Author : Oommen C. Kurian

Expert Speak Health Express
Published on Dec 16, 2025 Updated 3 Days ago

ऑलिवर सैक्स ने न्यूरोलॉजी को संवेदनशील और मानवीय कहानियों के ज़रिए पेश किया. उनकी किताबें बीमारी को केवल अंत नहीं बल्कि नई समझ की शुरुआत दिखाती थीं लेकिन हालिया लेखों ने सवाल उठाया है कि क्या ये कहानियाँ पूरी तरह हकीकत पर आधारित थीं या थोड़ी गढ़ी गई थीं.

न्यूरोलॉजी की जादुई कहानियां- सच क्या है? जानें!

कई दशकों तक ऑलिवर सैक्स लोगों की नज़र में न्यूरोलॉजी का एक संवेदनशील और मानवीय चेहरा बने रहे. वे ऐसे डॉक्टर माने जाते थे जो मरीजों को सिर्फ़ मेडिकल फ़ाइलों तक सीमित नहीं रखते थे बल्कि उनकी पूरी कहानी सामने लाते थे. Awakenings और The Man Who Mistook His Wife for a Hat जैसी किताबों के ज़रिए सैक्स ने पाठकों और कई डॉक्टरों को यह विश्वास दिलाया कि बीमारी की पहचान कहानी का अंत नहीं बल्कि उसकी शुरुआत होती है लेकिन द न्यू यॉर्कर में रेचल एवीव का हालिया खोजी लेख एक असहज सवाल उठाता है- क्या सैक्स की इन प्रभावशाली कहानियों की ताक़त हकीकत को थोड़ा बदलने पर टिकी थी? एवीव के अनुसार, कई बार सैक्स ने मरीजों की असली बातों और व्यवहार को बदलकर, जटिल ज़िंदगियों को सरल और साफ़ कहानियों में ढाल दिया.

  • ऑलिवर सैक्स ने न्यूरोलॉजी को मानवीय कहानियों के माध्यम से प्रस्तुत किया।
  • बीमारी को अंत नहीं, बल्कि नई समझ की शुरुआत के रूप में दिखाया गया।
  • हालिया लेखों ने इन कहानियों की हकीकत पर सवाल खड़े किए हैं।

 

“एवीव के अनुसार, कई बार सैक्स ने मरीजों की असली बातों और व्यवहार को बदलकर, जटिल ज़िंदगियों को सरल और साफ़ कहानियों में ढाल दिया।”

इस बेचैनी को समझने के लिए सोकल प्रकरण को याद किया जा सकता है. 1996 में एलन सोकल ने जानबूझकर एक बेतुका और अर्थहीन लेख एक अकादमिक पत्रिका में भेजा, यह परखने के लिए कि क्या जटिल शब्दों और विचारधारात्मक भाषा के सहारे बिना ठोस प्रमाण के भी कोई लेख स्वीकार किया जा सकता है. पत्रिका ने उसे छाप दिया और बाद में सोकल ने इसे एक धोखा बताकर उजागर किया. यह तुलना इसलिए नहीं है कि ऑलिवर सैक्स ने कोई धोखा किया- उन्होंने ऐसा नहीं किया. समानता इस बात में है कि कैसे सजी-संवरी कहानियाँ लोगों को आकर्षित कर लेती हैं और कैसे संस्थाएँ व पाठक एक प्रभावशाली प्रस्तुति को भरोसेमंद ज्ञान मान लेते हैं. अगर सोकल ने दिखाया कि गढ़े हुए सिद्धांत गंभीर विद्वता का रूप ले सकते हैं तो सैक्स का मामला यह दिखाता है कि चिकित्सा की कहानियाँ कैसे तथ्यात्मक सच्चाई का रूप ले सकती हैं. यह इसलिए अहम है क्योंकि सैक्स चिकित्सा जगत के भीतर से लिख रहे थे और एक अच्छे लेखक-डॉक्टर होने के नाते उन्हें अतिरिक्त भरोसा दिया गया. इस मायने में यह भीतर से आया हुआ एक “छोटा सोकल मामला” है- जो चेतावनी देता है कि जब कोई कहानी चिकित्सकीय अधिकार के साथ आती है तो हम उसे कितनी आसानी से सच मान लेते हैं.

अकेले महान व्यक्ति की बनाई गई कहानी

रेचल अवीव का सबसे मजबूत विश्लेषण Awakenings में “लियोनार्ड एल” के चित्रण से जुड़ा है. ओलिवर सैक्स ने लियोनार्ड को एक अकेले, दुखी और किताबों में डूबे व्यक्ति के रूप में दिखाया, यहाँ तक कि उसकी भावनाओं को गहराने के लिए रिल्के की कविता की पंक्ति भी उसके नाम से जोड़ दी लेकिन अवीव बताती हैं कि सैक्स के क्लिनिकल नोट्स में इसका कोई सबूत नहीं है. उलटे, वही पंक्ति सैक्स ने पहले अपने निजी पत्रों में खुद के लिए इस्तेमाल की थी. असली फर्क तब सामने आता है जब पता चलता है कि इलाज के बाद लियोनार्ड ने अपनी आत्मकथा लिखी थी, जिसमें वह खुद को दोस्तों से जुड़ा हुआ बताता है और अपने जीवन के कहीं ज्यादा जटिल, यहाँ तक कि परेशान करने वाले पहलुओं का ज़िक्र करता है. सैक्स को यह सब पता था, फिर भी उन्होंने अपनी किताब में इसे शामिल नहीं किया. नतीजा यह हुआ कि मरीज को नए सिरे से गढ़ दिया गया- ऐसा रूप जो पाठकों की सहानुभूति बनाए रखे लेकिन सच्चाई की पूरी तस्वीर न दिखाए.

“एवीव के अनुसार, कई बार सैक्स ने मरीजों की असली बातों और व्यवहार को बदलकर, जटिल ज़िंदगियों को सरल और साफ़ कहानियों में ढाल दिया।”

एविव यह भी दिखाती हैं कि सैक्स अपने काम को लेकर भोले नहीं थे. अपनी निजी डायरी में उन्होंने माना कि उन्होंने मरीजों को ऐसे “गुण” दे दिए जो उनके पास थे ही नहीं और कुछ बातें पूरी तरह गढ़ी हुई थीं. यह स्वीकारोक्ति बहस को बदल देती है. अब सवाल सिर्फ़ साहित्यिक सजावट का नहीं रह जाता बल्कि यह उठता है कि सैक्स के हाथों में “केस स्टडी” का मतलब क्या था?

जब कहानी हक़ीक़त से आगे निकल जाए

ऑलिवर सैक्स की सबसे मशहूर रचनाओं में से एक “द ट्विन्स” इसका साफ़ उदाहरण है, जहाँ कहानी सबूतों से आगे निकल जाती है. सैक्स ने दो ऑटिस्टिक जुड़वां भाइयों का ज़िक्र किया है जो एक-दूसरे से बड़े-बड़े अभाज्य संख्याएँ बोलकर “बात” करते थे. उन्होंने दावा किया कि वे इन संख्याओं की जाँच अपनी पुरानी किताब से करते थे. यह विवरण एक परीकथा जैसा लगता है- जहाँ दो दिमाग एक खास, रहस्यमय भाषा में जुड़ जाते हैं लेकिन रैचल एवीव बताती हैं कि इन जुड़वां बच्चों पर पहले से शोध हो चुका था और अमेरिकन जर्नल ऑफ साइकियाट्री में छपे दो शोध पत्रों में ऐसी अभाज्य संख्या वाली क्षमता का ज़िक्र नहीं मिलता. 2007 में एक मनोवैज्ञानिक ने सैक्स के इस दावे को चुनौती भी दी क्योंकि इंसान इतने बड़े अभाज्य नंबर अपने आप नहीं बना सकता. जब सैक्स से उस किताब के बारे में पूछा गया तो वे कोई ठोस जानकारी नहीं दे पाए. इसके बावजूद, कुछ वैज्ञानिकों ने सैक्स का बचाव किया- ठोस सबूत के बजाय उनकी प्रतिभा और कल्पनाशीलता के आधार पर. यह मामला दिखाता है कि कैसे एक प्रभावशाली कहानी, बिना पुख़्ता प्रमाण के भी, सच की तरह स्वीकार कर ली जाती है.

“अब सवाल सिर्फ़ साहित्यिक सजावट का नहीं रह जाता बल्कि यह उठता है कि सैक्स के हाथों में ‘केस स्टडी’ का मतलब क्या था?”

यह बात क्यों मायने रखती है

भारतीय पाठकों को यह समझाने की ज़रूरत नहीं है कि समाज में डॉक्टर की बात को कितनी अहमियत दी जाती है. अक्सर डॉक्टर की कही बात को अंतिम सच माना जाता है, खासकर ऐसे सिस्टम में जहाँ परिवार इलाज पर अपनी जेब से भारी खर्च करते हैं, कई डॉक्टरों से सलाह लेते हैं और भीड़भरे अस्पतालों में उम्मीद के सहारे टिके रहते हैं. ऐसे माहौल में ‘नैरेटिव मेडिसिन’ की अपनी अहम भूमिका है- यह इलाज को सिर्फ़ लेन-देन की प्रक्रिया बनने से रोकती है और डॉक्टरों को याद दिलाती है कि बीमारी सिर्फ़ आँकड़ों की चीज़ नहीं बल्कि एक जीया हुआ अनुभव होती है.

“जब कोई मेडिकल कहानी खुद को सच का गवाह बताती है तो उससे तथ्यों की ईमानदारी भी अपेक्षित होती है।”

अविव का लेख याद दिलाता है कि कहानियाँ अक्सर सावधानियों से ज़्यादा तेज़ी से फैलती हैं. कोई असरदार मेडिकल कहानी लोगों की उम्मीदें बना सकती है, सोच को प्रभावित कर सकती है और डॉक्टरों की सोच में भी जगह बना लेती है इसलिए अगर हम ऑलिवर सैक्स को पढ़ते या पढ़ाते हैं तो अब हमें उन्हें ज़्यादा समझदारी और सतर्कता के साथ पढ़ना होगा. हम उनके योगदान की सराहना कर सकते हैं लेकिन यह भी समझना ज़रूरी है कि उनकी लेखन शैली कहाँ सच्चाई को मोड़ सकती है. यह साहित्य को चिकित्सा से हटाने की बात नहीं है, बल्कि यह समझने की ज़रूरत है कि हम किस तरह की लेखन शैली पढ़ रहे हैं. साहित्य भावनात्मक सच्चाई पर चल सकता है लेकिन जब कोई मेडिकल कहानी खुद को सच का गवाह बताती है तो उससे तथ्यों की ईमानदारी भी अपेक्षित होती है. जैसे सोकल प्रकरण ने अकादमिक दुनिया को सावधान किया था, वैसे ही यह मामला चिकित्सा के लिए एक चेतावनी है—कि जो कहानी सच्ची लगती है, वह हमेशा पूरी सच्ची हो, यह ज़रूरी नहीं। जब संवेदना और तथ्य अलग हो जाते हैं तो सबसे सुंदर कहानी भी कमजोर पड़ जाती है.


ओम्मेन सी. कुरियन ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में हेल्थ इनिशिएटिव के प्रमुख और सीनियर फ़ेलो हैं.

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