ट्रंप ने अफ्रीकी देशों को व्यापार में मदद का वादा किया है, लेकिन इनकी आड़ में अमेरिका इन देशों के खनिज तक पहुंच, निर्वासितों को बसाना और उपनिवेशी ताकत दिखाना चाहता है.
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9 जुलाई 2025 को, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में अफ्रीकी महाद्वीप के कुछ राष्ट्राध्यक्षों के साथ व्हाइट हाउस में मुलाकात की. गैबोन, गिनी-बिसाउ, लाइबेरिया, मॉरिटानिया और सेनेगल के नेताओं के साथ तीन दिवसीय शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया. बैठक का मक़सद इन देशों के साथ व्यावसायिक अवसरों की खोज करना था. इस मुलाकात का एक लक्ष्य ये संदेश देना भी था कि ट्रंप प्रशासन अफ्रीका के कुछ चुनिंदा देशों के साथ बेहतर कूटनीतिक और आर्थिक संबंध चाहता है. हालांकि इस सम्मेलन के दौरान मॉरिटानिया के राष्ट्रपति के भाषण को अचानक बाधित करना और लाइबेरिया के राष्ट्रपति की शानदार इंग्लिश की खुलकर प्रशंसा करना ये भी दिखाता है कि अमेरिका अब भी इन देशों के साथ शक्ति, दबाव और औपनिवेशिक मानसिकता का भाव रखता है.
इसके बदले, इन पांच अफ़्रीकी नेताओं ने अमेरिका के सामने अपने प्रचुर खनिज संसाधनों की पेशकश की. इसमें दुर्लभ पृथ्वी (रेयर अर्थ), खनिज, तेल और गैस के विशाल भंडार शामिल हैं. इस सम्मेलन में आव्रजन और तीसरे देशों के लोगों के सुरक्षित निष्कासन समझौतों पर भी सहमति बनी. इस समझौते के तहत ये अफ़्रीकी देश अमेरिका से निर्वासित उन लोगों को स्वीकार करेंगे, जो मूल रूप अन्य देशों से हैं, लेकिन अमेरिका से मिलने वाले वित्तीय मुआवजे के बदले वो इन नागरिकों को अपने यहां स्वीकार करेंगे. ट्रंप प्रशासन पहले ही कुछ अवैध प्रवासियों को अफ्रीकी महाद्वीप के छोटे देशों, जैसे कि इस्वातिनी और दक्षिण सूडान में स्थानांतरित कर चुके हैं. दक्षिणी सूडान तो लंबे समय से चल रहे युद्ध से भी ग्रसित है. इसके अलावा नागरिकों के स्थानांतरण को लेकर लीबिया और रवांडा के साथ बातचीत जारी है. सम्मेलन के दौरान पांचों राष्ट्राध्यक्षों को, विशेष रूप से गिनी-बिसाउ, को स्पष्ट रूप से बता दिया गया था कि वो अमेरिकी से निर्वासितों लोगों को अपने यहां समायोजित करे.
ट्रंप प्रशासन पहले ही कुछ अवैध प्रवासियों को अफ्रीकी महाद्वीप के छोटे देशों, जैसे कि इस्वातिनी और दक्षिण सूडान में स्थानांतरित कर चुके हैं. दक्षिणी सूडान तो लंबे समय से चल रहे युद्ध से भी ग्रसित है.
अफ्रीकी देशों को अमेरिकी से निर्वासित नागरिकों के भंडार के रूप में देखना ये दिखाता है कि अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान में उपनिवेशवादी मानसिकता अभी भी गहरे से जड़ जमाए हुए है. इस औपनिवेशिक मानसिकता के तहत ये माना जाता है कि राष्ट्रीय संप्रभुता और मानव गरिमा को तात्कालिक राजनीतिक या आर्थिक लाभ के लिए सौदेबाजी में बदला जा सकता है. ट्रंप जिस तरह व्यापार को हथियार बना रहे हैं, उसे देखते हुए ये भी आश्चर्यजनक नहीं होगा अगर ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए सौदेबाजी का सहारा लिया जाए. ट्रंप की उम्मीदवारी का समर्थन करने के लिए अमेरिका इन देशों को किसी प्रकार के लाभ या छूट का आश्वासन दे सकता है. ये प्रवृति कूटनीति के व्यापारीकरण की तरफ इशारा करती है और ये बहुत चिंताजनक बात है. इसके अलावा, इन अफ्रीकी नेताओं ने ट्रंप की काफ़ी तारीफ भी है. अमेरिका को अपने प्राकृतिक संसाधनों तक आसान पहुंच के लिए उदार प्रस्ताव दिए. ये इस बात का चिंताजनक उदाहरण हैं कि कैसे राजनीतिक शक्ति लोकतांत्रिक सिद्धांतों से समझौता कर शोषणकारी संबंधों को जारी रख सकती है.
पहले जो विदेशी मदद मॉडल था, वो दान या अनुदान आधारित था, लेकिन अब ये व्यापार-केंद्रित मॉडल में बदल गया है. ये बदलाव अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो द्वारा पहले व्यक्त की गई नीतिगत दिशा के साथ मेल खाता है. इसके अलावा, ये पारस्परिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण कई अफ्रीकी नेताओं को भी पसंद आता है. ये अफ्रीकी नेता इस बात से चिढ़े रहते हैं कि पश्चिम देश खुद को अच्छे शासन, मानवाधिकारों और संस्थान निर्माण के चैंपियन के तौर पर पेश करते हैं, जबकि अफ्रीका के कुछ शासकों को तानाशाह मानते हैं. ट्रंप ने इस तीन दिवसीय सम्मेलन के लिए जिन मेहमानों का चयन किया था, वो दिखाता है कि अमेरिका के लिए अफ्रीका का सामरिक महत्व क्यों बरकरार है. इन देशों के पास मूल्यवान भूमि होने के साथ था खनिज और तेल का विशाल भंडार भी है.
ये पश्चिम और मध्य अफ्रीकी देश इन छोटी अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनका अमेरिका के साथ कोई खास पारंपरिक संबंध नहीं है. उदाहरण के लिए, गिनी-बिसाउ में तो अमेरिका का कोई दूतावास ही नहीं है. अमेरिका के साथ इसका व्यापार भी बहुत कम है. इसके अलावा, गिनी-बिसाऊ के राष्ट्रपति ने चुनावों को बार-बार स्थगित किया है. उनके इस कदम का निश्चित रूप से किसी भी पूर्व अमेरिकी प्रशासन द्वारा 'लोकतांत्रिक रूप से पीछे हटना' के तौर पर निंदा की जाती, लेकिन ट्रंप प्रशासन का रुख़ इसके विपरीत है. गिनी-बिसाऊ को शिखर सम्मेलन में शामिल करना ये दिखाता है कि ट्रंप प्रशासन ने उनके इस फैसले को खामोश स्वीकृति दे दी है.
अमेरिका के साथ इसका व्यापार भी बहुत कम है. इसके अलावा, गिनी-बिसाऊ के राष्ट्रपति ने चुनावों को बार-बार स्थगित किया है. उनके इस कदम का निश्चित रूप से किसी भी पूर्व अमेरिकी प्रशासन द्वारा 'लोकतांत्रिक रूप से पीछे हटना' के तौर पर निंदा की जाती, लेकिन ट्रंप प्रशासन का रुख़ इसके विपरीत है.
लोकतांत्रिक मानदंडों के प्रति इस स्पष्ट उपेक्षा ने अमेरिकी स्थिति में गैर-हस्तक्षेप की ओर व्यापक बदलाव को दर्शाया है, विशेष रूप से जब वाणिज्यिक हितों की बात आती है. इसके बावजूद, टैरिफ का असंगत और अक्सर तर्कहीन उपयोग ये दिखाता है कि अमेरिका की अफ्रीका नीति की समग्र दिशा और भी ज़्यादा अस्पष्ट है. अप्रैल 2025 में, ट्रंप प्रशासन ने छोटे अफ्रीकी राष्ट्र लेसोथो पर 50 प्रतिशत का उच्चतम ‘लिबरेशन डे’ टैरिफ लगा दिया था. लेसोथो मुख्य रूप से हीरे और कपड़े का निर्यात करता है. शुल्क में इतनी अधिक वृद्धि ये कहते हुए की गई कि अमेरिका से लेसेथो बहुत कम चीजें आयात करता है और उसके साथ अमेरिका का व्यापार असंतुलन है.
इसके विपरीत, दक्षिण अफ्रीका को एक कथित श्वेत नरसंहार के लिए दंडित किया गया. कई लोग ये तर्क करेंगे कि दक्षिण अफ्रीका का इज़रायल के प्रति रुख़ बहुत सख्त है. इज़रायल के खिलाफ दक्षिण अफ्रीका ने जिस तरह अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में अपील की थी, उसने ट्रंप को नाराज़ किया. दक्षिण अफ्रीका का गुटनिरपेक्ष रुख़, रूस की ओर उसका झुकाव और ईरान के साथ दक्षिण अफ्रीका के ऐतिहासिक करीबी संबंधों ने शायद ट्रंप प्रशासन के साथ उसके संबंधों को और तनावग्रस्त किया है. ट्रंप की नाराज़गी को कम करने और उनके प्रशासन पर भरोसा जगाने के लिए दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सायरिल रामाफोसा ने मई 2025 में अमेरिका की यात्रा की. द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य करने के लिए उत्सुक रामाफोसा ने अमेरिका को खनिजों पर कुछ अनुकूल शर्तें प्रस्तावित की. इतना ही नहीं उन्होंने अमेरिकी गैस के आयात को बढ़ाने में भी रुचि दिखाई. इसके बावजूद, अमेरिका ने नवंबर 2025 में दक्षिण अफ्रीका में आयोजित होने वाले जी-20 शिखर सम्मेलन में अपनी भागीदारी की अभी तक पुष्टि नहीं की है.
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बिसेंट डरबन में हुए जी-20 देशों के वित्त मंत्रियों के शिखर सम्मेलन से अनुपस्थित रहे. इससे पहले फरवरी 2025 में केपटाउन में हुई इसी तरह की एक बैठक में वो गैरहाजिर रहे. एक साल में ये दूसरा मौका है, जब अमेरिका ने दक्षिण अफ्रीका द्वारा आयोजित जी-20 देशों के वित्त सम्मेलन से बाहर रहने का फैसला किया. दोनों देशों के बीच बार-बार उत्पन्न हो रहा ये गतिरोध ना सिर्फ दक्षिण अफ्रीका के कूटनीतिक प्रभाव के बारे में चिंता को बढ़ाता है बल्कि एक बहुपक्षीय मंच के रूप में जी-20 की दीर्घकालिक एकता और प्रभावशीलता पर भी संदेह पैदा करता है.
अमेरिका का ये कदम भी ट्रंप प्रशासन की अफ्रीकी नीति की अंतर्विरोधों को और अधिक उजागर करता है.
ट्रंप का एक फैसला इन तनावों को और बढ़ा सकता है. राष्ट्रपति ट्रंप की तरफ से अब ब्रिक्स (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) से जुड़े देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने का ख़तरा है. इस बीच, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो और रवांडा के बीच अमेरिका की मध्यस्थता से एक समझौता हुआ है. अमेरिका का ये कदम भी ट्रंप प्रशासन की अफ्रीकी नीति की अंतर्विरोधों को और अधिक उजागर करता है.
ट्रंप प्रशासन ने अफ्रीका के दुर्लभ खनिज संसाधनों तक पहुंच सुनिश्चित करने में स्पष्ट रणनीतिक रुचि दिखाई है. हालांकि, लॉबिटो कॉरिडोर के लिए समर्थन के दावों बावजूद, अफ्रीका के कॉपर बेल्ट को अटलांटिक तट से जोड़ने की कोशिश पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं. इसकी वजह ये है कि इस प्रोजेक्ट के लिए अमेरिका की वित्तीय प्रतिबद्धताओं में कमी दिख रही है. जून 2025 में आयोजित अमेरिकी-अफ्रीका व्यापार शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिका ने 2.5 अरब डॉलर देने का वादा किया था. हालांकि, अब स्थिति ये है कि यूएस एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (यूएसएआईडी) को ख़त्म किए जाने के बाद इस आर्थिक मदद के पूरा ना होने का ख़तरा बढ़ गया है. यूएसएआईडी के विघटन से कई विदेशी सहायता परियोजनाएं या तो निलंबित हो रही हैं या उन्हें रद्द करना पड़ रहा है.
विभिन्न परियोजनाओं का इस तरह अचानक समाप्त होना निवेशकों के आत्मविश्वास को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है. एक तरफ चीन ने अफ्रीका में अपने रणनीतिक बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं पर तेज़ी से काम शुरू कर दिया है. ऐसे में अगर अमेरिका इन अफ्रीकी देशों को आर्थिक मदद देने के वायदे से पीछे हटेगा तो महत्वपूर्ण खनिजों तक पहुंच बनाने के उसके दीर्घकालिक उद्देश्य ख़तरे में आ जाएंगे.
क्या अमेरिका अपनी गलतियों में सुधार करेगा, ये देखा जाना बाकी है. ट्रंप प्रशासन ने कहा है कि अफ्रीकी नेताओं के साथ हुई इस शिखर बैठक को त्रैमासिक शिखर सम्मेलन की श्रृंखला की शुरुआत बताया है. सितंबर 2025 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के मौके पर एक बड़े अमेरिका-अफ्रीका शिखर सम्मेलन कराने की योजना है. हालांकि, इस बारे में फिलहाल निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता कि क्या क्या ये योजनाएं धरातल पर उतरेगी. अफ्रीकी देशों पर चीन के बढ़ते प्रभाव का सामना करने में लेन-देन वाला ये दृष्टिकोण कितना कारगर होगा, ये देखा जाना भी बाकी है. सच तो ये है कि ट्रंप प्रशासन का अचानक से अफ्रीका की ओर ध्यान देना अल्पकालिक सौदेबाजी लग रहा है. ये एक संगठित रणनीतिक दृष्टि की कमी को दिखाता है.
समीर भट्टाचार्य ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं.
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Dr. Samir Bhattacharya is an Associate Fellow at Observer Research Foundation (ORF), where he works on geopolitics with particular reference to Africa in the changing ...
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