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अमेरिका के अचानक टैरिफ़ के झटके ने वैश्विक व्यापार की दिशा ही बदल दी है और अब देश एक-दूसरे के साथ हाथ मिलाकर नए आर्थिक अवसरों की राह तलाश रहे हैं. भारत और ब्राज़ील जैसी अर्थव्यवस्थाएं इस चुनौती को साझेदारी में बदलकर भविष्य की रणनीति रच रही हैं.
Image Source: Getty Images
डोनाल्ड ट्रंप ने जब अपने ‘अचानक टैरिफ़’ के झटके से दुनिया को हिला दिया तो वैश्विक व्यापार की दुनिया भी अपनी चाल बदल बैठी. अमेरिका के ये कदम केवल विरोध पैदा नहीं कर गए बल्कि देशों को आपस में जोड़ने का नया तरीका भी दे गए. अब दुनिया भर में व्यापार समझौते और नई वार्ताएं पहले से कहीं तेज़ी से चल रही हैं और हर देश नए आर्थिक अवसरों की खोज में अपने पड़ोसी देशों के साथ हाथ मिला रहा है.
अमेरिका द्वारा टैरिफ बढ़ाने के बाद देखा जाए तो जहां यूरोपीय संघ (EU) ने इंडोनेशिया के साथ नौ सालों से लटके अपने व्यापार समझौते को अंतिम रूप दे दिया है, वहीं दो दशकों के बाद मेक्सिको के साथ अपने ट्रेड एग्रीमेंट को अपडेट करने में भी सफलता हासिल की है. इसी साल, यूरोपीय देशों आइसलैंड, लिकटेंस्टीन, नॉर्वे और स्विट्जरलैंड के समूह यूरोपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र (EFTA) ने दक्षिण अमेरिकी क्षेत्रीय समूह मर्कोसुर के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTAs) पर हस्ताक्षर किए हैं. ब्राज़ील मर्कोसुर का एक संस्थापक सदस्य है. इसके अलावा, EFTA ने भारत, थाईलैंड और मलेशिया के साथ भी मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) पर हस्ताक्षर किए हैं. इतना ही नहीं, मर्कोसुर समूह कनाडा, यूनाइटेड किंगडम (UK), वियतनाम, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), इंडोनेशिया और जापान के साथ व्यापार समझौते करने के साथ ही, भारत के साथ अपने मौज़ूदा व्यापार समझौते का विस्तार करने की भी योजना बना रहा है. यूएई भी वर्ष 2025 में केन्या, न्यूज़ीलैंड, मलेशिया, सर्बिया और यूक्रेन के साथ मुक्त व्यापार समझौतों को अंतिम रूप देने में जुटा हुआ है और उम्मीद है कि उसके इन देशों के साथ व्यापार समझौते इस साल अंतिम रूप ले लेंगे. यूएई फ्यूचर ऑफ इनवेस्टमेंट एंड ट्रेड पार्टनरशिप यानी "निवेश और व्यापार साझेदारी का भविष्य" नाम के 14 देशों के एक समूह का संस्थापक सदस्य भी है. इस समूह में शामिल देशों ने अपने साझा घोषणापत्र में “खुले और निष्पक्ष व्यापार के सिद्धांतों एवं नियम-आधारित व्यापार प्रणाली के पालन” की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है.
“ब्राज़ीलियाई उपराष्ट्रपति अल्कमिन के भारत दौरे के कुछ नतीज़े भी तुरंत सामने आ गए हैं.”
भारत भी दूसरे देशों के साथ व्यापारिक रिश्ते बनाने और समझौते करने में पीछे नहीं है. भारत अन्य देशों के साथ लगातार व्यापार वार्ताएं कर रहा है और इसी कड़ी में हाल ही में ब्राज़ील के उपराष्ट्रपति गेराल्डो अल्कमिन ने भारत का दौरा किया था. उपराष्ट्रपति अल्कमिन के पास ब्राज़ील के विकास, उद्योग, व्यापार और सेवा मंत्री की भी ज़िम्मेदारी है. ज़ाहिर है कि 7 अगस्त को भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और ब्राज़ील के राष्ट्रपति लुईस इनासियो लूला दा सिल्वा के बीच फोन पर एक घंटे तक बातचीत हुई थी, जिसमें दोनों नेताओं ने वाशिंगटन द्वारा "एकतरफा टैरिफ लगाने" पर विस्तार से चर्चा की थी. ब्राज़ील के उपराष्ट्रपति अल्कमिन का नई दिल्ली दौरा इस बातचीत के क़रीब दो महीने बाद 15 से 17 अक्टूबर के बीच हुआ. वाशिंगटन ने भारत और ब्राज़ील दोनों पर ही ट्रैरिफ बम फोड़ा है और दोनों देशों से होने वाले आयात पर 50 प्रतिशत का भारी-भरकम शुल्क लगा दिया है. इस अत्यधिक टैरिफ की वजह से दोनों ही देशों के अमेरिकी निर्यात पर व्यापक असर पड़ा है. अमेरिका के इस क़दम के जवाब में ही देखा जाए तो ब्राज़ील और नई दिल्ली ने हाथ मिलाया है, ताकि इससे होने वाले आर्थिक नुक़सान की भरपाई की जा सके. भारत-मर्कोसुर व्यापार समझौते को लेकर भारत के वाणिज्य मंत्रालय ने एक बयान जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि भारत और ब्राज़ील को "बातचीत शुरू होने के एक साल के भीतर इसे समाप्त करने की कोशिश करनी चाहिए."
ब्राज़ील की व्यापार और निवेश संवर्धन एजेंसी एपेक्स ब्राजील के प्रमुख ने हाल ही में कहा है कि "टैरिफ में बढ़ोतरी के बावज़ूद आने वाले दिनों में भारत के साथ व्यापार में ज़बरदस्त तेज़ी देखने को मिल सकती है और इसके पीछे कहीं न कहीं अमेरिकी टैरिफ एक बड़ी वजह होगी." ज़ाहिर है कि जब उपराष्ट्रपति अल्कमिन नई दिल्ली के दौरे पर आए थे, तो उनके साथ एक बहुत बड़ा प्रतिनिधिमंडल भी था, जिसमें हर सेक्टर और बिजनेस के लोग शामिल थे. उनके साथ आए प्रतिनिधिमंडल में रक्षा मंत्री जोस मोंटेरो और तेल, रक्षा, खनन, कृषि, खाद्य व एविएशन सेक्टर की देश की सबसे बड़ी कंपनियों के प्रतिनिधि शामिल थे. ज़ाहिर है कि अल्कमिन के दौरे से पहले इसकी सफलता के लिए दोनों देशों के बीच कई द्विपक्षीय वार्ताएं और कार्यक्रम आयोजित किए गए थे. इनमें 3 अक्टूबर को भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और ब्राज़ीलियाई राष्ट्रपति के मुख्य सलाहकार, राजदूत सेल्सो अमोरिम के नेतृत्व में छठा भारत-ब्राज़ील स्ट्रैटेजिक डायलॉग आयोजित किया गया था. इसके लावा 7 अक्टूबर को दोनों देशों के शीर्ष व्यापार अधिकारियों की अध्यक्षता में भारत-ब्राज़ील ट्रेड मॉनिटरिंग मैकेनिज़्म की बैठक हुई थी. इसी कड़ी में आगामी 24 नवंबर को ब्राज़ील के सैंटोस में ब्राज़ील-भारत डिफेंस डायलॉग भी आयोजित होने वाला है.
“अब भारतीयों को ब्राज़ील जाने के लिए ई-वीज़ा की सुविधा मिलेगी.”
हालांकि, भारत और ब्राज़ील के बीच रिश्तों में जो प्रगाढ़ता आ रही है उसके पीछे केवल ट्रंप का टैरिफ ही एक कारण नहीं है, बल्कि इसमें दोनों देशों की विदेश नीति का भी बहुत बड़ा योगदान है. ब्राज़ील की बात करें, तो भारत के साथ नज़दीकी की वजह उसकी 'ऑटोनोमिया पेला डायवर्सिफिकाओ' यानी विविधीकरण के ज़रिए स्वायत्तता हासिल करने की नीति है. वहीं नई दिल्ली की बात करें तो उसकी भी शुरू से ही यही रणनीति रही है. इसकी शुरुआत भारत के 'गुटनिरपेक्षता' के सिद्धांत से हुई थी और हाल-फिलहाल में इसी को कहीं न कहीं 'रणनीतिक स्वायत्तता' या 'बहु-संरेखण' का नाम दिया गया है. कुल मिलाकर, इन सबके पीछे राष्ट्र की एक स्वतंत्र विदेश और व्यापार नीति का बुनियादी सिद्धांत है, यानी एक ऐसा नीतिगत नज़रिया, जो एक मुद्दे पर आधारित नहीं हो, बल्कि जिसमें कई अलग-अलग विषय शामिल हों. भारत और ब्राज़ील दोनों ही अमेरिका की ओर से थोपे गए उच्च टैरिफ के प्रभाव को कम करने की भरसक कोशिश कर रहे हैं और इसके लिए सभी विकल्पों को आज़मा रहे हैं. लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि भारत-ब्राज़ील के बीच आर्थिक रिश्तों की भी एक सीमा है. इसकी वजह यह है कि दोनों देश चीनी, कॉफी और कपास जैसे उत्पादों के मामले में वैश्विक बाज़ारों में एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी हैं.
“ब्राज़ील के प्री-सॉल्ट फ़ील्ड्स में विशाल तेल भंडार है.”
ब्राज़ीलियाई उपराष्ट्रपति अल्कमिन के भारत दौरे के कुछ नतीज़े भी तुरंत सामने आ गए हैं. अपनी नई दिल्ली यात्रा के दौरान अल्कमिन ने ऐलान किया कि अब भारतीयों को ब्राज़ील जाने के लिए ई-वीज़ा की सुविधा मिलेगी. इसके अलावा उन्होंने ब्राज़ील के रक्षा मंत्री और भारत के विमानन मंत्री के साथ मिलकर ब्राज़ील की दिग्गज एविएशन कंपनी एम्ब्रेयर के भारतीय ऑफिस का उद्घाटन भी किया. इस दौरान एम्ब्रेयर और भारत के महिंद्रा समूह के बीच एक समझौता भी किया गया. अब ये दोनों कंपनियां मिलकर भारतीय वायु सेना के लिए C-390 मिलेनियम मिलिट्री ट्रांसपोर्ट विमान का निर्माण करेंगी. इसके अलावा, भारत और ब्राज़ील ऊर्जा सेक्टर में, ख़ास तौर पर पेट्रोलियम सेक्टर में भी सहयोग मज़बूत कर रहे हैं. ज़ाहिर है कि अमेरिका रूस की तेल कंपनियों पर कड़े प्रतिबंध लगा रहा है, जिससे भारत की तेल आपूर्ति प्रभावित हो रही है. ऐसे में भारत तेल आपूर्ति में संतुलन बनाने के मकसद से ब्राज़ील जैसे देशों की ओर रुख़ कर रहा है. ब्राज़ील के बुज़ियोस और सैंटोस में टुपी के प्री-सॉल्ट फ़ील्ड्स में तेल का प्रचुर भंडार है और वहां तेल उत्पादन भी बहुत अधिक है. ऐसे में ब्राज़ील के साथ पेट्रोलियम संबंध बढ़ाने से भारत को निर्बाध तेल आपूर्ति सुनिश्चित हो सकती है. इसके अलावा, 2026 में ब्राज़ील के कैंपोस और सैंटोस में छह ऑयल एक्सप्लोरेशन ब्लॉक में होने वाली नीलामी में भारतीय तेल कंपनियां शामिल हो सकती है. इतना ही नहीं, ब्राजील की राष्ट्रीय तेल कंपनी पेट्रोब्रास ने भारत की हिंदुस्तान पेट्रोलियम, भारत पेट्रोलियम और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन के साथ बिक्री अनुबंधों को भी अंतिम रूप दे दिया है.
“एम्ब्रेयर और भारत के महिंद्रा समूह के बीच एक समझौता भी किया गया.”
ट्रंप प्रशासन की ओर से दुनिया भर के देशों पर थोपे गए उच्च टैरिफ के बाद कई देशों के सामने निर्णायक घड़ी आ गई है और वे इसके ख़िलाफ़ लामबंद हो गए हैं. राष्ट्रपति ट्रंप ने विभिन्न देशों पर टैरिफ लगाने के फैसले के दिन को 'मुक्ति दिवस' घोषित किया था. ज़ाहिर है कि अमेरिका का यह ऐलान व्यापार उदारीकरण के सबसे बड़े पैरोकार के रूप में वाशिंगटन की भूमिका को समाप्त करने का ज़रिया बन सकता है. इसके साथ ही अमेरिका का यह क़दम बाक़ी दुनिया को मुक्त व्यापार के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करने वाला भी साबित हो सकता है. इस पूरी क़वायद में फिलहाल चीन सबसे बड़े विजेताओं में से एक बनकर उभरा है. चीन 2013 से दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक राष्ट्र बना हुआ है. चीन की ओर से अमेरिका को होने वाले निर्यात में दोहरे अंकों में गिरावट के बावज़ूद 2025 में चीन का कुल निर्यात बढ़ा है और सितंबर महीने में इसमें 8.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज़ की गई है. हालांकि, भारत और ब्राज़ील जैसे देशों को अमेरिकी टैरिफ के असर से बाहर निकलने के लिए अभी काफ़ी कुछ प्रयास करने की ज़रुरत है, लेकिन दोनों देशों ने पिछले दिनों उठाए गए क़दमों के ज़रिए अपने इरादों को साफ कर दिया है कि वे इस दिशा में पुरज़ोर कोशिश कर रहे हैं. वर्ष 2026 की शुरुआत में ब्राज़ील के राष्ट्रपति लुईस इनासियो लूला दा सिल्वा नई दिल्ली की यात्रा पर आने वाले हैं और उम्मीद है कि उनके दौरे से दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों में और मज़बूती आएगी, साथ इन कोशिशों को ठोस नतीज़े भी देखने को मिलेंगे.
हरी सेशासाई ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में विज़िटिंग फेलो और कॉन्सिलियम ग्रुप के को-फाउंडर हैं.
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Hari Seshasayee is a visiting fellow at ORF, part of the Strategic Studies Programme, and is a co-founder of Consilium Group. He previously served as ...
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