भारत में एआई और ऊर्जा के लिए जरूरी महत्वपूर्ण खनिजों की खोज और उत्पादन अभी काफी धीमा है. MMDR 2025 संशोधन का उद्देश्य नियम आसान करके और निवेश बढ़ाकर इस प्रक्रिया को तेज करना है. जानिए कैसे भारत अपनी खनिज सुरक्षा मजबूत कर रहा है.
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घरेलू खनिज अन्वेषण को बढ़ावा देने की अपनी योजना के तहत खान मंत्रालय ने हाल ही में महत्वपूर्ण खनिज ब्लॉकों की 7वीं चरण की नीलामी आयोजित की. इसका मुख्य कारण यह है कि भारत ऊर्जा संक्रमण के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण खनिजों के मामले में आयात पर निर्भर है जबकि इन खनिजों के निर्यात का इस्तेमाल आज भू-आर्थिक दबाव के साधन के रूप में किया जा रहा है इसलिए, इनकी आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित करना ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से सर्वोच्च प्राथमिकता बन गया है. इसी संदर्भ में जम्मू-कश्मीर में लिथियम भंडार की खोज को एक बड़ी उपलब्धि माना गया. हालांकि, खोज से लेकर व्यावसायिक उत्पादन तक की प्रक्रिया अपेक्षित रूप से सफल नहीं रही है.
2023 से अब तक महत्वपूर्ण खनिज ब्लॉकों की कई नीलामियां या तो पर्याप्त बोलियां न मिलने या योग्य बोलीदाताओं की कमी के कारण रद्द करनी पड़ी हैं. खास तौर पर अब तक केवल एक लिथियम ब्लॉक की नीलामी हुई है और उसमें भी बड़ी खनन कंपनियों ने कोई रुचि नहीं दिखाई. इसी पृष्ठभूमि में घरेलू खनन परियोजनाओं में हो रही देरी को कम करने के उद्देश्य से खान और खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम 2025 (जिसे आगे ‘संशोधन’ कहा गया है) लाया गया. यह कानून खनन कंपनियों को गहराई में मौजूद महत्वपूर्ण खनिजों की खोज और खनन के लिए अपने लाइसेंस वाले क्षेत्र को बढ़ाने की अनुमति देता है. साथ ही, कंपनियां बिना अतिरिक्त शुल्क के नए महत्वपूर्ण खनिज भी अपने लाइसेंस में जोड़ सकती हैं. लेकिन 2023 से कई खनिज ब्लॉकों की नीलामी पर्याप्त बोली लगाने वालों की कमी के कारण रद्द हो चुकी है. अब तक केवल एक लिथियम ब्लॉक की नीलामी हुई है, जिसमें बड़ी कंपनियों ने रुचि नहीं दिखाई.
इसी पृष्ठभूमि में घरेलू खनन परियोजनाओं में हो रही देरी को कम करने के उद्देश्य से खान और खनिज संशोधन अधिनियम 2025 लाया गया. यह कानून खनन कंपनियों को गहराई में मौजूद महत्वपूर्ण खनिजों की खोज और खनन के लिए अपने लाइसेंस वाले क्षेत्र को बढ़ाने की अनुमति देता है
गहराई में खनन करना बहुत महंगा काम होता है. ऊर्जा और एआई जैसी उभरती तकनीकों के लिए इन खनिजों की अनिवार्यता के बावजूद, कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव और महंगे निवेश, वैश्विक जोखिम, संसाधनों की सही जानकारी की कमी और कमजोर तकनीक के कारण भारत में खनन मुश्किल बना हुआ है, हालांकि नया कानून इसे सुधारने की कोशिश कर रहा है.
किसी खनिज का सही उपयोग करने से पहले उसकी जगह, मात्रा और गुणवत्ता जानने के लिए सर्वे किया जाता है, जिससे खनन की योजना बनाई जाती है. संयुक्त राष्ट्र संसाधन वर्गीकरण ढांचे (UNECE) के अनुसार, अन्वेषण अध्ययन G4 से G1 स्तर तक होते हैं, जहां व्यापकता और परियोजना की व्यावसायिक व्यवहार्यता क्रमशः बढ़ती जाती है. खनन कंपनियां सामान्यतः G1 स्तर के अध्ययन पूरे होने के बाद ही परियोजनाओं में निवेश करती हैं, क्योंकि इन्हीं के आधार पर उत्पादन और आय का अनुमान लगाया जाता है.
हालांकि, भारत में ऐसे अध्ययनों की गति काफी धीमी रही है. अब तक केवल एक लिथियम और दो निकेल-कोबाल्ट ब्लॉकों का ही G2/G3 स्तर तक अन्वेषण हो पाया है, जबकि अधिकांश महत्वपूर्ण खनिज ब्लॉक अभी भी G4 स्तर से आगे नहीं बढ़ पाए हैं. इन अध्ययनों की कमी के कारण संभावित महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों के अन्वेषण और निवेश के लिए सटीक रोडमैप तैयार करना कठिन हो जाता है.
चित्र 1: संसाधनों के लिए संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क वर्गीकरण (यूनेसीई) पर आधारित फ्लोचार्ट

अन्वेषण गतिविधियों की धीमी प्रगति का एक बड़ा कारण लाइसेंसिंग व्यवस्था की जटिलता भी है. राष्ट्रीय खनिज नीति 2016 ने खनिज अन्वेषण क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोला, जो इससे पहले मुख्यतः सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के नियंत्रण में था. इसके तहत MMDR संशोधन अधिनियम 2023 ने अधिसूचित निजी अन्वेषण एजेंसियों (NPEAs) यानी ‘एक्सप्लोरर्स’ को खोज और प्रारंभिक सर्वेक्षण कार्यों के लिए एक्सप्लोरेशन लाइसेंस (ELs) प्रदान करने की व्यवस्था की. हालांकि, इस ढांचे में NPEAs के लिए पर्याप्त प्रोत्साहन नहीं हैं.
राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण ट्रस्ट (NMET) अन्वेषण कार्यों के लिए वित्तीय सहायता देता है. यह NPEAs को परियोजना की पूरी लागत वापस करता है, लेकिन तभी जब वह अन्वेषित क्षेत्र की भूवैज्ञानिक रिपोर्ट को स्वीकार कर ले. इसके लिए कोई निश्चित समय सीमा तय नहीं की गई है. हालांकि NMET स्वीकृत परियोजना लागत का 30 प्रतिशत तक अग्रिम राशि देता है, लेकिन इसके बदले NPEA को समान राशि की बैंक गारंटी देनी होती है, जिससे अतिरिक्त प्रीमियम लागत जुड़ जाती है. एक्सप्लोरेशन लाइसेंस सबसे कम बोली लगाने वाले को मिलता है, लेकिन पैसा देर से मिलने के कारण खोज करने वाली एजेंसियों को शुरुआत में आर्थिक परेशानी होती है.
कनाडा और ऑस्ट्रेलिया भारत को खनिज खोज की उन्नत तकनीकें देते हैं, लेकिन इन्हें आयात करने में कई दिक्कतें आती हैं. खनिज संकेतों की पहचान के लिए उपयोग होने वाली हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग और उपग्रह-आधारित टोही प्रणालियों जैसी तकनीकों पर अक्सर ‘द्वि-उपयोग’ प्रतिबंध लगाए जाते हैं, क्योंकि उनका इस्तेमाल सैन्य उद्देश्यों के लिए भी किया जा सकता है.
दुनिया के कई देशों में यह देखा गया है कि अन्वेषण कंपनियां अपने खनिज रियायत अधिकार सीधे खनन कंपनियों को बेच देती हैं, जिससे वे अपने व्यापक कार्यों के लिए उचित मूल्य तय कर पाती हैं. लेकिन भारत के इस कानून में इसकी अनुमति नहीं है. इसके बजाय, यहां भी लाइसेंस रिवर्स ऑक्शन के जरिए दिए जाते हैं, जहां सबसे कम बोली लगाने वाले को अधिकार मिलता है. चूंकि आय भविष्य की नीलामी पर निर्भर रहती है, इसलिए अन्वेषकों को निकट अवधि में वित्तीय दबाव झेलना पड़ता है. हालांकि अधिनियम उन्हें खनन लाइसेंसधारी के साथ एकमुश्त भुगतान के लिए प्रत्यक्ष समझौता करने की अनुमति देता है, लेकिन इससे भी उन्हें उचित सौदेबाजी की स्थिति बहुत कम ही मिल पाती है.
भारत कोयला, एल्युमिनियम, सीसा, जस्ता और सोने जैसे प्रमुख खनिजों के खनन में अग्रणी देशों में शामिल है और उसने खनिज मानचित्रण के लिए भूवैज्ञानिक अध्ययनों में भी विशेषज्ञता विकसित की है. हालांकि, महत्वपूर्ण खनिजों के मामले में ये पारंपरिक क्षमताएं सीमित साबित होती हैं, क्योंकि ये खनिज सामान्यतः सौ मीटर से अधिक गहराई में पाए जाते हैं. वर्तमान और भविष्य दोनों में आपूर्ति सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इस गहराई तक पहुंच बनाने की क्षमता बढ़ाना आवश्यक है, खासकर तब जब सतही खदानों के संसाधन धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं.
इसके लिए उन्नत तकनीकी क्षमताओं की आवश्यकता होती है ताकि अन्वेषण और खनन अधिक सटीक और प्रभावी तरीके से किया जा सके. भारत ऐसी उन्नत प्रणालियों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है. कनाडा और ऑस्ट्रेलिया भारत को खनिज खोज की उन्नत तकनीकें देते हैं, लेकिन इन्हें आयात करने में कई दिक्कतें आती हैं. खनिज संकेतों की पहचान के लिए उपयोग होने वाली हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग और उपग्रह-आधारित टोही प्रणालियों जैसी तकनीकों पर अक्सर ‘द्वि-उपयोग’ (dual-use) प्रतिबंध लगाए जाते हैं, क्योंकि उनका इस्तेमाल सैन्य उद्देश्यों के लिए भी किया जा सकता है. इसी तरह, जटिल लाइसेंसिंग आवश्यकताओं के कारण गहरी ड्रिलिंग प्रणालियों का आयात अधिक महंगा हो जाता है. इसके अलावा, आवश्यक बुनियादी ढांचे और प्रशिक्षित मानव संसाधन की कमी भारत में इन तकनीकों के प्रभावी उपयोग और एकीकरण में बाधा बनती है.
हालिया संशोधन संरचनात्मक बदलाव लाने में पूरी तरह सफल नहीं दिखता. संसाधनों की सही पहचान के लिए सटीक आधारभूत डेटा अत्यंत महत्वपूर्ण है. इस दिशा में राष्ट्रीय भू-विज्ञान डेटा रिपॉजिटरी को एआई-आधारित जीआईएस प्रणालियों से मजबूत किया जाना चाहिए, ताकि पूर्वानुमानित खनिज मानचित्रण के जरिए महत्वपूर्ण खनिज ब्लॉकों की बेहतर पहचान की जा सके.
आज दुनिया में खनिजों की मांग और प्रतिस्पर्धा तेजी से बढ़ रही है, इसलिए भारत को अपने खनिज खुद खोजने होंगे. एआई, साफ ऊर्जा और नई तकनीकों के लिए इन खनिजों की जरूरत बहुत ज्यादा है. इसलिए भारत को खनन व्यवस्था में बड़े और अच्छे बदलाव करने होंगे.
NPEAs को ऐसे अधिकार मिलने चाहिए ताकि वे अपनी खोज सीधे कंपनियों को बेच सकें. इससे पैसा जुटाना आसान होगा. साथ ही, NMET को खर्च लौटाने की बजाय सीधे आर्थिक मदद देनी चाहिए. इसके अतिरिक्त, भारत कनाडा की ‘फ्लो-थ्रू शेयर‘ व्यवस्था को अपना सकता है, जिसमें शुरुआती परियोजनाओं के वित्तीय जोखिम को कम करने के लिए कर कटौती का लाभ अन्वेषकों से निवेशकों को हस्तांतरित किया जाता है. साथ ही, परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए मिनरल सिक्योरिटी पार्टनरशिप के फाइनेंस नेटवर्क का भी उपयोग किया जा सकता है.
भारत-ऑस्ट्रेलिया क्रिटिकल मिनरल्स इन्वेस्टमेंट पार्टनरशिप और भारत-अमेरिका TRUST पहल जैसी साझेदारियों के माध्यम से उन्नत खनन प्रणालियों के आयात को सरल बनाने पर भी ध्यान देना चाहिए. अंतरराष्ट्रीय अन्वेषण कंपनियों के साथ संयुक्त उपक्रम तकनीकी हस्तांतरण और ज्ञान साझा करने में मदद कर सकते हैं. राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन के तहत स्थापित उत्कृष्टता केंद्रों (Centres of Excellence) के माध्यम से इन तकनीकों पर घरेलू अनुसंधान एवं विकास (R&D) को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए. कोयला खनन में भारी मशीनरी के आयात पर निर्भरता कम करने के हालिया प्रयास महत्वपूर्ण खनिज खनन में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए एक मॉडल बन सकते हैं.
महत्वपूर्ण खनिजों की खोज और खनन के नियम आसान बनाना जरूरी है, लेकिन सिर्फ नियम बदलने से फायदा नहीं होगा. सरकार को कंपनियों और निवेशकों को भी भरोसा देना होगा. आज दुनिया में खनिजों की मांग और प्रतिस्पर्धा तेजी से बढ़ रही है, इसलिए भारत को अपने खनिज खुद खोजने होंगे. एआई, साफ ऊर्जा और नई तकनीकों के लिए इन खनिजों की जरूरत बहुत ज्यादा है. इसलिए भारत को खनन व्यवस्था में बड़े और अच्छे बदलाव करने होंगे.
आद्या चतुर्वेदी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर इकोनॉमी एंड ग्रोथ में रिसर्च असिस्टेंट हैं.
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Aadya Chaturvedi is a Research Assistant with ORF’s Center for Economy and Growth. Her work focuses on Energy and Climate Change, specifically on critical minerals, renewables, ...
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