Author : Aleksei Zakharov

Expert Speak Raisina Debates
Published on Sep 24, 2025 Updated 2 Days ago

तियानजिन एससीओ शिखर सम्मेलन से साफ संकेत मिलता है कि संगठन का मुख्य एजेंडा अब सुरक्षा की जगह पर आर्थिक सहयोग हो गया है. इस समिट में एससीओ विकास बैंक का प्रस्ताव मंजूर किया गया है, जो संगठन की महत्वाकांक्षाओं को ज़ाहिर करता है. हालांकि, सदस्य देशों के बीच कुछ मुद्दों पर मतभेद भी दिखे हैं, जिनसे संगठन की एकजुटता पर असर पड़ा है.

तियानजिन एससीओ समिट 2025: शिखर सम्मेलन के प्रमुख नतीज़ों और उभरते रुझानों पर एक नज़र

Image Source: Wikipidia

सितंबर महीने की शुरुआत में चीन के तियानजिन में आयोजित हुआ शंघाई सहयोग संगठन (SCO) का शिखर सम्मेलन काफ़ी सुर्ख़ियों में रहा था और उसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा था. दरअसल, भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच वैश्विक दक्षिण के कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष इस समिट में शामिल हुए थे और सम्मेलन से अलग कई देशों के नेताओं ने अहम द्विपक्षीय बैठकें भी की थीं. साल 2015 से ही भारत और पाकिस्तान के एससीओ में शामिल होने पर चर्चाएं तेज़ हो गई थीं. तब से इस संगठन का विस्तार चर्चा का प्रमुख मुद्दा रहा है. एससीओ के गठन को एक दशक हो चुका है और इसमें आज कई देश शामिल हैं, साथ ही इसका दायरा भी काफ़ी व्यापक हो गया है. ज़ाहिर है कि एससीओ में भी कई मसले ऐसे हैं, जिन पर सदस्य देशों की राय एक नहीं है, नतीज़तन उन मुद्दों पर कोई निर्णय नहीं हो पाता है. ख़ास तौर पर तीन बड़े ज्वलंतशील मुद्दों यानी आतंकवाद, उग्रवाद और अलगाववाद से निपटने पर सदस्य देश एकमत नहीं है और इस कारण इन मुद्दों पर निर्णायक फैसले लेने में रुकावटें आ रही हैं. वर्तमान में, भारत-चीन संबंधों में फिलहाल नरमी आई है और व्यापार विवाद की वजह से भारत और अमेरिका के रिश्तों में तनाव आ गया है. इन सारी वास्तविकताओं के बीच तियानजिन एससीओ समिट में सदस्य देशों के बीच सुरक्षा और भू-राजनीतिक मामलों समेत कई समझौतों पर सहमति बनी है.

सावधानी और सजगता के साथ एससीओ का विस्तार

पिछले तीन वर्षों के दौरान एससीओ के सबसे प्रमुख एजेंडे में इसका विस्तार भी शामिल रहा है. ईरान साल 2023 में, जबकि बेलारूस वर्ष 2024 में एससीओ का सदस्य बना था. देखा जाए तो शंघाई सहयोग संगठन का विस्तार बहुत तेज़ी से हो रहा है और 10 अन्य राष्ट्रों ने भी इसमें शामिल होने की इच्छा जताई है. हाल ही में तियानजिन में आयोजित एससीओ समिट ने दिखाया कि इस संगठन की पहुंच कितनी व्यापक हो चुकी है. पश्चिम में मिस्र से लेकर दक्षिण पूर्व में कंबोडिया तक दुनिया के हर कोने में स्थित देश इस शिखर सम्मेलन में शामिल हुए थे. हालांकि, फिलहाल ज़्यादातर देशों को एससीओ में डायलॉग पार्टनर यानी संवाद साझीदार का ही दर्ज़ा मिला हुआ है. ये देश एससीओ में अपनी भागीदारी बढ़ाना चाहते हैं और इसके लिए लगातार प्रयास भी कर रहे हैं. एससीओ में डायलॉग पार्टनर के रूप में शामिल होने वाला लाओस सबसे नया सदस्य राष्ट्र है.

एससीओ ने नए सदस्यों को जोड़ने की प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए ऐलान किया है कि वह "डायलॉग पार्टनर" और "ऑब्ज़र्वर" के दर्ज़े को एक नई श्रेणी "एससीओ साझीदार" में विलय कर देगा. यानी एससीओ के दो पर्यवेक्षक देशों (मंगोलिया और अफ़ग़ानिस्तान) एवं 15 संवाद साझीदार राष्ट्रों समेत सभी एससीओ प्लस देश (“SCO Plus अर्थात संवाद व पर्यवेक्षक देश”) भविष्य में न केवल एससीओ समिट की कार्यवाही में हिस्सा ले सकेंगे, बल्कि कुछ सहयोगी पहलों में भी शामिल हो सकेंगे. हालांकि, इसमें एक बड़ी अड़चन यह है कि "एससीओ साझीदार" दर्ज़े वाले देश सिर्फ़ एससीओ सम्मेलन की मेज़बानी करने वाले देश के आमंत्रण पर ही आयोजन में शामिल हो पाएंगे. 

ज़ाहिर है कि एससीओ में भी कई मसले ऐसे हैं, जिन पर सदस्य देशों की राय एक नहीं है, नतीज़तन उन मुद्दों पर कोई निर्णय नहीं हो पाता है. ख़ास तौर पर तीन बड़े ज्वलंतशील मुद्दों यानी आतंकवाद, उग्रवाद और अलगाववाद से निपटने पर सदस्य देश एकमत नहीं है और इस कारण इन मुद्दों पर निर्णायक फैसले लेने में रुकावटें आ रही हैं. 

तियानजिन में आयोजित एससीओ प्लस की बैठक में साफ तौर पर देखने को मिला कि चीन और रूस इस संगठन की ताक़त और पहुंच को पूरी दुनिया के सामने दिखाने के लिए कितने अधीर हैं. हालांकि, इसके बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं है कि एससीओ के दूसरे सदस्य देश तियानजिन की तरह व्यापक स्तर पर कूटनीति के इस बड़े आयोजन की मेज़बानी के लिए तैयार होंगे या नहीं. इसके अलावा, यह भी हो सकता है कि वैश्विक दक्षिण के कई देश बिना किसी अतिरिक्त प्रतिबद्धता के ही एससीओ के साथ जुड़े रहने के लिए तैयार हों. हालांकि, अगर कोई देश इस तरह का दृष्टिकोण रखता है, तो फिर उसके एससीओ का पूर्ण सदस्य बनने में रुकावट आ सकती है और वो इस संगठन का स्थाई सदस्य बनने से वंचित रह सकता है. उदाहरण के तौर पर पिछले दो दशक से ज्यादा समय से एससीओ-आसियान वार्ता चल रही है, लेकिन इसका कोई ख़ास नतीज़ा अब तक नहीं निकला है. यानी न तो इस वार्ता के चलते कोई अहम समझौता हुआ है और न ही कोई आपसी सहयोग स्थापित हो पाया है. ज़ाहिर है कि कई आसियान सदस्य देश (कंबोडिया, लाओस, म्यांमार) एससीओ प्लस का हिस्सा है, लेकिन सुरक्षा के मुद्दे पर संगठन का फोकस ज़्यादातर दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के लिहाज़ से कोई ख़ास उत्साहजनक नहीं रहा है, बल्कि कहा जाए कि चिंताजनक ही रहा है. बता दें कि इन अधिकांश दक्षिण पूर्व एशियाई देशों की विदेश नीति में गुटनिरपेक्षता को प्रमुखता दी जाती है.

इसी तरह से एससीओ के सदस्य देशों के बीच अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे पर भी आम सहमति नहीं है और कहीं न कहीं विरोधाभासी नज़रिया क़ायम है. अफ़ग़ानिस्तान हालांकि, एससीओ की चर्चा में एक अहम एजेंडा है. एससीओ में विशेष एससीओ-अफ़ग़ानिस्तान संपर्क समूह बनाए जाने से भी पता चलता है कि संगठन के लिए अफ़ग़ानिस्तान का मुद्दा कितनी अहमियत रखता है. अफ़ग़ानिस्तान औपचारिक तौर पर एससीओ प्लस का हिस्सा है. इतना सब होने के बावज़ूद एससीओ में इस पर कोई आम सहमति नहीं है कि अफ़ग़ानिस्तान के तालिबान शासन के साथ किस तरह संपर्क स्थापित किया जाए. ज़ाहिर है कि इन हालातों में अफ़ग़ानिस्तान के लिए एससीओ की पूर्ण सदस्यता हासिल करना असंभव सा हो जाता है. इतना ही नहीं, एससीओ सम्मेलनों में तालिबान शासन के प्रतिनिधियों को बुलाया भी नहीं जाता है. इससे भी पता चलता है कि संगठन में अफ़ग़ानिस्तान को लेकर सदस्य देशों का रुख़ अलग-अलग है. अफ़ग़ानिस्तान के तालिबान शासन के नुमाइंदों को तियानजिन एससीओ समिट में भी आमंत्रित नहीं किया गया था, इसके साथ ही 11-12 सितंबर, 2025 को दुशांबे में अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे पर आयोजित सदस्य देशों की एक सलाहकार बैठक में भी तालिबानी सरकार के प्रतिनिधि मौज़ूद नहीं थे. अहम बैठकों में अफ़ग़ानिस्तान की अनुपस्थिति वास्तव में हैरान करने वाली है. हालांकि, ऐसा भी हो सकता है कि इन दोनों ही बैठकों में ताजिकिस्तान के दख़ल की वजह से तालिबानी सरकार के प्रतिनिधियों को नहीं बुलाया गया हो. ज़ाहिर है कि काबुल में तालिबानी शासन व्यवस्था को लेकर ताजिकिस्तान का रुख़ बेहद सख्त रहा है और वह तालिबान के कामकाज के तरीक़ों से कतई सहमत नहीं है. 

शंघाई सहयोग संगठन में मची उथल-पुथल या वैचारिक मतभेदों को इसके लोगो यानी प्रतीक चिन्ह से भी समझा जा सकता है. इसके लोगों में अभी भी सिर्फ़ उन्हीं देशों के नक्शे हैं, जो इसके गठन के समय शामिल थे. भारत, पाकिस्तान, ईरान और बेलारुस के नक्शों को एससीओ के प्रतीक चिन्ह में शामिल नहीं किया गया है. (चित्र 1 देखें). इसका साफ मतलब है कि जिस तरह से एससीओ का विस्तार होता जा रहा है, ऐसे में उसे न केवल अपने तौर-तरीक़ों, नियमों और दिशानिर्देशों में बदलाव करना होगा, बल्कि अपनी ब्रांडिंग पर भी ख़ासा ध्यान देना होगा.

 

चित्र 1 -  एससीओ का आधिकारिक चिन्ह या लोगो

Tianjin Sco Summit 2025 Key Takeaways And Emerging Trends

स्रोत: एससीओ वेबसाइट

एससीओ में सुरक्षा एजेंडे को किया गया किनारे

निसंदेह तौर पर एससीओ में भौगोलिक विस्तार पर ख़ासा ध्यान दिया जा रहा है. लेकिन एक और अहम बात जो साफ दिखाई दे रही है, वो यह है कि संगठन ने सुरक्षा से जुड़े अपने एजेंडे से फोकस हटा दिया है और इसकी जगह पर आर्थिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक सहयोग को ज़्यादा तवज्जो दी जा रही है. एससीओ में आए इस बदलाव के दो कारण हो सकते हैं.

अफ़ग़ानिस्तान औपचारिक तौर पर एससीओ प्लस का हिस्सा है. इतना सब होने के बावज़ूद एससीओ में इस पर कोई आम सहमति नहीं है कि अफ़ग़ानिस्तान के तालिबान शासन के साथ किस तरह संपर्क स्थापित किया जाए. ज़ाहिर है कि इन हालातों में अफ़ग़ानिस्तान के लिए एससीओ की पूर्ण सदस्यता हासिल करना असंभव सा हो जाता है.

सबसे पहला कारण तो यह हो सकता है कि विस्तारित शंघाई सहयोग संगठन में सदस्य देशों के बीच सुरक्षा और भू-राजनीतिक मसलों पर आम सहमति नहीं बन पा रही और इसमें काफ़ी दिक़्क़तें आ रही हैं. हालांकि, तियानजिन में हुई एससीओ बैठक के बाद जारी किया गया घोषणापत्र इसका अपवाद था. इस घोषणा पत्र में कूटनीतिक प्रयासों की सफलता झलकती है, यानी सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर सदस्यों में एक राय नज़र आती है. ख़ास तौर पर इस घोषणापत्र में आतंकवाद के मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान के नज़रिए से तालमेल बनाते हुए इसमें जहां पहलगाम आतंकी हमले का मसला शामिल किया गया, तो खुजदार और जाफर एक्सप्रेस पर हुए आतंकवादी हमलों का भी उल्लेख किया गया. इस घोषणापत्र में ईरान के ख़िलाफ़ इजराइली और अमेरिकी सैन्य हमलों की न सिर्फ़ निंदा की गई, बल्कि इन्हें "आक्रामक कार्रवाई" भी बताया गया. इतना ही नहीं, इन हमलों को ईरान की संप्रभुता का "उल्लंघन" भी कहा गया. इसके बाद, जब इजराइल ने दोहा पर हमला किया था, तब भी एससीओ ने एक बयान जारी कर इस आक्रामक कार्रवाई को "अस्वीकार्य" बताया था. ईरान और दोहा के मामले में देखा जाए तो फिलहाल भारत एससीओ के नज़रिए के साथ खड़ा है, जो दिखाता है कि जून 2025 के बाद से इस क्षेत्र को लेकर नई दिल्ली का कूटनीतिक दृष्टिकोण बदला है. ज़ाहिर है कि तब 12 दिनों के इजराइल-ईरान युद्ध के दौरान इजराइली हवाई हमलों की कड़ी निंदा करने वाले एससीओ के वक्तव्य से भारत ने खुद को अलग कर लिया था. हालांकि, तियानजिन बैठक में एससीओ सदस्य देशों के बीच सभी मुद्दों पर विचार-विमर्श हुआ, बावज़ूद इसके कुछ सदस्य राष्ट्रों के बीच छाए गहरे मतभेदों का कोई हल इस समिट में नहीं निकाला जा सका.

एससीओ में रुख़ में आए इस बदलाव का दूसरा कारण वर्तमान में रूस की स्थिति में आया परिवर्तन है. इसके चलते एससीओ आर्थिक सेक्टर पर अब ज़्यादा फोकस कर रहा है. 2022 से पहले एससीओ में जो भी महत्वपूर्ण आर्थिक पहलें शुरू की जाती थीं, रूस उनका समर्थन करने में उत्साह नहीं दिखाता था, क्योंकि रूस को लगता था कि ऐसा करना चीन का पिछलग्गू बनने जैसा है. लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद लगे तमाम प्रतिबंधों और वित्तीय लेन-देन पर लगी रुकावटों की वजह से रूस के नज़रिए में बदलाव आया है और वो बीजिंग की आर्थिक परियोजनाओं पर चर्चा करने और उनका समर्थन करने के लिए तत्पर दिखाई दे रहा है. चीन के प्रस्तावों का रूस द्वारा खुलकर समर्थन करने का एक उदाहरण उसका तियानजिन समिट में एससीओ विकास बैंक की स्थापना के फैसले के साथ खड़ा होना है.

एससीओ विकास बैंक की यह पहल 2010 में उस वक़्त शुरू हुई थी, जब चीन संगठन के सदस्य देशों को कर्ज़ देने और इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी उनकी परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए बैंक को बढ़ावा देने में जुटा था. बीजिंग ने इस बैंक के स्थापना के प्रस्ताव में एससीओ के सदस्य राष्ट्रों के छोटे व्यवसायों और परियोजनाओं को ऋण देने की बात भी कही थी. ज़ाहिर है कि इससे चीन और बैंक दोनों को ख़ासा मुनाफा होता, लेकिन इससे कहीं न कहीं संगठन के सदस्य देशों के कर्ज़ के जाल में फंसने का ख़तरा था. हालांकि, ज़्यादातर मध्य एशियाई सदस्य देशों ने चीन के एससीओ बैंक स्थापित करने के प्रस्ताव का समर्थन किया था, क्योंकि वे चीन से अपनी विकास परियोजनाओं के लिए कर्ज़ लेना चाहते थे. तब रूस एक ऐसा देश था, जिसने चीन के इस प्रस्ताव का विरोध किया था, क्योंकि उसे डर था कि इससे यूरेशियन क्षेत्र में बीजिंग का आर्थिक दबदबा बढ़ सकता है, जिसके नतीज़े अच्छे नहीं होंगे. रूस ने इसके जवाब में कम पूंजी के साथ एक डेवलपमेंट फंड यानी विकास कोष और एक विशेष अकाउंट की स्थापना का प्रस्ताव रखा था, जिसके ज़रिए ऊर्जा, परिवहन और उच्च प्रौद्योगिकी सेक्टर की परियोजनाओं का वित्तपोषण किया जा सके. इतना ही नहीं, तब बीच का रास्ता निकालते हुए मास्को ने अस्ताना स्थित यूरेशियन विकास बैंक (EDB) को एससीओ बैंक के आधार के तौर पर इस्तेमाल करने का भी प्रस्ताव रखा था. ज़ाहिर है कि इससे रूस फायदे की स्थिति में होता, क्योंकि मास्को को उम्मीद थी कि यूरेशियन विकास बैंक में उसका मेजॉरिटी स्टेक होगा यानी बहुमत हिस्सेदारी होगी. वहीं बीजिंग तब ईडीबी में बराबरी की हिस्सेदारी के लिए कोशिश कर रहा था.

ज़ाहिर है कि पूर्व में बैंक में हिस्सेदारी और अपने-अपने फायदों को लेकर रूस व चीन आमने-सामने आ चुके हैं, ऐसे में यह निश्चित है कि एक नए वित्तीय संस्थान यानी प्रस्तावित एससीओ विकास बैंक के गठन में भी ये सारे सवाल ज़रूर खड़े होंगे. जैसे कि पहला सवाल तो यही सामने आएगा कि एससीओ बैंक की स्थापना के दौरान चार्टर पूंजी, यानी कौन सा देश शुरुआत में कितनी पूंजी का योगदान करेगा, या कहा जाए कि किसकी कितनी हिस्सेदारी होगी, इसके लिए क्या तरीक़ा अपनाया जाएगा? साथ ही सदस्य देशों के बीच शेयर वितरण किन सिद्धांतों पर आधारित होगा? इसके अलावा, सवाल यह भी पैदा होगा कि जिन परियोजनाओं का वित्तपोषण इस बैंक के द्वारा किया जाएगा, उनके चयन के मापदंड क्या होंगे? हालांकि, रूसी सरकार को उम्मीद है कि ये नया वित्तीय संस्थान न केवल लेनदेन के नए तौर-तरीक़ों यानी डिजिटल मुद्राओं और डिजिटल वित्तीय परिसंपत्तियों का प्रबंधन करेगा, बल्कि इसका सबसे प्रमुख मकसद पश्चिमी देशों के वित्तीय तंत्र से मुक्ति पाना होगा. ज़ाहिर है कि रूस और चीन एससीओ विकास बैंक को एक नए सिक्योरिटी डिपोज़िटरी के रूप में यानी एक ऐसी जगह के रूप में इस्तेमाल करने पर विचार कर रहे हैं जो शेयर, बॉन्ड, सरकारी प्रतिभूतियों आदि जैसी वित्तीय प्रतिभूतियों को इलेक्ट्रॉनिक रूप में सुरक्षित रखेगी और उनके हस्तांतरण व ट्रेडिंग को सुगम बनाएगी. कहने का मतलब है कि ये देश एससीओ विकास बैंक को यूरोक्लियर और क्लियरस्ट्रीम के विकल्प के रूप में उपयोग करने की सोच रहे हैं. इन परिस्थितियों में एससीओ विकास बैंक के परिचालन से जुड़े सवाल और व्यापक हो जाते हैं.

शंघाई सहयोग संगठन में मची उथल-पुथल या वैचारिक मतभेदों को इसके लोगो यानी प्रतीक चिन्ह से भी समझा जा सकता है. इसके लोगों में अभी भी सिर्फ़ उन्हीं देशों के नक्शे हैं, जो इसके गठन के समय शामिल थे. भारत, पाकिस्तान, ईरान और बेलारुस के नक्शों को एससीओ के प्रतीक चिन्ह में शामिल नहीं किया गया है.

एससीओ डेवलपमेंट बैंक की स्थापना को लेकर चल रही चर्चाओं से एक बात तो एकदम साफ है कि शंघाई सहयोग संगठन के भीतर सबसे प्रमुख भूमिका चीन और रूस की है और ये दोनों ही संगठन का एजेंडा निर्धारित करते हैं और तय करते हैं कि यह कैसे काम करेगा. फिलहाल बीजिंग और मॉस्को में एससीओ विकास बैंक की स्थापना को लेकर कोई मतभेद नज़र नहीं आ रहा है, बावज़ूद इसके एससीओ के दूसरे सदस्य देशों और विशेष रूप से उनकी केंद्रीय बैंकों की ओर से इस मुद्दे पर क्या रुख़ अपनाया जाता है, वो इस मामले में अहम भूमिका निभाएगा. बहरहाल, एससीओ विकास बैंक की स्थापना के प्रस्ताव को मंजूरी मिल चुकी है और इस प्रस्ताव को वास्तविकता में बदलने के लिए विशेषज्ञों के पास विचार के लिए भेज दिया गया है. यानी फिलहाल एससीओ के इस प्रस्ताव की स्थिति भी ब्रिक्स जैसी हो गई है. रूस ने साल 2024 में ब्रिक्स की अध्यक्षता के दौरान सदस्य देशों की राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार के लिए वैकल्पिक वित्तीय इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन 2025 में ब्राज़ील की ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान इस प्रस्ताव को विचार करने के लिए भेज दिया है, यानी एक तरह से इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है. इस लिहाज़ से देखा जाए तो एससीओ विकास बैंक की स्थापना को भी हक़ीक़त बनने में कई साल लग सकते हैं.

जिस तरह से शंघाई सहयोग संगठन का भौगोलिक विस्तार हो रहा है और इसके एजेंडे में नए मुद्दे शामिल हो रहे हैं, उसके मद्देनज़र एक ओर जहां संगठन की ताक़त और क्षमता में इज़ाफा हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ उसकी ज़िम्मेदारी और जवाबदेही भी बढ़ती जा रही है. इतना ही नहीं, रूस और चीन एससीओ के अहम सदस्य देश हैं और ऐसे में इस संगठन का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि ये दोनों देश अपने द्विपक्षीय मतभेदों को कितने कारगर तरीक़े से सुलझाते हैं. इसके अलावा, एससीओ का भविष्य इस पर भी निर्भर करेगा की भारत समेत दूसरे सदस्य देश चीन और रूस के प्रस्तावों को कितनी शिद्दत से बगैर किसी शक-सुबह के मंजूरी देते हैं. इस सारी बातों से साफ हो जाता है कि एससीओ का भविष्य कई बातों पर निर्भर है और इसको लेकर आगे भी चर्चाएं चलती रहेंगी. कहने का मतलब है कि वैश्विक स्तर पर भू-राजनीति क्या करवट लेती है और भविष्य में दुनिया भर में राजनीतिक व आर्थिक लिहाज़ से क्या बदलाव आता है, उन पर भी यह निर्भर है कि एससीओ की भविष्य की रूपरेखा और एजेंडा क्या होगा.

आख़िर में, तियानजिन एससीओ समिट के दौरान काफ़ी कुछ हासिल किया गया है और कई मुद्दों पर सदस्य देशों ने आम सहमति के ज़रिए निर्णय लेकर साबित किया है कि यह संगठन न केवल सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ रहा है, बल्कि भविष्य की ज़रूरतों के मुताबिक़ अपने एजेंडा में बदलाव भी कर रहा है. बावज़ूद इसके, जिस प्रकार से तियानजिन में एससीओ को एक नई विश्व व्यवस्था की नींव रखने वाला संगठन बताने को कोशिश की गई और इसको लेकर जो तमाम बड़ी-बड़ी बातें की गईं, यह सब न केवल अवास्तविक प्रतीत होता है, बल्कि संगठन की उपलब्धियों को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने जैसा भी प्रतीत होता है.


अलेक्सई ज़खारोव ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में रूस और यूरेशिया के फेलो हैं.

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