चार साल बाद भी रूस-यूक्रेन युद्ध जारी है- ऐसे में इसके असली कारणों को समझना जरूरी है. जानें कैसे ‘प्रभाव क्षेत्र’ की राजनीति इस टकराव के पीछे काम कर रही है.
जैसे-जैसे रूस-यूक्रेन युद्ध अपने चौथे वर्ष को पार कर चुका है, यह समय इसके मूल कारणों के नए सिरे से विश्लेषण की मांग करता है. आज के समय में बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है इसलिए देश अपने राष्ट्रीय हितों को नए तरीके से तय कर रहे हैं. शीत युद्ध खत्म होने के बाद भी रूस दुनिया की राजनीति में एक महत्वपूर्ण शक्ति बना रहा. समय के साथ उसकी ताकत बढ़ी इसलिए मॉस्को ने अपने हितों को फिर से तय करना शुरू किया और उन्हें ज्यादा मजबूती से लागू करने की कोशिश की.
जब किसी देश की शक्ति बढ़ती है तो वह अक्सर अपने आसपास के क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करता है. इसे ‘प्रभाव क्षेत्र’ (Sphere of Influence) कहा जाता है. इसका मतलब है कि कोई शक्तिशाली देश चाहता है कि उसके आसपास के देशों में राजनीतिक, रणनीतिक और सुरक्षा मामलों में उसका ज्यादा प्रभाव हो ताकि वह अपनी सुरक्षा मजबूत कर सके और अपने अस्तित्व को सुरक्षित रख सके. अपने ‘नियर अब्रॉड’ में रूस का अनुभव प्रभाव क्षेत्र की उस तर्कशक्ति का उपयुक्त उदाहरण प्रस्तुत करता है जिसे स्टीफन एम. वॉल्ट ने व्यक्त किया है. उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्पष्ट नियमों की कमी के कारण देशों के बीच प्रतिस्पर्धा होना स्वाभाविक है. इसी वजह से देश अपने हितों और सुरक्षा को बचाने के लिए प्रभाव क्षेत्र बनाने की कोशिश करते हैं, लेकिन यह पूरी तरह समस्या का समाधान नहीं कर पाता.
शीत युद्ध खत्म होने के बाद भी रूस दुनिया की राजनीति में एक महत्वपूर्ण शक्ति बना रहा. समय के साथ उसकी ताकत बढ़ी इसलिए मॉस्को ने अपने हितों को फिर से तय करना शुरू किया और उन्हें ज्यादा मजबूती से लागू करने की कोशिश की.
एक तरफ, अमेरिका के नेतृत्व वाला पश्चिमी गठबंधन उस क्षेत्र में सक्रिय रहा जिसे रूस अपना प्रभाव क्षेत्र मानता है, और इससे यूक्रेन युद्ध की स्थिति बनने में मदद मिली. दूसरी तरफ, यही सोच देशों के बीच अविश्वास और प्रतिस्पर्धा बढ़ाती है, जिससे स्थायी शांति के बजाय और अधिक संघर्ष पैदा होने का खतरा रहता है.
वैश्विक राजनीति में ‘प्रभाव क्षेत्रों’ पर चर्चा बार-बार सामने आती रही है. जब तक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में महान शक्तियाँ मौजूद रहेंगी, तब तक प्रभाव के लिए प्रतिस्पर्धा भी जारी रहने की संभावना है. उदार अन्तर्राष्ट्रीयतावाद यह तर्क देते हैं कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अंतर्गत सभी राज्यों की संप्रभुता समान है और शक्तिशाली देशों को कमजोर देशों पर अपनी इच्छा नहीं थोपनी चाहिए. व्यवहार में, हालांकि, वैश्विक राजनीति शायद ही कभी इस आदर्श के अनुरूप चलती है. भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के सामने गैर-हस्तक्षेप का सिद्धांत अक्सर टिक पाना कठिन होता है. साथ ही, प्रभाव क्षेत्र की तर्कशक्ति को स्वीकार करने वाला यथार्थवादी दृष्टिकोण भी अपनी सीमाओं से मुक्त नहीं है. किसी शक्तिशाली राज्य द्वारा कमजोर राज्यों पर अत्यधिक नियंत्रण का प्रयोग अपने-आप यह निर्धारित नहीं करता कि व्यवहार में प्रभाव क्षेत्र कैसे कार्य करते हैं.
रूस की यूक्रेन में की गई कार्रवाइयों को समझने के लिए तीन मुख्य कारणों को देखना जरूरी है. पहला कारण यह है कि बड़ी शक्तियों के हित हमेशा एक जैसे नहीं होते, और यही उनके फैसलों को प्रभावित करता है. आम तौर पर कोई भी बड़ा देश अपने आसपास के देशों में ज्यादा रुचि और चिंता रखता है, जबकि दूर के देशों में उसकी रुचि कम होती है. इसी वजह से यूक्रेन के मामले में रूस का हित और चिंता अमेरिका की तुलना में कहीं ज्यादा गहरा है. मॉस्को यूक्रेन में किसी शत्रुतापूर्ण महान शक्ति की उपस्थिति को-उसकी भौगोलिक निकटता और ऐतिहासिक संबंधों को देखते हुए-एक ‘अस्तित्वगत खतरे’ के रूप में देखता है.रूस को अपनी सुरक्षा को लेकर जो डर महसूस होता है, उसका एक कारण उसके इतिहास में हुए हमलों की यादें भी हैं.
आम तौर पर कोई भी बड़ा देश अपने आसपास के देशों में ज्यादा रुचि और चिंता रखता है, जबकि दूर के देशों में उसकी रुचि कम होती है. इसी वजह से यूक्रेन के मामले में रूस का हित और चिंता अमेरिका की तुलना में कहीं ज्यादा गहरा है. मॉस्को यूक्रेन में किसी शत्रुतापूर्ण महान शक्ति की उपस्थिति को-उसकी भौगोलिक निकटता और ऐतिहासिक संबंधों को देखते हुए-एक ‘अस्तित्वगत खतरे’ के रूप में देखता है.
दूसरी बात यह है कि आज के वैश्वीकरण के दौर में भी व्यापार अक्सर पास-पड़ोस के देशों के साथ ज्यादा होता है. बड़ी शक्तियों का व्यापार भी अधिकतर अपने ही क्षेत्र के देशों के साथ केंद्रित रहता है. इसी कारण यूक्रेन ऊर्जा और खाद्यान्न जैसे क्षेत्रों में रूस का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार था. हालांकि 2015 में कीव ने मास्को से प्राकृतिक गैस खरीदना बंद कर दिया था. फिर भी 2022 से पहले उसकी व्यापक ऊर्जा संरचना रूसी आपूर्ति श्रृंखलाओं से गहराई से जुड़ी हुई थी.
तीसरा, महान शक्तियों के पास शक्ति-प्रक्षेपण (power projection) की क्षमताएँ होती हैं, और उनके लिए अपनी शक्ति का प्रदर्शन अपने निकटवर्ती क्षेत्र में करना दूरस्थ क्षेत्रों की तुलना में अधिक आसान और आकर्षक होता है. मास्को ने कई बार किया है-2008 में जॉर्जिया के साथ युद्ध से लेकर 2014-15 और 2022 में यूक्रेन में उसके सैन्य हस्तक्षेप तक.
शीत युद्ध के अंत में एक समझौते की कल्पना की गई थी शीत युद्ध के बाद उम्मीद थी कि पश्चिम रूस के साथ बराबरी के आधार पर सहयोग करेगा, लेकिन बाद में यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था में हुए बदलावों को रूस ने अपने हितों की अनदेखी के रूप में देखा. जेम्स बेकर की कथित ‘एक इंच भी पूर्व की ओर नहीं‘ वाली टिप्पणी से जुड़ा टूटा हुआ वादा, और पूर्वी यूरोपीय देशों की संप्रभु पसंद पर पश्चिम का जोर-इन दोनों ने मिलकर उन तनावों को आकार दिया जो अंततः यूक्रेन युद्ध में हुए. सीरिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों में रूस की मौजूदगी यह दिखाती है कि बड़ी शक्तियां आमतौर पर सिर्फ अपने ही क्षेत्र तक सीमित नहीं रहतीं. वे अक्सर दूसरे क्षेत्रों में भी अलग-अलग तरीकों से दखल देने की कोशिश करती हैं.
जब भी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था उथल-पुथल के दौर में प्रवेश करती है, शक्ति-आधारित रणनीतिक सोच प्रमुख हो जाती है. कुछ रणनीतिकारों ने तर्क दिया है कि दुनिया को महान शक्तियों के स्पष्ट रूप से निर्धारित प्रभाव क्षेत्रों में विभाजित करने से हितों के टकराव कम हो सकते हैं और स्थिरता को बढ़ावा मिल सकता है. यह एक भ्रम है; महान शक्तियाँ सामान्यतः ‘जीओ और जीने दो’ के सिद्धांत पर सहमत नहीं होतीं. अगर प्रभाव क्षेत्र की सोच को पूरी तरह सही मान लिया जाए, तो यूक्रेन-जो रूस के बहुत पास है और जिसका उससे ऐतिहासिक संबंध भी है-उसे रूस के साथ सामान्य और स्थिर संबंध रखने चाहिए थे. यह कहना भी सही नहीं होगा कि पश्चिम की नीतियों का इस स्थिति पर कोई असर नहीं पड़ा. जैसे रूस ने अपने आसपास के देशों में बाहरी दखल को कम करने की कोशिश की, वैसे ही यूरोप द्वारा यूरोमैदान आंदोलन को दिए गए समर्थन को भी अलग-अलग देशों और लोगों ने अलग-अलग तरीके से देखा.
आगे का रास्ता संतुलित और समझदारी भरी कूटनीति से ही निकलेगा. न तो प्रभाव क्षेत्र की सोच को पूरी तरह नजरअंदाज करना सही है और न ही उसे पूरी तरह स्वीकार करना. बड़ी शक्तियों को समझना होगा कि दूसरों के क्षेत्रों में दखल देना खतरनाक है.
संतुलन-शक्ति (Balance of Power) सिद्धांतों के अनुसार, ‘कमजोर राज्य प्रभुत्व का विरोध करते हैं और उसे कम करने के तरीके खोजते हैं.’ महान शक्तियों की प्रतिद्वंद्विता इस गतिशीलता को और बढ़ा देती है, क्योंकि वे अक्सर एक-दूसरे की कमजोरियों का लाभ उठाने की कोशिश करती हैं. रूस ने जितना अधिक इन देशों पर प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश की, उतना ही अधिक उसका प्रतिद्वंद्वी पश्चिम हस्तक्षेप करता गया-रंग क्रांतियों और लोकतंत्र-प्रोत्साहन का समर्थन करते हुए, जिससे मेजबान देश (इस मामले में यूक्रेन) और रूस के बीच अविश्वास का एक दुष्चक्र पैदा हुआ. क्षेत्र में रूस की खुली आक्रामकता ने स्वीडन और फ़िनलैंड को पश्चिमी सुरक्षा गठबंधन की ओर धकेला, यूक्रेन में राष्ट्रवादी भावना को मजबूत किया, और क्षेत्र में रूस के प्रभाव के दावे को कमजोर कर दिया.
यह बताता है कि बड़ी शक्तियों की राजनीति अक्सर संघर्ष और अस्थिरता पैदा करती है. देश अपनी सुरक्षा के लिए फैसले लेते हैं, लेकिन कई बार वही फैसले युद्ध और तनाव बढ़ा देते हैं. जब तक देशों की ताकत अलग-अलग रहेगी, तब तक प्रभाव क्षेत्र की सोच अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बनी रहेगी. रूस का अनुभव दिखाता है कि प्रभाव क्षेत्र वास्तव में मौजूद होते हैं, लेकिन उनसे स्थायी शांति बनाना मुश्किल होता है.
शांति के लिए ऐसी सुरक्षा व्यवस्था जरूरी है जो सभी देशों की चिंताओं को समझे और इसे केवल पश्चिम के विस्तार या रूस के प्रभुत्व के रूप में न देखा जाए. साथ ही यूक्रेन की संप्रभुता सुरक्षित रहे, उसे पश्चिम से आर्थिक-राजनीतिक संबंध बनाने की आज़ादी मिले और आर्थिक सहयोग को सैन्य गठबंधनों से अलग रखा जाए ताकि रूस की सुरक्षा चिंताएं भी कम हो सके. आगे का रास्ता संतुलित और समझदारी भरी कूटनीति से ही निकलेगा. न तो प्रभाव क्षेत्र की सोच को पूरी तरह नजरअंदाज करना सही है और न ही उसे पूरी तरह स्वीकार करना. बड़ी शक्तियों को समझना होगा कि दूसरों के क्षेत्रों में दखल देना खतरनाक है.
अलेक्सी ज़खारोव ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के सामरिक अध्ययन कार्यक्रम में रूस और यूरेशिया विषय के फ़ेलो हैं.
नीतीश कुमार ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के सामरिक अध्ययन कार्यक्रम में रिसर्च इंटर्न हैं.
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Aleksei Zakharov is a Fellow with ORF’s Strategic Studies Programme. His research focuses on the geopolitics and geo-economics of Eurasia and the Indo-Pacific, with particular ...
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Nitish Kumar is a Research Intern with the Strategic Studies Programme at the Observer Research Foundation. ...
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