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अगस्त 2025 में अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर नए टैक्स और प्रतिबंध लगाए और 22 अक्टूबर को दो बड़ी रूसी तेल कंपनियों पर सीधा प्रहार किया. मक़सद रूस की कमाई घटाकर उसे यूक्रेन पर बातचीत के लिए दबाव में लाना था लेकिन असर सीमित रहा. नतीजे में दुनिया अब महंगे तेल और बदलती भू-राजनीति की नई चुनौती से जूझ रही है.
Image Source: Getty Images
अगस्त 2025 में अमेरिका ने रूस से तेल और ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर सेकेंडरी टैरिफ और कुछ प्रतिबंध लगाए. अमेरिका इस बात से नाराज़ था कि यूक्रेन से शांति वार्ता के लिए रूस गंभीरता नहीं दिखा रहा है. इन प्रतिबंधों के ज़रिए अमेरिका का मक़सद रूस की निर्यात बाज़ारों तक पहुंच को सीमित करना, युद्ध को वित्तपोषित करने की उसकी क्षमता को प्रभावित करना और उसे यूक्रेन के साथ बातचीत के लिए तैयार करना है. हालांकि, जब इससे भी बात नहीं बनी तो अमेरिका ने 22 अक्टूबर 2025 को तेल के क्षेत्र में काम करने वाली रूस की दो बड़ी कंपनियों पर प्रतिबंध लगा दिया. रोसनेफ्ट और लुकोइल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने का फैसला रूस को यूक्रेन से बातचीत को मज़बूर करने के लिए लिया गया. हालांकि अमेरिकी द्वारा लगाए गए इन प्रतिबंधों का वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों पर कुछ असर पड़ सकता है लेकिन ऐसा लगता नहीं कि इससे रूस को यूक्रेन के साथ बातचीत करने के लिए मज़बूर किया जा सकता है.
भारत और चीन ने रूस पर आर्थिक प्रतिबंधों को एकतरफा रूप से लागू करने का विरोध किया है क्योंकि ये दोनों देश रूसी तेल के सबसे बड़े खरीदार हैं. भारत और चीन का कहना है कि ये प्रतिबंध संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के आदेश के तहत नहीं हैं. वैसे दिलचस्प बात ये है कि भारत और चीन की कंपनियों ने रूस से तेल की अपनी खरीदारी को कम करना शुरू कर दिया है. हालांकि, रूसी तेल पर ज़्यादातर प्रतिबंध पहले से ही लागू हैं, ऐसे में वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में रूस से तेल की आपूर्ति को अल्पकालिक या मध्यम अवधि में बंद करने की संभावना ना के बराबर है. आसान शब्दों में कहें तो रूस से तेल की खरीद को पूरी तरह बंद नहीं किया जा सकता क्योंकि इससे अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी और वैश्विक तेल बाज़ार पर इसका दीर्घकालिक असर पड़ेगा.
रूसी तेल पर हालिया अमेरिकी प्रतिबंध, वॉशिंगटन की बदलती स्थिति का संकेत हैं और ये प्रतिबंध वर्तमान प्रशासन के तहत पहले लागू किए गए. फरवरी 2022 में जब से युद्ध शुरू हुआ है, अमेरिका ने रूस के तेल पर प्रतिबंधों को सावधानीपूर्वक लगाना शुरू किया था. प्रतिबंध लगाने में सतर्कता की वजह ये थी कि इससे वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों पर अस्थिर प्रभाव और अमेरिका में घरेलू उच्च मुद्रास्फीति का डर था. हालांकि, इस साल की शुरुआत में ये स्थिति बदल गई. तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने रूस की तेल कंपनियों गैजप्रोम नेफ्ट और सर्गुटनेफ्टगैज़ पर प्रतिबंध लगाए. अमेरिका ने रूस पर कई तरह की पाबंदियां लगाईं लेकिन इसमें सबसे महत्वपूर्ण रूसी तेल के 60 डॉलर प्रति बैरल मूल्य सीमा से नीचे स्थानांतरण करने वाले 183 जहाजों पर प्रतिबंध लगाना शामिल था.
22 अक्टूबर के प्रतिबंधों के बाद तेल 5 डॉलर महंगा हुआ और बाज़ार में रूसी तेल को बदलने जितनी सप्लाई नहीं है.
अमेरिका में राष्ट्रपति बदलते ही रूस को लेकर उसकी नीति में भी बदलाव देखने को मिला. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुरू में मॉस्को के प्रति सौहार्दपूर्ण रुख अपनाया था. हालांकि, बाद में उन्होंने रुख़ कड़ा कर लिया. यूक्रेन में युद्ध ख़त्म करने में रूस की तरफ से संकल्प की कमी देखने के बाद ट्रंप ने रूस से तेल की खरीद करने पर भारत के ख़िलाफ़ सेकेंडरी टैरिफ लगाए. फिर भी उन्होंने अगस्त में रूस पर प्रतिबंध लगाने से परहेज किया. रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने के फैसला का कुछ खास असर नहीं दिखा. रूस से तेल की खरीद जारी रही. इसे देखते हुए ट्रंप ने अक्टूबर 2025 में 2 बड़ी रूसी तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया.
तेल राजस्व में गिरावट से रूस को मुद्रा नियंत्रण कड़े करने पड़ सकते हैं और आर्थिक गतिविधि धीमी पड़ सकती है.
अमेरिका अब तक लगभग दो-तिहाई रूसी तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगा चुका है. इसकी वजह से दूसरे देशों की वो कंपनियां भी डर गई, जो रूसी तेल के मध्यस्थ और अंतिम उत्पादन में शामिल हैं. इन गैर-रूसी कंपनियों को डर है कि अमेरिका कहीं उन्हें एसडीएन (स्पेशली डेजिगनेटेड नेशनल्स) की सूची में ना शामिल कर दे. अमेरिका उन व्यक्तियों, कंपनियों या संस्थाओं को एसडीएन सूची में शामिल करता है, जिसे वो अपने लिए ख़तरा मानता है और फिर उनके ख़िलाफ़ कड़े एक्शन लेता है. अमेरिका के रुख़ में और भी सख्ती की उस समय पुष्टि हुई, जब उसने स्विट्ज़रलैंड में मुख्यालय वाली प्रमुख वस्तु व्यापार कंपनी गनवोर को लुकोइल की संपत्तियों की विदेश में बिक्री को ब्लॉक कर दिया. गनवोर के पीछे हटने से लुकोइल की यूरोप भर में संपत्तियां अस्थिर स्थिति में आ गई हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक अब लुकोइल पर ख़तरा बढ़ गया है. यूरोपीय सहायक कंपनियों पर खरीदारों के साथ समझौता ना करने की लुकोइल की असमर्थता के कारण उन्हें संबंधित देशों की सरकारों द्वारा राष्ट्रीयकृत किया जा सकता है.
22 अक्टूबर 2025 को, प्रतिबंध लगाने के बाद से तेल की कीमतों में प्रति बैरल 5 डॉलर की बढ़ोत्तरी हो गई है. मोराटोरियम यानी अस्थायी प्रतिबंध की अवधि 21 नवंबर 2025 को ख़त्म हो गई. मोराटोरियम वो अवधि थी, जब रूस से तेल खरीदने वाली कंपनियों को ये मौका दिया गया कि वो धीरे-धीरे अपनी खरीद कम करें. इस अवधि के दौरान वैश्विक तेल बाज़ार लगभग स्थिर रहा. इस बीच, विभिन्न देशों ने रूस से कच्चे तेल की खरीद कम करना शुरू कर दिया, जिससे रूसी तेल की कीमतें गिर गईं. इसके विपरीत, गैर-प्रतिबंधित कच्चे तेल की कीमत में वृद्धि होने लगी क्योंकि मांग बढ़ रही थी. हालांकि, वैश्विक तेल बाज़ारों में रूसी कच्चे तेल को बदलने के लिए पर्याप्त तेल उपलब्ध नहीं है. विश्व तेल बाज़ार में रूसी कच्चे तेल की हिस्सेदारी करीब 10 प्रतिशत है. रूस 40 लाख बैरल से ज़्यादा तेल और 15 लाख बैरल तेल उत्पाद रोज़ाना निर्यात करता है. ज़ाहिर है, इतने कम समय में इस रूसी तेल से बदलना लगभग असंभव होगा. कुछ ऐसा ही 10 जनवरी 2025 के प्रतिबंधों के बाद हुआ था. अब प्रतिबंधित रूसी तेल शायद तीसरे पक्ष के तेल व्यापारियों के माध्यम से छूट वाले मूल्य पर बेचा जाएगा. हालांकि, इन समायोजनों का रूसी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा है. रूस के कुल निर्यात राजस्व में एक तिहाई से ज़्यादा हिस्सेदारी कच्चे तेल की बिक्री की है. अगर इसके निर्यात में गिरावट आती है तो हो सकता है कि मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए रूसी केंद्रीय बैंक को अतिरिक्त मुद्रा नियंत्रण उपाय लागू करने पर मज़बूर होना पड़ेगा. रूस पहले से ही उच्च ब्याज दर की समस्या से जूझ रहा, अगर नए उपाय लागू किए जाते हैं तो इससे रूस की आर्थिक गतिविधि धीमी होने की आशंका है. इसका असर, उद्योग और उपभोक्ताओं, दोनों पर पड़ेगा.
तालिका 1.1: मार्च 2022 के बाद रूस से भारत को कच्चे तेल का आयात

*2022 और 2023 के लिए, छूट सीमा में दोनों डीएपी (डिलीवर्ड एट प्लेस) और एफओबी (फ्री ऑन बोर्ड) कीमतें शामिल हैं.
** नवंबर का डेटा, औसत नहीं.
स्रोत: लेखक द्वारा Kpler, रूसी आर्थिक विकास मंत्रालय, और उद्योग विशेषज्ञों के साथ साक्षात्कार से डेटा कलेक्शन. (नोट: डेटा प्वाइंट थोड़े अलग हो सकते हैं)
रूस पर यूरोपीय संघ (ईयू) ने भी सेकेंडरी टैरिफ और प्रतिबंध लगाए थे लेकिन उसकी तुलना में, अमेरिकी प्रतिबंध ज़्यादा प्रभावी हैं क्योंकि इनकी वजह से डॉलर-समर्थित वित्तीय प्रणाली से कटने का ख़तरा रहता है. यही वजह है कि 10 जनवरी के प्रतिबंधों की घोषणा के बाद, तेल रिफाइन करने वालों ने फरवरी और मार्च में से ही रूसी तेल की खरीद घटा दी. (तालिका 1.1 देखें). देशों ने तेल व्यापारियों के माध्यम से रूसी तेल खरीदना जारी रखा. बाद में ट्रंप प्रशासन के दौरान प्रतिबंधों को लागू करने में ढिलाई आने के कारण सीधे अलग-अलग देशों ने रूस से सीधे तेल खरीदना शुरू कर दिया. हाल के प्रतिबंधों के लागू होने के बाद भी इसी तरह के रुझान देखे जा सकते हैं.
65% आयात संभालने वाली भारतीय रिफाइनरियों पर अमेरिकी प्रतिबंधों का अभी तक कोई बड़ा असर नहीं पड़ा.
चीनी सरकारी तेल कंपनियों सिनोपेक और पेट्रोचाइना ने रूस से अपने कुछ भविष्य के कच्चे तेल निर्यात को स्थगित कर दिया है. इसी तरह, भारतीय रिफाइनरी कंपनियों ने दिसंबर में रूसी तेल के आदेशों को रोक दिया है. ये कंपनियां भारत द्वारा आयात किए जाने वाले रूसी तेल का 65 प्रतिशत हिस्सेदारी रखती हैं. खरीद में कमी के बावजूद, दोनों देशों ने हाल के प्रतिबंधों का पालन करने पर आधिकारिक बयान नहीं दिया है. भारतीय अधिकारियों ने अमेरिका के प्रतिबंधों पर देश की स्थिति को दोहराते हुए कहा कि तेल की खरीद बाज़ार की शक्तियों द्वारा संचालित होती है. भारत के मूल्य-संवेदनशील बाज़ार को देखते हुए, कच्चे तेल पर छूट भारत की खरीद की मात्रा को प्रभावित करती है. 2022 से रूसी कच्चे तेल पर बढ़ती छूट के कारण भारत ने बड़ी मात्रा में रूसी तेल खरीदा (तालिका 1.1 देखें). भारत इस दौरान रूसी तेल का दूसरा सबसे बड़ा आयातक बन गया.
अल्पकालिक अवधि में, भारतीय तेल आयातक शायद रूसी तेल की खरीद को कम कर सकते हैं. अब ये भारतीय रिफाइनरी कंपनियां अन्य देशों से कच्चे तेल की अन्य किस्में खरीदेंगे. हालांकि, मध्यम से दीर्घकालिक अवधि में, रूसी कच्चा तेल व्यापारी और मध्यस्थों के माध्यम से आयात किया जाने की संभावना है. अगर ट्रंप रूस पर कम ध्यान देना शुरू करेंगे तो फिर तेल आयात की इस प्रवृत्ति में और वृद्धि की उम्मीद है. यहां तक कि अगर अमेरिकी कच्चे तेल की बिक्री बढ़ाने के ट्रंप के तर्क पर विचार किया जाए तो अमेरिका के पास इतना तेल नहीं है कि वो इस कमी की भरपाई कर सके. इसके अलावा, अमेरिका खुद अपने घरेलू उपभोग के लिए काफ़ी मात्रा में तेल का आयात करता है.
15–20% वैश्विक तेल प्रतिबंधों में फँसा है और इससे अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था में बड़ा विघटन आया है.
इसके अलावा, रियायती दर पर कच्चा तेल भारत के लिए अच्छी खबर है, इसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है. विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2022 के बाद से, रियायती दर पर तेल मिलने से भारत को 12-17 अरब डॉलर का फायदा हुआ. टैक्स से भी कमाई बढ़ी और घरेलू बाज़ार में तेल की कीमतें स्थिर रहीं जबकि, इसी दौरान यूरोपीय देशों में इसके दाम तेज़ी से बढ़ गए. 2024 से तेल में मिल रही रियायतों में गिरावट आई, और इसे देखते हुए भारतीय रिफाइनरी कंपनियों ने कच्चे तेल की आपूर्ति के लिए नए बाज़ारों की तलाश शुरू कर दी है. हालांकि, जनवरी में प्रतिबंधों को लागू करने और अगस्त में सेकेंडरी टैरिफ बढ़ाने के बाद भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी तेल की अपनी खरीद बढ़ा दी. अब तक, अमेरिकी प्रतिबंधों का रूस से भारत की तेल की खरीद पर गंभीर प्रभाव नहीं पड़ा है. हालांकि, अगर अब भारतीय रिफाइनरियां रूसी तेल की बजाए किसी नए बाज़ार की तलाश करती हैं तो भारत की तेल खरीद की नए सिरे से संरचना करनी पड़ेगी. इसका भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों पर प्रभाव पड़ेगा. बढ़ती मुद्रास्फीति और रुपये का अवमूल्यन वित्तीय दबाव पैदा करेगा.
रूस, ईरान और वेनेज़ुएला तेल उत्पादन करने वाले तीन प्रमुख देश हैं. अलग-अलग कारणों से तीनों ही देशों पर प्रतिबंध लगे हैं. अब नए प्रतिबंधों की वजह से वैश्विक तेल बाज़ार धीरे-धीरे दो खंडों में बंटता जा रहा है. वैश्विक तेल का 15-20 प्रतिशत से अधिक हिस्सा प्रतिबंधों के तहत है. दिलचस्प बात ये है कि, इन प्रतिबंधों को उन देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर थोड़ा-बहुत प्रभाव तो पड़ा है लेकिन ये अपने घोषित उद्देश्यों को हासिल नहीं कर पाए हैं. इसकी बजाए, इन प्रतिबंधों ने अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था में विघटन पैदा किया है. प्रतिबंधों की वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था में अस्थिरता बढ़ जाती है. लागत बढ़ने से महंगाई बनी रहती है, जिससे आर्थिक वृद्धि प्रभावित होती है.
रूस को यूक्रेन के साथ युद्ध ख़त्म करने पर मज़बूर करने के लिए अमेरिका और पश्चिमी देशों ने प्रतिबंध लगाए. यूक्रेन युद्ध के ख़ात्मे के लिए प्रतिबंधों पर बढ़ती निर्भरता ने इन उपायों की सीमा उजागर कर दी है. ये प्रतिबंध अपने उद्देश्य हासिल नहीं कर पाए, ऐसे में सवाल ये है कि, क्या अमेरिका वास्तव में ऐसे प्रतिबंधों को विश्व के दो-तिहाई से अधिक देशों पर लागू कर सकता है, जबकि इन देशों का रूस से सीधे कोई लेना-देना नहीं है. प्रतिबंधों के इन सिलसिलों का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर विनाशकारी प्रभाव दिख रहा है.
राजोली सिद्धार्थ जयप्रकाश ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में जूनियर फेलो हैं.
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Rajoli Siddharth Jayaprakash is a Junior Fellow with the ORF Strategic Studies programme, focusing on Russia’s foreign policy and economy, and India-Russia relations. Siddharth is a ...
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