भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है. बेशक यह एक बड़ी उपलब्धि है लेकिन क्या सिर्फ रैंकिंग से समृद्धि तय होती है? इस लेख के जरिए जानें कि भारत की असली चुनौती क्या है और कैसे लोकतंत्र और बढ़ता मिडिल क्लास देश की भविष्य की आर्थिक दिशा तय करेंगे.
भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी इकॉनमी बनने का जश्न मना रहा है मगर उसका अपर मिडिल-इनकम देश बनने का रास्ता कई ताकतों से तय होगा. इनमें पॉलिटिकल गवर्नेंस, संस्थाओं की आजादी और कारोबार करने वालों के हक शामिल हैं. भारत अलग-अलग इलाकों की अलग सियासत और अलग आर्थिक ढांचे का मेल है. हर इलाके के अपने हुनर, अपने साधन और अपनी ख्वाहिशें हैं. ऐसे में भारत का बड़ी आर्थिक ताकत बनना इस बात पर टिका है कि इन सबका भला साथ-साथ हो.
भारत ने राजनीतिक आजादी को संविधान में बुनियादी हक बनाया, भले ही शुरुआत में उसका आर्थिक रास्ता समाजवादी रहा. अगर इन दोनों देशों की सियासी बनावट को समझे बिना तुलना करें, तो नतीजे गलत निकलेंगे. पीटर रोजेंडॉर्फ के मुताबिक, जहां हुकूमत सख्त और केंद्रीकृत होती है, वहां आमदनी का फैलाव सीमित रहता है.
भारत एक संघीय ढांचा है जो लोकतंत्र और ताकत के बंटवारे पर टिका है. यहां लोगों के पास अपनी मर्जी से खर्च करने की आजादी है. यही उम्मीदों से भरी इकॉनमी की असली ताकत है. इस मायने में भारत की तरक्की की कहानी की सीधे चीन से तुलना नहीं हो सकती.
भारत और चीन लगभग एक ही वक्त आजाद हुए लेकिन दोनों की सियासी और आर्थिक राह अलग-अलग रही. चीन ने आर्थिक सुधार किए लेकिन राजनीतिक आजादी पर बेहद कड़ी ग्रिप रखी. भारत ने राजनीतिक आजादी को संविधान में बुनियादी हक बनाया, भले ही शुरुआत में उसका आर्थिक रास्ता समाजवादी रहा. अगर इन दोनों देशों की सियासी बनावट को समझे बिना तुलना करें, तो नतीजे गलत निकलेंगे. पीटर रोजेंडॉर्फ के मुताबिक, जहां हुकूमत सख्त और केंद्रीकृत होती है, वहां आमदनी का फैलाव सीमित रहता है. पूंजी घटती है और काम करने वाली आबादी का हिस्सा कम हो सकता है. इसी वजह से वर्ल्ड बैंक के कंजंप्शन बेस्ड गिनी इंडेक्स में भारत (25.5) में गैर-बराबरी चीन (35.7) से कम दिखती है. इनकी तुलना का तरीका अलग हो सकता है और नतीजे उसी पर निर्भर करते हैं.
चीन अब मिडिल-इनकम से आगे बढ़कर पश्चिमी देशों जैसा जीवन स्तर हासिल करना चाहता है लेकिन उसका डेवलपमेंट मॉडल अभी भी ज्यादा निर्यात वाली मैन्युफैक्चरिंग पर टिका है. अलग-अलग सेक्टरों में असंतुलन है. रियल एस्टेट सेक्टर की परेशानी ने इसे और बढ़ाया है. मशहूर अर्थशास्त्री जेफ्री सैक्स कहते हैं कि फाइनेंस और इन्वेस्टमेंट का रोल विकास को आगे बढ़ाने में बेहद अहम है.
भारत में निजी कंपनियां सरकार को अदालत में चुनौती दे सकती हैं. यह लोकतंत्र की बड़ी ताकत है, जो सिर्फ पैसे से नहीं मापी जा सकती. वोडाफोन पर पुराने टैक्स की मांग को भारतीय अदालत ने रद्द कर दिया था. इससे दिखा कि यहां संस्थागत संतुलन हुकूमत की हद तय करता है.
चीनी फाइनेंशियल सिस्टम को देखें तो वहां पारंपरिक रूप से बैंक लोन पर ज्यादा भरोसा रहा है. आम लोगों के लिए उधार लेने के रास्ते तंग रहे जिससे शैडो बैंकिंग बढ़ी. ये हरकतें कई बार नियमों को दरकिनार कर देती हैं. खराब कर्ज यानी एनपीए बैंक की बैलेंस शीट को कमजोर करते हैं. इससे पूरी इकॉनमी के लिए खतरा पैदा होता है. ऊपर से टैरिफ और व्यापार रुकावटों का दबाव है जिससे ग्रोथ रेट पर असर पड़ रहा है. ग्लोबल अनिश्चितता भी बढ़ी है. आईएमएफ का अनुमान है कि चीन की ग्रोथ रेट 2025 में 5 फीसदी से घटकर 2026 में 4.5 फीसदी रह सकती है. आईएमएफ का मशवरा है कि चीन को एक्सपोर्ट और इन्वेस्टमेंट आधारित मॉडल की जगह घरेलू खर्च बढ़ाना चाहिए.
भारत जैसा लोकतांत्रिक सिस्टम और चीन के एक-पार्टी मॉडल की सीधे-सीधे कोई तुलना नहीं हो सकती. भारत में निजी कंपनियां सरकार को अदालत में चुनौती दे सकती हैं. यह लोकतंत्र की बड़ी ताकत है, जो सिर्फ पैसे से नहीं मापी जा सकती. वोडाफोन पर पुराने टैक्स की मांग को भारतीय अदालत ने रद्द कर दिया था. इससे दिखा कि यहां संस्थागत संतुलन हुकूमत की हद तय करता है. ऐसे संतुलन निजी निवेश को भरोसा देते हैं और लॉन्ग टर्म कैपिटल फॉर्मेशन को बढ़ाते हैं. इससे बढ़ते हुए इंडियन मिडिल क्लास को सीधे फायदा मिलता है.
भारत अभी प्रति व्यक्ति आमदनी में ऊंचे स्तर तक नहीं पहुंचा है. लेकिन एक जीवंत लोकतंत्र के रूप में उसकी प्रगति टिकाऊ है और आने वाले समय में बेहतर नतीजे दे सकती है. आखिरकार, किसी देश की तरक्की सौ मीटर की दौड़ नहीं होती, वह एक लंबी मैराथन होती है.
मिडिल क्लास वह है जिसकी सालाना आमदनी 5 लाख से 30 लाख रुपये के बीच है. कयास है कि 2030 तक यह संख्या 71.5 करोड़ तक पहुंच सकती है. 2004-05 में यह कुल आबादी का 14 फीसदी था, जो 2030 तक 46 फीसदी हो सकता है. कुछ अर्थशास्त्री कहते हैं कि डॉलर में तुलना करना ठीक नहीं, लेकिन क्रय-शक्ति के हिसाब से लोकल करेंसी में मापना लोगों की जेब की हालत को ज्यादा सही तरीके से दिखाता है.
भारत जैसा बड़ा देश नीचे के तबके की हालत को नजरअंदाज नहीं कर सकता. सरकार पर नैतिक जिम्मेदारी है कि वह समाज के साथ अपने समझौते को निभाए और लोगों का जीवन स्तर बेहतर करे. कोविड महामारी जैसी सदी में एक बार आने वाली आपदा के दौरान सरकार ने ज्यादा नकद देने के बजाय अनाज और जरूरी सामान सीधे लोगों तक पहुंचाया. इससे महंगाई का झटका वैसा नहीं लगा, जैसा कई पश्चिमी देशों में देखा गया.
आखिर में, भारत के प्राइवेट सेक्टर के रोल को कम नहीं आंक सकते. दुनिया में चल रहीं मौजूदा सियासी और आर्थिक हलचलों के बावजूद भारत कुछ हद तक सुरक्षित रहा है. यह प्राइवेट सेक्टर के लिए सही वक्त है कि वह जोखिम लेने की हिम्मत दिखाए और इन्वेस्टमेंट बढ़ाए. सरकार अकेले इन्वेस्टमेंट और खपत को ज्यादा समय तक नहीं बढ़ा सकती, क्योंकि इससे प्राइवेट सेक्टर के लिए जगह कम हो सकती है. भारतीय श्रम कानून में पिछले दिनों हुए सुधार भी एक कदम हैं, जो मालिक और कर्मचारी के अलग-अलग हितों में संतुलन साधने की कोशिश करते हैं. भारत अभी प्रति व्यक्ति आमदनी में ऊंचे स्तर तक नहीं पहुंचा है. लेकिन एक जीवंत लोकतंत्र के रूप में उसकी प्रगति टिकाऊ है और आने वाले समय में बेहतर नतीजे दे सकती है. आखिरकार, किसी देश की तरक्की सौ मीटर की दौड़ नहीं होती, वह एक लंबी मैराथन होती है.
उल्लास राव , दुबई स्थित मणिपाल एकेडमी ऑफ हायर एजुकेशन (MAHE) के मणिपाल बिजनेस स्कूल (MBS) में वित्त संकाय के मेंबर हैं.
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Ullas Rao is a Faculty member at the London Institute of Banking & Finance (LIBF) and an Associate Professor at the Vijaybhoomi University. ...
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