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Published on Mar 16, 2026 Updated 1 Days ago

आज हम बात कर रहे हैं भारत के मेडिकल सर्विस बॉण्ड की, जहां डॉक्टर पढ़ाई खत्म कर सरकारी सेवा के लिए भेजे जाते हैं लेकिन हर राज्य के नियम अलग हैं और ग्रामीण हालात मुश्किल. जानें कि दुनिया में इसके मॉडल कैसे हैं और भारत में सुधार क्यों जरूरी है.

MBBS के बाद अनिवार्य सेवा बॉण्ड: डॉक्टरों का सच

तेजी से फैलते भारत के मेडिकल एजुकेशन सिस्टम की बराबरी बहुत कम सरकारी सेक्टर ही कर सकते हैं. दिसंबर 2025 तक देश में 818 मेडिकल कॉलेज, 1,28,875 MBBS सीटें और 82,059 पोस्टग्रैजुएट (MD/MS) सीटें मौजूद थीं. फिर भी यह बहस जारी है कि जब सरकार इस पढ़ाई पर सब्सिडी देती है, तो बदले में उसे क्या चाहिए? कई राज्यों में और कुछ संस्थानों में सरकारी मेडिकल पढ़ाई में कंपलसरी सर्विस बॉण्ड है. लेकिन पॉलिसी पूरे पेशे पर एक जैसी लागू ही नहीं है.

MBBS के बाद के बॉण्ड पीछे तर्क है कि नए डॉक्टर ऐसी जगहों में जाएं, जहां डॉक्टरों की भर्ती मुश्किल है. लेकिन MD या MS या खासकर DM या MCh जैसे सुपर-स्पेशलाइजेशन के बाद के बॉण्ड का असर अलग है. तब तक डॉक्टर की ट्रेनिंग कई वर्षों हो चुकी होती है. स्पेशलिस्टों के लिए मौके भी उतने नहीं होते. ऐसे में डॉक्टर की प्रफेशनल लाइफ में सरकारी दखल काफी बाद में आता है.

मजबूरी का बॉण्ड सिस्टम

बॉण्ड सिस्टम में एक और समस्या बताई जाती है. सरकार के मुताबिक भारत में डॉक्टर-जनसंख्या अनुपात अब 1:811 है. लेकिन इसमें आयुष डॉक्टर भी हैं. कहते हैं कि रजिस्टर्ड डॉक्टरों में से 80 फीसदी ही असल में सर्विस के लिए मौजूद हैं. लेकिन असल मुश्किल डॉक्टरों का बंटवारा है. 2021 के नैशनल सैंपल सर्वे का डेटा डीकोड हुआ तो पता चला कि 2018 में भारत की लगभग 66 फीसदी आबादी गांव में थी. वहां महज 33 फीसदी हेल्थ वर्कर्स थे, और डॉक्टर सिर्फ 27 फीसदी. स्टडी में पता चला कि 65 फीसदी डॉक्टर प्राइवेट सेक्टर में थे.

यह बहस जारी है कि जब सरकार इस पढ़ाई पर सब्सिडी देती है, तो बदले में उसे क्या चाहिए? कई राज्यों में और कुछ संस्थानों में सरकारी मेडिकल पढ़ाई में कंपलसरी सर्विस बॉण्ड है. लेकिन पॉलिसी पूरे पेशे पर एक जैसी लागू ही नहीं है.

'हेल्थ डायनामिक्स ऑफ इंडिया 2022-23' की 2024 में आई रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण कम्युनिटी हेल्थ सेंटरों में स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की भारी कमी है. 31 मार्च, 2023 तक यहां 21,964 स्पेशलिस्ट्स चाहिए थे, और केवल 4,413 ही थे. यानी लगभग 79.9 फीसदी की कमी. इसीलिए सर्विस बॉण्ड जरूरी बताते हैं. लेकिन क्या बॉण्ड से ही सब सही हो जाएगा? बॉण्ड वक्ती पोस्टिंग दिला सकता है, लेकिन वह ऐसे हालात नहीं बनाता कि डॉक्टर वहां लंबे समय तक बने रहें. फिर हर राज्य में इसके नियम अलग-अलग हैं. ऐसे में यह सरकारी मजबूरी को बॉण्ड के जरिए संभालने की कोशिश ज्यादा लगती है. 

भारत से बाहर स्थिति

सिर्फ भारत में ही मेडिकल एजुकेशन को सर्विस से नहीं जोड़ा जाता. लेकिन दूसरे देशों में इसे जिस तरह व्यवस्थित किया गया है, वह अलग है. ऑस्ट्रेलिया का बॉण्डेड मेडिकल प्रोग्राम कॉमनवेल्थ की मदद से मेडिकल सीट देता है. बदले में 156 हफ्ते यानी तीन साल ग्रामीण या दूरदराज इलाकों में सर्विस करनी होती है. इस राष्ट्रीय योजना में नियम साफ हैं और हर एक तरीका तय है.

क्या बॉण्ड से ही सब सही हो जाएगा? बॉण्ड वक्ती पोस्टिंग दिला सकता है, लेकिन वह ऐसे हालात नहीं बनाता कि डॉक्टर वहां लंबे समय तक बने रहें. फिर हर राज्य में इसके नियम अलग-अलग हैं. ऐसे में यह सरकारी मजबूरी को बॉण्ड के जरिए संभालने की कोशिश ज्यादा लगती है. 

दक्षिण अफ्रीका में डॉक्टरों को स्वतंत्र प्रैक्टिस का लाइसेंस लेने से पहले दो साल की इंटर्नशिप और उसके बाद एक साल की पेड कम्युनिटी सर्विस करनी होती है. जापान के कोटा मॉडल में छात्रों को स्कॉलरशिप और दाखिला मिलता है. बदले में उन्हें अपने ही इलाके में लगभग नौ साल सर्विस देनी होती है. नीचे की तुलना दिखाती है कि ट्रेनिंग को सर्विस से जोड़ना सिर्फ भारत में नहीं है.

तालिका 1: विभिन्न देशों में चिकित्सा सेवा दायित्व मॉडलों की तुलना

देश

कार्यक्रम

कोर डिज़ाइन

सबूत क्या बताते हैं

ऑस्ट्रेलिया

बॉण्डेड मेडिकल प्रोग्राम

राष्ट्रीय योजना, 156 हफ्ते सर्विस, ग्रामीण या दूरदराज क्षेत्रों में काम. 

रिसर्च बताती है कि रूरल बैकग्राउंड वाले डॉक्टर और रूरल ट्रेनिंग डॉक्टरों को वहां काफी टिकाए रखती है.

दक्षिण अफ्रीका  

 

इंटर्नशिप + कम्युनिटी सर्विस

दो साल इंटर्नशिप और एक साल सरकारी सर्विस. 

 

अध्ययन बताते हैं कि इससे डॉक्टरों सभी जगह पहुंचे. हालांकि लंबे समय तक टिकना काम की परिस्थितियों पर निर्भर है.

 

थाईलैंड  

अनिवार्य सर्विस और विशेष ग्रामीण कार्यक्रम

 

तीन साल सर्विस अनिवार्य. ग्रामीण छात्रों को भर्ती करके उन्हें सरकारी अस्पतालों में ट्रेनिंग दी जाती है. 

 

अध्ययन बताते हैं कि ग्रामीण भर्ती वाले डॉक्टर ज्यादा टिकते हैं.

 

जापान  

 

 

क्षेत्रीय कोटा और स्कॉलरशिप मॉडल

लगभग नौ साल सर्विस की शर्त. 

 

अध्ययन बताते हैं कि इन डॉक्टरों के ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने की संभावना ज्यादा होती है.

भारत  

 

राज्य और संस्थान आधारित सर्विस बॉण्ड

 

हर राज्य में अलग नियम. अवधि, जुर्माना और लागू करने के तरीके अलग-अलग. 

मॉनिटरिंग कमजोर है. ट्रेनिंग बढ़ने के बावजूद स्पेशलिस्ट्स की कमी बनी हुई है.

 

स्रोत : लेखक द्वारा ( 1 ), ( 2 ), ( 3 ), ( 4 ), ( 5 ), ( 6 ) से संकलित ।

इन देशों में सर्विस की शर्त किसी तय नियोक्ता, तय क्षेत्र या विशेष एडमिशन ट्रैक से जुड़ी है. यह भी देखते हैं कि इन नीतियों से कितने डॉक्टर लंबे समय तक टिकते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की 2021 की गाइडलाइन भी यही कहती है कि ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों को टिकाने के लिए सिर्फ मजबूरी काफी नहीं है. इसके लिए ट्रेनिंग, सुपरविजन, इंफ्रास्ट्रक्चर और करियर के मौके भी जरूरी हैं.

कितने की मेडिकल डिग्री

सरकारी मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर तैयार करने की असली लागत फीस से कहीं ज्यादा है. इसमें अस्पताल, फैकल्टी, लैब, हॉस्टल, स्टाइपेंड और क्लिनिकल इंफ्रास्ट्रक्चर शामिल है. इसीलिए सरकारी सर्विस को अक्सर इस खर्च की भरपाई के तौर पर पेश किया जाता है. 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सर्विस बॉण्ड अपने आप में गलत नहीं हैं, अगर उनकी शर्तें साफ हों, पीरियड लिमिटेड हो और छोड़ने का रास्ता भी हो. कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि बहुत लंबा सर्विस पीरियड या बहुत भारी जुर्माना इस सिस्टम को गलत बना सकता है.

जवाब दिया जाता है कि मेडिकल ट्रेनिंग अस्पतालों में होती है, अधिकतर तो सरकारी अस्पतालों में. फिर सरकार करियर की शुरुआत में प्लेसमेंट भी देती है. इसलिए सर्विस की उम्मीद रखना बाकी पेशों के बरक्स आसान है. फिर भी यह सवाल तो है ही कि जब मेडिकल एंट्री और लाइसेंस नैशनल लेवल पर है, तो राज्यों के अलग-अलग नियम कैसे चल सकते हैं?

बॉण्ड के अलग-अलग नियमों के चलते 2022 में स्वास्थ्य मंत्रालय ने नैशनल मेडिकल कमीशन की राय पर नई गाइडलाइन पर काम करने की बात कही थी. आयोग का मानना था कि सामान्य बॉण्ड व्यवस्था कई बार बुनियादी न्याय के खिलाफ जा सकती है, और पूरे सिस्टम पर फिर से सोचना होगा. अप्रैल 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य-दर-राज्य अलग-अलग मजबूरी की बजाय एक समान नीति होनी चाहिए.

फिर से सोचें इस नीति पर

डॉक्टर पूछते रहे हैं कि सर्विस बॉण्ड इंजीनियर, आर्किटेक्ट, वैज्ञानिक और रिसर्चरों पर भी क्यों नहीं लागू होते. वे भी तो सरकारी सहायता से पढ़ते हैं. जवाब दिया जाता है कि मेडिकल ट्रेनिंग अस्पतालों में होती है, अधिकतर तो सरकारी अस्पतालों में. फिर सरकार करियर की शुरुआत में प्लेसमेंट भी देती है. इसलिए सर्विस की उम्मीद रखना बाकी पेशों के बरक्स आसान है. फिर भी यह सवाल तो है ही कि जब मेडिकल एंट्री और लाइसेंस नैशनल लेवल पर है, तो राज्यों के अलग-अलग नियम कैसे चल सकते हैं?

अब यह जरूरत है कि मेडिकल बॉण्ड व्यवस्था की समीक्षा की जाए, ताकि समझा जा सके कि इतने सालों में इससे मेडिकल सिस्टम पर असल में असर क्या पड़ा है.

दिल्ली में UG और PG पर एक साल की अनिवार्य सर्विस है. एक वक्त पंजाब ने MBBS दाखिले के लिए जमानत में संपत्ति की शर्त लगा दी थी, जिसे बाद में हाई कोर्ट ने रोक दिया. राजस्थान ने PG बॉण्ड तोड़ने पर कुछ स्पेशलिटी में जुर्माना 1.5 करोड़ रुपये तक कर दिया है. कर्नाटक तो कॉलेज डिग्री सर्टिफिकेट रोकने लगे तो सरकार को कहना पड़ा कि ऐसा नहीं किया जा सकता, और नीति बदलने के चलते छात्रों को छूट दी गई है. महाराष्ट्र सरकार भी अपनी बॉण्ड नीति खत्म करने पर विचार कर रही है.

प्रतिबंध न बने अनुबंध

2023 के एक सर्वे में छात्रों ने कहा कि उन्हें ग्रामीण सर्विस से समस्या नहीं है, लेकिन वहां बुनियादी सुविधाओं की कमी, सुरक्षा की चिंता और अस्पष्ट पोस्टिंग प्रक्रिया बड़ी दिक्कत है. भारत में अभी तक ऐसा कोई राष्ट्रीय डेटाबेस नहीं है जहाँ सभी राज्यों के बॉण्ड नियम एक जगह उपलब्ध हों. 

सिद्धांत रूप से बॉण्ड यह तय कर सकता है कि सरकारी सहायता से पढ़े डॉक्टर कुछ समय जनता की सर्विस करें. लेकिन दिक्कत तब होती है जब बाहर निकलने की कीमत इतनी ज्यादा हो जाती है कि यह एक प्रतिबंध लगने लगता है. इसीलिए अब यह जरूरत है कि मेडिकल बॉण्ड व्यवस्था की समीक्षा की जाए, ताकि समझा जा सके कि इतने सालों में इससे मेडिकल सिस्टम पर असल में असर क्या पड़ा है.


के.एस. उपलाभ गोपाल ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में हेल्थ इनिशिएटिव के एसोसिएट फेलो हैं.


*MBBS = Bachelor of Medicine, Bachelor of Surgery (Undergraduate)

*MD/MS = Doctor of Medicine/Master of Surgery (Postgraduate)

*DM/MCh = Doctorate of Medicine/ Master of Chirurgiae (Super-Specialisation)

*AYUSH = Ayurveda, Yoga and Naturopathy, Unani, Siddha, and Homoeopathy

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Author

K. S. Uplabdh Gopal

K. S. Uplabdh Gopal

Dr. K. S. Uplabdh Gopal is an Associate Fellow with the Health Initiative at the Observer Research Foundation. He writes and researches on how India’s ...

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