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Published on Apr 13, 2026 Updated 0 Hours ago

परमाणु हथियारों के सिस्टम में AI जोड़ने से जहां फैसले तेज़ और सटीक हो सकते हैं, वहीं इससे गलत अलार्म, गलत आकलन और अनजाने युद्ध का खतरा भी बढ़ जाता है. इसलिए United Nations General Assembly इस मुद्दे पर वैश्विक चिंता और नियम बनाने की ज़रूरत पर ज़ोर दे रहा है- जानिए आखिर क्यों AI का इस्तेमाल यहां सबसे संवेदनशील मुद्दा बन गया है.

न्यूक्लियर सिस्टम में AI… कितना सुरक्षित?

प्रस्तावना

1 दिसंबर 2025 को, संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने परमाणु हथियारों के कमांड, कंट्रोल और कम्युनिकेशन(एनसी-3) में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को एकीकृत करने के संभावित ज़ोखिमों पर संकल्प A/RES/80/23 पारित किया. इस संकल्प को यूएन के सदस्य देशों का व्यापक समर्थन मिला, जो परमाणु हथियारों के क्षेत्र में एआई द्वारा पैदा ख़तरों को लेकर उनकी चिंता दिखाता है.

इस प्रस्ताव ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भूमिका और एकीकरण में परमाणु और गैर-परमाणु देशों के बीच अंतर को रेखांकित किया. भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में तीव्रता को देखते हुए, परमाणु हथियार संपन्न देश एनसी-3 आर्किटेक्चर में एआई को अपनाने के लिए पहले से कहीं अधिक प्रेरित हैं. इससे ये सवाल उठता है कि परमाणु हथियार संपन्न देश रणनीतिक स्थिरता बनाए रखने के लिए परमाणु क्षेत्र में एआई की चुनौती को किस प्रकार और किस हद तक कम कर रहे हैं.

एनसी-3 में एआई: इसका क्या उद्देश्य?

एआई, एक ऐसी तकनीक के रूप में, मानवीय क्षमताओं का समर्थन और उन्हें सक्षम बनाने के लिए विकसित की गई है. इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े जटिल फैसले लेना शामिल है. किसी भी उभरती हुई तकनीक की तरह, एआई को भी देशों ने अपने प्रतिद्वंद्वियों पर प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त बनाए रखने की रणनीति के हिस्से के रूप में तैयार किया गया है.

एआई के माध्यम से, ज़्यादा सटीक सूचना को प्रोसेस किया जाता है, इससे मानवीय पूर्वाग्रह को कम करने और निर्णय लेने की क्षमता को बढ़ाने का अवसर मिलता है.

अगर विभिन्न देशों के दृष्टिकोण से देखें तो, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के संभावित उपयोग इसे एनसी-3 संरचना में एकीकृत करने के लिए प्रोत्साहन प्रदान करते हैं. एआई के माध्यम से, ज़्यादा सटीक सूचना को प्रोसेस किया जाता है, इससे मानवीय पूर्वाग्रह को कम करने और निर्णय लेने की क्षमता को बढ़ाने का अवसर मिलता है. इससे प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का प्रदर्शन बेहतर हो सकता है, झूठे अलार्म कम हो सकते हैं और संभावित रूप से गलती से होने वाले प्रक्षेपणों को रोका जा सकता है.

यूरोपियन लीडरशिप नेटवर्क की एलिस साल्टिनी द्वारा नीचे दी गई तालिका में दिखाए अनुसार, तीन प्रमुख परमाणु-सशस्त्र देशों, चीन, अमेरिका और रूस, कमान और नियंत्रण संबंधी निर्णय लेने की प्रक्रियाओं का समर्थन करने में एआई की भूमिका पर ज़ोर देते हैं.

 

तालिका 1: एनसी-3 में एआई पर अमेरिकी, चीनी और रूसी चर्चा का तुलनात्मक मूल्यांकन

एनसी-3 से संबंधित काम

अमेरिका           

चीन         

रूस

शुरुआती चेतावनी प्रणाली

एकीकृत सामरिक चेतावनी और हमले के आकलन को बेहतर बनाने की अमेरिकी ज़रूरत पर ज़ोर देता है

रणनीतिक प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली में सुधार के महत्व पर ज़ोर देता है.   

तुरंत ख़तरे का पता लगाने और नुकसान की भविष्यवाणी करने के लिए एआई को संभावित रूप से लाभकारी बताया गया है.

कमांड और कंट्रोल

फैसले लेने की उन्नत तकनीकी और एकीकृत योजना एवं संचालन के साथ एनसी-3 आर्किटेक्चर के लिए मज़बूत दृष्टिकोणों को अनुकूलित करने की अमेरिका की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है.

राष्ट्रीय सुरक्षा में एआई की भूमिका को आगे बढ़ाने के लिए कमांड और निर्णय लेने को प्रमुख रुचि के क्षेत्रों के रूप में रेखांकित करता है.

दैनिक गतिविधियों और ऑपरेशनल वॉर मैनेजमेंट के फैसले लेने में एआई के मौजूदा उपयोग पर ज़ोर डालता है. इसके अलावा, जवाबी कार्रवाई की योजना बनाने में एआई की उपयोगिता पर भी प्रकाश डालते हैं.

लक्ष्य निर्धारण






लक्ष्य निर्धारण क्षमता में सुधार लाने में एआई की उपयोगिता पर ज़ोर डालता है.






लक्ष्य निर्धारण और मिसाइल गाइडेंस में सुधार लाने में एआई के महत्व पर ज़ोर देता है.

ये इस बात पर प्रकाश डालता है कि रडार प्रणालियों को उन नए कार्यों से निपटने की आवश्यकता है, जिन्हें पारंपरिक एआई एल्गोरिदम द्वारा खराब तरीके से किया जाता है, जैसे कि लक्ष्य पहचान (रणनीतिक पारंपरिक और परमाणु हमले की क्षमताओं सहित).

स्रोत: यूरोपीयन लीडरशिप नेटवर्क

 

कुल मिलाकर, अमेरिका, चीन और रूस में एनसी-3 से संबंधित प्रक्रियाओं में एआई के एकीकरण पर चल रही चर्चा दो मुद्दों पर टिकी है. ये प्रतिस्पर्धात्मक लाभ प्राप्त करने और विरोधियों के विरुद्ध प्रतिरोध क्षमता बढ़ाने की ओर झुकी हुई है. हालांकि, चीनी रणनीतिक विशेषज्ञों ने एआई प्रणालियों पर अत्यधिक निर्भरता और विश्वास को लेकर चिंताएं भी जताई हैं.

रणनीतिक स्थिरता

इसी संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र महासभा का संकल्प A/RES/80/23 मौजूदा परिस्थितियों और भविष्य की चुनौतियों से निपटने के मुद्दों पर प्रकाश डालता है. एक वैचारिक ढांचे और नीतिगत उपकरण दोनों के रूप में, रणनीतिक स्थिरता उन प्रोत्साहनों को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक हो गई है, जो राज्यों को परमाणु संघर्ष की ओर धकेलते हैं. इसीलिए ये फैसला किया गया कि एआई-सक्षम एनसी-3 संरचनाएं और संबंधित प्रणालियां मानव नियंत्रण और निगरानी में रहेंगी. ये प्रणालियां परमाणु हथियारों के उपयोग पर स्वायत्त रूप से निर्णय लेने में सक्षम नहीं होंगी.

मानव हस्तक्षेप से परे ख़तरे

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के तीव्र विकास ने बहस को मानवीय हस्तक्षेप की अवधारणा से आगे बढ़ाकर अनजाने में होने वाले तनाव के ख़तरों की ओर मोड़ दिया है, विशेष रूप से संकट के दौरान. जैसे-जैसे तकनीकी ज्यादा एडवांस होती है, वैसे-वैसे नीति निर्माताओं की ज़ोखिमों लेने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है. इससे शुरुआती कदम का लाभ उठाने की प्रेरणा मिलती है और विरोधियों के ख़िलाफ संभावित हमले को रोकने के लिए कार्रवाई करने के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनती हैं. निर्णय लेने की प्रक्रिया का छोटा होने के कारण मानवीय निगरानी में कमी से गलतफहमी, गलत व्याख्या और गलत अनुमान की संभावना बढ़ सकती है.

निर्णय लेने की प्रक्रिया का छोटा होने के कारण मानवीय निगरानी में कमी से गलतफहमी, गलत व्याख्या और गलत अनुमान की संभावना बढ़ सकती है.

विभिन्न देशों का वोटिंग पैटर्न

संकल्प A/RES/80/23 पर मतदान के पैटर्न ने परमाणु हथियारों से लैस और परमाणु हथियारों से रहित देशों के बीच परमाणु हथियारों की भूमिका के संबंध में एक संरचनात्मक विभाजन को दिखाया.

कुल 118 सदस्य देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया, नौ देशों ने इसके विरोध में मतदान किया (अर्जेंटीना, बुरुंडी, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, दक्षिण कोरिया, फ्रांस, इज़राइल, रूसी संघ, ब्रिटेन और अमेरिका), जबकि 44 देशों ने मतदान से परहेज़ किया. स्पष्ट रूप से, प्रमुख परमाणु-सशस्त्र देशों ने रणनीतिक बाधाओं से बचने के लिए इस प्रस्ताव का विरोध किया. मतदान के इस पैटर्न से ये भी स्पष्ट होता है कि परमाणु-सशस्त्र न होने वाले देश, विशेष रूप से परमाणु-सशस्त्र देशों के भौगोलिक रूप से निकट स्थित देश, परमाणु रणनीति के संदर्भ में एआई के ख़तरों को किस तरह देखते हैं.

परमाणु निरस्त्रीकरण की वकालत करने वाले गैर-परमाणु देशों ने एआई प्रणालियों को एक नए ज़ोखिम के रूप में वर्गीकृत किया है. ये परमाणु हथियारों और संबंधित संरचनाओं की मौजूदा कमज़ोरी को और बढ़ा देता है. उनका तर्क है कि परमाणु हथियारों वाले देशों में एआई के एकीकरण की सीमा और स्तर को सत्यापित और प्रमाणित करने में कठिनाई सुरक्षा दुविधा को और गहरा करती है. इसके जवाब में, उन्होंने विश्वास निर्माण और ज़ोखिम कम करने के नए उपाय प्रस्तावित किए हैं, जो तकनीकी की प्रधानता को स्पष्ट रूप से दिखाती है.

सहमति की तलाश में वैश्विक शक्तियां

एआई एकीकरण के माध्यम से तकनीकी बढ़त बनाए रखने के लिए हथियारों की होड़ के बावजूद कुछ मुद्दों पर सहमति बनाने की कोशिश की गई है. परमाणु-सशस्त्र देशों ने मानव-केंद्रित ढांचे पर आधारित सीमाओं के आसपास व्यापक सहमति बनाने की कोशिश की है. हालांकि, इसे स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है.

अमेरिका और चीन दोनों ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि फैसले लेने में एआई को मनुष्यों का स्थान नहीं दिया जाना चाहिए. इसी तरह, ब्रिटेन और फ्रांस ने परमाणु हथियार संपन्न देशों के लिए जिम्मेदार व्यवहारों की रूपरेखा तय करने में मानवीय सक्रियता बढ़ाने की वकालत की है. संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव में मौजूदा भू-राजनीतिक वास्तविकताओं और परमाणु हथियारों के पूर्ण उन्मूलन में मौजूद गंभीर बाधाओं को स्वीकार किया गया है. इसमें कहा गया है कि व्यावहारिक मार्ग जोखिम को कम करने में निहित है, और परमाणु हथियारों के ख़तरों को कम करने के लिए "अधिक प्रभावी, ठोस और पारदर्शी उपायों की तत्काल आवश्यकता" है. हालांकि, ऐसे उपाय निरस्त्रीकरण का विकल्प नहीं हैं, बल्कि मौजूदा परमाणु हथियारों से उत्पन्न होने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए चलने वाले निरंतर कदम हैं.

एआई के सैन्य इस्तेमाल में मानवीय निर्णय और निगरानी, इससे जुड़े ज़ोखिमों को कम करने के लिए ज़रूरी हैं.

भारत का नज़रिया

परमाणु हथियार संपन्न देश होने के नाते, भारत एक अद्वितीय और जटिल ख़तरे वाले वातावरण में कार्यरत है. भारत को चीन और पाकिस्तान जैसे दो परमाणु हथियार संपन्न पड़ोसी देशों से राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. 2020 में चीन के साथ गलवान घाटी संघर्ष और 2025 में पाकिस्तान के साथ ऑपरेशन सिंदूर ने परमाणु प्रतिरोध की गतिशीलता और नई दिल्ली के लिए व्यापक सुरक्षा वातावरण को और ज़्यादा तनावपूर्ण बना दिया है.

यही वजह है कि भारत के लिए अपने विरोधियों से आगे रहना एक जरूरी लक्ष्य है. परमाणु हथियारों के संबंध में, भारत इनकी निवारक के रूप में प्राथमिक भूमिका पर ज़ोर देता रहता है. इसलिए भारत एक प्रभावी प्रतिरोधक के रूप में एक मज़बूत परमाणु त्रिशूल हासिल करने के लिए तकनीकी का विकास और अधिग्रहण कर रहा है. भारत में परमाणु हथियारों पर राजनीतिक नियंत्रण है. इसे देखते हुए इस बात के कोई संकेत नहीं हैं कि भारत अल्पावधि से मध्यम अवधि में अपने एनसी-3 बुनियादी ढांचे में ऑटोमेशन की ओर कदम बढ़ाएगी. इसके अलावा, भारत का अपना डिफेंस इकोसिस्टम अभी भी प्रारंभिक अवस्था में है.

अक्टूबर 2025 में संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रथम समिति में पेश एक प्रस्ताव में, भारत ने अपने पांच-स्तंभ वाले "विश्वसनीय एआई" ढांचे की रूपरेखा प्रस्तुत की, जिसमें शामिल हैं: (i) विश्वसनीयता और मजबूती; (ii) सुरक्षा; (iii) पारदर्शिता; (iv) निष्पक्षता; और (v) गोपनीयता. इसमें इस बात पर ज़ोर दिया गया कि एआई के सैन्य इस्तेमाल में मानवीय निर्णय और निगरानी, ​​इससे जुड़े ज़ोखिमों को कम करने के लिए ज़रूरी हैं. 

हालांकि, ये मानक ढांचा एक आधारभूत रेखा स्थापित करता है, लेकिन युद्धक्षेत्र में, विशेष रूप से यूक्रेन और पश्चिम एशिया के संघर्ष क्षेत्रों में, एआई को तेज़ी से अपनाए जाने से ये संकेत मिलता है कि भारत सैद्धांतिक ज़िद पर अड़े रहने का ख़तरा नहीं उठा सकता. भू-राजनीतिक परिस्थितियों में हो रहे बदलावों और एआई एकीकरण पर अन्य परमाणु-सशस्त्र देशों की बदलती सैद्धांतिक स्थितियों को देखते हुए भारत को तुरंत प्रतिक्रिया देनी होगी. इसमें लचीलापन बढ़ाने और विश्वसनीय सेकेंड स्ट्राइक क्षमता को बनाए रखने के लिए अपने एनसी-3 बुनियादी ढांचे को उन्नत करना शामिल है.

भविष्य की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि परमाणु हथियार संपन्न देशों के बीच घटते राजनीतिक विश्वास और लगातार बनी हुई गलतफहमियों वाले माहौल में किस प्रकार के आश्वासन और जोखिम कम करने के उपाय अपनाए जाते हैं.

अब क्या होगा?

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर संयुक्त राष्ट्र महासभा का प्रस्ताव एनसी-3 के साथ एकीकरण, निरस्त्रीकरण बहस में गतिरोध को दूर करने की दिशा में एक रचनात्मक कदम है. उभरती प्रौद्योगिकियों के विघटनकारी प्रभाव ने परमाणु हथियार संपन्न देशों को इससे जुड़े ज़ोखिमों और चुनौतियों पर गंभीरता से विचार करने के लिए नई गति प्रदान की है. इसके साथ ही, परमाणु हथियार रहित देशों को ख़तरे कम करने के उपायों को अपनाने के लिए प्रोत्साहन मिल रहा है. भविष्य की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि परमाणु हथियार संपन्न देशों के बीच घटते राजनीतिक विश्वास और लगातार बनी हुई गलतफहमियों वाले माहौल में किस प्रकार के आश्वासन और जोखिम कम करने के उपाय अपनाए जाते हैं.


समीर पाटिल ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर सिक्योरिटी, स्ट्रैटेजी और टेक्नोलॉजी में डायरेक्टर हैं.

राहुल रावत ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में रिसर्च असिस्टेंट हैं.

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