पहाड़ अपनी अनछुई खूबसूरती और सुकून के लिए बुलाते हैं लेकिन बढ़ता पर्यटन कहीं न कहीं पानी की कमी का कारण भी बनता जा रहा है. हिमालयी क्षेत्रों में जाएँ तो हर झरने और हर बूंद की कद्र करें. इस बात का मर्म जानने के लिए पढ़ें पूरा लेख .
विश्व भर के पर्यटन स्थलों-जैसे भारत में शिमला, लद्दाख और गोवा; इंडोनेशिया में बाली; तुर्की में बोडरुम; म्यांमार में सिएम रीप; दक्षिण अफ्रीका में केप टाउन; ग्रीस में नाक्सोस; और थाईलैंड में कोह सामुई-को विशेषकर पर्यटन के चरम मौसम में जल संकट का सामना करना पड़ रहा है. इन अधिकांश शहरों में जल की कमी का कारण पूर्ण जल उपलब्धता का अभाव नहीं बल्कि पर्यटकों की बढ़ती संख्या से अचानक बढ़ी मांग है. इससे अवसंरचना पर दबाव पड़ता है और विभिन्न हितधारकों के बीच जल का असमान वितरण होता है. इस अर्थ में जल संकट केवल पारिस्थितिक अनिवार्यता नहीं, बल्कि पर्यटन-आधारित शहरी विकास की राजनीतिक अर्थव्यवस्था से निर्मित एक शासनगत परिणाम बन जाता है.
हिमालय में पर्वतीय भूगोल की विशिष्ट बाधाएँ इस समस्या को और बढ़ा देती हैं. सीमित भंडारण क्षमता, लंबी दूरी तक पानी उठाने की आवश्यकता, बहु-आयामी ऊर्जा निर्भरता, तथा भूस्खलन, फ्लैश फ्लड और हिमनदीय झील विस्फोट (GLOFs) जैसी जलवायु चरम घटनाओं के प्रति संवेदनशीलता, हिमालयी शहरी जल प्रणालियों को संरचनात्मक रूप से कमजोर बनाती है. पर्यटन से उत्पन्न दबाव जलवायु और भू-आकृतिक कमजोरियों के साथ मिलकर शहरी जल तनाव का एक विशिष्ट रूप पैदा करते हैं-जो अस्थायी, असमान रूप से वितरित और पारंपरिक नियोजन उपकरणों से नियंत्रित करना कठिन है.
विश्व की सबसे युवा वलित पर्वत श्रृंखला होने के कारण हिमालय में लगभग 15,000 हिमनद हैं, जिनका पिघला जल सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र, यमुना, मेकांग, सालवीन, इरावदी, यांग्त्ज़े और पीली नदी जैसी प्रमुख नदियों को पोषित करता है, जिससे लगभग 1.3 से 1.5 अरब लोगों को लाभ मिलता है. इसी समय हिमालय तीव्र शहरीकरण से भी गुजर रहा है, वैश्विक पर्यटन नेटवर्क से जुड़ रहा है और तीव्र निर्माण, अवसंरचना पुनर्संरचना तथा मौसमी जनसंख्या वृद्धि का अनुभव कर रहा है. पिछले दो दशकों में पर्यटन की तेज़ वृद्धि , हिमनदों के पीछे हटने, वर्षा पैटर्न में बदलाव, स्रोतों के जल प्रवाह में कमी और चरम मौसमी घटनाओं में वृद्धि जैसे पर्यावरणीय परिवर्तनों के साथ हुई है.
अधिकांश शहरों में जल की कमी का कारण पूर्ण जल उपलब्धता का अभाव नहीं बल्कि पर्यटकों की बढ़ती संख्या से अचानक बढ़ी मांग है. इससे अवसंरचना पर दबाव पड़ता है और विभिन्न हितधारकों के बीच जल का असमान वितरण होता है.
जनवरी 2022 से मार्च 2025 के बीच भारतीय हिमालयी राज्यों में 1,186 में से 822 दिनों पर चरम मौसमी घटनाएं दर्ज की गई, जिनमें 2,863 लोगों की मृत्यु हुई. इस बीच पर्यटन लगातार बढ़ता रहा, केवल हिमाचल प्रदेश में ही प्रति वर्ष लगभग 2 करोड़ पर्यटक आए, जिससे राज्य की जल आपूर्ति सेवाओं पर दबाव बढ़ा. हिमालयी शहर इस समय कई समस्याओं का एक साथ सामना कर रहे हैं. मौसम की मार, पेड़ों की कटाई, भूजल की कमी, तेजी से बढ़ते शहर, ज्यादा पर्यटन और कमजोर बुनियादी सुविधाएं—ये सब मिलकर हालात को और खराब कर रहे हैं. विडंबना यह है कि जिस पर्यटन को तरक्की का जरिया माना जा रहा है, वही लंबे समय में इलाके की स्थिरता के लिए खतरा बन सकता है. इसलिए हिमालय में पर्यटन को सिर्फ कमाई का साधन नहीं, बल्कि पानी और पर्यावरण को ध्यान में रखकर टिकाऊ और सुरक्षित विकास के रास्ते के रूप में देखा जाना चाहिए.
आँकड़े बताते हैं कि हिमालयी नगरों में विशेषकर गर्मियों और त्योहारों के दौरान पर्यटकों की संख्या बढ़ती है, जो स्थानीय वर्षा और जल पुनर्भरण चक्र से हमेशा मेल नहीं खाती. हाल के वर्षों में ये आगमन चरम मौसमी घटनाओं के साथ भी सहयोग से हुए हैं, जिससे जोखिम और प्रभाव बढ़े हैं. हिमाचल प्रदेश में पर्यटन वृद्धि के साथ सड़क संपर्क, ब्रांडिंग और बजट होटलों का विस्तार हुआ, परंतु यह स्पष्ट नहीं कि यह विकास पर्यावरणीय और अवसंरचनात्मक क्षमता के अनुरूप था या नहीं.
चित्र 1: वर्ष 2024 में हिमाचल प्रदेश में कुल पर्यटक संख्या में मौसमी बदलाव

Source: Author’s illustration using Tourist Statistics data
मौसम की मार, पेड़ों की कटाई, भूजल की कमी, तेजी से बढ़ते शहर, ज्यादा पर्यटन और कमजोर बुनियादी सुविधाएं—ये सब मिलकर हालात को और खराब कर रहे हैं. विडंबना यह है कि जिस पर्यटन को तरक्की का जरिया माना जा रहा है, वही लंबे समय में इलाके की स्थिरता के लिए खतरा बन सकता है. इसलिए हिमालय में पर्यटन को सिर्फ कमाई का साधन नहीं, बल्कि पानी और पर्यावरण को ध्यान में रखकर टिकाऊ और सुरक्षित विकास के रास्ते के रूप में देखा जाना चाहिए.
हिमाचल प्रदेश ने 2022 से 2024 के बीच पर्यटन में तेज़ वृद्धि दर्ज की, जो उसी अवधि में चरम मौसमी घटनाओं-जैसे बादल फटना, फ्लैश फ्लड, भूस्खलन और लंबे सूखे दौर-में बढ़ोतरी के साथ मेल खाती है. गर्मियों के दौरान लंबे शुष्क काल आधार प्रवाह (बेस फ्लो) को कम कर देते हैं. ऐसी स्थिति में पर्यटकों की अधिक संख्या पहले से दबाव झेल रही जल प्रणालियों पर प्रतिस्पर्धा को और तीव्र कर देती है. यह हिमाचल प्रदेश की विकास दिशा में एक विरोधाभास को दर्शाता है, जहां पहाड़ी क्षेत्रों में ‘विकास-प्रथम’ शासन की राजनीतिक अर्थव्यवस्था मजबूत होती दिखती है और पर्यटन वृद्धि को पर्यावरणीय संकेतों से अलग कर दिया जाता है.
लेह में पारंपरिक जल और स्वच्छता प्रबंधन की जगह केंद्रीकृत इंजीनियरिंग समाधान आ गए हैं. स्थानीय भूगोल से असंगति के कारण भूजल क्षय और प्रदूषण बढ़ा है. लेह की जल आपूर्ति क्षमता 6.07 एमएलडी है, जबकि मांग 7.5 एमएलडी है. 80 प्रतिशत से अधिक जल आवश्यकता भूजल से पूरी होती है. गंगटोक में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 60-70 लीटर जल मिलता है, जो अनुशंसित 135 लीटर से कम है.
इसी प्रकार, ब्रिटिश भारत की पूर्व ग्रीष्मकालीन राजधानी शिमला 2018 में ‘डे ज़ीरो’ के करीब पहुँच गया था, जब कई इलाकों में लगभग 10–15 दिनों तक पाइपलाइन से पानी की आपूर्ति बंद रही. 2016 में जल प्रदूषण की समस्या के कारण प्रमुख जल स्रोत अश्वनी खड्ड को बंद करना पड़ा था, और 24 घंटे की बिजली कटौती से पानी उठाने की प्रक्रिया भी बाधित हुई-इन्हें इस संकट के मुख्य कारण माना गया. हालांकि, इस संकट को और गंभीर बनाने में पर्यटन की भूमिका ने स्थानीय निवासियों को आक्रोशित कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप पर्यटकों से शिमला न आने की अपील करते हुए एक बड़ा अभियान चलाया गया. वहीं नैनीताल में शहर के मुख्य जल स्रोत नैनी झील का जलस्तर घटकर 4.7 फीट रह गया है, जो पिछले पाँच वर्षों में सबसे कम है.
अभी जो कदम उठाए जाते हैं, वे ज़्यादातर सिर्फ पानी की सप्लाई बढ़ाने पर केंद्रित होते हैं, जिससे पर्यटकों की सुविधा तो बनी रहती है, लेकिन प्रकृति और स्थानीय लोगों को नुकसान होता है. टिकाऊ पर्यटन के लिए जरूरी है कि इलाके की पर्यावरणीय सीमाओं को समझकर ही विकास किया जाए.
यह समस्या केवल भारतीय हिमालयी शहरों तक सीमित नहीं है. जलवायु परिवर्तन नेपाल के अपर मुस्तांग क्षेत्र में मानव बसावट के नक्शे को बदल रहा है, जहां जलस्रोत सूखने के कारण बस्तियाँ उजड़ रही हैं और पेयजल, सिंचाई तथा पशुधन के लिए पानी की कमी बढ़ती जा रही है. नेपाल की राजधानी काठमांडू को भी बार-बार जल संकट और खराब गुणवत्ता वाले पेयजल की समस्या का सामना करना पड़ता है. शहर अत्यधिक भूजल दोहन, अधिक गैर-राजस्व जल (लीकेज और हानि), भूमि उपयोग में बदलाव, जलवायु अनिश्चितताओं और शासन संबंधी चुनौतियों से जूझ रहा है. भूटान में भी, लगभग 80 अरब घन मीटर जल उपलब्ध होने के बावजूद, अवसंरचना, योजना और वितरण संबंधी समस्याओं के कारण दीर्घकालिक जल कमी बनी हुई है.
सामूहिक रूप से ये उदाहरण इस बात को रेखांकित करते हैं कि जल संकट केवल जलवायु का परिणाम नहीं है, बल्कि यह योजना, संसाधन आवंटन और लचीलापन से जुड़ा एक संरचनात्मक संकट है. यह आवश्यक बनाता है कि पर्यटन वृद्धि को जल संसाधनों की सीमाओं तथा पर्यावरणीय और सामाजिक न्याय के संदर्भ में किस प्रकार संचालित किया जाए, इस पर मूलभूत पुनर्विचार किया जाए. ये उदाहरण दर्शाते हैं कि हिमालय में जल संकट केवल जलवायु परिणाम नहीं, बल्कि योजना, आवंटन और लचीलेपन की समस्या है. इसके लिए पर्यटन शासन की पुनर्विचार आवश्यकता है.
शुरुआत के तौर पर शहरों में ऐसा प्लान बनाना चाहिए जिसमें पर्यटन, पानी और कचरे का सही प्रबंधन एक साथ हो. साथ ही, किसी जगह पर उसकी क्षमता के अनुसार ही पर्यटकों की संख्या तय करनी चाहिए, ताकि वहां जरूरत से ज्यादा भीड़ न हो.
हिमालयी शहरों में पर्यटन की योजना बनाते समय पानी के सही प्रबंधन पर पूरा ध्यान नहीं दिया गया है. पानी निकालने के अलग-अलग तरीकों पर भी ठीक से निगरानी नहीं होती. अभी जो कदम उठाए जाते हैं, वे ज़्यादातर सिर्फ पानी की सप्लाई बढ़ाने पर केंद्रित होते हैं, जिससे पर्यटकों की सुविधा तो बनी रहती है, लेकिन प्रकृति और स्थानीय लोगों को नुकसान होता है. टिकाऊ पर्यटन के लिए जरूरी है कि इलाके की पर्यावरणीय सीमाओं को समझकर ही विकास किया जाए. भूटान का ऐसा मॉडल, जिसमें कम पर्यटक लेकिन ज़्यादा मूल्य और संरक्षण पर खर्च किया जाता है, एक अच्छा उदाहरण है. साथ ही, पर्यटकों को अलग-अलग जगहों और मौसमों में बांटने से भी दबाव कम हो सकता है. हिमालय में पर्यटन की योजना में लचीलापन और पर्यावरण सुरक्षा को सबसे अहम जगह मिलनी चाहिए.
सोमा सरकार ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के अर्बन स्टडीज प्रोग्राम में एसोसिएट फेलो हैं.
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Soma Sarkar is an Associate Fellow with ORF’s Urban Studies Programme. Her research interests span the intersections of environment and development, urban studies, water governance, Water, ...
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