Author : Kabir Taneja

Expert Speak Raisina Debates
Published on Sep 06, 2025 Updated 0 Hours ago

एक तरफ लेबनान में सक्रिय हिज़बुल्लाह का इजराइल के साथ चल रहा युद्धविराम ज़्यादा सफल नहीं है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका की अगुवाई में हिज़बुल्लाह को हथियार विहीन करने की योजना आगे बढ़ रही है. यानी लेबनान के सहयोगी राष्ट्र वहां सुरक्षा ढांचे को नए सिरे से विकसित करने में जुटे हैं. इस बीच, तेहरान भी अपने सबसे प्रमुख सहयोगी हिज़बुल्लाह का खुलकर साथ दे रहा है. कुल मिलाकर लेबनान वैश्विक संघर्ष का एक नया मंच बन गया है.

लेबनान को लेकर चल रहा है एक ख़ामोश युद्ध!

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इजराइल ने 7 अक्टूबर, 2023 को हुए आतंकवादी हमले के बाद तेल अवीव की सुरक्षा योजनाओं में ख़ासा बदलाव किया है. इजराइल पर यह आतंकी हमला हालांकि हमास ने किया था, लेकिन इजराइल ने अपनी जवाबी कार्रवाई में लेबनान में सक्रिय हिज़बुल्लाह को भी निशाने पर लिया, क्योंकि वो हिज़बुल्लाह को ज़्यादा बड़ा ख़तरा मानता था. दोनों पक्षों के बीच महीनों तक सैन्य संघर्ष चला और इसी लड़ाई के दौरान इजराइली सेनाओं ने बेरूत के शिया मुस्लिम उपनगर दाहयेह में हिज़बुल्लाह के संस्थापक हसन नसरल्लाह को मौत के घाट उतार दिया था. इसके बाद अमेरिकी की मध्यस्थता से दोनों पक्षों के बीच नवंबर 2024 में युद्धविराम हुआ. तब से दोनों पक्षों के बीच छिटपुट झड़पों को छोड़कर यह सीजफायर क़ायम है.

इजराइल ने हिज़बुल्लाह के ख़िलाफ़ अपनी कार्रवाई के तहत लेबनान के दक्षिणी हिस्से में अपनी सेना की सहूलियत के लिए एक बफर ज़ोन बनाया है. यह इलाक़ा लंबे समय से आतंकवादी समूह हिज़बुल्लाह का गढ़ रहा है और यहीं से उत्तरी इजराइल में लगातार रॉकेट हमले किए जाते थे. लेबनान के नए राष्ट्रपति जोसेफ औन, जो कि पहले लेबनानी सशस्त्र बलों के कमांडर थे, उनकी अध्यक्षता में लेबनान कैबिनेट ने अमेरिका के समर्थन वाली एक योजना मंजूर की है. इस योजना के तहत आतंकी संगठन हिज़बुल्लाह के निरस्त्रीकरण का रास्ता साफ होगा. इजराइल के साथ युद्धविराम के लिए हिज़बुल्लाह को हथियार विहीन करने की मांग की जा रही थी और यह उसी दिशा में एक क़दम है. इसके बदले में इजराइल ने लेबनान में मौजूद अपनी सेनाओं की चरणबद्ध वापसी की बात कही है. बता दें कि इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने शर्त रखी थी कि जब हिज़बुल्लाह का निरस्त्रीकरण किया जाएगा, तभी वो इस साल के अंत तक लेबनान से अपनी सेनाओं को वापस बुलाएंगे.

इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने शर्त रखी थी कि जब हिज़बुल्लाह का निरस्त्रीकरण किया जाएगा, तभी वो इस साल के अंत तक लेबनान से अपनी सेनाओं को वापस बुलाएंगे.

हसन नसरल्लाह के मारे जाने के बाद नईम कासिम ने हिज़बुल्लाह की कमान संभाली है और उन्हें नसरल्लाह की तुलना में नरम विचारों वाला माना जाता है. नईम कासिम के कमाम संभालने के बाद यह संगठन कई परेशानियों से जूझ रहा है. हिज़बुल्लाह को होने वाली फंड और हथियारों की आपूर्ति भी बंद हो गई है, ख़ास तौर पर सीरिया के रास्ते होने वाली आपूर्ति रुक गई है. हालांकि, ईरान के संरक्षण में फलने-फूलने वाले इस सशत्र समूह के वहां की सरकार के साथ रिश्तों में कोई फर्क नहीं पड़ा है. ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव यानी सुरक्षा प्रमुख अली लारिजानी ने लेबनान मंत्रिमंडल के हिज़बुल्लाह को हथियार विहीन करने के प्रस्ताव को स्वीकृति दिए जाने के बाद लेबनान और इराक़ का दौरा किया था. देखा जाए तो, अली लारीजानी कहीं न कहीं ईरानी कुद्स बल के दिवंगत सैन्य जनरल कासिम सुलेमानी के पदचिन्हों पर चल रहे हैं और उसके मारे जाने से खाली हुई जगह को भर रहे हैं. ज़ाहिर है कि सुलेमानी ही वो व्यक्ति थे, जो तेहरान की क्षेत्रीय नीतियां निर्धारित करते थे और जिन्हें कभी अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसियों ने "मध्य पूर्व में सबसे शक्तिशाली शख़्सियत" माना था.

ईरानी शासको के लिए क्यों महत्वपूर्ण रहा है हिज़बुल्लाह? 

ईरानी शासकों के लिए हिज़बुल्लाह हमेशा से बेहद महत्वपूर्ण रहा है. 1980 के दशक की शुरुआत से ही हिज़बुल्लाह ईरानी सरकार के लिए सामरिक और रणनीतिक लिहाज़ से बेहद अहम रहा है और उसके इशारों पर काम करता रहा है. ज़ाहिर है कि एक ओर हिज़बुल्लाह ने ईरानी सत्ताधीशों के शिया राजनीतिक हितों की नुमाइंदगी की है, वहीं दूसरी और इजराइल को काबू करने में भी उल्लेखनीय भूमिका निभाई है. हिज़बुल्लाह लेबनान में 1992 से ही एक सक्रिय राजनीतिक दल रहा है. लेबनान की राजनीति बेहद पेचीदा और मजहबी तौर पर बंटी हुई है. लेबनान की इन मुश्किल राजनीतिक परिस्थितियों में हिज़बुल्लाह ने ही हमेशा शिया हितों की आवाज़ बलुंद की है. ख़ास बात यह है कि हिज़बुल्लाह की राजनीति में उतरने की यह कोशिश कभी क़ामयाब नहीं हो पाई और उसे इस कारण तमाम दिक़्क़तों से जूझना पड़ा. इन परेशानियों से निपटने के लिए हिज़बुल्लाह को अपनी आतंकी शाखा का पहले की तुलना में अधिक इस्तेमाल करने के लिए मज़बूर होना पड़ा. लेबनान में विशेष रूप से शियाओं के बीच हिज़बुल्लाह की लोकप्रियता काफ़ी बढ़ गई थी और इसी से उत्साहित होकर हिज़बुल्लाह ने वर्ष 2018 में चुनाव लड़ा और बड़ी संख्या में उसके सदस्य चुनाव जीतकर संसद में पहुंचे. यहां तक कि सरकार के गठन में हिज़बुल्लाह की भूमिका बेहद अहम हो गई और सरकार में उसका दख़ल भी बढ़ गया. हालांकि, चुनाव जीतने पर हिज़बुल्लाह को क्षेत्र के दूसरे इस्लामिक संगठनों की आलोचना भी झेलनी पड़ी. इन इस्लामिक संगठनों ने चुनावी राजनीति को पश्चिमी अवधारणा बताकर हिज़बुल्लाह पर निशाना साधा और उसका मज़ाक भी उड़ाया. इन इस्लामिक कट्टरपंथी संगठनों ने इस्लाम के उसूलों पर चलने वाली सरकार की वक़ालत की और उसी की स्थापना पर ज़ोर दिया. इन सभी घटनाक्रमों ने देखा जाए तो हिज़बुल्लाह को अपने समर्थकों के क़रीब लाने का काम किया और उनके प्रति ज़्यादा जवाबदेह बना दिया.

हिज़बुल्लाह लेबनान में अपनी स्थिति को मज़बूत करना चाहता था और इसके लिए उसने अक्सर क्षेत्रीय भू-राजनीतिक उथल-पुथल से खुद को दूर रखा, साथ ही पड़ोसियों के संघर्ष में शामिल होने से बचता रहा. उदाहरण के तौर पर अक्टूबर 2023 में जब हमास ने इजराइल पर हमला किया, तब हमास के नेताओं ने हिज़बुल्लाह से उत्तरी मोर्चे पर कमान संभालने और इजराइल से युद्ध करने का आग्रह किया था. लेकिन उस समय हिज़बुल्लाह ने हमास-इजराइल की लड़ाई में कूदने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई थी. हिज़बुल्लाह प्रमुख हसन नसरल्लाह पहले ही कह चुके थे कि तथाकथित 'प्रतिरोध की धुरी' में अभी भी इजराइल पर निर्णायक हमला करने का दम नहीं है. तब हसन नसरल्लाह ने कहा था कि "हमें अभी भी वक़्त चाहिए...लेकिन हम धीरे-धीरे जीत रहे हैं... हमारी लड़ाई दृढ़ता और धैर्य की है."

लेबनान में विशेष रूप से शियाओं के बीच हिज़बुल्लाह की लोकप्रियता काफ़ी बढ़ गई थी और इसी से उत्साहित होकर हिज़बुल्लाह ने वर्ष 2018 में चुनाव लड़ा और बड़ी संख्या में उसके सदस्य चुनाव जीतकर संसद में पहुंचे. यहां तक कि सरकार के गठन में हिज़बुल्लाह की भूमिका बेहद अहम हो गई और सरकार में उसका दख़ल भी बढ़ गया.

हिज़बुल्लाह बहुत चालाक संगठन है और वो आस-पास होने वाली घटनाओं पर पैनी नज़र रखता है. उसे राजनीतिक हक़ीक़त का भी बखूबी अंदाज़ा है और यह भी पता है उसकी ताक़त और कमज़ोरियां क्या हैं. इन्हीं सब वजहों से यमन में मौजूद हमास और हूतियों समेत दूसरे विद्रोही गुटों की तुलना में हिज़बुल्लाह इजराइल के लिए एक बड़ा ख़तरा बन गया है. ज़ाहिर है कि ईरानी कुद्स फोर्स के प्रमुख सुलेमानी ने जब अपनी योजना के तहत सीरिया में सुरक्षा और हमले के लिए हज़ारों की तादात में हिज़बुल्लाह लड़ाकों की तैनाती का फैसला किया था, तब नसरल्लाह ने इसका समर्थन नहीं किया था. हिज़बुल्लाह ने वर्ष 2009 में दमिश्क में तत्कालीन राष्ट्रपति बशर अल-असद के शासन के साथ अपने संबंधों के बारे में कहा था कि ये रिश्ते सुरक्षा, राजनीतिक और आर्थिक ज़रूरतों पर आधारित हैं. हालांकि, हिज़बुल्लाह के लिए अरब स्प्रिंग के बाद सीरिया में बशर अल-असद शासन की मज़बूती के लिए बड़ी संख्या में अपने लड़ाकों को तैनात करने पर अपने यहां काफ़ी चुनौतियां झेलनी पड़ी थीं. इतना ही नहीं, हिज़बुल्लाह ने पहले भी इजराइल के साथ लेबनान के समुद्री विवाद को सुलझाने वाली वार्ताओं में अहम भूमिका निभाई है. ऐसा करके हिज़बुल्लाह ने यह जताया है कि ज़रूरत पड़ने पर वो राजनीतिक वार्ताओं को भी संचालित करने में सक्षम है. 

ये सभी पुरानी बातें हैं और अब बात करते हैं 2025 की. वर्तमान में अमेरिका को लगता है कि वो सऊदी अरब जैसे अपने अरब साझीदार देशों के साथ मिलकर बगैर किसी सैन्य कार्रवाई के हिज़बुल्लाह पर काबू पा सकता है और उसे हथियार डालने पर मज़बूर कर सकता है. दरअसल, ऐसा करके अमेरिका 7 अक्टूबर, 2023 को इजराइल पर हुए आतंकी हमले के बाद उसकी कड़ी प्रतिक्रिया से उपजे हालातों का फायदा उठाना चाहता है. सऊदी अरब की सरकारी मीडिया ने हिज़बुल्लाह के ख़िलाफ अभियान छेड़ दिया है और अस्थिरता फैलाने के लिए उसकी व्यापक रूप से आलोचना की जा रही है. इतना ही नहीं, मीडिया ने क्षेत्र में होने वाले शिया-सुन्नी विवाद की कमज़ोरियों को भी सामने लाने का काम किया है. लेबनानी राष्ट्रपति जोसेफ औन का भी कहना है कि ऐसे संगठन जिनमें सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं है, उनसे हथियार छीन लेने चाहिए और उनकी मिलिट्री विंग को समाप्त कर देना चाहिए. हिज़बुल्लाह जैसे संगठनों से हथियार छीन लेने के बाद लेबनान की सुरक्षा में जो कमी आएगी, उसकी भरपाई के लिए अमेरिका और फ्रांस जैसे देशों ने लेबनान के सशस्त्र बलों की आर्थिक मदद करने और उन्हें प्रशिक्षित करने का वादा भी किया है. हालांकि, हिज़बुल्लाह ने लेबनान सरकार की निरस्त्रीकरण योजना को सिरे से ख़ारिज कर दिया है और इसका पुरज़ोर विरोध किया है. हिज़बुल्लाह ने यह भी आरोप लगाया है कि जोसेफ औन के नेतृत्व में बेरूत की नई सरकार ने लेबनान को इजराइल के हवाले कर दिया है.

हिज़बुल्लाह की हथियार प्रणाली

हिज़बुल्लाह के इस रुख़ से ज़ाहिर होता है कि वो आसानी से हथियार नहीं डालेगा और उसका निरस्त्रीकरण सहज नहीं होगा. हिज़बुल्लाह के पास हथियारों का बड़ा जख़ीरा है. इसके शस्त्रागार में न केवल छोटे हथियार शामिल हैं, बल्कि 400 किलोमीटर से अधिक दूरी तक निशाना साधने वाली लंबी दूरी की मिसाइलें और रॉकेट भी हैं. इसके साथ ही 2,000 किलोमीटर के दायरे में निगरानी करने में सक्षम ड्रोन भी इसके पास मौजूद हैं. हिज़बुल्लाह के पास बड़ी तादाद में प्रशिक्षित सैन्यकर्मी भी हैं, जिन्हें इन अत्याधुनिक हथियारों को बनाने और चलाने में महारत हासिल है. हालांकि, हिज़बुल्लाह के पास जो हथियार प्रणालियां है, ख़ास तौर पर जो मिसाइलें हैं, उनमें ज़्यादातर 1970 और 80 के दशक की तकनीक़ का इस्तेमाल किया गया है. हाल ही में हिज़बुल्लाह ने अपने ये सैन्य हथियार और मिसाइलें हूतियों को देने का काम किया है. ज़ाहिर है कि हूती विद्रोही संगठन भी एक गैर-सरकारी हथियारबंद गुट है. हिज़बुल्लाह से मिले सैन्य साज़ो-सामान के बल पर ही हूती विद्रोही लाल सागर के पार मिसाइलों और ड्रोन्स का इस्तेमाल कर विदेशी जहाजों को निशाना बनाने में सक्षम हो गए हैं. हूती विद्रोहियों की कार्रवाई की वजह से पहले से ही लाल सागर एक जोख़िम वाली जगह बनी हुई थी और अब यह और भी ज्यादा ख़तरनाक हो गई है, जिससे जहाजों के ज़रिए वैश्विक व्यापार में रुकावटें आ रही हैं. कुल मिलाकर, जनवरी 2020 में अमेरिकी ड्रोन हमले में ईरानी कुद्स फोर्स के कमांडर कासिम सुलेमानी की इराक़ में हत्या के बावज़ूद, पूरे क्षेत्र में उसने विद्रोही गुटों का जो जाल बुना था, वो आज भी क़ायम है और अपनी गतिविधियों को सक्रियता से अंज़ाम दे रहा है.

सच्चाई है कि अमेरिका, सऊदी अरब, इजराइल और कई दूसरे देश आज लेबनान को अपनी भू-राजनीतिक महात्वाकांक्षाओं को पूरा करने के एक बेहतरीन अवसर के रूप में देख रहे हैं.

लेबनान की दुविधा 

आख़िर में, लेबनान आज दुविधा में फंसा है. कभी जिस बेरूत को 'पूर्व का पेरिस' कहा जाता था, वो आज भयानक आर्थिक तंगी से जूझ रहा है. लेबनान की अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए पहले जो भी प्रयास किए गए हैं, वो नाक़ाम साबित हुए हैं. आज लेबनान क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दबावों के बीच पिस रहा है. इन हालातों के मद्देनज़र हिज़बुल्लाह से हथियार छीनना आसान काम नहीं होगा. लेबनानी राष्ट्रपति औन के समर्थन के बावज़ूद यह काम उतना सरल नहीं है, जितना समझा जा रहा है. इसमें कोई संदेह नहीं है कि हिज़बुल्लाह ईरान के लिए बेहद अहम है और वो उसे हथियार विहीन संगठन कतई नहीं बनने देगा. तेहरान ज़ाहिर तौर पर फिलहाल तमाम मुश्किलों में घिरा है और उसकी ताक़त भी कम हुई है, बावजूद इसके वो हिज़बुल्लाह का वज़ूद बनाए रखने के लिए अपनी पूरी ताक़त झोंक देगा. यानी इराक़ के साथ-साथ आज लेबनान भी सत्ता की लड़ाई का एक अखाड़ा बन गया है और कई देश यहां अपनी ज़ोर आजमाइश कर रहे हैं. बगदाद और बेरूत ऐसे मुश्किल हालातों में क्यों घिरे हैं, इसको लेकर अलग-अलग राय हैं, लेकिन यह सच्चाई है कि अमेरिका, सऊदी अरब, इजराइल और कई दूसरे देश आज लेबनान को अपनी भू-राजनीतिक महात्वाकांक्षाओं को पूरा करने के एक बेहतरीन अवसर के रूप में देख रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ ईरान है, जो किसी भी सूरत में हिज़बुल्लाह का साथ नहीं छोड़ेगा. ज़ाहिर है कि इजराइल के साथ चले “12 दिन के युद्ध” में ईरान को काफ़ी झटके झेलने पड़े हैं. ऐसे में ईरान पूरे क्षेत्र में अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को हासिल करने के लिए इस मौक़े का भरपूर इस्तेमाल करेगा और हिज़बुल्लाह का साथ देकर क्षेत्र में अपने दबदबे को फिर से क़ायम करने की पूरी कोशिश करेगा.


कबीर तनेजा ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में डिप्टी डायरेक्टर और फेलो हैं.

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