत्तर-दक्षिण के बीच चल रहे विभाजन को दूर करना भी है, ख़ास तौर से व्यापार, आर्थिक और विकास के क्षेत्र में. अफ़्रीकी समूह लगातार ऐसी नीतियों की वकालत करता है, जो अधिक न्यायसंगत आर्थिक व्यवस्थाओं को आकार दे, और वैश्विक बाज़ारों तक अफ़्रीकी देशों की पहुंच और कारोबारी परिस्थितियों की बेहतरी सुनिश्चित करे. इस लिहाज़ से अफ़्रीकी महाद्वीपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र (AfCFTA) एक बड़ी उपलब्धि है, जिसका मक़सद अफ़्रीकी देशों के भीतर व्यापार को बढ़ावा देना और बाहरी ताक़तों पर उनकी निर्भरता को कम करना है.
संयुक्त राष्ट्र महासभा में, अफ़्रीका वैश्विक खाद्य सुरक्षा के बारे में भी अपनी चिंताएं बताना चाहता है. यह महाद्वीप भूख और कुपोषण से जुड़ी गंभीर चुनौतियों से लड़ रहा है, जिस कारण अफ़्रीकी देशों ने भोजन के अधिकार को एक सार्वभौमिक मानवाधिकार के रूप में मान्यता देने की मांग की है. सूखे, जमीनों के बंजर होने और राजनीतिक अस्थिरता से पैदा हो रहे ख़तरों को देखते हुए, अफ़्रीका खाद्य असुरक्षा से निपटने के लिए, ख़ास तौर से साहेल और हॉर्न ऑफ अफ़्रीका जैसे क्षेत्रों में, अंतरराष्ट्रीय मदद पाने का प्रयास कर रहा है.
कुल मिलाकर, अफ़्रीका के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा अपनी कूटनीतिक प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने, वैश्विक शासन को प्रभावित करने और टिकाऊ विकास, शांति व न्याय की मांग करने का एक महत्वपूर्ण मंच है. भले ही, आर्थिक असमानताएं, संघर्ष समाधान और संस्थागत सुधारों से जुड़ी कई चुनौतियों से यह महाद्वीप जूझ रहा है, लेकिन अफ़्रीकी समूह वैश्विक मामलों की दिशा तय करने और अधिक न्यायंसगत, समावेशी और निष्पक्ष विश्व व्यवस्था बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए प्रतिबद्ध है.
(अनुभव रॉय नई दिल्ली स्थित यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया (USAI) के सेंटर फॉर मिलिट्री हिस्ट्री ऐंड कॉन्फ्लिक्ट स्टडीज (CMHCS) में वरिष्ठ फेलो हैं)
(समीर भट्टाचार्य ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं)
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Dr. Samir Bhattacharya is an Associate Fellow at Observer Research Foundation (ORF), where he works on geopolitics with particular reference to Africa in the changing ...
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Anubhav Roy is a Senior Research Fellow at the Centre for Military History and Conflict Studies (CMHCS), United Service Institution of India (USI), New Delhi. ...
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