अमीर देशों के ब्याज दर बढ़ाने से पैसा उनके पास चला जाता है और विकासशील देशों से बाहर निकल जाता है जिससे गरीब देशों में कर्ज और आर्थिक संकट बढ़ जाता है. समझिए कैसे वैश्विक मौद्रिक नीतियां अलग-अलग देशों पर असमान असर डालती हैं.
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जब बड़ी अर्थव्यवस्थाएं ब्याज दर बढ़ाती हैं तो कर्ज़ महंगा हो जाता है, लोग कम खर्च करते हैं और कीमतें घट जाती हैं. अमेरिकी फेडरल रिज़र्व ने मार्च 2022 से जुलाई 2023 के बीच 11 बार ब्याज दरों में बढ़ोतरी की. इस तरह कुल मिलाकर 525 बेसिस प्वाइंट की वृद्धि की गई. पिछले चार दशकों में ये सबसे तेज बढ़ोतरी में से है जिसके कारण ब्याज दर शून्य से बढ़कर लगभग 5.25-5.50 प्रतिशत हो गया. ये बढ़ोतरी केवल अमेरिका में नहीं हो रही थी. यूरोपियन सेंट्रल बैंक और बैंक ऑफ इंग्लैंड भी उसी समय इस दिशा में बढ़ा.
आज की एक-दूसरे से जुड़ी वित्तीय प्रणाली में पूंजी तेज़ी से आगे बढ़ती है और वो किसी के पास टिक कर नहीं रहती. जब बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में ब्याज दरें बढ़ती हैं तो पैसा उनकी तरफ जाता है और बाकी देशों से दूर चला जाता है. जिन देशों पर कर्ज़ है या जिनके पास सीमित भंडार है, उन्हें सबसे ज़्यादा नुकसान उठाना पड़ता है.

जब बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में ब्याज दरें बढ़ती हैं तो विकासशील देशों में संपत्ति रखने वालों लोगों के सामने एक सीधा सा सवाल आता है: क्या जोखिम के बदले मिलने वाला मुनाफा ठीक है? IMF की अप्रैल 2026 की वैश्विक वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के अनुसार 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद से उभरते बाज़ारों में आने वाला पैसा आठ गुना बढ़ गया है और ये 4 ट्रिलियन डॉलर के करीब हो गया है. लेकिन ये पैसा वैश्विक जोखिम में बदलाव को लेकर भी बेहद संवेदनशील हो गया है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार बाज़ार अनिश्चितता में अचानक थोड़ी बढ़ोतरी (जैसे कि फेडरल रिजर्व ने 2022 में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की शुरुआत की थी) के कारण भी इन देशों से पैसा तेज़ी से बाहर जा सकता है. इससे तिमाही GDP का लगभग 1 प्रतिशत बाहर चला जाता है.
पिछले चार दशकों में ये सबसे तेज बढ़ोतरी में से है जिसके कारण ब्याज दर शून्य से बढ़कर लगभग 5.25-5.50 प्रतिशत हो गया. ये बढ़ोतरी केवल अमेरिका में नहीं हो रही थी. यूरोपियन सेंट्रल बैंक और बैंक ऑफ इंग्लैंड भी उसी समय इस दिशा में बढ़ा.
जब वैश्विक स्थितियां कठिन होती हैं तो पैसा तेज़ी से देश से बाहर जा सकता है. भारी कर्ज़ या सीमित भंडार वाले जिन देशों ने इस स्थिति में प्रवेश किया, उनके पास इस तरह के झटकों को सहने की सबसे कम गुंजाइश थी. अमेरिका ने ब्याज दरों को कम करने की शुरुआत की, जर्मनी ने इसका अनुसरण किया. यूरोपियन सेंट्रल बैंक ने जुलाई 2022 और 2023 के अंत के बीच अपनी ब्याज दरों में 10 बार बढ़ोतरी की. इस तरह ब्याज दरें 2008 के वित्तीय संकट के बाद से सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गई. बैंक ऑफ इंग्लैंड ने भी यही किया और दो साल के भीतर दरों को लगभग शून्य से बढ़ाकर 5.25 प्रतिशत पर पहुंचा दिया. जब सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं एक साथ सख्ती बरतती हैं तो कोई सहारा नहीं रहता, कोई विकल्प नहीं होता और बचने का कोई उपाय नहीं होता. विकासशील देशों के लिए सभी दिशाओं से तूफान एक साथ आया.
संकट से पहले कोई देश कहां खड़ा था, उससे ये तय होता है कि वो कितना बुरा फंसेगा. घाना, श्रीलंका और पाकिस्तान अलग-अलग कारणों से संकट के कगार पर पहुंचे- अलग-अलग खर्च करने की आदत, अलग-अलग गवर्नेंस की नाकामी, अलग-अलग आर्थिक संरचना. तीनों में जो समानता थी, वो एक जैसा उद्देश्य नहीं बल्कि एक जैसी स्थिति थी: भारी कर्ज़, थोड़ा सा विदेशी मुद्रा भंडार और वैश्विक स्थितियों के बिगड़ने पर लगभग कोई गुंजाइश न होना. तीनों ने उस समय कर्ज़ लिया जब ब्याज दरें कम थी और महामारी के समय खर्च किया. लेकिन ये स्थिति कई वर्षों की देन है.
घाना की समस्या ज़रूरत से ज़्यादा खर्च के साथ शुरू हुई. वो जितना राजस्व इकट्ठा कर रहा था, उससे बहुत ज़्यादा खर्च कर रहा था. श्रीलंका की समस्याएं अलग थीं. निर्यात से ज़्यादा आयात होने की वजह से विदेशी मुद्रा भंडार कई वर्षों से घट रहा था. 2021 में उर्वरक पर सरकारी प्रतिबंध से हालात काफी बिगड़ गए. इससे फसलों को नुकसान हुआ, निर्यात से होने वाली आय कम हुई और खाद्य संकट खड़ा हो गया. ये सब उस समय हो रहा था जब वैश्विक वित्तीय स्थिति कठिन हो रही थी.
जब बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में ब्याज दरें बढ़ती हैं तो अक्सर पैसा विकासशील देशों से बाहर चला जाता है. कम विदेशी मुद्रा भंडार, ज्यादा विदेशी कर्ज और कमज़ोर वित्तीय प्रणाली वाले देशों पर सबसे ज़्यादा असर पड़ता है. IMF की अप्रैल 2025 की वैश्विक वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट ने चेतावनी दी कि कठिन वैश्विक स्थिति मुद्राओं को कमज़ोर कर सकती है.
पाकिस्तान की चुनौती संरचनात्मक और दीर्घकालिक थी. IMF के बजट विश्लेषण से पता चला कि 2023-24 में केवल ब्याज भुगतान 7.3 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपये से ज़्यादा होने की उम्मीद थी. ये सरकार के कुल राजस्व से भी ज़्यादा था.
आज की वैश्विक वित्तीय प्रणाली की एक प्रमुख विशेषता ये है कि अमेरिका, जर्मनी या इंग्लैंड जैसे देशों में ब्याज दरों पर फैसलों का दूर-दराज के देशों पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है. ये उस समय भी हो सकता है जब वो फैसले उस देश के लिए ज़रूरी हैं. जब बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में ब्याज दरें बढ़ती हैं तो अक्सर पैसा विकासशील देशों से बाहर चला जाता है. कम विदेशी मुद्रा भंडार, ज्यादा विदेशी कर्ज और कमज़ोर वित्तीय प्रणाली वाले देशों पर सबसे ज़्यादा असर पड़ता है. IMF की अप्रैल 2025 की वैश्विक वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट ने चेतावनी दी कि कठिन वैश्विक स्थिति मुद्राओं को कमज़ोर कर सकती है, संपत्तियों की कीमत घटा सकती है और उभरते बाज़ारों से पूंजी बाहर कर सकती है. इससे पता चलता है कि ये देश अभी भी कितने जोखिम में हैं, यहां तक कि वो देश भी जिन्होंने अपनी नीतियों में सुधार के लिए कड़ी मेहनत की है.
इस बात पर विचार करना होगा कि क्या संकट से निपटने की योजना अगले संकट को रोकने या केवल मौजूदा संकट को काबू में करने के हिसाब से तैयार की गई है. जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक ये सिस्टम अलग-अलग देशों को अगले झटके के लिए तैयार करने के बदले उन्हें सहारा देता रहेगा.
पश्चिम और मध्य अफ्रीका में 14 देश CFA फ्रैंक का इस्तेमाल करते हैं. ये यूरो से जुड़ी मुद्रा है. इसका ये मतलब है कि ब्याज दरों को लेकर ECB का फैसला सीधे उनकी अर्थव्यवस्थाओं पर असर डालता है जबकि निर्णय लेने में उनकी कोई भूमिका नहीं है. बैंक ऑफ इंग्लैंड के फैसले भी उन अर्थव्यवस्थाओं पर वही असर डालते हैं जो ब्रिटिश पाउंड में कर्ज़ चुकाते हैं. ये संस्थान अपने अधिकार क्षेत्र में निर्णय लेते हैं. लेकिन समस्या ये है कि उनके निर्णय उनकी सीमाओं के बाहर की स्थिति को ध्यान में रखकर लेने के लिए नहीं होते हैं.
IMF रिसर्च से पता चलता है कि फंड की अधिक लागत, बड़े कर्ज़ के पुनर्वित की आवश्यकताओं और बाहर जाते कम पैसे ने विकासशील देशों के पास बुनियादी खर्च के लिए उपलब्ध पैसा कम कर दिया है. ये स्थिति उस समय भी है जब अमीर देशों ने ब्याज दरों में कटौती की शुरुआत की है. सुधार की ज़रूरत इसलिए नहीं है कि किसी ने गलत फैसला लिया. इसका कारण ये है कि नियम अलग दुनिया के हिसाब से बनाए गए हैं. संकट के समय उभरते बाज़ार जिन संस्थानों की ओर रुख करते हैं, वहां उनकी भागीदारी बहुत कम है. कर्ज़ से राहत तब मिलती है जब नुकसान हो चुका होता है.
जो संस्थान संकट में फंसे देशों को बचाते हैं, वो वही हैं जो वसूली की शर्तें तय करते हैं. घाना, श्रीलंका और पाकिस्तान में IMF के कार्यक्रम के तहत वित्तीय अनुशासन के उपाय ज़रूरी हैं. जिन देशों में वित्तीय गुंजाइश लगभग नहीं के बराबर थीं, वहां ये शर्तें लागू होने पर वो कमज़ोरियों बढ़ सकती हैं जिनकी वजह से संकट खड़ा हुआ था. IMF ने 2023 में श्रीलंका के लिए 2.9 अरब डॉलर की एक्सटेंडेड फंड फैसिलिटी (EFF) की व्यवस्था मंज़ूर की. सुधार केवल मतदान में हिस्सेदारी तक सीमित नहीं रह सकता. उसे इस बात पर विचार करना होगा कि क्या संकट से निपटने की योजना अगले संकट को रोकने या केवल मौजूदा संकट को काबू में करने के हिसाब से तैयार की गई है. जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक ये सिस्टम अलग-अलग देशों को अगले झटके के लिए तैयार करने के बदले उन्हें सहारा देता रहेगा. वैश्विक मौद्रिक नीति सीमाओं से परे है लेकिन वैश्विक गवर्नेंस नहीं. जब तक ये बदलाव नहीं होता, तब तक सुधार उन हाथों में बने रहेंगे जिनके पास सबसे ज़्यादा वोट है और जो सबसे कम प्रभावित हैं. ये डिज़ाइन की खामी नहीं है बल्कि डिज़ाइन है.
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Dhani Mehrishi is a Research Intern at the Observer Research Foundation. ...
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