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Published on Apr 15, 2026 Updated 0 Hours ago

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज सदियों से व्यापार और ताकत की लड़ाई का केंद्र रहा है और 2026 का अमेरिका–ईरान तनाव उसी इतिहास की नई कड़ी है. तेल-गैस के इस अहम रास्ते पर नियंत्रण की जंग आज भी उतनी ही निर्णायक है, जितनी कभी मसालों और समुद्री व्यापार के दौर में थी. पढ़े विश्लेषण.

होर्मुज… एक रणनीतिक दरवाजा- जानें पूरा इतिहास

2026 में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को वैश्विक ध्यान के केंद्र में ला दिया. इस दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया, जिसमें जलडमरूमध्य को समुद्री यातायात के लिए फिर से खोलने की मांग की गई और चेतावनी दी गई कि मांग पूरी न होने पर ईरान के बिजली संयंत्रों और अन्य महत्वपूर्ण ढांचों पर हमले किए जा सकते हैं. यह घटना उस लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसमें हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य और हॉर्मुज़ बंदरगाह व्यापार और शक्ति के संघर्षों का केंद्र रहे हैं. 2026 की घटनाएं 1507 (पुर्तगालियों का कब्ज़ा), 1552 (उस्मानी चुनौती), 1622 (एंग्लो-फारसी द्वारा पुर्तगालियों का निष्कासन) और 1625 (पुर्तगाली, अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी और डच VOC के बीच नौसैनिक संघर्ष) जैसी ऐतिहासिक घटनाओं की निरंतरता को दर्शाती हैं.

हॉर्मुज़ का इतिहास

हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य का नाम ईरान के छोटे से हॉर्मुज़ द्वीप से पड़ा है. सदियों तक यह द्वीप अंतरमहाद्वीपीय व्यापार का एक प्रमुख केंद्र रहा, जहाँ भारी मात्रा में व्यापारिक गतिविधियाँ होती थीं और यह समुद्री व्यापार मार्गों के जरिए दूर-दराज़ क्षेत्रों को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी था. वैश्विक आर्थिक इतिहास में हॉर्मुज़ ने फ़ारस की खाड़ी के माध्यम से हिंद महासागर और यूरोप के बीच व्यापार को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. हालांकि इस मार्ग पर बसरा, बेरूत और अलेक्जेंड्रिया जैसे अन्य केंद्र भी महत्वपूर्ण थे, लेकिन फ़ारस की खाड़ी के मुहाने पर स्थित होने के कारण हॉर्मुज़ की स्थिति विशेष थी.

1507 में हॉर्मुज़ में एक महत्वपूर्ण युद्ध हुआ, जिसमें उभरते हुए पुर्तगाली समुद्री साम्राज्य और हॉर्मुज़ के राज्य के बीच टकराव हुआ. अफोंसो डी अल्बुकर्क के नेतृत्व में पुर्तगालियों ने द्वीप पर कब्ज़ा कर लिया. बाद में उन्होंने 1509 में गोवा और 1511 में मलक्का पर भी अधिकार कर लिया.

यह दौर व्यापारिक प्रतिस्पर्धा (मर्केंटिलिज़्म) से भरा हुआ था, जिसमें उभरती यूरोपीय समुद्री शक्तियाँ दुनिया भर में लाभदायक व्यापार पर नियंत्रण के लिए लगातार संघर्ष कर रही थीं. भारत और हिंद महासागर से जुड़ा व्यापार उस समय वैश्विक अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा था. ब्रिटिश अर्थशास्त्री एंगस मैडिसन के अनुसार, 17वीं सदी में यह क्षेत्र वैश्विक GDP का लगभग 24 प्रतिशत हिस्सा था. हॉर्मुज़ पर कब्ज़ा करके पुर्तगालियों का उद्देश्य हिंद महासागर के समुद्री व्यापार पर नियंत्रण स्थापित करना था.

21वीं सदी की दूसरी तिमाही में हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में बढ़ते सैन्य और नौसैनिक तनावों के बीच यह समझना महत्वपूर्ण हो गया है कि यह क्षेत्र लंबे समय से वैश्विक भू-राजनीति और व्यापारिक संघर्षों का केंद्र रहा है.

पुर्तगालियों के आगमन से पहले हिंद महासागर का व्यापार अपेक्षाकृत खुला था, जिसमें अरब, गुजराती, बंगाली, मलाबारी, आर्मेनियाई और मिस्री व्यापारियों सहित विभिन्न समुदायों को लाभ मिलता था. हालांकि पुर्तगाली इस लाभदायक व्यापार में देर से आए, लेकिन उन्होंने वस्तुओं के प्रवाह और समुद्री मार्गों पर सख्त नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की. यह संघर्ष महत्वपूर्ण था क्योंकि इसने विश्व राजनीति और वैश्विक व्यापार में एक नए चरण की शुरुआत की. इससे गोवा स्थित पुर्तगाली समुद्री साम्राज्य-जिसे ‘एस्टाडो दा इंडिया’ कहा जाता है-का सुदृढ़ीकरण हुआ.

वर्तमान अमेरिका–ईरान तनाव को समझने से पहले यह याद रखना ज़रूरी है कि हॉर्मुज़ पर नियंत्रण हमेशा नौसैनिक शक्ति की असमानताओं पर निर्भर रहा है. 1507 में अल्बुकर्क ने लगातार नौसैनिक युद्ध और तोपों के शुरुआती उपयोग के जरिए स्थानीय प्रतिरोध को हराकर जीत हासिल की.

1552 में हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य और फ़ारस की खाड़ी में पुर्तगालियों और ओटोमन साम्राज्य के बीच तीव्र नौसैनिक संघर्ष हुए. कई प्रयासों के बावजूद उस्मानी साम्राज्य पुर्तगालियों को चुनौती देने में सफल नहीं हो पाया और पुर्तगाली अपनी पकड़ बनाए रखने में सफल रहे.

1622 में तीसरा बड़ा संघर्ष हुआ, जब पुर्तगाली सेना का सामना फारसी सेना से हुआ, जिसे अंग्रेज़ों का समर्थन प्राप्त था. इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी (1600) और डच ईस्ट इंडिया कंपनी (1602) भी हिंद महासागर में उसी महत्वाकांक्षा के साथ उतरे थे, जैसी पहले पुर्तगालियों की थी. अंग्रेज़ों का उद्देश्य एशियाई समुद्री मार्गों पर पुर्तगाली नियंत्रण को तोड़ना और अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करना था. इसी दौरान ईरान के शासक शाह अब्बास I ने अधिक आक्रामक तटीय नीति अपनाई, बहरीन पर कब्ज़ा किया, बंदर अब्बास बंदरगाह का विकास किया और ग्वादर जैसे महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति मजबूत की.

इस दौर की कूटनीतिक चालें और व्यापारिक प्रतिस्पर्धाएँ 21वीं सदी की राजनीति की तुलना में कहीं अधिक जटिल थीं. अंततः अंग्रेज़–फारसी संयुक्त सेना ने पुर्तगालियों को निर्णायक रूप से हरा दिया और हॉर्मुज़ पर उनका नियंत्रण समाप्त कर दिया. इसके बाद पुर्तगाली मस्कट चले गए, जो आगे चलकर उनके लिए एक महत्वपूर्ण आधार बन गया.

हॉर्मुज़ एक बार फिर निर्णायक साबित हुआ. इस हार ने पुर्तगाल की साम्राज्यिक शक्ति को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया, जिसका प्रभाव गुजरात से लेकर थाईलैंड और गोवा से लेकर मकाऊ तक देखा गया. हॉर्मुज़ कभी केवल एक क्षेत्रीय व्यापारिक मार्ग नहीं रहा; इसका रणनीतिक महत्व हमेशा व्यापक भू-राजनीतिक संघर्षों के केंद्र में रहा है. घोड़ों, मसालों, रेशम, तेल या प्राकृतिक गैस जैसे वस्तुओं के व्यापार के अलावा, इसने कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक क्षणों में विश्व इतिहास की दिशा को भी प्रभावित किया है.

1625 में हॉर्मुज़ का युद्ध फ़ारस की खाड़ी में उस समय तक के सबसे बड़े नौसैनिक संघर्षों में से एक माना जाता है. इस युद्ध में पुर्तगाली बेड़े पर इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी और डच ईस्ट इंडिया कंपनी के संयुक्त दबाव का सामना करना पड़ा. हालांकि यह युद्ध किसी निर्णायक परिणाम तक नहीं पहुँचा और इसे सामान्यतः बराबरी (ड्रा) माना जाता है, फिर भी इसने क्षेत्र में पुर्तगाली नौसैनिक प्रभुत्व को कमजोर कर दिया. इसके बाद के वर्षों में पुर्तगालियों ने हॉर्मुज़ को वापस पाने के कई प्रयास किए-1620 के दशक में बार-बार सैन्य कोशिशें और 1631 में कूटनीतिक प्रयास भी-लेकिन सभी विफल रहे. ये असफलताएँ समुद्री शक्ति में धीरे-धीरे हो रहे बदलाव को दर्शाती हैं. सदियों से होर्मुज जलडमरूमध्य समुद्री शक्ति का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है, जो वैश्विक व्यवस्था में व्यापक बदलावों को प्रतिबिंबित करता है.

वर्तमान में हॉर्मुज़ की भूमिका

21वीं सदी की दूसरी तिमाही में होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते सैन्य और नौसैनिक तनावों के बीच यह समझना आवश्यक हो गया है कि यह क्षेत्र लंबे समय से वैश्विक भू-राजनीति और व्यापारिक संघर्षों का केंद्र रहा है. इतिहास में पुर्तगाली, उस्मानी तुर्क, सफ़वीद फ़ारसी, अंग्रेज़, अरब व्यापारी और डच जैसी विभिन्न शक्तियों ने इस महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग पर वर्चस्व के लिए लगातार संघर्ष किया. इन संघर्षों के परिणाम दूरगामी रहे-इन्होंने राजनीतिक मानचित्रों को बदला, अंतरराष्ट्रीय व्यापार के स्वरूप को प्रभावित किया और महत्वपूर्ण संसाधनों की खपत को भी रूपांतरित किया.

यदि 16वीं और 17वीं सदी के हॉर्मुज़ संघर्षों ने घोड़ों, मसालों और कपास के व्यापार के माध्यम से वैश्विक व्यवस्था को बदला था, तो आज का बढ़ता तनाव भी तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति को बाधित करके इसी तरह व्यापक प्रभाव डाल सकता है. इसलिए आज होर्मुज जलडमरूमध्य पर दिया जा रहा ध्यान एक लंबे ऐतिहासिक क्रम का हिस्सा है-जहाँ रणनीतिक व्यापार मार्गों पर नियंत्रण लगातार वैश्विक भू-राजनीतिक परिणामों को आकार देता रहा है.


डॉ. अभिमन्यु सिंह अरहा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), नई दिल्ली के ऐतिहासिक अध्ययन केंद्र में एसोसिएट प्रोफेसर हैं.
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Abhimanyu Singh Arha

Abhimanyu Singh Arha

Abhimanyu Singh Arha is a historian and an academician currently serving as Associate Professor at Centre for Historical Studies, School of Social Sciences, Jawaharlal Nehru ...

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