मूलभूत ढांचे को लेकर उच्च गुणवत्ता की एक पारदर्शी रणनीति ही क्वाड को हिंद प्रशांत क्षेत्र में विकास के साझीदार और BRI के व्यवहारिक विकल्प के तौर पर प्रस्तुत कर सकती है.
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1 जुलाई को क्वाड्रीलेटरल सिक्योरिटी डायलॉग (Quad) यानी भारत, जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्री, 2017 में क्वाड की स्थापना के बाद से 10वीं बार वाशिंगटन डीसी में मिले. अपने साझा बयान में विदेश मंत्रियों ने दक्षिणी चीन सागर में चीन की आक्रामकता और पहलगाम में पाकिस्तान के राज्य प्रायोजित आतंकी हमले की निंदा की और चीन द्वारा उन्नत निर्माण और अहम कच्चे माल की आपूर्ति श्रृंखलाओं को हथियार बनाने को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की. ये बयान ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति के रुख़ को ही अभिव्यक्त करता है, जिसमें चीन को अमेरिका के सामरिक प्रतिद्वंदी के तौर पर पेश किया जाता है और आर्थिक एवं राष्ट्रीय सुरक्षा को एक ही बताया जाता है और एक खुले, नियमों पर आधारित और समावेशी हिंद प्रशांत को लेकर प्रतिबद्धता ज़ाहिर की जाती है.
उल्लेखनीय बात ये है कि क्वाड के विदेश मंत्रियों के बयान में कनेक्टिविटी, ऊर्जा और मिलकर व्यापार को विकसित करने और मूलभूत ढांचे के विकास जैसे मसलों का ज़िक्र नहीं किया था. इससे मौजूदा प्रशासन में अमेरिका की प्राथमिकताओं का पता चलता है. फिर भी ये पहलें हिंद प्रशांत क्षेत्र में बड़ी ताक़तों के बीच प्रतिस्पर्धा की धुरी बनी हुई है. इस क्षेत्र में 2015 से 2030 के दौरान विकास के लिए ज़रूरी 4.5 ट्रिलियन डॉलर की पूंजी का अभाव है. अपने बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत चीन ने अपनी अतिरिक्त औद्योगिक क्षमता का निर्यात करके और व्यापार पर निर्भरता बढ़ाकर हिंद प्रशांत की तमाम आपूर्ति श्रृंखलाओं और विकास में सहायता के आदर्शों पर अपना प्रभाव और गहरा कर लिया है. इस तरह चीन आर्थिक लाभ भी उठा रहा है और सामरिक नियंत्रण भी बढ़ा रहा है.
अपने बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत चीन ने अपनी अतिरिक्त औद्योगिक क्षमता का निर्यात करके और व्यापार पर निर्भरता बढ़ाकर हिंद प्रशांत की तमाम आपूर्ति श्रृंखलाओं और विकास में सहायता के आदर्शों पर अपना प्रभाव और गहरा कर लिया है. इस तरह चीन आर्थिक लाभ भी उठा रहा है और सामरिक नियंत्रण भी बढ़ा रहा है.
क्वाड एक बहुपक्षीय समूह है, जिसमें शामिल हर देश चीन को अपने सामरिक प्रतिद्वंदी के तौर पर देखता है और उसे चीन से आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. ऐसे में क्वाड द्वारा BRI के भू-राजनीतिक और आर्थिक दबदबे की अनदेखी करना संकुचित दृष्टिकोण ही कहलाएगा. भले ही क्वाड के विदेश मंत्रियों की बैठक में ये अवसर हाथ से निकल गया. लेकिन, 2025 में नई दिल्ली में होने वाले क्वाड के शिखर सम्मेलन के दौरान इस कमी को पूरा किया जा सकता है. इस लेख में हिंद प्रशांत क्षेत्र में क्वाड की कनेक्टिविटी और मूलभूत ढांचे के विकास के क्षेत्र में सहयोग के अवसरों और उनके सामने खड़ी मुश्किलों का विश्लेषण किया गया है. इस लेख में इन सभी क्षेत्रों में क्वाड के सीमित सहयोग की भी आलोचनात्मक समीक्षा की गई है.
कनेक्टिविटी, सहयोग और मूलभूत ढांचे का विकास अब भयंकर प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र के तौर पर उभरा है. चीन के BRI ने दिखाया है कि कनेक्टिविटी के क्षेत्र में बहुआयामी सहयोग, भू-राजनीतिक प्रभाव हासिल करने में किस तरह उपयोगी है. क्वाड के हर देश ने इसके जवाब में कनेक्टिविटी के विकल्प पेश किए हैं, हालांकि वो पास पड़ोस तक ही सीमित रहे हैं. अब तक ज़मीनी स्तर पर क्वाड का सामूहिक असर सीमित ही रहा है. इन देशों ने मिलकर पलाऊ में समुद्र के भीतर केबल बिछाने की परियोजना शुरू की है, और 10 से भी कम छोटे स्तर के हरित ऊर्जा के बिजलीघर लगाने शुरू किए हैं, जिनकी कुल लागत 0.5 बिलियन डॉलर से भी कम है.
इसकी तुलना में BRI ने बड़ी तेज़ी से अपना विस्तार किया है. 2023 तक चीन अपने नीतिगत सरकारी बैंकों के ज़रिए 20 हज़ार परियोजनाओं में पूंजी निवेश कर चुका था. इन परियोजनाओं का निर्माण चीन की सरकारी और निजी कंपनियां कर रही हैं. इस तरह चीन प्रभावी भू-आर्थिक दबदबा बनाने में सफल रहा है. मिसाल के तौर पर जब श्रीलंका, क़र्ज़ नहीं चुका सका तो इसके बदले में चीन की एक सरकारी कंपनी ने उसके हंबनटोटा बंदरगाह को 99 साल के पट्टे पर ले लिया. पाकिस्तान में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे ने ग्वादर बंदरगाह तक पहुंच बना ली है. पूरे एशिया और अफ्रीका में चीन द्वारा निर्मित परिवहन, ऊर्जा और डिजिटल मूलभूत ढांचे वहां की अर्थव्यवस्थाओं को चीन के साथ जोड़ रहे हैं. इन प्रतिबद्धताओं की व्यापकता की वजह अक्सर यही होती है कि पश्चिम के विकल्प मुक़ाबला करने के लिए बहुत देर से मैदान में उतरते हैं.
इसके बावजूद, चीन के साथ प्रतिस्पर्धा क्वाड के लिए तमाम अवसर उपलब्ध कराती है. ऐसे देशों की तादाद बढ़ती जा रही है, जो BRI के क़र्ज़ के बोझ और अपारदर्शी शर्तों से फ़िक्रमंद होने लगे हैं. ग्लोबल साउथ का आर्थिक विकास पारदर्शी और टिकाऊ समझौतों के ज़रिए बुनियादी ढांचे के विकास पर निर्भर है. क्वाड को चाहिए कि वो विकास का वैकल्पिक मॉडल पेश करके इस ज़रूरत को पूरा करे. ये ऐसा मॉडल हो जो उनके विदेश नीति के लक्ष्यों को विकास में अंतरराष्ट्रीय सहायता (जो मोटे तौर पर ओवरसीज़ डेवलपमेंट एसिस्टेंस (ODA) के तहत वित्तीय मदद पर आधारित होता है) के तालमेल वाला हो. हाल ही में USAID की जगह शुरू किए गए अमेरिका फर्स्ट फ़ॉरेन असिस्टेंस को इस मामले में धुरी बनाया जा सकता है. अमेरिका की ये नई एजेंसी ‘ऐसे सामरिक निवेशों पर ज़ोर देती है, जो अमेरिका और उसके साझीदारों को मज़बूत बनाती हो’. क्वाड का दिल्ली में होने वाला शिखर सम्मेलन, क्वाड देशों की साझा प्राथमिकताओं वाले क्षेत्रों में रणनीतिक विदेशी सहायता में सहयोग का अच्छा अवसर बन सकता है. यही नहीं, क्वाड के डेवेलपमेंट फिनांस कॉरपोरेशन (DFCs) भी ब्लू डॉट नेटवर्क (BDN), क्वाडपोर्ट्स ऑफ दि फ्यूचर (QFPF) पार्टनरशिप और क्रिटिकल मिनरल्स एलायंस जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा सकते हैं. अगर क्वाड इन टुकड़ों को मिलाकर कनेक्टिविटी की एक व्यापक और बहुआयामी योजना तैयार कर सकता है, तो वो एक विश्वसनीय पैकेज उपलब्ध करा सकता है. ग्लोबल साउथ की कई सरकारों ने संकेत दिया है कि वो आला दर्जे की पारदर्शी परियोजनाओं में दिलचस्पी रखते हैं. ज़ाहिर है कि क्वाड अगर ये विकल्प पेश करता है, तो इसे अपनाने वाले मौजूद हैं.
ग्लोबल साउथ का आर्थिक विकास पारदर्शी और टिकाऊ समझौतों के ज़रिए बुनियादी ढांचे के विकास पर निर्भर है. क्वाड को चाहिए कि वो विकास का वैकल्पिक मॉडल पेश करके इस ज़रूरत को पूरा करे.
सामूहिक रूप से क्वाड के चारों देश विकास में निवेश की काफ़ी पूंजी वाले हैं. 2017 से 2024 के दौरान इन देशों ने ग्रांट, रियायती क़र्ज़ और आर्थिक सहायता के कार्यक्रमों के ज़रिए क्षेत्र के मूलभूत ढांचे में 341.31 अरब डॉलर का निवेश किया है. क्वाड देशों के विकास वित्त निगमों (DFCs) के बीच सहयोग से उनके विदेशी सहायता कार्यक्रम को अधिक प्रचारित किया जा सकता है. इससे जोखिम का बोझ बांटा जा सकता है. लागत कम की जा सकती है और बड़ी परियोजनाओं को मिलकर संचालित करने के साथ ही अधिक आकर्षक शर्तों पर क़र्ज़ दिया जा सकता है. इस दृष्टिकोण को हक़ीक़त बनाने के लिए एक अहम क़दम ये होगा कि 2021 के क्वाड इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड में फिर से जान डाली जाए. क्वाड की सामूहिक आर्थिक क्षमता उनकी ताक़त को बढ़ा सकती है और ऐसी परियोजनाएं चलाने में सहायक हो सकती है, जो कोई एक देश अकेले नहीं संचालित कर सकता है.
भविष्य में क्वाड की विश्वसनीयता के लिए भरोसा सबसे ज़रूरी शर्त है. इस विश्वसनीयता को मज़बूत करने के लिए क्वाड को चाहिए कि वो पारदर्शी और तय लक्ष्यों वाली मूलभूत परियोजनाओं पर ज़ोर दें. शुरुआत में ठोस परिणाम हासिल करके क्वाड ये दिखा सकता है कि उसका मॉडल काम करता है और फिर वो विकास में साझेदारियों पर भरोसा बहाल कर सकता है. इसके लिए शुरुआत में बिजली व्यवस्था, डिजिटल कनेक्टिविटी या फिर दूर-दराज़ के इलाक़ों में परिवहन व्यवस्था सुधारने जैसी परियोजनाओं पर बल देना चाहिए.
वैसे तो क्वाड ने इंफ्रास्ट्रक्चर वर्किंग ग्रुप, दि क्वाड पार्टनरशिप फॉर केबल कनेक्टिविटी ऐंड रेज़िलिएंस (QPCCR) और क्वाड पोर्ट्स ऑफ फ्यूचर (QFPF) जैसे आपसी सहयोग के कई क़दम उठाए हैं. लेकिन, इनके नतीजे अस्पष्ट और नगण्य ही रहे हैं. पूंजी लगाने के वादे तुरंत वितरण और ज़मीनी स्तर पर कार्रवाई में नहीं दिख रहे हैं. भारत और ऑस्ट्रेलिया में वित्तीय सीमाएं और उभरती विदेश नीति एवं सामरिक प्राथमिकताओं के चलते निरंतरता में बाधाएं आ रही हैं.
इन बाधाओं से पार पाने के लिए क्वाड 2+1 के त्रिपक्षीय सहयोग निगम स्थापित कर सकता है, जिसमें क्वाड के दो साझीदार और एक लाभार्थी साझीदार देश हो. इस तरीक़े से हर देश की ज़रूरत के मुताबिक़ स्थानीय योजनाओं पर बल दिया जा सकेगा, जो नॉर्थ साउथ और साउथ साउथ सहयोग के साथ मेल खाती हों. इससे मिलकर सृजन करने, ज्ञान साझा करने और सहायता के कुशल उपयोग को बढ़ावा मिलेगा, जो क्वाड की व्यवस्थाओं के तहत दिए जाने वाले सहयोग में होने वाली देरी का विकल्प बनेगा. भारत, अमेरिका और नेपाल के बीच MCC, चीन के BRI के उच्च स्तर के विकल्प की संभावनाओं का उदाहरण है.
भारत और ऑस्ट्रेलिया को ग़ैर औपनिवेशिकवादी, विश्वसनीय देशों के तौर पर देखा जाता है. दोनों को मिलकर बंगाल की खाड़ी और दक्षिणी प्रशांत क्षेत्र में मूलभूत ढांचे के संयुक्त विकास के कार्य को तेज़ करना चाहिए. ऑस्ट्रेलिया और भारत एक दूसरे के पूरक क्षमताओं वाले हैं: भारत का क्षेत्रीय तजुर्बा है, तो बंदरगाहों को स्वचालित बनाने और ग्रीन शिपिंग सेक्टर में ऑस्ट्रेलिया क्षमताओं को मिला दें तो समुद्री मूलभूत ढांचे की कमियों को दूर किया जा सकता है. इसी तरह जापान और अमेरिका को चाहिए कि वो दक्षिणी पूर्वी एशिया में कनेक्टिविटी बढ़ाने में सहयोग करें. क्योंकि इस इलाक़े में उनके विकास के लक्ष्य सामरिक ज़रूरतों के साथ तालमेल वाले हैं. ये त्रिपक्षीय व्यवस्थाएं बाद में PGII, ग्लोबल गेटवे या फिर इटली के मैट्टेई प्लान के साथ भी जोड़ी जा सकती हैं. लेकिन, ऐसा क्वाड की व्यवस्थाओं के प्रभावी साबित होने के बाद ही किया जा सकता है.
भारत का क्षेत्रीय तजुर्बा है, तो बंदरगाहों को स्वचालित बनाने और ग्रीन शिपिंग सेक्टर में ऑस्ट्रेलिया क्षमताओं को मिला दें तो समुद्री मूलभूत ढांचे की कमियों को दूर किया जा सकता है.
फिर भी चुनौतियां बनी हुई हैं: तालमेल की जटिलताएं, समूह के भीतर निर्णय प्रक्रिया की असमान शक्तियां, अलग अलग क़ानूनी व्यवस्थाएं और (शायद) लाभार्थी देशों की सीमित संस्थागत क्षमताएं. संबंधित देशों में राजनीतिक उठा-पटक भी त्रिपक्षीय सफलता को बाधित करती है. फिर भी क्वाड देशों में मज़बूत राजनीतिक विश्वास और तमाम क्षेत्रों में सहयोग का जाल, एक अनूठी आधारशिला प्रदान करता है, जिस पर सहयोग के इस मॉडल को पहले के मुक़ाबले अधिक प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकता है.
इसके समानांतर क्वाड को परिवहन और व्यापारिक गलियारों को वित्तीय सहायता देने को प्राथमिकता देनी चाहिए, ताकि BRI के कनेक्टिविटी के मूलभूत ढांचे का मुक़ाबला किया जा सके. गलियारे (ज़मीनी, समुद्री या मल्टीमोडल) चीन की प्रभाव बढ़ाने की रणनीति का केंद्रीय भाग हैं और उनके मुक़ाबले के लिए बराबरी का रणनीतिक निवेश किया जाना चाहिए. एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर (AAGC) को फिर से जीवित किया जाना चाहिए, ताकि एशिया और अफ्रीका के बीच कनेक्टिविटी के लक्ष्य हासिल किए जा सकें. ख़ास तौर से इसलिए भी, क्योंकि क्वाड के साझीदार अफ्रीका की सामरिक और आर्थिक अहमियत समझते हैं. AAGC को लोबितो कॉरिडोर या फिर यूरोपीय संघ के ग्लोबल गेटवे से जोड़ने से भी आर्थिक तालमेल और भू-राजनीतिक समरूपता को मज़बूती दी जा सकती है.
यही नहीं, I2U2 (भारत, इज़राइल, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका) जैसे समूहों के साथ साझेदारी करके भी मध्यम और दूरगामी अवधि में उम्मीदें जगाने वाले मार्ग प्रशस्त किए जा सकते हैं. UAE अब अफ्रीका का सबसे बड़ा द्विपक्षीय विकास साझीदार है और वो बहुत ठोस पूंजी और विश्वसनीयता हासिल कर चुका है. मध्यम अवधि में क्वाड और I2U2 के बीच मूलभूत ढांचे और ऊर्जा क्षेत्र के विकास में सहयोग से गहरा असर डाला जा सकता है और परियोजनाओं की विश्वसनीयता बढ़ाई जा सकती है.
अपने आपको BRI के एक विश्वसनीय विकल्प के तौर पर पेश करने के लिए क्वाड को योजनाएं लागू करने की कमियां दूर करनी होंगी. लचीले त्रिपक्षीय मॉडल अपनाने होंगे और परिवहन के सामरिक रूप से अहम ऐसे गलियारों में पैसे लगाने पर ज़ोर देना होगा, जो कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय भरोसे को बढ़ाने वाले हों.
हिंद प्रशांत क्षेत्र में मूलभूत ढांचे और कनेक्टिविटी के विकास को अर्थपूर्ण ढंग से आगे बढ़ाने के लिए क्वाड देशों को आपसी सहयोग बढ़ाना ही होगा. इसका मतलब ग्रीन एनर्जी, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और समुद्री कनेक्टिविटी में निवेश को विस्तार देना होगा और साथ ही साथ पारदर्शिता, स्थायित्व और ऊंचे दर्जे के मानकों का भी पालन करना होगा. भारत को चाहिए कि वो ब्लू डॉट नेटवर्क (BDN) में शामिल होने पर विचार करे, ताकि सामूहिक विश्वसनीयता को मज़बूती दे सके, मूलभूत ढांचे के मानकों को एकरूप बना सके और निजी क्षेत्र के निवेश को आकर्षित कर सके. AAGC में नई जान डालने से भी चीन के BRI के प्रति सामरिक बढ़त हासिल की जा सकती है और हिंद प्रशांत एवं अफ्रीका के बीच आर्थिक संपर्कों को बढ़ाया जा सकता है. क्वाड के विकास वित्त निगम और नीतिगत बैंकों को चाहिए कि वो फंडिंग की व्यवस्था को सुधारने, निवेश के जोखिम कम करने और निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र की साझेदारी बढ़ाने के लिए मिलकर काम करें. क्वाड को आसियान (ASEAN) और पैसिफिक आइलैंड्स फोरम जैसे क्षेत्रीय संस्थानों के साथ भी सहयोग बढ़ाना चाहिए. क्योंकि इनमें दक्षिणी प्रशांत के पलाऊ, पापुआ न्यू गिनी और फिजी जैसे देश शामिल हैं. या फिर, मूलभूत ढांचे की परियोजनाओं को स्थानीय ज़रूरतों के मुताबिक़ ढालना चाहिए और साथ ही साथ समावेशिता और क्षेत्रीय देशों के समर्थन को सुनिश्चित करना चाहिए. आख़िर में, बुनियादी ढांचे के विकास की एक आपस में जुड़ी हुई, पारदर्शी और लचीली रणनीति ही क्वाड को हिंद प्रशांत क्षेत्र में विकास के एक विश्वसनीय साझीदार के तौर पर पेश कर सकेगी और BRI का व्यवहारिक विकल्प मुहैया करा सकेगी.
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Prithvi Gupta was a Junior Fellow with the Observer Research Foundation’s Strategic Studies Programme. He worked out of ORF’s Mumbai centre, and his research focused ...
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