जहाज़ निर्माण के लिए भारत को अपने पूर्व की ओर देखना होगा भारत का जहाज़ निर्माण का सपना ‘पूर्व की ओर देखो’ नीति टिका है. दक्षिण कोरिया और जापान के साथ साझेदारी हमारी समुद्री सुरक्षा और आर्थिक शक्ति का आधार बन सकती है.
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महाशक्तियों के बीच टकराव और कुछ प्रमुख रणनीतिक उद्योगों से जुड़े उत्पादन के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला तेज़ी से बदल रही है. ये बदलाव भारत जैसे देश के लिए गंभीर चिंता की बात हैं, क्योंकि हम अपने उत्पादों के लिए अब भी दूसरे देशों पर निर्भर हैं. जहाज़ निर्माण इन्हीं प्रमुख उद्योगों में से एक है, जिसमें अपार संभावनाएं मौजूद हैं और जिसका भारत की समुद्री, ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा पर महत्वपूर्ण प्रभाव है. इसके रणनीतिक महत्व को देखते हुए ही, भारत घरेलू औद्योगिक क्लस्टर विकसित करने के लिए ख़ासा प्रयास कर रहा है. घरेलू कोशिशों को आगे बढ़ाते हुए नई दिल्ली प्रमुख दक्षिण कोरियाई और जापानी कंपनियों के साथ भी रणनीतिक साझेदारी बनाने में जुटी है. इस लेख में भारत की जहाज़ निर्माण की आकांक्षाओं और पूर्वोत्तर एशिया में इसके विस्तार का ख़ाका खींचा गया है.
समग्र जहाज़ निर्माण क्षेत्र विकसित करने का प्रयास भारत ने साल 2016 में शुरू कर दिया था. इसे 2025 की सालाना बजट घोषणाओं में उल्लेखनीय रूप से गति दी गई है. बजट में 25,000 करोड़ रुपये के समुद्री विकास कोष (MDF) और मेगा शिपिंगबिल्डिंग क्लस्टर निर्माण और जहाज़ निर्माण वित्तीय सहायता नीति (SBFAP) 2.0 के लिए कई आर्थिक प्रावधान किए गए हैं. ये घोषणाएं समुद्री भारत विजन 2030 और अमृत काल समुद्री विजन 2047 के अनुरूप हैं, क्योंकि ये दोनों ऐसे महत्वपूर्ण नीतिगत दस्तावेज़ हैं, जो जहाज़ निर्माण क्षेत्र में भारत द्वारा हासिल किए जाने वाले रणनीतिक उद्देश्यों का महत्व बताते हैं. इन विजन के अनुसार, भारत का इरादा साल 2030 और 2047 तक क्रमशः शीर्ष के 10 और शीर्ष के 5 देशों में शामिल होने का है. इतना ही नहीं, हम अपने स्वदेशी घरेलू बेड़े को साल 2030 तक 5 से 7 प्रतिशत और 2047 तक 69 प्रतिशत बढ़ाना चाहते हैं. भारत 2030 तक दो मेगा जहाज़ निर्माण पार्क भी बनाने को इच्छुक है. कुल मिलाकर कहें, तो केंद्र सरकार की इन आर्थिक और गैर-वित्तीय नीतियों के कारण जहाज़ निर्माण और इससे जुड़े क्षेत्रों में विदेशी निवेशकों के लिए माहौल बेहतर बना है.
इस लेख में भारत की जहाज़ निर्माण की आकांक्षाओं और पूर्वोत्तर एशिया में इसके विस्तार का ख़ाका खींचा गया है.
केंद्र सरकार जहां ज़्यादातर बड़े काम करती है, वहीं तटवर्ती राज्य भी अपनी सीमित क्षमताओं और संसाधनों के साथ इनमें अपना योगदान देते हैं. ये राज्य भारत के आगामी आठ प्रमुख जहाज़ निर्माण क्लस्टरों से लाभ उठाना चाहते हैं, जिनको केंद्र के 75,000 करोड़ रुपये के बजट का लाभ मिलेगा. इन आठ में से पांच ग्रीनफील्ड होंगे, जबकि शेष तीन (वाडिनार, कांडला और कोच्चि बंदरगाह) में उपलब्ध सुविधाओं का विस्तार किया जाएगा. जहाज़ निर्माण क्लस्टर पश्चिमी और पूर्वी तटवर्ती राज्यों, जैसे- महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, गुजरात, ओडिशा और केरल में स्थापित किए जाएंगे. यहां मुख्य रूप से जहाज़ निर्माण और उसकी मरम्मत पर ही काम होगा.
निवेश के लिए एक-दूसरे से होड़ ले रहे पांच राज्यों में से कुछ ने अपने कारोबार को खुद स्थापित करने में कहीं ज़्यादा रुचि दिखाई है और विदेशी निवेशकों को और अधिक लुभाने के लिए उन्होंने अतिरिक्त प्रोत्साहनों व नीतियों का एलान किया है (देखें तालिका- 1). जैसे, महाराष्ट्र का लक्ष्य मरम्मत, पुनर्चक्रण और जहाज़ निर्माण के मद्देनजर सुविधाएं विकसित करने का है. अनुमान है कि इन सुविधाओं के माध्यम से महाराष्ट्र समुद्री बोर्ड (MMB) साल 2030 तक 40,000 नए रोज़गार पैदा कर सकेगा. वह इससे 6,600 करोड़ रुपये निवेश भी जुटाना चाहता है. इसी तरह, आंध्र प्रदेश ने भी एक लॉजिस्टिक निगम की स्थापना की है और केंद्र सरकार के साथ तालमेल बिठाते हुए राज्य की समुद्री नीति में बदलाव किया है.
तालिका 1 : भारत में जहाज़ निर्माण क्लस्टर बनाने की कार्ययोजना
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भारतीय राज्य |
जहाज़ निर्माण क्लस्टर (अपेक्षित) |
पहल |
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विजयदुर्ग (सिंधुदुर्ग) में 1,371 एकड़ ज़मीन पर, नांदगांव (पालघर) में 2,666 एकड़ ज़मीन पर और दिघी (रायगढ़) में 2,550 एकड़ ज़मीन पर निर्माण की योजना है. इनको पहले चरण के लिए तय किया गया है. |
जहाज़ निर्माण, जहाज़ मरम्मत और जहाज़ पुनर्चक्रण नीति 2025 लागू की गई (इसमें 15 प्रतिशत कैपिटल सब्सिडी, शोध और विकास के लिए 25 करोड़ रुपये, कौशल विकास के लिए एक करोड़ रुपये, जटिलता कम करने के लिए सुव्यवस्थित प्रयास और 30 वर्षों के लिए नवीकरणीय भूमि पट्टे के प्रावधान किए गए हैं) |
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दुगराजपत्तनम में 2,000 एकड़ ज़मीन पर क्लस्टर-निर्माण, जिसमें जहाज़ निर्माण सुविधा के लिए 1,000 एकड़ और बाकी ज़मीन डाउनस्ट्रीम उद्योगों के लिए, मछलीपट्टनम (500 एकड़) और भवनपाडु (300 एकड़) भी अन्य संभावित स्थान हैं. |
आंध्र प्रदेश समुद्री नीति 2024 समग्र दृष्टिकोण पर ज़ोर देती है, जिसमें शिपयार्ड और क्लस्टर विकास पर ख़ासा ध्यान दिया गया है. विशेष उद्देश्य वाले जहाज़ों का निर्माण इस क्षेत्र में निवेश को आकर्षित करता है. |
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चेरथला (अलाप्पुझा जिला) में 15 एकड़ ज़मीन |
परीक्षण सुविधा केंद्र स्थापित करने पर विचार, इंजीनियरों और फाइनेंसरों के कौशल विकास के लिए कम अवधि वाले पाठ्यक्रम |
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पारादीप बंदरगाह के पास एक जहाज़ रीसाइक्लिंग हब बनाने के लिए स्थान की तलाश |
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हाज़िरा, कच्छ, अमरेली और भावनगर में शिपबिल्डिंग यार्ड बनने की उम्मीद |
गुजरात समुद्री नीति के अनुमोदन का इंतज़ार, जिसमें ब्याज सब्सिडी, कर छूट, वेब लैंड लीज, आंतरिक डिजाइन के बढ़ावा और शोध व विकास पर ध्यान देने की बात है. |
स्रोत- लेखक द्वारा संकलित
कई राज्यों द्वारा शुरू की गई इन नीतियों का मक़सद जहाज़ निर्माण से जुड़े बुनियादी ढांचे को बनाने की दिशा में केंद्र सरकार के प्रयासों में सहयोगी बनना है. गुजरात जैसे राज्य केंद्र के SBFAP 2.0 को अतिरिक्त प्रोत्साहित करने की योजना बना रहे हैं. अन्य राज्य भी जहाज़ निर्माण और शिपयार्ड के विकास के लिए कई मॉडल पेश कर रहे हैं. इन परियोजनाओं में ग्रीनफील्ड बंदरगाह पर यार्ड को बेहतर बनाना भी शामिल है. निजी बंदरगाहों पर ही नहीं, वे स्वतंत्र रूप से शिपयार्ड भी विकसित करना चाहते हैं. हालांकि, इन सभी प्रयासों के बावजूद, विदेशी निवेशकों को लुभाने की चुनौती बनी हुई है, जो इन महत्वाकांक्षी लक्ष्यों तक पहुंचने के लिए ज़रूरी है. इसके लिए एक व्यापक रणनीति बनाने की ज़रूरत होगी, जो न सिर्फ़ राज्य और केंद्र के बीच मज़बूत तालमेल व सहयोग से चलाई जाए, बल्कि उसमें गहरी कूटनीति, वित्तीय और गैर-वित्तीय प्रोत्साहनों का विस्तार और सरकारी नीतियों को लागू करने के लिए ज़रूरी राजनीतिक इच्छाशक्ति शामिल की जाए.
बेशक, राष्ट्र और राज्यों के स्तर पर होने वाले प्रयासों से जहाज़ निर्माण और इससे जुड़े उद्योगों की स्थापना की बुनियाद तैयार होती है, लेकिन भारत को समग्र विकास के लिए ख़ास तौर से कोरिया और जापान के प्रमुख जहाज़ निर्माण कंपनियों के साथ वैश्विक साझेदारी बनानी होगी. अगर हम लंबे समय तक लाभ और स्थिरता चाहते हैं, तो नई दिल्ली (और राज्यों की राजधानियों को भी) जहाज़ निर्माण के क्षेत्र में सियोल व टोक्यो के साथ अपने संबंधों का लाभ ज़रूर उठाना चाहिए. उनको औद्योगिक आपूर्ति श्रृंखला के ख़ास-ख़ास पहलुओं पर भी ध्यान देना होगा.
केंद्र सरकार जहां ज़्यादातर बड़े काम करती है, वहीं तटवर्ती राज्य भी अपनी सीमित क्षमताओं और संसाधनों के साथ इनमें अपना योगदान देते हैं. ये राज्य भारत के आगामी आठ प्रमुख जहाज़ निर्माण क्लस्टरों से लाभ उठाना चाहते हैं, जिनको केंद्र के 75,000 करोड़ रुपये के बजट का लाभ मिलेगा.
हमने इस दिशा में निश्चय ही शुरुआती प्रगति की है, पर अभी हमें काफ़ी काम करना है. 2024 में, मंत्री-स्तर के एक प्रतिनिधिमंडल ने औद्योगिक सहयोग की संभावनाओं का पता लगाने के लिए दक्षिण कोरिया की तीन बड़ी कंपनियों (एचडी कोरिया शिपबिल्डिंग ऐंड ऑफशोर इंजीनियरिंग, हनवा ओशन और सैमसंग हैवी इंडस्ट्रीज) और जापान का दौरा किया. इसके अलावा, भारत के पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने भारतीय और जापानी शिपयार्ड के बीच साझेदारी मज़बूत बनाने के लिए जापान के इंफ्रास्ट्रक्चर और परिवहन उप-मंत्री टेराडा योशिमीची से मिलकर चर्चा की. उन्होंने विशेष रूप से मित्सुबिशी हैवी इंडस्ट्रीज, इमाबारी, कनागावा डॉकयार्ड्स व जापान मरीन यूनाइटेड कॉरपोरेशन (JMUC) के साथ साझा उद्यम स्थापित करने और सहयोग की साझी व्यवस्था बनाने की संभावनाओं के बारे में बात की. भारत में इन नीतिगत बदलावों को देखते हुए, हनवा ओशन व इमाबारी शिपबिल्डिंग के प्रतिनिधिमंडलों ने भारत का दौरा किया और औद्योगिक सहयोग को लेकर जांच-पड़ताल की.
कोरियाई कंपनियों ने भी इस क्षेत्र में भारत के साथ साझेदारी करने में रुचि दिखाई है. एचडी कोरिया शिपबिल्डिंग ऐंड ऑफशोर इंजीनियरिंग (KSOE) और भारत की सबसे बड़ी सरकारी जहाज़ निर्माता कंपनी कोचीन शिपयार्ड ने जहाज़ निर्माण व समुद्री विकास के क्षेत्र में रणनीतिक सहयोग करने, कार्य-बल के कौशल को निखारने के लिए मिलकर प्रयास करने, मानकों में सुधार के लिए तकनीकी विशेषज्ञता को साझा करने और उत्पादकता व क्षमता उपयोग को सुधारने के लिए एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए. बढ़ते बाज़ार, व्यापक बंदरगाह बुनियादी ढांचे और कम श्रम लागत के कारण कोरियाई कंपनियां इस साझेदारी को महत्वपूर्ण मानती हैं. यह वास्तव में कोरिया की उन देशों के साथ साझेदारी बढ़ाने की योजना का हिस्सा है, जो उसके लिए ‘स्प्रिंगबोर्ड’ के रूप में काम कर सकते हैं. उदाहरण के लिए, इस योजना के तहत ही कोरिया की प्रमुख कंपनी हनवा ओशन और हनवा सिस्टम्स ने 2024 में अमेरिका के फिली शिपयार्ड के अधिग्रहण का फ़ैसला लिया था.
हाल ही में, हनवा ओशन ने नोएडा में भी अपना एक अंतरराष्ट्रीय इंजीनियरिंग केंद्र खोला है. बयान में बताया गया है कि यह फ़ैसला उनकी ‘वैश्विक इंजीनियरिंग क्षमताओं को मज़बूत बनाने, ख़ास तौर से फ्लोटिंग प्रोडक्शन, स्टोरेज ऐंड ऑफ-लोडिंग (EPSO) और फ्लोटिंग लिक्विफाइड नेचुरल गैस (FLNG) जैसी प्रमुख परियोजनाओं के व्यापक डिजाइन को ध्यान में रखकर’ लिया गया है. जापानी कंपनी मित्सुई ओ.एस.के. लाइन्स लिमिटेड (MOL) भी अपनी भारत-विस्तार योजना के तहत एक भारतीय लॉजिस्टिक्स स्टार्टअप में निवेश करने की सोच रही है. भारत चाहे, तो कोरिया और जापान के साथ अपने रिश्तों को आगे बढ़ाते हुए इन मौकों का उपयोग अपनी जहाज़ निर्माण क्षमताओं को व्यापक व बेहतर बनाने के लिए कर सकता है.
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर और उनके कोरियाई समकक्ष चो ह्यून के बीच हाल ही में हुई बैठक के बाद जारी द्विपक्षीय बयान में यही संकेत मिलता है कि जहाज़ निर्माण साझेदारी को मज़बूत बनाने के लिए रणनीतिक तालमेल बेहतर बनाया जाएगा. बयान में ‘नई औद्योगिक आकांक्षाओं’ को पूरा करते हुए संबंधों को और मज़बूत बनाने पर ज़ोर दिया गया है. कोरिया और अमेरिका के बीच जहाज़ निर्माण को लेकर आपसी सहयोग में हुई हालिया प्रगति को देखते हुए, भारत को कोरियाई उद्योगों को लुभाने के इस अवसर का पूरा लाभ उठाना चाहिए. भारत को उन जापानी कंपनियों के साथ भी जुड़ना चाहिए, जो जहाज़ निर्माण के क्षेत्र को आगे बढ़ाने में रुचि रखती हैं. कोरियाई कंपनियों के साथ मिलकर विकास करने से भारतीय जहाज़ निर्माण उद्योग में सुधार आएगा, जिससे व्यवस्थाएं बेहतर होंगी और उन्नत तकनीक का लाभ मिलेगा. यह साझेदारी भारत को अपने औद्योगिक मानकों को बेहतर बनाने भी मदद करेगी, ख़ास तौर से स्वास्थ्य सुरक्षा, पर्यावरण मानकों, आपूर्ति व्यवस्थाओं और गुणवत्ता संबंधी समस्याओं को सुधारने में, जिनका सामना आज यह उद्योग कर रहा है. इससे गुणवत्ता और आपूर्ति में लगने वाले समय जैसे मानकों में भी सुधार होगा, जो ग्राहकों के लिए काफ़ी मायने रखते हैं. इसी तरह, भारत-चीन संबंधों को लेकर तनाव और जहाज़ निर्माण के क्षेत्र पर चीन के दबदबे को देखते हुए सियोल व टोक्यो भी जहाज़ निर्माण में रणनीतिक साझेदारी सुधारने के प्रयास करेंगे, ताकि दोनों देशों के बीच औद्योगिक सहयोग और गहरा बन सके.
जापानी और दक्षिण कोरियाई कंपनियों ने भारत में सफल कारोबार स्थापित किए हैं. उन्होंने यहां रेलवे के बुनियादी ढांचे में मदद देकर, इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) हार्डवेयर परियोजनाएं बनाकर बुनियादी ढांचे व विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र विकसित किए हैं. यह बताता है कि जहाज़ निर्माण और इससे जुड़े क्षेत्रों में भी इस साझेदारी का लाभ उठाया जा सकता है. अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए भारत को आने वाले दिनों में राजनीतिक प्रयास करने होंगे व नीतिगत सहयोग की ज़रूरत पड़ेगी. साथ ही, विदेशी निवेशकों को लुभाने के लिए उसे वित्तीय और गैर-आर्थिक प्रोत्साहन भी देने होंगे. इन सबका यही अर्थ है कि घरेलू स्तर पर सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र बनाने की तुलना में, यह भारत के लिए और भी अधिक मुश्किल काम साबित होने वाला है.
(अभिषेक शर्मा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में स्ट्रैटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में जूनियर फेलो हैं)
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Abhishek Sharma is a Junior Fellow with ORF’s Strategic Studies Programme. His research focuses on the Indo-Pacific regional security and geopolitical developments with a special ...
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