2025 के स्वतंत्रता दिवस पर अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आर्थिक सुधारों को भारत की सुरक्षा के आधारभूत ढांचे में समाहित करके पेश किया
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किसी भी देश को फ़ुर्ती से काम पर लगाने के लिए एक बड़े ख़तरे से अच्छा असर कोई और नहीं दिखाता. और, अगर तीन ख़तरे मंडरा रहे हों तो वो तमाम तरह के हितों को एक साथ लाकर, उन्हें अस्तित्व का मसला बनाते हुए भारत की महान रणनीति के तौर पर पेश करने की रफ़्तार तेज़ कर सकते हैं.
स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लगातार 12वां भाषण बिल्कुल यही काम करता है. इस भाषण में आज भारत के सामने खड़े तीन ख़तरों- भू-राजनीतिक, आतंकवादियों से और आर्थिक ख़तरे से आमने सामने से निपटता है. एक शांतिप्रिय, नियमों के पाबंद और तेज़ी से विकसित होते राष्ट्र की इन तीन ख़ूबियों- जिन्हें पश्चिम की नज़र में ‘मूल्य’ कहा जाता है, वो आज भारत की कमज़ोरियों के तौर पर देखी जा रही हैं. युद्ध के दौरान चीन और पाकिस्तान के गठजोड़ से लेकर रूस की ऊर्जा को लेकर अमेरिका और यूरोपीय संघ के खोखले बहाने और दोहरे मानदंड तक, सत्ता ने लोकतंत्रों से लेकर तानाशाही शासनों को एक बराबरी से नशे में चूर कर दिया है. ऐसे में भारत जैसे देशों को अपनी रणनीति में बदलाव लाने की आवश्यकता है.
दहशतगर्दों को उनके मददगारों के साथ जोड़कर मोदी ने भारत और पाकिस्तान के संबंधों में एक न्यू नॉर्मल को स्थापित किया है. प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि, ‘जो लोग आतंकवाद को पालते-पोसते और प्रश्रय देते हैं और जो लोग आतंकियों को मज़बूती देते हैं, उनको अब अलग अलग करके नहीं देखा जाएगा’. इससे भी एक क़दम आगे बढ़ते हुए प्रधानमंत्री ने परमाणु बम की धमकी के प्रति ज़ीरो टॉलरेंस की नीति को स्पष्ट रूप से सामने रखा. क्योंकि हाल ही में पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल सैयद आसिम मुनीर अहमद शाह ने एटमी गीदड़भभकी दी थी. एक परमाणु युद्ध की आशंका को अमेरिका की धरती से, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नाक के नीचे जताया गया था.
स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लगातार 12वां भाषण बिल्कुल यही काम करता है. इस भाषण में आज भारत के सामने खड़े तीन ख़तरों- भू-राजनीतिक, आतंकवादियों से और आर्थिक ख़तरे से आमने सामने से निपटता है.
मोदी ने हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के ज़रिए प्राप्त हुई विजय के हवाले से साफ़ साफ़ कहा कि न तो आतंकवाद सफल होगा, न परमाणु हथियारों की धमकी कामयाब होगी. मोदी ने पहलगाम के आतंकवादियों के मज़हबी झुकाव की तरफ़ इशारा करते हुए इस बात का ज़िक्र किया कि आतंकियों ने लोगों को उनके धर्म के आधार पर निशाना बनाया था. उन्होंने कहा कि, ‘हमारे साहसी सैनिकों ने दुश्मन को उनकी कल्पना से परे सज़ा दी. पाकिस्तान में इस क़दर तबाही मची कि इससे जुड़ी नई नई बातें और जानकारियां हर दिन सामने आ रही हैं.’ उन्होंने ऐलान किया कि पाकिस्तान के आतंकियों और परमाणु हथियारों की गीदड़भभकी दोनों को लेकर भारत के बर्दाश्त की सीमा पार हो चुकी है. सिंधु जल समझौते को ख़त्म करने का खुला ऐलान करते हुए मोदी ने कहा कि, ‘अब भारत ने तय कर लिया है कि ख़ून और पानी साथ साथ नहीं बहेंगे’.
यही नहीं, प्रधानमंत्री ने भारत के सुरक्षा कवच का विस्तार करने का ऐलान करते हुए कहा कि अब इसके दायरे में ‘सामरिक ही नहीं, नागरिक क्षेत्र भी आएंगे’. प्रधानमंत्री ने कहा कि सुदर्शन चक्र मिशन का रक्षा कवच अब अस्पताल, रेलवे और आस्था के केंद्रों के लिए भी तैयार किया जाएगा. ये काम दोहरी रणनीति के ज़रिए किया जाएगा: घरेलू रक्षा रिसर्च और निर्माण और आधुनिक युद्ध के लिए तैयारी करके भविष्य के हमलों से निपटने की व्यवस्था करके. सुरक्षा जहां पहले संरक्षण का एक तरीक़ा मानी जाती थी; वहीं अब इसमें अर्थव्यवस्था भी जुड़ गई है और अब शायद हम आर्थिक सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा से मिलाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.
मोदी ने एक उच्च स्तरीय डेमोग्राफी मिशन की स्थापना की भी घोषणा की, ताकि सीमा पार से ‘भारत के ऊपर मंडरा रहे आबादी के संकट’ से निपटा जा सके. पाकिस्तान या बांग्लादेश का ज़िक्र किए बिना प्रधानमंत्री ने कहा कि, ‘ये घुसपैठ एक सोची समझी साज़िश का हिस्सा है’, जिससे भारत की डेमोग्राफी को बदलने की कोशिश की जा रही है.
मोदी ने एक उच्च स्तरीय डेमोग्राफी मिशन की स्थापना की भी घोषणा की, ताकि सीमा पार से ‘भारत के ऊपर मंडरा रहे आबादी के संकट’ से निपटा जा सके. पाकिस्तान या बांग्लादेश का ज़िक्र किए बिना प्रधानमंत्री ने कहा कि, ‘ये घुसपैठ एक सोची समझी साज़िश का हिस्सा है’, जिससे भारत की डेमोग्राफी को बदलने की कोशिश की जा रही है. अन्य मसलों के अलावा, घुसपैठिए भारत के नौजवानों की रोज़ी-रोटी छीन रहे हैं, ‘हमारे भाइयों और बहनों को निशाना बना रहे हैं’ और ‘मासूम आदिवासियों को बरगलाकर उनकी ज़मीनें छीन रहे हैं’. सबसे बड़ी बात ये कि आबादी की बनावट में तब्दीली राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौतियां भी पैदा करती है और सामाजिक तनाव के बीज भी बोती है. ऐसे में आबादी के इस मिशन को बाहरी सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदार एजेंसियों के प्रयासों में पूरक बनना चाहिए.
आत्मनिर्भरता को रफ़्तार देने की मोदी की ये कोशिश तीन क्षेत्रों में बेहद सही वक़्त पर हो रही है. पहला, उन्होंने इस बात की तारीफ़ की कि भारत की सेना ने हथियारों और विशेषज्ञता के मामले में दुश्मन को किस तरह चौंकाया था. उन्होंने कहा कि, ‘दुश्मन को अंदाज़ा नहीं था कि हमारे पास कैसे हथियार और किस तरह की सामर्थ्य है. उसको समझ में नहीं आया कि पलक झपकते ही कौन की शक्ति उसको तबाह कर रही थी’. प्रधानमंत्री ने कहा कि, ‘कल्पना कीजिए कि अगर हम आत्मनिर्भर नहीं होते, तो क्या हम इतनी फ़ुर्ती से ऑपरेशन सिंदूर का संचालन कर सकते थे?’ प्रधानमंत्री मोदी ने इन परिणामों का श्रेय पिछले एक दशक के दौरान रक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के प्रयासों को दिया. जहां तक नैरेटिव की बात है तो ताक़त ख़ामोशी के साथ काम करने में है.
दूसरा, मोदी ने 21वीं सदी में तकनीक की महत्ता को रेखांकित किया और इस पर राष्ट्रीय स्तर पर महारत हासिल करने की ज़रूरत पर बल दिया. यहां प्रधानमंत्री ने सेमीकंडक्टर के इतिहास और इस पर राजनीति पर ज़ोर दिया. मोदी ने कहा कि पांच दशक पहले तक भारत चिप तकनीक के मामले में दुनिया के अग्रणी देशों में से एक था. लेकिन, उन्होंने कहा कि, ‘इस विचार को रोका गया, इसको लटकाया गया और फिर इस पर ताला लगा दिया गया.’ आज के दौर की ज़रूरतों और पैमाने का ज़िक्र करते हुए, मोदी ने कहा कि देश में सेमीकंडक्टर की छह इकाइयां स्थापित करने का काम चल रहा है. इसके साथ साथ चार और इकाइयों को भी हरी झंडी दे दी गई है. मोदी ने वादा किया कि, ‘इस साल के आख़ितर तक भारत में और भारत के लोगों द्वारा बनी मेड इन इंडिया चिप’ बाज़ार में आ जाएगी. मोदी ने इसी तरह ऊर्जा की आत्मनिर्भरता पर भी ज़ोर दिया और बताया कि पिछले 11 वर्षों में सौर ऊर्जा की क्षमता में 30 गुने की बढ़ोत्तरी हुई है और 10 नए परमाणु ऊर्जा रिएक्टरों का भी विकास चल रहा है.
अमेरिका की अगुवाई में चल रहे डिग्लोबलाइज़ेशन के दौर में मोदी ने ‘स्वदेशी’ की नई परिकल्पना पेश की है. स्वदेशी का विचार 1905 में सबसे पहले सामने आया था, जिसे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनंद मठ (1870) से प्रेरणा मिली थी. मोदी ने स्वदेशी के विचार को सुरक्षा के क्षेत्र में समाहित कर दिया है. मोदी का ‘स्वदेशी’ पर ज़ोर अब चरखे या फिर हथकरघे पर केंद्रित नहीं है. स्वदेशी का 2025 का पुनरावतार तकनीकी प्लेटफॉर्म और ऑपरेटिंग सिस्टम, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और साइबर सिक्योरिटी पर ज़ोर देने वाला है.
दूसरे शब्दों में कहें तो आख़िरकार सुरक्षा के अर्थव्यवस्था से तालमेल बनाने से भारत की ग्रैंड स्ट्रैटेजी के एक स्तंभ का निर्माण किया जा रहा है. आप अमेरिका स्थित सोशल मीडिया कंपनियों पर भारत की निर्भरता को लेकर इस परिकल्पना पर विचार करें: यू-ट्यूब, फ़ेसबुक और एक्स जैसे प्लेटफार्म से भारतीयों को होने वाली आमदनी और संवाद उस वक़्त गुम हो जाएंगे, जिस दिन अमेरिका ये तय कर लेगा कि भारत अब एक ‘व्यावहारिक’ साझीदार नहीं है और उसे ‘दंडित’ करने का प्रयास करेगा. फ़रवरी 2022 में इन तीनों अमेरिकी कंपनियों ने ‘बोलने की आज़ादी’ के रूसी पक्ष को प्रतिबंधित कर दिया था. भरोसे में ये कमी, जो सिर्फ़ अमेरिका की राजनीति तक सीमित नहीं, बल्कि अमेरिकी कंपनियों तक जाएगी. इसी जोखिम को देखते हुए मोदी ने देश को इस ख़तरे से निपटने के लिए तैयार होने की गुज़ारिश की. भारत का UPI इस समय दुनिया में भुगतान का सबसे बड़ा प्लेटफार्म है. दुनिया भर में इसकी कामयाबी से प्रेरणा लेते हुए मोदी ने कहा, ‘मैं अपने देश के नौजवानों को चुनौती देता हूं कि आख़िर हमारे पास अपने प्लेटफार्म क्यों नहीं हैं?’
भारत का UPI इस समय दुनिया में भुगतान का सबसे बड़ा प्लेटफार्म है. दुनिया भर में इसकी कामयाबी से प्रेरणा लेते हुए मोदी ने कहा, ‘मैं अपने देश के नौजवानों को चुनौती देता हूं कि आख़िर हमारे पास अपने प्लेटफार्म क्यों नहीं हैं?’
और तीसरा, मोदी ने अपनी सरकार द्वारा किए गए सुधारों के बारे में बात की. उनके भाषण में सुधार का ज़िक्र 25 बार आया. प्रधानमंत्री ने भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम की तारीफ़ की और उद्यमियों को इस वादे के साथ उद्यम स्थापित करने के लिए आमंत्रित किया कि ‘उनके अनुपालन की लागत में काफ़ी हद तक कमी लाई जाएगी, जिससे उन्हें नई ताक़त मिलेगी’. मोदी ने सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए एक ऐसी टास्क फोर्स के गठन की घोषणा की, जो तय समयसीमा के भीतर काम करेगी. मोदी ने कहा कि, ‘मौजूदा नियम, क़ानून, नीतियां और प्रक्रियाओं को 21वीं सदी के मुताबिक़ ढालना होगा, ताकि हम वैश्विक परिवेश के हिसाब से ख़ुद को तैयार कर सकें और इसका तालमेल भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के दृष्टिकोण से बिठा सकें.’
लेकिन, प्रधानमंत्री इस विचार को लंबे वक़्त से आगे बढ़ा रहे हैं. अनुपालन से जुड़े पिछले सुधार जनविश्वास (प्रावधानों का संशोधन) क़ानून 2023 लाकर मोदी सरकार ने केंद्र सरकार के अंतर्गत आने वाले 5,239 प्रावधानों में से केवल 113 को आपराधिक दायरे से बाहर किया था. हम उम्मीद करते हैं कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2024 और 2025 के बजट में जिस जनविश्वास 2.0 विधेयक का ज़िक्र किया था, वो आख़िरकार क़ानून बनेगा. सरकार को इससे भी महत्वाकांक्षी लक्ष्य के लिए काम करना चाहिए और 2026 के बजट में इन प्रावधानों के एक बड़े हिस्से को आपराधिकता के दायरे से बाहर करना चाहिए. इससे उद्यमिता को शक्ति मिलेगी, निरीक्षकों का डर ख़त्म होगा और छोटे व बड़े, भारतीय एवं विदेशी उद्यमियों के लिए कारोबार करना एक बराबर से आसान होगा. तब तक कारोबारियों और ग्राहकों को अक्टूबर में दिवाली के आस-पास तक GST में होने वाली कटौती से ही संतोष करना पड़ेगा.
मोदी के भाषणों में जिन विचारों का ज़िक्र हुआ, उनको हक़ीक़त में तब्दील करना ही होगा. इसके लिए अगर अफ़सरशाही विरोध करे, तो उसे भी सुधारना होगा. फिर चाहे ऐसा बलपूर्वक ही क्यों न करना पड़े, ताकि वो देश राष्ट्रीय हितों की सेवा कर सकें और भारत की ग्रैंड स्ट्रैटेजी को मज़बूती प्रदान करें.
जिस एक ख़तरे का ज़िक्र प्रधानमंत्री मोदी ने सीधे तौर पर नहीं किया, वो ट्रंप द्वारा हाल ही में भारतीय सामानों पर लगाया गया टैरिफ है. हालांकि, मोदी ने एक लक्ष्मण रेखा ज़रूर खींची. उन्होंने कहा कि, ‘भारत के किसानों को नुक़सान पहुंचाने वाली किसी भी तरह की नीति के ख़िलाफ़ मोदी एक दीवार बनकर खड़ा है. भारत अपने किसानों, अपने पशुपालक किसानों और अपने मछलीपालकों के हितों से कभी भी किसी तरह का कोई समझौता नहीं करेगा.’ दूसरे शब्दों में जहां भारत, अमेरिका और बाक़ी दुनिया से रिश्ते बढ़ाना चाहता है. लेकिन, वो अपनी घरेलू राजनीति या अपने किसानों के हितों की क़ीमत पर हरगिज़ ऐसा नहीं करेगा.
ट्रंप की खुली बयानबाज़ियों के उलट, शायद भारत का तरीक़ा ज़्यादा समझदारी वाला है- बड़ी बड़ी बातें करने और उन पर अमल नहीं करने के बजाय भारत पर्दे के पीछे से काम करना बेहतर समझता है. सुधारों, रक्षा तैयारियों और आत्मनिर्भरता के लिए ऐसी ऊर्जा अचानक से पैदा नहीं होती. निश्चित रूप से इन अनिश्चितताओं से निपटने के लिए ट्रंप ने एक बड़े ट्रिगर का काम किया है. ऐसा लगता है कि भारत एकजुट होने और सुधार करने के लिए ऐसे ही संकटों का उसी तरह इंतज़ार कर रहा था, जिस तरह 1991 में किया था, जब एक वित्तीय तबाही के मुहाने पर खड़े होने की वजह से प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली सरकार ने आर्थिक सुधारों की शुरुआत की थी.
मोदी का विज़न बिल्कुल स्पष्ट है. लेकिन, इसका ये मतलब नहीं है कि इसे सीधे-सपाट तरीक़े से लागू भी किया जाएगा. हमारा प्रशासनिक ढांचा बदलाव का बड़ा विरोधी है और सुधारों की प्रक्रिया बेहद सुस्त गति से ज़मीन पर उतारी जाती है. भारत के प्रशासनिक ढांचे और इसके अधिकारियों को इसमें उस्तादी हासिल है. ये अधिकारी प्रगति में बाधक बन सकते हैं. मोदी के भाषणों में जिन विचारों का ज़िक्र हुआ, उनको हक़ीक़त में तब्दील करना ही होगा. इसके लिए अगर अफ़सरशाही विरोध करे, तो उसे भी सुधारना होगा. फिर चाहे ऐसा बलपूर्वक ही क्यों न करना पड़े, ताकि वो देश राष्ट्रीय हितों की सेवा कर सकें और भारत की ग्रैंड स्ट्रैटेजी को मज़बूती प्रदान करें.
गौतम चिकरमाने ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के उपाध्यक्ष हैं
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Gautam Chikermane is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. His areas of research are grand strategy, economics, and foreign policy. He speaks to ...
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