आज के युद्ध के दो चेहरे हैं- एक रूस-यूक्रेन की तरह, जहां लड़ाई धीरे-धीरे लंबी खिंचती है; दूसरा ईरान युद्ध, जहाँ दूर से तेज़ और सटीक हमले होते हैं. लेख से समझिए कि असल युद्ध इन दोनों का मिश्रण है जहां सिर्फ हथियार नहीं बल्कि रणनीति, तकनीक और लंबे समय तक टिके रहने की क्षमता ही जीत तय करती है.
हाल के वर्षों में युद्ध के दो अलग-अलग तरीके सामने आए हैं. पहला पुराना प्रकार का युद्ध है जिसे यूक्रेन के युद्ध ने नए रूप में दिखाया है. यहाँ विरोधी देश पिछले चार वर्षों से लंबे समय तक चलने वाली लड़ाई में उलझे हुए हैं. इसमें बहुत बड़ी संख्या में लोगों की जान गई है और सड़कों, इमारतों और अन्य बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है. युद्ध के मैदान ने यह भी दिखाया है कि ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और बाज़ार में मिलने वाली तकनीक का इस्तेमाल करने वाली छोटी सैन्य टुकड़ियां अब टैंकों और भारी हथियारों जितनी ही अहम हो गई हैं.
दूसरा तरीका अमेरिका और इज़राइल की रणनीति लंबी दूरी से सटीक हमलों पर आधारित है, जिसमें मिसाइलों और बमवर्षक विमानों का उपयोग होता है. इसमें हमलावर को कम नुकसान होता है, लेकिन विरोधी को भारी क्षति होती है, जैसा गाज़ा और ईरान के हमलों से दिखता है. यह युद्ध का अलग मॉडल है, जहां सैन्य शक्ति का इस्तेमाल और उसके राजनीतिक परिणाम अलग तरह से देखे जाते हैं. इसलिए इन तरीकों और उनकी सीमाओं को समझना जरूरी है, खासकर क्योंकि अमेरिका जैसे देश से लड़ाई अक्सर असममित तरीके से ही होती है.
अमेरिका की लंबी दूरी से सटीक हमले करने वाली ‘शॉक एंड ऑ‘ रणनीति पूरी तरह से सैन्य प्रभुत्व पर आधारित है और इसके सामने टिकने के लिए बहुत उन्नत और बहु-स्तरीय वायु रक्षा प्रणाली की आवश्यकता होती है. अब तक किसी देश ने इसे पूरी तरह परखने की स्थिति में मुकाबला नहीं किया है, हालांकि 1999 में सर्बिया ने कुछ हद तक अमेरिका-नाटो की वायु सेनाओं का सामना किया था और एक स्टेल्थ लड़ाकू विमान भी मार गिराया था.
युद्ध के मैदान ने यह भी दिखाया है कि ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और बाज़ार में मिलने वाली तकनीक का इस्तेमाल करने वाली छोटी सैन्य टुकड़ियां अब टैंकों और भारी हथियारों जितनी ही अहम हो गई हैं.
ईरान के साथ युद्ध में अमेरिका के लिए सबसे बड़ा सबक यह रहा कि इराक और अफगानिस्तान के अनुभवों को देखते हुए ज़मीनी सेना को सीधे युद्ध में न उतारा जाए. लेकिन इससे उसकी यह क्षमता सीमित हो जाती है कि वह ईरान के खिलाफ अभियान को अपनी शर्तों पर खत्म कर सके. अमेरिका अभी तक सबसे अहम लड़ाई-हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर नियंत्रण-नहीं जीत पाया है. यहाँ उसे ईरान की एक मिश्रित चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें समुद्री बारूदी सुरंगें, जहाज-रोधी क्रूज़ मिसाइलें, ड्रोन, छोटे पनडुब्बियाँ, तेज़ रफ्तार नौकाएँ और बिना चालक वाले पानी के नीचे चलने वाले वाहन शामिल हैं. सबसे बढ़कर, ईरान को अपने भूगोल का बड़ा लाभ भी मिला हुआ है.
ईरान की असममित प्रतिक्रिया उसके खाड़ी के पड़ोसी देशों और इज़राइल पर ड्रोन और मिसाइल हमलों के रूप में सामने आई है. उसके पास सीमित मिसाइल भंडार होने के कारण वह अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी इज़राइल पर पूरी तरह ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहा है. इसलिए उसका एक बड़ा लक्ष्य यह है कि वह अपने पड़ोसियों और पूरी दुनिया के लिए इस युद्ध की आर्थिक कीमत बढ़ा दे. लेकिन असली सवाल यह रहेगा कि ईरान का समाज कितना मजबूत और एकजुट रहता है. लंबे समय तक आंतरिक एकता बनाए रखना ही वह तरीका है जिससे वह अमेरिकी अभियान का सामना कर सकता है, जैसे अफगानिस्तान में तालिबान ने किया था और कई दशक पहले वियतनाम ने किया था. हालांकि हाल के समय में ईरान के भीतर कुछ बड़े आंतरिक मतभेद भी सामने आए हैं, जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.
दोनों मौजूदा अभियानों में एक तीसरा आयाम भी दिखाई देता है, जो अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन जिसका रणनीतिक महत्व तेजी से बढ़ रहा है. यह है लक्ष्य तय करने की प्रक्रिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का उपयोग और साइबर अभियानों को युद्ध की शक्ति बढ़ाने वाले साधन के रूप में इस्तेमाल करना.
ऐसे विश्वसनीय संकेत मिलते हैं कि एआई-सहायित लक्ष्य निर्धारण-खासकर प्रोजेक्ट मेवन जैसे कार्यक्रमों के रूप-मौजूदा अभियानों में उपयोग किए गए हैं. यह कार्यक्रम मशीन लर्निंग के जरिए निगरानी से मिले डेटा का विश्लेषण करता है और लक्ष्यों की सूची को और सटीक बनाता है. अगर ऐसा हो रहा है, तो इसका मतलब है कि हमलावर अब बहुत तेज़ी और अधिक सटीकता के साथ लक्ष्यों की पहचान, वर्गीकरण और प्राथमिकता तय कर सकता है. एआई सेंसर से लेकर हमले तक की प्रक्रिया को तेज़ कर देता है, जिससे आक्रामक और रक्षात्मक दोनों तरह के अभियानों पर बड़ा असर पड़ता है.
अमेरिका अभी तक सबसे अहम लड़ाई-हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर नियंत्रण-नहीं जीत पाया है. यहाँ उसे ईरान की एक मिश्रित चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें समुद्री बारूदी सुरंगें, जहाज-रोधी क्रूज़ मिसाइलें, ड्रोन, छोटे पनडुब्बियाँ, तेज़ रफ्तार नौकाएँ और बिना चालक वाले पानी के नीचे चलने वाले वाहन शामिल हैं.
साइबर क्षेत्र में, यह रिपोर्ट सामने आई है कि इज़राइल ने तेहरान के ट्रैफिक कैमरा नेटवर्क और मोबाइल फोन ढांचे में सेंध लगाई. साइबर अभियान अब केवल बाधा नहीं डालते, बल्कि हमलों में मदद करते हैं. ये महत्वपूर्ण लोगों की रियल-टाइम जानकारी देते हैं और खुफिया प्रणाली का हिस्सा बनकर युद्ध में बड़ा बदलाव ला रहे हैं.
रक्षा योजनाकारों के लिए इसके गहरे मायने हैं. जिस सैन्य बल की पूरी तरह निगरानी हो रही हो, जिसकी संचार व्यवस्था में सेंध लग चुकी हो और जिसके नेतृत्व की गतिविधियों को एआई की मदद से रियल-टाइम में ट्रैक किया जा रहा हो, वह एक सामान्य पारंपरिक दुश्मन से कहीं अधिक जटिल खतरे का सामना करता है. इसलिए सूचना पर प्रभुत्व की लड़ाई अब नेटवर्क, सेंसर और एआई प्रणालियों के स्तर पर भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है जितनी युद्ध के मैदान पर.
अभी भी कई बातें साफ नहीं हैं-जैसे लक्ष्य तय करने में एआई की असली भूमिका, साइबर हमलों का प्रभाव और उनके जवाबी उपाय. दोनों पक्षों की कई क्षमताएँ सार्वजनिक नहीं हैं, इसलिए इन अभियानों को समझते समय सावधानी जरूरी है.
भारत के लिए इन अभियानों के सीधे और महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं. भारत एक ऐसी रणनीतिक स्थिति में है जहाँ उसे एक साथ दोनों प्रकार के युद्ध मॉडल के लिए तैयार रहना होगा. पिछले वर्ष के ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया प्रिसिजन स्ट्राइक मॉडल उपमहाद्वीप में भी संभव है और भारत के पास हवा से पाकिस्तान की सैन्य ठिकानों पर बढ़त की क्षमता है; दोनों पक्षों ने नागरिक ढांचे पर हमले से परहेज किया.
यूक्रेन युद्ध से मिला एक बड़ा सबक यह है यूक्रेन युद्ध ने दिखाया कि कागज पर मजबूत सेना और नई तकनीक होने के बावजूद जीत तय नहीं होती-सही योजना, बेहतर क्रियान्वयन और समाज का लचीलापन ही असली निर्णायक होते हैं.
भारत अपनी सेना को सिर्फ एक खतरे या एक तरह के युद्ध के आधार पर नहीं बना सकता. पाकिस्तान का मामला वायु शक्ति से संभल सकता है, लेकिन चीन के साथ संघर्ष लंबा और थकाने वाला युद्ध बन सकता है, इसलिए मजबूत सेना, उद्योग और सामाजिक लचीलापन जरूरी है, ताकि दो मोर्चों का सामना किया जा सके.
एआई और साइबर क्षेत्र इस चुनौती को और अधिक गंभीर बना देते हैं. भारत को अमेरिका और इज़राइल जैसी आक्रामक क्षमताएँ विकसित करनी होंगी, साथ ही मजबूत रक्षात्मक ढाँचा भी तैयार करना होगा-जैसे सुरक्षित कमांड नेटवर्क, एआई के अनुकूल संचार प्रणाली और मजबूत साइबर-प्रतिरोध क्षमता-ताकि दुश्मन को सूचना पर वह प्रभुत्व न मिल सके जो हाल के अभियानों में बेहद निर्णायक साबित हुआ है. सूचना पर बढ़त हासिल करना अब दोनों प्रकार के युद्ध मॉडलों में प्रभावी कार्रवाई की पूर्व शर्त बन चुका है.
इस मामले में भारत किसी तरह की ढिलाई नहीं बरत सकता. यह खबर कि भारतीय नेविगेशन सैटेलाइट प्रणाली नैविक (NavIC) को परमाणु घड़ियों के आयात में विफलता के कारण बड़ी समस्या का सामना करना पड़ रहा है, अच्छी नहीं मानी जा सकती. नैविक भारत का जीपीएस का विकल्प है और इसके महत्वपूर्ण रक्षा उपयोग हैं, लेकिन यह अभी पूरी तरह से संचालित नहीं हो पाया है.
क्षयात्मक युद्ध और सटीक प्रहार एक-दूसरे के विपरीत नहीं हैं; असल में वास्तविक युद्ध हालात के अनुसार इन दोनों तरीकों के बीच बदलता रहता है. यूक्रेन युद्ध से मिला एक बड़ा सबक यह है यूक्रेन युद्ध ने दिखाया कि कागज पर मजबूत सेना और नई तकनीक होने के बावजूद जीत तय नहीं होती-सही योजना, बेहतर क्रियान्वयन और समाज का लचीलापन ही असली निर्णायक होते हैं. दूसरी ओर, सटीक प्रहार वाले युद्ध में ज़मीनी सेना न भेजना अल्पकाल में सुरक्षित लगता है, लेकिन लंबे समय में परिणाम सीमित कर देता है और एआई, साइबर तथा विरोधी के असममित तरीकों व भूगोल के कारण जोखिम बना रहता है. उदाहरण के तौर पर, हॉर्मुज़ में केवल नष्ट करने की क्षमता होने का मतलब यह नहीं है कि उस क्षेत्र पर नियंत्रण भी आसानी से मिल जाएगा.
मनोज जोशी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एक विशिष्ट फेलो हैं.
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Manoj Joshi is a Distinguished Fellow at the ORF. He has been a journalist specialising on national and international politics and is a commentator and ...
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