Author : Kavya Wadhwa

Expert Speak Raisina Debates
Published on Dec 26, 2025 Updated 13 Days ago

SHANTI विधेयक भारत के परमाणु क्षेत्र में निजी भागीदारी का बड़ा कदम है. सफलता भरोसेमंद नियमन पर निर्भर है. आगामी दशक तय करेगा कि यह ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाता है या सिर्फ वादा रह जाता है.

SHANTI बिल और 100 GW लक्ष्य: अवसर या चुनौती?

शांति विधेयक (SHANTI Bill) 1962 के परमाणु ऊर्जा अधिनियम के बाद भारत के परमाणु शासन में सबसे बड़ा सुधार है. पुराने ढांचे ने देश की रणनीतिक सुरक्षा तो सुनिश्चित की लेकिन परमाणु ऊर्जा को कुल बिजली उत्पादन में 2 प्रतिशत से भी कम पर सीमित रखा. शांति विधेयक इस व्यवस्था को बदलते हुए निजी भागीदारी की अनुमति देता है ताकि परमाणु बिजली उत्पादन को तेज़ी से बढ़ाया जा सके जबकि संवेदनशील और रणनीतिक क्षेत्रों पर सरकार का नियंत्रण बना रहे.

शांति विधेयक (SHANTI Bill) 1962 के परमाणु ऊर्जा अधिनियम के बाद भारत के परमाणु शासन में सबसे बड़ा सुधार है.

हालाँकि, इस विधेयक की सफलता कानून पर नहीं, उसके अमल पर निर्भर करेगी. असली सवाल यह है कि क्या भारत इस नए ढांचे को समय पर परियोजनाओं, भरोसेमंद नियमन और प्रभावी निर्माण में बदल पाएगा या फिर यह सुधार भी पिछली नीतियों की तरह देरी और कमजोर क्रियान्वयन का शिकार हो जाएगा.

स्वदेशी SMR पर दांव: आठ साल की चुनौती

भारत ने 2033 तक स्वदेशी स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) शुरू करने का लक्ष्य तय किया है लेकिन यह समय-सीमा अपने साथ गंभीर रणनीतिक जोखिम भी लेकर आती है. अगले आठ वर्षों के दौरान वैश्विक परमाणु बाज़ार में तेज़ गतिविधि देखने को मिलेगी, जहाँ कई विदेशी कंपनियाँ अपनी पहले से परखी हुई और व्यावसायिक रूप से उपलब्ध SMR तकनीकों को आक्रामक रूप से आगे बढ़ाएँगी. ऐसी स्थिति में भारतीय निजी उद्योग जो ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक विस्तार के लिए शीघ्र परमाणु क्षमता चाहता है, स्वाभाविक रूप से कम जोखिम वाले और तुरंत उपलब्ध विदेशी विकल्पों की ओर झुक सकता है, बजाय इसके कि वह अभी तक अपरीक्षित स्वदेशी डिज़ाइनों का इंतज़ार करे.

भारत का पिछला अनुभव भी इस आशंका को मज़बूत करता है. तमिलनाडु के कलपक्कम में स्थित फास्ट ब्रीडर रिएक्टर परियोजना लगातार वर्षों की देरी, तकनीकी चुनौतियों और लागत बढ़ोतरी से जूझती रही है. यदि स्वदेशी SMR भी समय पर विकसित और तैनात नहीं हो पाते तो तब तक भारतीय बाज़ार विदेशी तकनीकों से भर सकता है. इसका परिणाम केवल तकनीक आयात तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि ईंधन आपूर्ति, प्रमुख उपकरणों, रखरखाव और संचालन में दीर्घकालिक निर्भरता पैदा होगी. ऐसी निर्भरता भारत के आत्मनिर्भरता और रणनीतिक स्वायत्तता के लक्ष्यों के विपरीत होगी और भविष्य में नीति विकल्पों को भी सीमित कर सकती है.

NPCIL से आगे: क्षमता का विस्तार

भारत में परमाणु ऊर्जा विस्तार की सबसे बड़ी बाधा एकल-ऑपरेटर मॉडल रहा है. NPCIL सीमित सरकारी बजट और प्रशासनिक क्षमता के साथ काम करता है जबकि 100 GW लक्ष्य के लिए एक साथ दर्जनों रिएक्टर परियोजनाओं का प्रबंधन करना होगा. हकीकत यह है कि काकरापार, कुडनकुलम और राजस्थान जैसी परियोजनाएँ वर्षों की देरी का सामना कर चुकी हैं जो दिखाता है कि अकेले NPCIL के भरोसे तेज़ विस्तार संभव नहीं है.

हालाँकि, इस विधेयक की सफलता कानून पर नहीं, उसके अमल पर निर्भर करेगी.

निजी भागीदारी का मतलब परमाणु संप्रभुता का निजीकरण नहीं है. संवेदनशील गतिविधियाँ- जैसे ईंधन संवर्धन, पुनर्प्रसंस्करण और भारी जल उत्पादन- सरकार के नियंत्रण में ही रहेंगी. निजी कंपनियों को केवल बिजली उत्पादन और रिएक्टर संचालन जैसे व्यावसायिक क्षेत्रों में जगह दी जाएगी. इससे प्रतिस्पर्धा आएगी, लागत और समय पर दबाव बनेगा और राज्य रणनीतिक क्षेत्रों पर ध्यान देते हुए निजी पूंजी से क्षमता बढ़ा सकेगा लेकिन यह तभी संभव है जब नियामक ढांचा भरोसेमंद और स्पष्ट हो.

नियामक ढांचा: स्वतंत्रता की चिंता और नई न्यायिक व्यवस्था

अब तक भारत में परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) की स्थिति पूरी तरह स्पष्ट और संतोषजनक नहीं रही है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि AERB और परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) दोनों ही एक ही संस्था-परमाणु ऊर्जा आयोग-के अधीन कार्य करते हैं. इस संरचना के कारण नियमन और परमाणु ऊर्जा के विस्तार को बढ़ावा देने वाली भूमिकाएँ आपस में टकराती हुई दिखाई देती हैं. एक ओर DAE का उद्देश्य परमाणु ऊर्जा क्षमता का विस्तार करना है, वहीं दूसरी ओर AERB की जिम्मेदारी सुरक्षा, मानकों और अनुपालन की निगरानी करना है. जब दोनों संस्थाएँ एक ही प्रशासनिक ढाँचे के भीतर काम करती हैं तो नियामक की निष्पक्षता और स्वतंत्रता पर स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं.

अंतरराष्ट्रीय अनुभव स्पष्ट रूप से दिखाता है कि एक भरोसेमंद और सुरक्षित परमाणु क्षेत्र के लिए नियामक संस्था की पूरी तरह स्वतंत्र पहचान अत्यंत आवश्यक होती है. अमेरिका, फ्रांस और अन्य विकसित परमाणु देशों में नियामक एजेंसियाँ सरकार की परमाणु विस्तार नीतियों से अलग रखी जाती हैं ताकि सुरक्षा मानकों से किसी भी प्रकार का समझौता न हो. स्वतंत्र नियामक न केवल तकनीकी मानकों को सख्ती से लागू करता है बल्कि आपात स्थितियों में पारदर्शी और विश्वसनीय निर्णय लेने की क्षमता भी रखता है.

असली सफलता इस पर निर्भर करेगी कि AERB और AERAC व्यवहार में कितने स्वतंत्र और तकनीकी रूप से मज़बूत साबित होते हैं-क्योंकि नियामक की विश्वसनीयता कानून से नहीं, उसके काम से बनती है.

भारत में परमाणु क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने के लिए भी नियामक की स्वतंत्रता निर्णायक होगी. निजी निवेशक तभी आगे आएँगे जब उन्हें यह भरोसा होगा कि नियमों का क्रियान्वयन निष्पक्ष, पारदर्शी और राजनीतिक या संस्थागत दबाव से मुक्त है. यदि नियामक और प्रवर्तक की भूमिकाएँ स्पष्ट रूप से अलग नहीं की गईं तो निवेशकों का भरोसा कमजोर बना रहेगा इसलिए, AERB को कानूनी, प्रशासनिक और वित्तीय रूप से स्वतंत्र बनाना न केवल परमाणु सुरक्षा के लिए आवश्यक है बल्कि भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के दीर्घकालिक विकास और विश्वसनीयता के लिए भी अनिवार्य कदम है.

SHANTI विधेयक AERB को संवैधानिक स्वतंत्रता देता है और साथ ही एक नई चार-स्तरीय अपील व्यवस्था लाता है. इसमें विशेषज्ञ परिषद (AERAC), तकनीकी सदस्यों वाला विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण और अंततः सुप्रीम कोर्ट शामिल हैं. यह व्यवस्था इसलिए अहम है क्योंकि परमाणु विवाद केवल कानूनी नहीं, बल्कि तकनीकी और सुरक्षा से जुड़े होते हैं. तय समय में फैसले निवेशकों का भरोसा बढ़ा सकते हैं. लेकिन असली सफलता इस पर निर्भर करेगी कि AERB और AERAC व्यवहार में कितने स्वतंत्र और तकनीकी रूप से मज़बूत साबित होते हैं-क्योंकि नियामक की विश्वसनीयता कानून से नहीं, उसके काम से बनती है.

दायित्व सुधार: अंतरराष्ट्रीय तालमेल, लेकिन सीमाएँ बनी हुई

2010 का परमाणु क्षति नागरिक दायित्व अधिनियम भारत में परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के विस्तार के लिए एक बड़ी बाधा के रूप में उभरा था. इस अधिनियम के तहत उपकरणों और तकनीक की आपूर्ति करने वाली कंपनियों पर अनिश्चित और व्यावहारिक रूप से असीमित दायित्व का जोखिम था. चूँकि दायित्व की सीमा स्पष्ट नहीं थी इसलिए परमाणु परियोजनाएँ बीमा के योग्य नहीं रह गई थी. परिणामस्वरूप, न केवल विदेशी आपूर्तिकर्ता भारत में निवेश से हिचकिचाने लगे बल्कि घरेलू निजी कंपनियाँ भी इस क्षेत्र में प्रवेश करने से बचने लगीं. इस स्थिति ने भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता के विस्तार को धीमा कर दिया.

इस पृष्ठभूमि में SHANTI विधेयक का सेक्शन 16 एक महत्वपूर्ण सुधार के रूप में सामने आता है. यह प्रावधान आपूर्तिकर्ताओं पर दायित्व को स्पष्ट और सीमित करता है. अब आपूर्तिकर्ता की जिम्मेदारी तभी तय होगी जब उसका उल्लेख अनुबंध में स्पष्ट रूप से किया गया हो या यह साबित किया जा सके कि नुकसान जानबूझकर की गई लापरवाही का परिणाम है. इससे ऑपरेटर और आपूर्तिकर्ता आपसी सहमति से, इस्तेमाल की जा रही तकनीक और परियोजना की प्रकृति के अनुसार जोखिम का बँटवारा कर सकते हैं. साथ ही, दुर्घटना की स्थिति में पीड़ितों के प्रति पूरी और प्राथमिक जिम्मेदारी ऑपरेटर की ही बनी रहती है, जिससे सार्वजनिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत कमजोर नहीं होता.

विधेयक में प्रति दुर्घटना 300 मिलियन स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (SDR) लगभग 3,000 करोड़ रुपये की दायित्व सीमा निर्धारित की गई है. इस सीमा के पार होने पर सरकार का समर्थन और अंतरराष्ट्रीय कोष उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है. यह ढाँचा भारत को अंतरराष्ट्रीय परमाणु दायित्व मानकों के अनुरूप बनाता है और परियोजनाओं को निवेश तथा बीमा के लिए व्यावहारिक रूप से सक्षम करता है. इसके चलते विदेशी तकनीक और निजी पूंजी के लिए भारत का परमाणु क्षेत्र अधिक आकर्षक बन सकता है.

हालाँकि, इस सुधार की अपनी सीमाएँ भी हैं. फुकुशिमा जैसी अत्यंत गंभीर परमाणु दुर्घटना की स्थिति में 300 मिलियन SDR की सीमा अपर्याप्त साबित हो सकती है और पूर्ण मुआवज़े की गारंटी नहीं देती. इस अर्थ में, SHANTI विधेयक परमाणु ऊर्जा के विस्तार और निवेश व्यवहार्यता को तो संभव बनाता है, लेकिन अत्यधिक बड़े हादसों में पीड़ितों को पूरी सुरक्षा प्रदान करने का दावा नहीं करता. स्पष्ट है कि नीति-निर्माताओं ने यहाँ सुरक्षा के आदर्श से अधिक, निवेश और परियोजना व्यवहार्यता को प्राथमिकता दी है.

क्या SHANTI से 100 GW संभव है?

SHANTI विधेयक निवेश और निर्माण की राह आसान बनाता है लेकिन केवल कानून से परमाणु रिएक्टर समय पर नहीं बनते. 100 GW क्षमता जोड़ने के लिए मज़बूत ट्रांसमिशन नेटवर्क और बेहतर ग्रिड प्रबंधन ज़रूरी होगा जबकि भारत का ग्रिड पहले ही नवीकरणीय ऊर्जा की अनियमितता से दबाव में है.

भले ही 100 GW हासिल करना बड़ी उपलब्धि हो, यह पर्याप्त नहीं होगा. 2047 तक भारत को 2,000 GW से अधिक बिजली क्षमता चाहिए होगी. ऐसे में 100 GW परमाणु ऊर्जा भी कुल उत्पादन का केवल लगभग 5 प्रतिशत होगी-महत्वपूर्ण लेकिन ऊर्जा संक्रमण के लिए निर्णायक नहीं.

 हकीकत यह है कि काकरापार, कुडनकुलम और राजस्थान जैसी परियोजनाएँ वर्षों की देरी का सामना कर चुकी हैं जो दिखाता है कि अकेले NPCIL के भरोसे तेज़ विस्तार संभव नहीं है.

गौरतलब है कि SHANTI विधेयक एक मज़बूत नीतिगत ढांचा पेश करता है-स्पष्ट नियामक व्यवस्था, निवेश योग्य दायित्व नियम और सुरक्षा व व्यावसायिक हितों के बीच संतुलन लेकिन भारत का परमाणु रिकॉर्ड बताता है कि असली समस्या कानून की नहीं, क्रियान्वयन की रही है. रिएक्टरों में देरी और लागत बढ़ना आम रहा है. SHANTI इन चुनौतियों को सीधे हल नहीं करता बल्कि निजी ऑपरेटरों को अवसर देकर उस एकल-ऑपरेटर जोखिम को कम करता है जिसने अब तक विस्तार को रोका.

इस सुधार की सफलता अगले दशक में तय होगी- क्या निजी कंपनियाँ NPCIL से बेहतर प्रदर्शन करेंगी, क्या स्वदेशी SMR विदेशी तकनीकों से प्रतिस्पर्धा कर पाएंगे और क्या नियामक संस्थाएँ वास्तव में स्वतंत्र और सक्षम बनेंगी. SHANTI या तो भारत के परमाणु क्षेत्र को नई गति देगा, जिसका असर 2035 में दिखेगा या फिर कमजोर अमल के कारण एक और अधूरा सुधार बनकर रह जाएगा.


काव्या वाधवा परमाणु ऊर्जा की समर्थक और नीति विश्लेषक हैं, जो टिकाऊ ऊर्जा समाधानों को बढ़ावा देने और प्रभावी नीतिगत सुधारों के लिए कार्यरत हैं.

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