Author : Vivek Mishra

Expert Speak Raisina Debates
Published on Mar 20, 2026 Updated 4 Days ago

पश्चिम एशिया की हवा इन दिनों बारूद की गंध से भरी है. डोनाल्ड ट्रम्प का नया मध्य पूर्व बनाने का सपना अब एक ऐसे युद्ध में बदलता दिख रहा है जहां हर दिन हालात और ज्यादा अनिश्चित होते जा रहे हैं- इस पूरे बदलते समीकरण को विस्तार से समझने के लिए पढ़िए पूरा लेख.

कहानी ‘नए मध्य पूर्व’ की…अंजाम किसके पक्ष में?

ईरान में युद्ध खतरनाक स्तर तक बढ़ता जा रहा है. ट्रंप द्वारा एकतरफा जीत की घोषणा और ईरान की युद्धविराम के लिए तीन शर्तें एक-दूसरे से बिल्कुल अलग नजर आती हैं. कई अमेरिकी विमानों को मार गिराया गया है जिनमें हाल ही में इराक के ऊपर एक ईंधन भरने वाला विमान भी शामिल है. अमेरिका के कई सैन्य ठिकानों पर हमले हुए हैं और उसके क्षेत्रीय सहयोगी इन हमलों को रोकने में लगे हुए हैं. इसके अलावा, ईरान द्वारा हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में बारूदी सुरंगें बिछाने की संभावित कोशिश ने स्थिति को और विस्फोटक बना दिया है.

अमेरिका और इज़राइल द्वारा किए गए घातक और सटीक हवाई हमले, जो 6,000 से अधिक हो चुके हैं, हवाई शक्ति के उपयोग की एक नई सीमा तय कर सकते हैं. जमीनी स्तर पर वाशिंगटन और तेल अवीव को वैसी सफलता नहीं मिली, जैसी उन्होंने शुरुआत में उम्मीद की थी. हवाई हमलों के बावजूद हालात पूरी तरह उनके नियंत्रण में नहीं आ पाए हैं. युद्ध की दिशा लगातार बदल रही है, जिससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिका ने इस संघर्ष में अपनी क्षमता से अधिक जोखिम उठा लिया है. अब यह युद्ध लंबा और मुश्किल होता जा रहा है, जिसका असर सिर्फ क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी पड़ सकता है.

ईरान-अमेरिका तनाव

ट्रंप प्रशासन को ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू करने के पीछे दो मुख्य कारण थे. पहला, 2018 में परमाणु समझौते (JCPOA) से बाहर निकलने के बाद दोनों देशों के बीच तनाव लगातार बढ़ता गया. दूसरा, अमेरिका चाहता था कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह बंद कर दे, लेकिन ईरान इसके लिए तैयार नहीं था. बातचीत विफल होने के बाद हालात युद्ध तक पहुंच गए.  2018 में परमाणु समझौते (JCPOA) से अमेरिका के बाहर निकलने के बाद शुरू हुआ तनाव.  और ईरान से उसके परमाणु संवर्धन कार्यक्रम को पूरी तरह बंद करने की मांग. अमेरिका का यह प्रस्ताव कि ईरान का संवर्धन केंद्र देश के बाहर हो, तेहरान को स्वीकार नहीं था. अंततः, जिनेवा में हुई वार्ताओं की विफलता, जिसमें स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर शामिल थे, ने अमेरिका को ईरान पर हमला करने का निर्णय लेने के लिए प्रेरित किया.

युद्ध की दिशा लगातार बदल रही है, जिससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिका ने इस संघर्ष में अपनी क्षमता से अधिक जोखिम उठा लिया है. अब यह युद्ध लंबा और मुश्किल होता जा रहा है, जिसका असर सिर्फ क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी पड़ सकता है.

इस ऐतिहासिक निर्णय के केंद्र में दो नेताओं, डोनाल्ड ट्रम्प और बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं थीं. दोनों नेताओं ने अलग-अलग उद्देश्यों के बावजूद ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को आवश्यक समझा. उस समय ईरान कमजोर दिखाई दे रहा था, उसके सहयोगी कमजोर हो चुके थे और उसकी अर्थव्यवस्था गिरावट में थी. जनवरी 2026 में हुए विरोध प्रदर्शनों ने यह संकेत दिया कि बाहरी मदद से शासन परिवर्तन संभव हो सकता है.

इज़राइल के लिए ईरान लंबे समय से एक बड़ा और सीधा खतरा माना जाता है. उसे लगता है कि ईरान उसकी सुरक्षा और अस्तित्व के लिए चुनौती है. 7 अक्टूबर को हमास के हमलों के बाद हालात और गंभीर हो गए. इन घटनाओं ने इज़राइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू को यह मौका दिया कि वे अमेरिका को अपने साथ और मजबूती से जोड़ सकें. इस समय अमेरिका भी इज़राइल के समर्थन में खुलकर सामने आया. दूसरी ओर, ट्रंप प्रशासन ने पहले वेनेजुएला में जो सैन्य सफलता हासिल की थी, उसी तरह की रणनीति ईरान में भी अपनाने की कोशिश की. उन्हें लगा कि हवाई हमलों और तेज कार्रवाई से जल्दी नतीजे मिल सकते हैं. लेकिन ईरान की स्थिति अलग थी. वहां कई ऐसे समूह हैं जो सीधे सरकार नहीं हैं, लेकिन उसका समर्थन करते हैं और क्षेत्र में सक्रिय हैं.

इन गैर-राज्यीय सहयोगियों के खिलाफ लंबे समय से अभियान चल रहा था, फिर भी कोई ठोस और निर्णायक सफलता नहीं मिली. इससे यह साफ हो गया कि सिर्फ हवाई हमलों से ईरान को झुकाना आसान नहीं है. इस कारण युद्ध जटिल और लंबा होता जा रहा है. ईरानी शासन को गिराने का एकमात्र संभावित तरीका आंतरिक विद्रोह और बाहरी सैन्य समर्थन का संयोजन हो सकता था, लेकिन यह वास्तविकता कभी मजबूत नहीं रही. उल्टा, हमलों के बाद ईरान में राष्ट्रवादी भावना और मजबूत हो गई है, जिससे जनता शासन के साथ और मजबूती से जुड़ गई है.

ट्रंप अब अपने इस निर्णय को लेकर दबाव में दिखाई देते हैं. युद्ध की बढ़ती लागत और घरेलू असंतोष प्रशासन पर भारी पड़ रहा है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अमेरिका के सहयोगी पूरी तरह उसके साथ नहीं हैं. यूरोप पहले ही यूक्रेन मुद्दे पर संतुलन बना रहा था, और अब ईरान युद्ध ने उसकी प्राथमिकताओं को बदल दिया है. इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी भी घरेलू राजनीतिक दबाव का सामना कर रही हैं. ब्रिटेन ने शुरू में अमेरिका को अपने ठिकानों के उपयोग की अनुमति देने से इनकार किया था. खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देश, विशेष रूप से संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब-अब अमेरिका के साथ अपने सुरक्षा संबंधों की कीमत चुका रहे हैं और इस टकराव में खिंचने से बचना चाहते हैं.

7 अक्टूबर को हमास के हमलों के बाद हालात और गंभीर हो गए. इन घटनाओं ने इज़राइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू को यह मौका दिया कि वे अमेरिका को अपने साथ और मजबूती से जोड़ सकें. इस समय अमेरिका भी इज़राइल के समर्थन में खुलकर सामने आया.

अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष यह संकेत देता है कि एक नया मध्य पूर्व उभर रहा है. ईरान की क्षेत्रीय हमले करने की क्षमता ने खाड़ी देशों की सुरक्षा धारणाओं को हिला दिया है. ईरान की ‘प्रेसाइज मास‘ रणनीति-जिसमें सस्ते ड्रोन और मिसाइलों का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है-ने युद्ध की लागत का समीकरण बदल दिया है.

ट्रंप की मध्य पूर्व रणनीति

तेहरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की कोशिश, जिसकी कमजोरी का अध्ययन 1980 के दशक के टैंकर युद्ध के समय से किया जाता रहा है-वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरे प्रभाव डालने वाले सबसे गंभीर उकसावे वाले जोखिमों में से एक है. ईरानी नौसैनिक संपत्तियों, जैसे IRIS Dena, को निशाना बनाना और व्यापक समुद्री क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियां यह संकेत देती हैं कि यह संघर्ष अपनी रणनीतिक सीमा को बढ़ाते हुए इंडो-पैसिफिक के करीब पहुँच रहा है. भारत के लिए, यह बदलाव उसकी पारंपरिक संतुलित भू-राजनीतिक नीति को अभूतपूर्व चुनौती के सामने खड़ा करता है, क्योंकि हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास किसी भी प्रकार का व्यवधान सीधे उसकी ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार मार्गों और पश्चिमी हिंद महासागर में उसके व्यापक रणनीतिक हितों को प्रभावित करता है.

ऐसे हालात में किसी एक की जल्दी जीत मुश्किल लगती है. ट्रंप की यह रणनीति मध्य पूर्व को बदलने की कोशिश जरूर है, लेकिन इसके नतीजे पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं. इसमें जोखिम ज्यादा है और फायदा कब मिलेगा, यह कहना मुश्किल है.

ट्रंप की मध्य पूर्व नीति चार मुख्य आधारों पर टिकी थी. पहला, I2U2 समूह के जरिए क्षेत्रीय देशों के बीच सहयोग बढ़ाना. दूसरा, अब्राहम समझौतों के माध्यम से इज़राइल और अरब देशों के रिश्ते सुधारना. तीसरा, गाज़ा के पुनर्निर्माण की योजना, जिससे वहां स्थिरता लाई जा सके. और चौथा, भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC), जिसका उद्देश्य व्यापार और ऊर्जा के नए रास्ते बनाना था. लेकिन ईरान के साथ बढ़ते तनाव और उसके युद्धविराम से इनकार करने के कारण ये सभी योजनाएं प्रभावित हो रही हैं. क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ने से निवेश, व्यापार और सहयोग की संभावनाएं कमजोर पड़ रही हैं. इससे न सिर्फ अमेरिका की योजनाओं पर असर पड़ा है, बल्कि उसके सहयोगी देश भी अब सावधानी बरत रहे हैं.

आगे चलकर यह युद्ध लंबा खिंच सकता है, जिसमें दोनों पक्षों को अपनी ताकत और धैर्य का पूरा इस्तेमाल करना पड़ेगा. ऐसे हालात में किसी एक की जल्दी जीत मुश्किल लगती है. ट्रंप की यह रणनीति मध्य पूर्व को बदलने की कोशिश जरूर है, लेकिन इसके नतीजे पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं. इसमें जोखिम ज्यादा है और फायदा कब मिलेगा, यह कहना मुश्किल है.


विवेक मिश्रा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में सामरिक अध्ययन कार्यक्रम के उप निदेशक हैं. 

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Vivek Mishra is Deputy Director – Strategic Studies Programme at the Observer Research Foundation. His work focuses on US foreign policy, domestic politics in the US, ...

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