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Published on Aug 30, 2025 Updated 0 Hours ago

वर्ष 2026 का UN वाटर कांफ्रेंस दक्षिण एशिया में जल सहयोग को बढ़ावा देने के साथ-साथ इस क्षेत्र की अनूठी चुनौतियों के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. 

संयुक्त राष्ट्र जल सम्मेलन 2026: दक्षिण एशिया के जल साझेदारी में बदलाव की उम्मीद?

यह लेख निबंध श्रृंखला द वर्ल्ड वाटर वीक 2025 का हिस्सा है.


दक्षिण एशिया अपने क्षेत्रीय जल प्रशासन के मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है.  हाल के घटनाक्रम - भारत द्वारा इंडस वाटर ट्रीटी का 'स्थगन', यारलुंग त्सांगपो (ब्रह्मपुत्र) पर चीन का मेगा बांध, 2026 में गंगा वाटर ट्रीटी की समाप्ति और भारत तथा बांग्लादेश के बीच अनसुलझा तीस्ता मुद्दा जैसे कुछ मुद्दे अभी लंबे समय से चल रहे हैं और इन विषयों ने दक्षिण एशिया की हाइड्रो-पॉलिटिक्स पर गहरा असर डाला है. ये घटनाक्रम दर्शाते हैं कि पिछले तीन दशकों में, यह क्षेत्र भू-राजनीतिक, पारिस्थितिक और आर्थिक रूप से बदल गया है, जिससे इस क्षेत्र की सीमा-पार से बहने वाली नदियों और उन नदियों के उद्गम के विषय में मौजूदा व्यवस्थाएं और विवाद समाधान तंत्र अप्रासंगिक हो गए हैं. इसके अलावा, स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे कि बांधों पर बहस, जो संबंधित राष्ट्रीय जल सुरक्षा के लिए केंद्रीय बहस बनी हुई है और जिसके पारिस्थितिकी परिणामों की गहरी आलोचना की जाती है, वह भी देशों और विभिन्न हितधारकों के बीच अत्यधिक आपसी मनमुटाव की स्थिति पैदा कर चुका है. चुनौतियों के इस जटिल जंजाल से दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्था पर गहरा पड़ रहा है और यह स्थिति क्लाइमेट चेंज के उभरते ख़तरों के साथ साथ भू-राजनीतिक मांगों के प्रति इस क्षेत्र के रुख़ पर भी गहरा असर डालेगा.


इस नए परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि वैश्विक और क्षेत्रीय मंच ऐसे परिवर्तनों को किस हद तक प्रभावित करते हैं या सहयोग को प्रोत्साहित कर सकते हैं?

ये चुनौतियां सीमाओं के परे होने के कारण बहुपक्षीय सहयोग की मांग करती हैं.  हालांकि, मौजूदा संदर्भ में, अधिकांश दक्षिण एशियाई देशों के पास सीमा-पार जल प्रबंधन पर द्विपक्षीय समझौते मौजूद हैं और इस क्षेत्र में साझा जल को नियंत्रित करने वाला कोई भी समझौता ऐसा नहीं है जो सब पर सामान्य रूप से लागू हो. इस स्थिति से ठीक अलग, दक्षिण एशियाई क्षेत्र के भीतर ही अब छोटे-छोटे क्षेत्रीय समूह बन गए हैं और उन्होंने हाल के दिनों में अधिक सक्रियता दिखाई है. इस नए परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि वैश्विक और क्षेत्रीय मंच ऐसे परिवर्तनों को किस हद तक प्रभावित करते हैं या सहयोग को प्रोत्साहित कर सकते हैं ?

 

दक्षिण एशिया की नदी प्रणालियों का प्रबंधन: क्षेत्रीय बनाम वैश्विक दृष्टिकोण

हाल के वर्षों में सीमा-पार जल का सुरक्षाकरण, प्रमुख वैश्विक घटनाक्रमों के अनुसार ही है जिसने जल को वैश्विक और राष्ट्रीय राजनीतिक एजेंडे में उच्च स्थान दिया है. और इसी क्रम में सबसे उल्लेखनीय है 2023 का यूनाइटेड नेशंस (UN) वाटर कांफ्रेंस और 2026 में होने वाला इसका आगामी संस्करण. 2023 वाटर कांफ्रेंस की तैयारी को इजिप्ट में आयोजित ‘कांफ्रेंस ऑफ़ दी पार्टीज’ (COP) 27 से अधिक महत्व मिला क्योंकि यह पहला COP था जिसमें 'जल' को उसके आधिकारिक एजेंडे में शामिल किया गया था. 

2023 वाटर कांफ्रेंस का एक प्रमुख उद्देश्य वाटर एक्शन डेकेड 2018-2028 की मध्यावधि समीक्षा करना था, जिसे महत्वाकांक्षी 2030 सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (SDG) एजेंडा के लिए जल-संबंधी लक्ष्यों और उद्देश्यों पर ध्यान केंद्रित करने और प्रयासों को बढ़ाने के लिए यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली (UNGA) के प्रस्ताव द्वारा लाया गया था. एक्शन डेकेड के लक्ष्यों में से एक SDG 2030 एजेंडा को तेज करने में कई पैमानों पर जल सहयोग और साझेदारी को प्रोत्साहित करना है. और जल संसाधनों के एकीकृत प्रबंधन को मजबूत करना भी इसका एक महत्वपूर्ण लक्ष्य  है. 

हालांकि 2023 के सम्मेलन को उसके राजनीतिक प्रभाव की कमी, जल जैसे जटिल मामलों पर चर्चा के लिए उपलब्ध कम समय और किसी भी बाध्य करने वाले समझौते के बजाय स्वैच्छिक प्रतिबद्धताओं के कारण उसे कई आलोचनाओं का सामना करना पड़ा, लेकिन यह कई SDGs  को साकार करने में सीमा-पार जल सहयोग की केंद्रीयता को स्वीकार करने का प्रयास करने में सफ़ल रहा. खासकर आपदा जोख़िम न्यूनीकरण यानी डिजास्टर रिस्क रिडक्शन (DRR) और क्लाइमेट अडॉप्टेशन में सहयोग की भूमिका और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए व्यापक लाभों को महसूस करने और बढ़ाने में यह सम्मेलन सफ़ल रहा यह शायद उप-राष्ट्रीय या राष्ट्रीय स्तर पर संभव नहीं हो पाता.

 

क्या वैश्विक ढांचों से दक्षिण एशियाई देशों को समाधान मिल सकता है?

2023 सम्मेलन ने बड़े पैमाने पर इंटीग्रेटेड वाटर रिसोर्स मैनेजमेंट (IWRM) की महत्वपूर्ण आवश्यकता और देशों द्वारा वाटर कन्वेंशन 1992 और वाटरकोर्स कन्वेंशन 1997 जैसे कानूनी ढांचे को अपनाने की बात कही है जिससे कि अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों पर दीर्घकालिक उत्पादक सहयोग की सुविधा मिल सके. इसके ठीक विपरीत, UN सम्मेलन के विमर्श के आधार पर जल और स्वच्छता पर लाई गई पर SDG 6 पर केंद्रित रिपोर्ट, जिसे SDG 2030 एजेंडा की प्रगति को उजागर करने के लिए प्रकाशित किया गया था, उसने दक्षिण एशियाई देशों के बारे में एक बहुत अलग तस्वीर पेश की है. रिपोर्ट के अनुसार 2030 तक वैश्विक लक्ष्य को पूरा करने के लिए मौजूदा IWRM  क्रियान्वन की गति को दुगना करने की आवश्यकता है. विशेष रूप से, यह इन SDG लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए दक्षिण एशिया क्षेत्र में ज़रूरी कदमों को उजागर करता है. 

दक्षिण एशिया पारम्परिक तौर पर कई मायनों में एक बटा हुआ क्षेत्र रहा है. दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) अपने इरादों और उद्देश्यों को लेकर बहुत हद तक अप्रभावी रहा है और इस समूह के देश बांग्लादेश, भूटान, भारत और नेपाल (BBIN) पहल और बहु-क्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग के लिए बंगाल की खाड़ी पहल (BIMSTEC) जैसे सहयोग के अन्य रास्ते तलाश रहे हैं, बजाय इसके कि वे एक दक्षिण एशिया में सामूहिक सहयोग प्राप्त करने की कोशिश करें.  इस क्षेत्र में जल-संबंधी कई लक्ष्यों पर धीमी प्रगति और मेगा सम्मेलनों की व्यापकता को देखते हुए, यह सवाल प्रासंगिक है कि ऐसे मेगा सम्मेलन देशों को उनके SDG लक्ष्यों को प्राप्त करने में कैसे मदद करते हैं, जब इससे प्राप्त अधिकांश समाधान क्षेत्र-विशिष्ट चिंताओं के लिए संवेदनशील नहीं हैं. उदाहरण के लिए, दक्षिण एशिया के क्षेत्रीय संदर्भ इंटीग्रेटेड रिवर बेसिन मैनेजमेंट (IRBN) जैसे विश्व स्तर पर स्वीकृत जल प्रशासनिक ढांचे को अपने यहां के रिवर बेसिन के लिए स्वीकार में असमर्थ है. IRBN के सफ़ल प्रयोजन के लिए एक बहुपक्षीय संस्थागत ढांचे की आवश्यकता है, और इस क्षेत्र के रिवर बेसिनों के लिए ऐसी व्यवस्था खड़ा करना फिलहाल वास्तविकता से परे है. 

इसी तरह अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढांचे जैसे कि UN वाटरकोर्स कन्वेंशन 1997 की उपयोगिता पूरे दक्षिण एशिया में बहुत कम प्रासंगिकता है. UNGA में संधि पर मतदान के दौरान प्रत्येक दक्षिण एशियाई राष्ट्र का एक अलग रुख़ था और तब से किसी ने भी इस उपकरण की पुष्टि नहीं की है और इसमें अब तक कोई भी दक्षिण एशियाई देश शामिल नहीं हुआ है. इसके अतिरिक्त, जैसा कि प्रख्यात विद्वानों द्वारा तर्क दिया गया है कि संधि की 'व्यापक प्रकृति' और सामान्य मार्गदर्शक सिद्धांत देशों के लिए इसके विभिन्न प्रावधान को समझने के लिए पर्याप्त गुंजाइश रखते हैं. जैसा कि दक्षिण एशियाई देशों द्वारा इस संधि पर मतदान के दौरान व्यक्त किया गया था. 

जल प्रबंधन में विश्व स्तर पर मौजूद उपकरण और कानूनी ढाँचे के प्रयोजन की वैश्विक स्वीकृति और वैद्यानिक मान्यता से जुड़ी चुनौतियों के अलावा पिछले जल सम्मेलनों के अनुभव अन्य महत्वपूर्ण और विवादास्पद मुद्दों जैसे कि जल की उपलब्धता और परिवर्तनशीलता, जल भंडारण संरचनाओं या बांधों के प्रभाव को रेखांकित करते हैं. इसके अलावा ये सम्मेलन राष्ट्रीय और क्षेत्रीय नीति-निर्माण को प्रभावित करने वाले अन्य मुद्दों जैसे कि साझा जलमार्गों से उत्पन्न होने वाले पर्यावरणीय जोख़िमों और विसंगतियों को दूर करने में उपलब्ध अपनी सीमित ताकत को रेखांकित करते हैं. इस संबंध में भारत का मामला एक रोचक दृष्टिकोण उपलब्ध कराता है. भारतीय नीति-निर्माताओं, रणनीतज्ञों और जल प्रशासन से जुड़े लोगो के बीच मौसम से सम्बंधित प्राकृतिक आपदा की घटनाओं से निपटने के लिए जल भंडारण और नदियों को जोड़ने वाली परियोजनाओं की आवश्यकता पर लगभग सहमति है. राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) के तहत आठ मिशनों में से एक, भारत का राष्ट्रीय जल मिशन, भारत की दीर्घकालिक जल सुरक्षा के लिए जल भंडारण परियोजनाओं के रणनीतिक महत्व की दिशा में काम करता है. इसके अलावा, यह सोच जल के प्रवाह को बढ़ाने के लिए जल भंडारण की सुविधा के महत्व पर जोर देती है, जिसमें गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना (GBM) बेसिन में पानी के बंटवारे के संबंध में भारत और उसके पूर्व दिशा के पड़ोसियों, जैसे बांग्लादेश, के बीच असंतोष को कम करने की ओर काम करता है. फिर भी, बड़े पैमाने पर जल भंडारण बुनियादी ढांचा, जल की उपलब्धता और परिवर्तनशीलता पर डेटा के साथ-साथ इसके सामाजिक-पर्यावरणीय प्रभाव के लिए राज्य और गैर-राज्य के संस्थाओं में शंका का भाव उत्पन्न करता है जिससे 'मिडिल ग्राउंड' खोजने में राष्ट्रीय या क्षेत्रीय स्तर पर किसी भी सार्थक संवाद को आगे बढ़ाने में बाधा आती है.

बयानबाजी से परे सार्थक सहयोग की दिशा 

यूनाइटेड नेशंस (UN) वाटर कांफ्रेंस यानी संयुक्त राष्ट्र जल सम्मेलन की व्यापकता के बारे में उठाई गई चिंताओं के बावजूद, यह महत्वपूर्ण नीतिगत बातचीत की दिशा में एक मजबूत कदम है. जल को उच्चतम राजनीतिक स्तर के अजेंडे तक पहुंचाने के साथ साथ SDG भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विकास के लिए एक केंद्रीय ढांचा बन कर उभरा है. इसके अलावा यह एक स्वीकृत तथ्य है कि दक्षिण एशिया में जल के विषय में क्षेत्रीय सहयोग गरीबी उन्मूलन, ऊर्जा और जल सुरक्षा, और जलवायु परिवर्तन से लड़ने की क्षमता से संबंधित कई लक्ष्यों को पूरा करने में महत्वपूर्ण है. अब ज़रूरत यह है कि वैश्विक सम्मेलनों को क्षेत्र-विशिष्ट चिंताओं के प्रति अधिक उत्तरदायी होने के लिए कैसे प्रेरित किया जाए. इसके साथ ही यह भी सोचना होगा कि इस क्षेत्र के देश अपने राष्ट्रीय और क्षेत्रीय लाभों के लिए उचित सबक ऐसे उच्च-स्तरीय मंच के द्वारा कैसे ले पाए. 

2026 में होने वाले यूनाइटेड नेशंस वाटर कांफ्रेंस ने 'बहुपक्षीय प्रक्रियाओं में जल' और 'सहयोग के लिए जल' जैसे विषयों को विचार-विमर्श के लिए प्रस्तावित किया है. इसका उद्देश्य जल को 'वैश्विक, बहुपक्षीय और अंतर-सरकारी संवादों' में शामिल करना और सीमा-पार जल सहयोग को सुविधाजनक बनाना है. हालांकि, इस बातचीत की इस प्रक्रिया के दौरान यूनाइटेड नेशंस वाटर कांफ्रेंस को जल 

इसलिए एक कदम पीछे हटकर उन सार्थक तरीकों का पता लगाना आवश्यक है जिनसे दक्षिण एशिया के संदर्भ में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय विकास के लिए जल का बेहतर लाभ उठाने के उपाय हो. इतिहास गवाह है कि दक्षिण एशिया क्षेत्र में रचनात्मक सहयोग होता रहा है जो BBIN पहल के अंतर्गत भारत, नेपाल, बांग्लादेश और भूटान के बीच जलविद्युत क्षेत्र में मौजूद महत्वपूर्ण सामाजिक और आर्थिक लाभ वाली पहल है. लेकिन पानी से जुड़े ऊर्जा के स्रोत की चिंता की बातें इस ढांचे के अंतर्गत सहयोग में बाधा डालती हैं.  दक्षिण एशियाई देशों के बीच व्याप्त गहरे अविश्वास की स्थिति भी इसका एक प्रमुख कारण है. 

2026 में होने वाले यूनाइटेड नेशंस वाटर कांफ्रेंस ने 'बहुपक्षीय प्रक्रियाओं में जल' और 'सहयोग के लिए जल' जैसे विषयों को विचार-विमर्श के लिए प्रस्तावित किया है. इसका उद्देश्य जल को 'वैश्विक, बहुपक्षीय और अंतर-सरकारी संवादों' में शामिल करना और सीमा-पार जल सहयोग को सुविधाजनक बनाना है. हालांकि, इस बातचीत की इस प्रक्रिया के दौरान यूनाइटेड नेशंस वाटर कांफ्रेंस को जल प्रशासन में आवश्यक परिवर्तन लाने के लिए दक्षिण एशियाई क्षेत्र के लिए एक इस क्षेत्र के अनुरूप एक प्रतिक्रिया की आवश्यकता को स्वीकार करना ज़रूरी है. इसके अतिरिक्त, विभिन्न देशों और उनके नेतृत्व को भी आपसी आर्थिक लाभ के लिए सीमा-पार जल का लाभ उठाने के लिए आवश्यक राजनीतिक पहल करनी चाहिए और ऐसा कर के SDG एजेंडा 2030 तक पूरा करने के अपने उद्देश्य को बल देना चाहिए.


देबर्शी दासगुप्ता सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च नई दिल्ली में ट्रांसबाउंडरी रिवर्स, इकोलॉजी एंड डेवलपमेंट स्टडीज (TREADS) में सीनियर रिसर्च एसोसिएट हैं. 

सुबिया अहमद सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च नई दिल्ली में ट्रांसबाउंडरी रिवर्स, इकोलॉजीज, एंड डेवलपमेंट स्टडीज (TREADS) में सीनियर रिसर्च एसोसिएट हैं. 

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