Published on Aug 21, 2023 Updated 0 Hours ago
जैविक ख़तरों का मुक़ाबला करने के लिए बायोलॉजिकल वेपन्स कन्वेंशन (BWC) के दायरे में साइंटिफिक एक्सपर्ट ग्रुप का गठन ज़रूरी!

टास्क फोर्स 6: SDGs में तेज़ी लाना: 2030 एजेंडा के लिए नए रास्ते तलाशना


सार

पिछले दशक के दौरान जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तकनीक़ी परिदृश्य बहुत तेज़ी के साथ बदला है और विकसित हुआ है. अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों की सुलभता ने सूक्ष्मजीवों, रोग वाहकों और जीवित कोशिकाओं में कुशलता के साथ परिवर्तन करना और उनमें तरह-तरह के प्रयोग करना बेहद सुगम बना दिया है. हालांकि, जैविक ख़तरों को लेकर जो मौज़ूदा मूल्यांकन प्रणालियां हैं, वे ऐसी टेक्नोलॉजियों के संभावित जैव सुरक्षा जोख़िमों का आकलन करने में असमर्थ हैं. कोविड-19 महामारी के दौरान जो कुछ अनुभव मिला है, उसने यह स्पष्ट तौर पर बताया है कि इस तरह का कोई जैविक हथियार किस हद तक आर्थिक तबाही और आम लोगों के स्वास्थ्य को नुक़सान पहुंचाने की क्षमता रखता है. यह पॉलिसी ब्रीफ़ ऑर्गेनाइजेशन फॉर दि प्रोहिबिशन ऑफ केमिकल वेपन्स के साइंटिफिक एडवाइज़री बोर्ड की तरह बायोलॉजिकल वेपन्स कन्वेंशन (BWC) के दायरे में साइंटिफिक एक्सपर्ट ग्रुप (SEG) को संस्थागत बनाए जाने का प्रस्ताव प्रस्तुत करता है. यह साइंटिफिक एक्सपर्ट ग्रुप न केवल नई प्रौद्योगिकियों के संभावित जैव सुरक्षा ख़तरों का आकलन करेगा, प्राकृतिक और मानव निर्मित दोनों तरह के जैविक ख़तरों के उभार और उनके फैलाव की निगरानी करेगा, बल्कि ऐसी सभी परिस्थितियों से निपटने के लिए कारगर उपायों की भी सिफ़ारिश करेगा.

1.चुनौती

कोविड-19 महामारी के दौरान उसकी उत्पत्ति और उसके समाधान को लेकर जो प्रतिक्रिया दी गई, उसमें व्यापक स्तर पर विवाद देखने को मिला था, ज़ाहिर है कि कोरोना महामारी ने वैश्विक जैविक ख़तरे की मौज़ूदा मूल्यांकन प्रणालियों की ख़ामियों को सामने लाने का काम किया. प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय संगठन, जैसे कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और बायोलॉजिकल वेपन्स कन्वेंशन (BWC), ऐसे जैविक ख़तरों से पैदा होने वाले संकट के लिए पर्याप्त रूप से तैयारी करने और उसका मुक़ाबला करने में अपनी तरफ से कोई उचित व्यवस्था करने में नाक़ाम रहे. उल्लेखनीय है कि वर्तमान में WHO और BWC दोनों की ही जो ढांचागत व्यवस्थाएं हैं, वे भविष्य में इस प्रकार की चुनौतियों से निपटने के लिए अपर्याप्त होने साथ ही अक्षम भी हैं.

बायोलॉजिकल वेपन्स कन्वेंशन वर्ष 1975 में स्थापित एक अंतर्राष्ट्रीय संधि है, जिसका उद्देश्य जैविक हथियारों के विकास, उत्पादन और भंडारण पर रोक लगाना है. [1] इतना ही नहीं इस अंतर्राष्ट्रीय समझौते का मकसद युद्ध के दौरान जैविक हथियारों के इस्तेमाल को रोकने के साथ ही यह भी सुनिश्चित करना है कि बायोलॉजिकल रिसर्च का उपयोग केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए ही किया जाए. BWC जैविक हथियारों के ख़तरे को समाप्त कर वैश्विक स्तर पर शांति और सुरक्षा को प्रोत्साहित करना चाहता है, जो कि न सिर्फ व्यापक हानि पहुंचा सकता है, बल्कि संभावित तौर पर विभिन्न क्षेत्रों एवं देशों को अस्थिर भी कर सकता है. यह संधि सदस्य देशों को बायोटेक्नोलॉजी के शांतिपूर्ण उपयोग पर सहयोग करने के लिए एक रूपरेखा प्रदान करती है, साथ ही सैन्य उद्देश्यों के लिए ऐसी प्रौद्योगिकी के दुरुपयोग को रोकने की दिशा में भी काम करती है. BWC निरस्त्रीकरण को प्रोत्साहित करने और सामूहिक विनाश के हथियारों के प्रसार को रोकने में भी सहायता करता है. इसलिए, यह वैश्विक स्तर पर सुरक्षा को बरक़रार रखने के लिए डिज़ाइन किए गए अंतर्राष्ट्रीय लीगल फ्रेमवर्क का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है.

दूसरी ओर, WHO का प्रमुख कार्य अधिक व्यापक है, साथ ही सार्वजनिक-स्वास्थ्य पर ज़्यादा केंद्रित है. WHO, संयुक्त राष्ट्र (UN) की एक विशेष एजेंसी है, जो वैश्विक स्वास्थ्य नीतियों, कार्यक्रमों और प्रतिक्रियाओं को बढ़ावा देने एवं समन्वय करने के लिए उत्तरदायी है. WHO का मकसद अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य मामलों की अगुवाई करना, स्वास्थ्य से संबंधित तमाम तरह की रिसर्च के एजेंडा को निर्धारित करना, उनके मानदंड और मानकों को तय करना, देशों को तकनीक़ी मदद मुहैया करना और स्वास्थ्य से संबंधित गतिविधियों पर नज़र रखना एवं उनका मूल्यांकन करना है.

WHO का जो सारा कामकाज और उत्तरदायित्व है, वो उसके संविधान पर आधारित है, जिसे वर्ष 1948 में अपनाया गया था. WHO का प्राथमिक उद्देश्य स्वास्थ्य को बढ़ावा देना, बीमारी की रोक-थाम करना और हेल्थ सेक्टर में विभिन्न असमानताओं को दूर करना है. इसके साथ ही WHO पर महामारी और संक्रामक रोगों के प्रकोप जैसी वैश्विक आपात स्वास्थ्य स्थितियों को संभालने और उन पर प्रतिक्रिया देने की भी ज़िम्मेदारी है. इस प्रकार से वैश्विक स्वास्थ्य गवर्नेंस में WHO की भूमिका आज दुनिया के सामने आने वाली पेचीदा और परस्पर जुड़ी हुईं स्वास्थ्य चुनौतियों का समाधान तलाशने में बेहद महत्त्वपूर्ण हो चुकी है.

हालांकि, इन संगठनों की जो भी व्यवस्था एवं आधिकारिक कामकाज है, उसमें रिसर्च से जुड़े कुछ ग्रे एरिया यानी संदेहास्पद क्षेत्रों या फिर कहा जाए कि संदेहास्पद स्थिति, जिसमें यह निर्णय करना कठिन हो कि क्या सही है और क्या गलत है, पर ध्यान नहीं दिया जाता है. ख़ास तौर पर जैव प्रौद्योगिकी का विषय, जिसका कि अच्छी और ग़लत दोनों मंशा के साथ उपयोग किया जा सकता है. यह BWC के मामले में विशेष रूप से एक सच्चाई है, जिसका काम सामने आने वाले जैविक ख़तरों पर नज़र रखना और जैव प्रौद्योगिकी के शांतिपूर्ण उपयोग पर पारस्परिक सहयोग को प्रोत्साहित करना है. हालांकि, BWC इन ख़तरों की जांच-परख के लिए उल्लेखनीय रूप से निवारक या रोकने वाले क़दम उठाने में नाक़ाम रहा है. कई और भी ऐसे प्रमुख मुद्दे हैं, जो BWC के अपने मकसद को हासिल करने के सामर्थ्य को कम करने का कार्य करते हैं, इन्हीं सारी वजहों से BWC में तत्काल प्रभाव से, या कहा जाए कि बगैर समय गंवाए सुधार किए जाने की ज़रूरत है.

सबसे पहला विषय तो यह है कि बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में हुई तेज़ प्रगति ने जैविक हथियारों का विकास और उत्पादन करना आसान एवं सस्ता बना दिया है. CRISPR-Cas9 जैसी जीन में परिवर्तन करने की तकनीक़ों ने इस क्षेत्र में क्रांति लाने का काम किया है. इसके साथ ही इन तकनीक़ों ने कम ख़र्च में और शीघ्रता के साथ विकसित जैविक अनुसंधान को आसान बना दिया है. [2] हाल के वर्षों में ऐसी एक महत्त्वपूर्ण रिसर्च गेन-ऑफ-फंक्शन (GoF) रिसर्च है, [3] जो ऐसे प्रयोगों को संदर्भित करती है, जिसमें किसी प्राणी या जीव की क्षमताओं को बढ़ाने या फिर नए फंक्शन्स विकसित करने के लिए उसके आनुवंशिक या जैव रासायनिक मेकअप में जानबूझकर बदलाव करना शामिल है. इस तरह की रिसर्च माइक्रोबायोलॉजी, वायरोलॉजी और जेनेटिक्स समेत विभिन्न क्षेत्रों में की जाती है. जहां तक वायरोलॉजी की बात है, तो गेन-ऑफ-फंक्शन अनुसंधान में मनुष्यों या जानवरों को संक्रमित करने के लिए वायरस की क्षमता में वृद्धि करने या संक्रामकता या रोगजनकता को बढ़ाने के लिए वायरस के जीन में बदलाव करना शामिल है. हालांकि, इस रिसर्च का मकसद उन प्रक्रियाओं को बेहतर तरीक़े से समझना है, जिनके द्वारा वायरस विकसित होते हैं और फैलते हैं. साथ ही इस शोध का उद्देश्य वायरस के संक्रमण का मुक़ाबला करने के लिए उपचार के नए तरीक़े या फिर प्रभावी वैक्सीन विकसित करना है. गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च भी उल्लेखनीय रूप से ख़तरे पैदा कर सकती है, [4] क्योंकि यह नए या फिर और अधिक ख़तरनाक पैथोजन्स यानी बीमारी फैलाने वाले वायरसों का सृजन कर सकती है, जो कि दुर्घटनावश पर्यावरण में छोड़े जा सकते हैं या बायो-टैररिज़्म यानी जैव-आतंकवाद के लिए भी उनका उपयोग किया जा सकता है. [5]

अन्य प्रौद्योगिकियों जैसे कि हाई-थ्रोपुट जीन सिक्वेंसिंग, आर्टिफिशियल जीन सिंथेसिस, सिंथेटिक बायोलॉजी में विकास, ये सब इसमें योगदान देने का काम करते हैं. इन तकनीक़ी विकासों के मद्देनज़र BWC को अपडेट करने की ज़रूरत है, साथ ही यह भी सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि समझौता जैविक हथियारों के निर्माण और उपयोग को रोकने में प्रभावी बना रहे.

दूसरा मुद्दा यह है कि कोविड-19 महामारी ने पूरी दुनिया के समक्ष इस तथ्य को उजागर करने का काम किया है कि उभरती संक्रामक बीमारियों (emerging infectious diseases) की वजह से किस प्रकार बड़े पैमाने पर शारीरिक, मानसिक और आर्थिक नुक़सान की संभावना हो सकती है. उभरती संक्रामक बीमारियों से पैदा होने वाले ख़तरों से निपटने के लिए BWC में व्यापक स्तर पर सुधार किए जाने की आवश्यकता है. इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किए जाने की ज़रूरत है कि वैश्विक समुदाय इस तरह की बीमारियों के प्रकोप का सामना करने के लिए बेहतर ढंग से तैयार हो. इसमें कुछ विशेष प्रकार के अनुंसंधानों की निगरानी किए जाने की काबिलियत हासिल करना शामिल है, जैसे कि अत्यधिक संक्रामक सूक्ष्मजीवों (उदाहरण के लिए, सांस संबंधी बीमारियों के वायरस) या समाप्त किए जा चुके माइक्रोब्स, अर्थात सूक्ष्मजीवों (उदाहरण के लिए, स्मालपॉक्स) के जीनोम को कृत्रिम रूप से निर्मित करना और परिवर्तित करना, साथ ही गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च का संचालन करना.

तीसरा विषय यह है कि BWC के पास कारगर वेरिफिकेशन यानी सत्यापन उपायों की कमी है, जिससे बायोलॉजिकल वेपन्स कन्वेंशन के प्रावधानों के उल्लंघन के बारे में पता लगाना मुश्किल हो जाता है. ज़ाहिर है कि सत्यापन के उपायों का अभाव होने से BWC की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ता है, [6]  साथ ही इससे विभिन्न देशों के लिए गुपचुप तरीक़े से जैविक हथियार विकसित करना या नई-नई प्रौद्योगिकियों पर अनुसंधान करना बेहद आसान हो जाता है. उल्लेखनीय है कि इसका सीधा असर इस बात पर पड़ सकता है कि जैविक हथियार कितनी आसानी से विकसित किए जाते हैं. चूंकि वेरिफिकेशन प्रक्रिया मौज़ूद नहीं है, ऐसे में ज़रूरत है कि BWC द्वारा ज़्यादा सख़्त तरीक़े से रोकथाम कार्रवाई को अमल में लाया जाए.

चौथा मुद्दा यह है कि जैविक हथियारों का ये ख़तरा सिर्फ़ देशों तक ही सीमित नहीं है, आतंकवादी समूह जैसे हिंसक संगठन भी व्यापक स्तर पर नुक़सान पहुंचाने के लिए जैविक हथियारों का उपयोग कर सकते हैं. जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि जैव प्रौद्योगिकी में तरक़्क़ी के साथ, गैर-सरकारी किरदारों, यानी गैर-सरकारी संगठनों या कंपनियों के लिए भी प्रोयगशाला में जैविक हथियार विकसित करना बेहद आसान हो गया है. ऐसे में आवश्यकता है कि BWC ऐसे संगठनों और कंपनियों द्वारा पैदा होने वाले ख़तरों को समझने के लिए खुद को अपडेट करे.

जीन ड्राइव्स, CRISPR-Cas9, आर्टिफिशियल जीन सिंथेसिस और गेन-ऑफ-फंक्शन जैसी उभरती टेक्नोलॉजियों की भूमिका सुनिश्चित करने के लिए बायो सिक्योरिटी एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच पारस्परिक संबंधों की जांच-पड़ताल के ज़रिए BWC और WHO दोनों के ही द्वारा प्रभावी रूप से दख़ल दिए जाने की ज़रूरत है.

ज़ाहिर है कि ऐसी परिस्थियों में साइंटिफिक एक्सपर्ट ग्रुप (SEG) एक समाधान है, क्योंकि एक वैज्ञानिक विशेषज्ञ समूह को संस्थागत बनाने के बाद ही BWC की कई ख़ामियों को दूर किया जा सकता है. इस एक्सपर्ट ग्रुप को ऑर्गेनाइजेशन फॉर दि प्रोहिबिशन ऑफ केमिकल वेपन्स, अर्थात रासायनिक हथियार निषेध संगठन (OPCW) के साइंटिफिक एडवाइज़री बोर्ड (SAB) की तर्ज़ पर तैयार किया जा सकता है. उल्लेखनीय है कि SAB स्वतंत्र विशेषज्ञों का एक समूह है, जो कि OPCW को वैज्ञानिक एवं तकनीक़ी सलाह देता है. [7] इसमें 25 सदस्य शामिल हैं, जो कि केमिस्ट्री, बायोलॉजी, फिजिक्स और ऐसे ही विभिन्न संबंधित क्षेत्रों के विशेषज्ञ हैं. [8] समूह में शामिल विशेषज्ञों की प्रमुख ज़िम्मेदारियों में केमिकल वेपन्स कन्वेंशन (CWC) से संबंधित वैज्ञानिक और तकनीक़ी मुद्दों की समीक्षा करना शामिल है, साथ ही OPCW की विभिन्न गतिविधियों की सुरक्षा को लेकर सुझाव देना और OPCW एवं वैज्ञानिक समुदाय के बीच सहयोग को बढ़ावा देना शामिल है. SAB रासायनिक हथियारों के कथित उपयोग की जांच-पड़ताल करने और रासायनिक हथियारों के भंडार की समाप्ति को सुनिश्चित करने में भी अहम भूमिका निभाता है. [9]

देखा जाए तो CWC के विपरीत, BWC में एक स्थाई साइंटिफिक बोर्ड का अभाव है, जो माइक्रोबायोलॉजी, वायरोलॉजी, पैथोलॉजी, मॉलिक्युलर जेनेटिक्स और जेनेटिक इंजीनियरिंग समेत अन्य क्षेत्रों में होने वाले ताज़ातरीन विकास और तरक़्क़ी पर नज़र रख सके. प्रस्तावित साइंटिफिक एक्सपर्ट ग्रुप इस कमी को पूरा करने में सहायता कर सकता है. इतना ही नहीं, ये SEG न केवल इन प्रौद्योगिकियों के उपयोग के लिए ऑपरेशनल मापदंडों की सिफ़ारिश कर सकता है, बल्कि इन उभरती प्रौद्योगिकियों से जुड़ी विभिन्न घटनाओं और ख़तरों को लेकर समय-समय पर रिपोर्ट भी प्रकाशित कर सकता है. ज़ाहिर है कि इस सभी मुद्दों को सुलझाने के लिए BWC के अंतर्गत एक स्थाई और स्वतंत्र वैज्ञानिक बोर्ड की स्थापना करना बेहद महत्त्वपूर्ण है.

  1. G20 की भूमिका

 

G20 समूह विश्व सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का एक मंच है, जिसकी वैश्विक जीडीपी में हिस्सेदारी लगभग 80 प्रतिशत हैं और इसके सदस्य देशों में दुनिया की 60 प्रतिशत आबादी निवास करती है. [10] G20 जलवायु परिवर्तन, वैश्विक स्वास्थ्य संकट एवं सुरक्षा ख़तरों जैसी साझा चुनौतियों और अवसरों का समाधान करने के लिए दुनिया की चोटी की अर्थव्यवस्थाओं को एक मंच प्रदान करके वैश्विक शक्ति संतुलन में अहम भूमिका अदा करता है. G20 के सदस्य देश मिलजुलकर कार्य करके उन पेचीदा वैश्विक समस्याओं का समाधान तलाशने के लिए अपने सामूहिक संसाधनों और विशेषज्ञता का फायदा उठा सकते हैं, जिन्हें कोई भी एक देश अकेले अपने दम पर संबोधित नहीं कर सकता है. इतना ही नहीं G20 समूह वैश्विक स्तर पर एजेंडा एवं विभिन्न मानकों को निर्धारित करने के लिए एक अहम फोरम बन चुका है. ऐसे में G20 समूह अपने आधिकारिक वक्तव्यों एवं घोषणाओं के माध्यम से जहां दूसरे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों और मंचों की नीतियों व प्राथमिकताओं को प्रभावित कर सकता है, वहीं अन्य देशों एवं हितधारकों की अपेक्षाओं को पूरा करने का भी काम कर सकता है.

ऐसे में निसंदेह रूप से G20 के लिए सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को हासिल करने की अपनी प्रतिबद्धता के हिस्से के रूप में BWC के सशक्तीकरण पर ध्यान केंद्रित करना बेहद ज़रूरी हो गया है. ज़ाहिर है कि एक प्रभावशाली बायोलॉजिकल वेपन्स कन्वेंशन निम्नलिखित अलग-अलग सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए बहुत अहम सिद्ध होगा:

  • लक्ष्य 1.5: “वर्ष 2030 तक ग़रीबों, वंचितों एवं कमज़ोर या विपरीत हालातों में रहने वालों के लिए लचीले माहौल का निर्माण करना और स्वास्थ्य सुरक्षा प्रणालियों को सशक्त करके जलवायु से संबंधित चरम मौसमी घटनाओं एवं अन्य आर्थिक, सामाजिक व पर्यावरणीय परिस्थितियों और आपदाओं [11] के प्रति उनके जोख़िम एवं उनकी संवेदनशीलता को कम करना.”
  • लक्ष्य 2.4: खाद्यान्न फसलों और खाद्य प्रसंस्करण सुविधाओं समेत कृषि आपूर्ति श्रृंखलाओं की बायो-टैररिज़्म अर्थात जैव-आतंकवाद से हिफ़ाजत कर “वर्ष 2030 तक टिकाऊ खाद्य उत्पादन प्रणाली सुनिश्चित करना और लचीली कृषि प्रथाओं को लागू करना, जो उत्पादकता एवं उत्पादन में बढ़ोतरी और इकोसिस्टम को बरक़रार रखने में सहायता करने वाली हों. इसके साथ ही ऐसी कृषि प्रथाओं को कार्यान्वित करना, जो क्लाइमेट चेंज, चरम मौसमी घटनाओं, सूखा, बाढ़ और अन्य आपदाओं के अनुकूलन की क्षमता को मज़बूत करने वाली हों और जो प्रगतिशील तरीक़े से भूमि एवं मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार करें.”[12]
  • लक्ष्य 3. डी: जैव सुरक्षा जोख़िमों का आकलन करने और उभरते ख़तरों को लेकर जानकारी साझा करने के लिए एक समान फ्रेमवर्क प्रदान करके “सभी देशों, विशेष रूप से विकासशील देशों की प्रारंभिक चेतावनी, ख़तरे में कमी और राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्वास्थ्य जोख़िमों के प्रबंधन के लिए क्षमता को सशक्त करना.”
  • लक्ष्य 16: एक समावेशी बोर्ड बनाने के लिए दुनिया भर से वैज्ञानिकों को शामिल करके “टिकाऊ विकास के लिए शांतिपूर्ण एवं समावेशी सोसाइटियों को प्रोत्साहन देना, सभी के लिए न्याय तक पहुंच उपलब्ध कराना और हर स्तर पर प्रभावशाली, जवाबदेह एवं समावेशी संस्थानों का निर्माण करना.”[13]
  • लक्ष्य 16.8: देशों को बोर्ड के स्तर पर अपनी चिंताओं और समस्याओं को पुरज़ोर तरीक़े से उठाने का अवसर प्रदान करके “वैश्विक गवर्नेंस से संबंधित संस्थानों में विकासशील देशों की भागीदारी को व्यापक बनाना और मज़बूती प्रदान करना.” [14]
  • लक्ष्य 17.6: जानकारी साझा करने के लिए एक मंच स्थापित करके “विज्ञान, तकनीक़ और इनोवेशन्स पर नॉर्थ-साउथ, साउथ-साउथ एवं और त्रिकोणीय क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना. साथ ही पारस्परिक रूप से सहमत शर्तों पर जानकारी साझा करना, जिसमें वर्तमान तंत्रों के बीच बेहतर समन्वय, ख़ास तौर पर अमेरिका के स्तर पर और एक वैश्विक प्रौद्योगिकी सुविधा तंत्र के ज़रिए समन्वय स्थापित करना शामिल है.”[15]

व्यापक नज़रिए से देखा जाए, तो सभी सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जैव सुरक्षा को बरक़रार रखना और उसे सशक्त करना बेहद अहम होगा. कोविड-19 महामारी के दौरान वैश्विक स्तर पर जो अनुभव हुआ है, उससे स्पष्ट होता है कि एक महामारी SDGs की प्रगति को रोकने एवं विकास की रफ़्तार को उलटने का सामर्थ्य रखती है, विशेष रूप से ग़रीबी उन्मूलन, स्वास्थ्य एवं वैक्सीनेशन और शिक्षा से जुड़े लक्ष्यों की प्रगति को बाधित करने की क्षमता रखती है. इस विश्लेषण से साफ हो जाता है कि BWC का सशक्तिकरण न केवल नई प्रौद्योगिकियों के दुरुपयोग को रोकने के लिए, बल्कि सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिहाज़ से भी काफ़ी अहम साबित होगा.

  1. G20 के लिए सिफ़ारिशें

बायोलॉजिकल वेपन्स कन्वेंशन का जो वर्तमान स्वरूप है, उसमें साइंटिफिक एक्सपर्ट ग्रुप (SEG) की स्थापना का कोई प्रावधान नहीं है. हालांकि, इसमें कोई शक नहीं है कि जैविक ख़तरों पर नज़र रखने और उनका मुक़ाबला करने के लिए BWC के अंतर्गत एक तंत्र को संस्थागत बनाना बेहद ज़रूरी है.

इस पॉलिसी ब्रीफ़ में जिस SEG को प्रस्तावित किया गया है, उसमें कन्वेंशन पर हस्ताक्षर करने वाले देशों के वैज्ञानिकों एवं चिकित्सकों के साथ-साथ WHO और ग्लोबल हेल्थ सिक्योरिटी एजेंडा (GHSA) के प्रतिनिधि भी शामिल होने चाहिए. इस एक्सपर्ट ग्रुप के जो भी सदस्य होंगे, वे विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ हो सकते हैं, जिनमें जैव सुरक्षा, माइक्रोबायोलॉजी, वायरोलॉजी, पैथोलॉजी, मॉलिक्युलर जेनेटिक्स, जेनेटिक इंजीनियरिंग, पब्लिक हेल्थ, एपिडेमियोलॉजी शामिल हैं. लेकिन इसके सदस्य केवल इन्हीं क्षेत्रों तक सीमित नहीं रह सकते हैं, बल्कि इनके अलावा दूसरे क्षेत्रों के एक्सपर्ट्स को भी इस ग्रुप में शामिल किया जा सकता है. इसके अलावा, SEG को कन्वेंशन में साइन करने वाले और इससे दूर रहने वाले देशों में किसी जैविक प्रकोप की घटनाओं या वायरस के लीकेज होने की घटनाओं की जांच-पड़ताल के लिए अन्य सरकारी या फिर गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित करने की भी आज़ादी होनी चाहिए.

इतना ही नहीं इस साइंटिफिक एक्सपर्ट ग्रुप में वर्ल्ड ऑर्गेनाइजेशन फॉर एनिमल हेल्थ और फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन जैसे संगठनों के विशेषज्ञों का स्थायी प्रतिनिधित्व होना भी बहुत अहम है. ऐसा इसलिए है क्योंकि मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और कृषि जैव सुरक्षा के लिहाज़ से बेहद संवेदनशील हैं. इन तीनों में से कोई भी क्षेत्र संभावित जैव सुरक्षा ख़तरे की शुरुआत का प्रमुख बिंदु हो सकता है. ऐसे में ज़ाहिर है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए ‘वन हेल्थ’ [16] की परिकल्पना को जैव सुरक्षा ख़तरों तक भी बढ़ाया जाना चाहिए. वन हेल्थ सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक उभरता हुआ दृष्टिकोण है, जो मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य के पारस्परिक रिश्ते को बखूबी पहचानता है. [17] वन हेल्थ का नज़रिया यह स्वीकार करता है कि मनुष्यों, जानवरों और पर्यावरण का स्वास्थ्य नज़दीकी से जुड़ा हुआ है. साथ ही यह भी स्वीकार करता है कि सभी के स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने एवं सुरक्षित करने के लिए तीनों डोमेन को ध्यान में रखकर ही कोई दख़ल दिया जाना बेहद आवश्यक है.

साइंटिफिक एक्सपर्ट ग्रुप अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए कई प्रकार के उत्तरदायित्वों का निर्वहन करेगा: [18]

  1. उभरती टेक्नोलॉजियों से संबंधित किसी भी घटना और ख़तरे को लेकर समय-समय पर रिपोर्ट का प्रकाशन.
  1. मानव एवं पर्यावरणीय स्वास्थ्य के लिए संभावित ख़तरों की एवं संवेदनशील टेक्नोलॉजी एप्लिकेशन्स और एजेंटों की उनके बदलाव करने के सामर्थ्य एवं इस्तेमाल करने में सुगमता के आधार पर एक सूची बनाना और उसे अपडेट करना. उदाहरण के तौर पर जीन एडिटिंग टेक्नोलॉजी, सोमैटिक जीन एडिटिंग एवं जीन-ड्राइव स्टडीज़, दोनों में अंतर्निहित तकनीक़ है. हालांकि, जीन ड्राइव का ग़लत इरादों से किया गया उपयोग, सोमैटिक जीन एडिटिंग के दुर्भावनापूर्ण इस्तेमाल की अपेक्षा बहुत ज़्याद नुक़सान पहुंचा सकता है. इस प्रकार से प्रौद्योगिकियों को प्राथमिकता देने से ऐसी तकनीक़ों को परिस्थितियों के मुताबिक़ नियंत्रित करने के लिए नियम-क़ानून बनाने में मदद मिलेगी. इस सूची को नियमित तौर पर अपडेट किया जाएगा और साइंटिफिक एक्सपर्ट ग्रुप तालमेल को बढ़ावा देने एवं काम के दोहराए जाने की संभावना को कम करने के लिए ऑस्ट्रेलिया ग्रुप और वासेनार व्यवस्था (Wassenaar Arrangement) जैसे बहुपक्षीय निर्यात नियंत्रण संगठनों के साथ सहयोग कर सकता है.
  1. SEG इस प्रकार की टेक्नोलॉजियों एवं एजेंटों का इस्तेमाल करने वाली प्रयोगशालाओं के लिए एक न्यूनतम साझा मापदंड और ट्रेनिंग प्रोग्राम कार्यक्रम तैयार करेगा. इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में नैतिकता, मैटेरियल मैनेजमेंट की प्रथाओं, व्यक्तिगत सुरक्षा प्रथाओं और सुरक्षित निस्तारण प्रथाओं से संबंधित पाठ्यक्रम शामिल किए जा सकते हैं. इसके साथ ही इन मापदंडों का अनुपालन सुनिश्चित करने के साथ-साथ अनुपालन नहीं किए जाने की रिपोर्टिंग की ज़िम्मेदारी रिसर्च करने वाले संस्थान की होगी. हाल ही में अमेरिका [19] और रूस की [20] जैविक एजेंटों से लैस जगहों पर हुईं सेफ्टी से जुड़ी घटनाओं ने दुर्घटनावश पैदा होने वाली किसी विपरीत परिस्थिति में नुक़सान को कम करने के लिए मौज़ूदा उपायों की नक़ामी को उजागर किया है. यह ध्यान रखना भी बेहद अहम है कि SARS-CoV-2 वायरस के लैब से लीकेज होने की थ्योरी में भी यह कहा गया था कि इस पैथोजन पर रिसर्च सुरक्षा के लिहाज़ से अपर्याप्त प्रयोगशाला में की जा रही थी और इसी वजह से यह जानलेवा वायरस वहां से लीक हो गया और पूरी दुनिया में कोहराम मचा दिया.

विश्व स्वास्थ्य संगठन एक वैश्विक महामारी समझौते पर भी बातचीत करने की प्रक्रिया में है, जिसमें विभिन्न प्रकार के प्रावधान शामिल हैं. ये प्रावधान महामारी के ख़तरे को कम करने के लिए समन्वय और सहयोग का आह्वान करते हैं. [21] इस लिहाज़ से देखा जाए, तो WHO और BWC के तहत प्रस्तावित SEG के बीच उल्लेखनीय रूप से सहयोग की संभावना है.

  1. निष्कर्ष

बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में होने वाली तरक़्क़ी और इस वजह से इस तक आसान पहुंच कहीं न कहीं जैव हथियारों के अधिक लक्ष्य केंद्रित और असरकारक उपयोग की सुगम बनाती है. सामूहिक हमलों की विनाशकारी पारंपरिक समझ के चलते जैविक हथियारों का उपयोग नरसंहार, गृह युद्धों और दूसरे संगठनों द्वारा बड़े पैमाने पर जानलेवा हमलों के साथ-साथ विभिन्न जातीय समूहों को नुक़सान पहुंचाने के लिए लक्ष्य बनाने जैसी घातक गतिविधियों में किया जा सकता है. मौज़ूदा परिदृश्य में BWC इस तरह के ख़तरों का मुक़ाबला करने और ऐसे परिस्थितियों से निपटने के लिए पर्याप्त संसाधनों से लैस नहीं है. ऐसे में जैव सुरक्षा के लिए और इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए एक मज़बूत नियामक एवं निगरानी तंत्र आज के दौर की सबसे बड़ी मांग है. इसमें कोई दोराय नहीं है कि साइंटिफिक एक्सपर्ट ग्रुप उभरती प्रौद्योगिकियों से पैदा होने वाले संभावित ख़तरों का मूल्यांकन करने, दूसरे बहुपक्षीय संगठनों के साथ समन्वय व सहयोग करने और समुचित जवाबी उपायों को लेकर सुझाव देने के लिए एक उचित एवं कारगर तंत्र उपलब्ध करा सकता है.


एट्रिब्यूशन: सौरभ तोडी एवं शाम्भवी नाइक, “जैविक ख़तरों का मुक़ाबला करने के लिए बायोलॉजिकल वेपन्स कन्वेंशन (BWC) के दायरे में साइंटिफिक एक्सपर्ट ग्रुप (SEG) का गठन आवश्यक!,” T20 पॉलिसी ब्रीफ़, जून 2023.


Endnotes-

[1]Biological Weapons Convention,” United Nations, accessed April 3, 2023.

[2] John Van der Oost and Constantinos Patinios. “The Genome Editing Revolution,” Trends in Biotechnology 41, no. 3 (2023): 396-409.

[3] National Research Council. Potential Risks and Benefits of Gain-of-Function Research: Summary of a Workshop (National Academies Press, 2015).

[4] Michael J. Imperiale and Arturo Casadevall, “Rethinking Gain-of-Function Experiments in the Context of the COVID-19 Pandemic,” Mbio 11, no. 4 (2020): e01868-20.

[5] Michael J. Selgelid, “Gain-of-Function Research: Ethical Analysis,” Science and Engineering Ethics 22 (2016): 923-64.

[6] J. Revill, J. Borrie, and R. Lennane, “Back to the Future for Verification in the Biological Disarmament Regime?,” UNIDIR, 2022.

[7] OPCW, “Scientific Advisory Board,” March 28, 2022.

[8] OPCW, “Scientific Advisory Board”

[9] OPCW, “Scientific Advisory Board”

[10] James McBride, Anshu Siripurapu, and Noah Berman, “What does G20 Do?,” Council of Foreign Relations, last modified December 15, 2022.

[11] General Assembly Resolution 71/313, “Work of the Statistical Commission Pertaining to the 2030 Agenda for Sustainable Development,” A/RES/71/313, July 10, 2017.

[12] General Assembly Resolution 71/313, “Work of the Statistical Commission Pertaining to the 2030 Agenda for Sustainable Development”

[13] General Assembly Resolution 71/313, “Work of the Statistical Commission Pertaining to the 2030 Agenda for Sustainable Development”

[14] General Assembly Resolution 71/313, “Work of the Statistical Commission Pertaining to the 2030 Agenda for Sustainable Development”

[15] General Assembly Resolution 71/313, “Work of the Statistical Commission Pertaining to the 2030 Agenda for Sustainable Development”

[16] John S. Mackenzie and Martyn Jeggo, “The One Health Approach—Why is it So Important?,” Tropical Medicine and Infectious Disease 4, no. 2 (2019): 88.

[17] Wiku B. Adisasmito et al., “One Health: A New Definition for a Sustainable and Healthy Future,” PLoS Pathogens 18, no. 6 (2022): e1010537.

[18] Shambhavi Naik and Aditya Ramanathan, “The New Bioweapons Peril: A Case to Revisit the Biological Weapons Convention,” Indian Public Policy Review 3, no. 1 (Jan-Feb) (January 14, 2022): 59–76.

[19] Alison Young and Nick Penzenstadler, “Inside America’s Secretive Biolabs,” USA Today, accessed April 3, 2023.

[20] Matt Field, “What Happened after an Explosion at a Russian Disease Research Lab Called VECTOR?,” Bulletin of the Atomic Scientists, November 27, 2019.

[21] World Health Organisation, “Countries Begin Negotiations on Global Agreement to Protect World from Future Pandemic Emergencies,” accessed May 31, 2023.

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