सीमाओं पर तनाव अब सिर्फ़ लड़ाई और बयानों तक नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर मीम और हैशटैग की जंग बन गया है. जानें, कैसे अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के बीच यह डिजिटल मुकाबला लोगों की सोच को तेजी से बदल रहा है.
पिछले साल से अफ़ग़ानिस्तान की तालिबान हुकूमत और पाकिस्तान के बीच जारी तनाव इस बात का उदाहरण है कि ऑनलाइन नैरेटिव को लेकर मुकाबला युद्ध के मैदान की घटनाओं की तरह ही अहम है. ऑपरेशन खैबर स्टॉर्म से लेकर ऑपरेशन गज़ब लिल हक़ तक पाकिस्तान सेना ने लगातार बमबारी और मनोवैज्ञानिक युद्ध के ज़रिए अफ़ग़ान तालिबान को निशाना बनाया है. इस माहौल में मीम, व्यंग्य और वायरल हास्य प्रभाव बनाने के अप्रत्याशित हथियार बन गए हैं जिनके ज़रिए लोगों की सोच तय की जा रही है और पारंपरिक संचार की रणनीतियों को चुनौती दी जा रही है.
पाकिस्तान जहां पारंपरिक रूप से नैरेटिव तय करने के लिए संस्थागत संचार के ढांचे पर निर्भर रहा है, वहीं अफ़ग़ानिस्तान में सूचना का माहौल काफी अधिक विकेंद्रित प्रणाली में बदल गया है. अब वहां संदेश एक साथ कई पक्षों से आते हैं जिनमें तालिबान के आधिकारिक प्रवक्ता, अफ़ग़ान पत्रकार, कार्यकर्ताओं का नेटवर्क, मीम पेज और प्रवासी समुदाय शामिल हैं. साथ मिलकर इन्होंने ऐसा विकेंद्रित सूचना तंत्र बनाया है जो पाकिस्तान के आधिकारिक संचार तंत्र (विशेष रूप से इंटर-सर्विसेज़ पब्लिक रिलेशन यानी ISPR) का मुकाबला करने में सक्षम है.
ऑपरेशन खैबर स्टॉर्म से लेकर ऑपरेशन गज़ब लिल हक़ तक पाकिस्तान सेना ने लगातार बमबारी और मनोवैज्ञानिक युद्ध के ज़रिए अफ़ग़ान तालिबान को निशाना बनाया है. इस माहौल में मीम, व्यंग्य और वायरल हास्य प्रभाव बनाने के अप्रत्याशित हथियार बन गए हैं जिनके ज़रिए लोगों की सोच तय की जा रही है और पारंपरिक संचार की रणनीतियों को चुनौती दी जा रही है.
नैरेटिव के इस मुकाबले में महत्वपूर्ण फैक्टर समय है. फरवरी 2026 में हवाई हमलों के तुरंत बाद अफ़ग़ान नैरेटिव फैलाने लगे. जब तक ISPR के ज़रिए आधिकारिक बयान जारी होते थे, तब तक अफ़ग़ानिस्तान का नज़रिया काफी फैल जाता था. ये पैटर्न विकेंद्रित डिजिटल नेटवर्क और केंद्रीकृत सरकारी संचार प्रणाली के बीच व्यापक संरचनात्मक असमानता को दर्शाता है. कई मामलों में ये मज़ाकिया नैरेटिव आधिकारिक संदेशों को चुनौती देने में आश्चर्यजनक रूप से प्रभावी साबित हुए हैं, विशेष रूप से उस समय जब सरकार प्रायोजित हास्य के प्रयास ऑनलाइन तालमेल बिठाने में नाकाम रहते हैं.
अफ़ग़ानी सूचना तंत्र मुख्य तौर पर डिजिटल कम्युनिकेशन के तीन आपस में जुड़े रूपों के ज़रिए काम करता है: i) आधिकारिक बयान और राजनीतिक संदेश, ii) मीम एवं हैशटैग कैंपेन, और iii) एक साथ काम करने वाले मैसेजिंग नेटवर्क.
आधुनिक सूचना युद्ध की एक और प्रमुख विशेषता है युद्ध को शेयर करने योग्य डिजिटल कंटेंट में बदलना. जब सैन्य संघर्ष की ख़बरें ऑनलाइन फैलने लगती हैं तो सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म तुरंत ही मीम, चुटकुलों और टिप्पणियों से भर जाते हैं. ये कंटेंट मामूली लग सकते हैं लेकिन ये डिजिटल सूचना तंत्र के भीतर महत्वपूर्ण काम करते हैं. मीम जटिल राजनीतिक तर्कों को आकर्षक रूप में प्रस्तुत करते हैं जो सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर तेज़ी से फैलते हैं. चूंकि वो हास्य और प्रतीकात्मकता पर निर्भर करते हैं, इसलिए वो ध्यान आकर्षित करने और लोगों की सोच को तय करने में विशेष रूप से प्रभावी होते हैं. वास्तव में मीम भू-राजनीतिक संघर्ष को नैरेटिव में बदलते हैं और भावनात्मक पहलू को हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं.
ये कंटेंट मामूली लग सकते हैं लेकिन ये डिजिटल सूचना तंत्र के भीतर महत्वपूर्ण काम करते हैं. मीम जटिल राजनीतिक तर्कों को आकर्षक रूप में प्रस्तुत करते हैं जो सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर तेज़ी से फैलते हैं. चूंकि वो हास्य और प्रतीकात्मकता पर निर्भर करते हैं, इसलिए वो ध्यान आकर्षित करने और लोगों की सोच को तय करने में विशेष रूप से प्रभावी होते हैं.
हैशटैग कैंपेन अफ़ग़ानी डिजिटल लामबंदी के सबसे प्रमुख टूल में से हैं. पाकिस्तान के साथ तनाव के क्षणों में एक्टिविस्ट और विश्लेषक अक्सर अफ़ग़ान संप्रभुता और पाकिस्तानी आक्रमण को लेकर नैरेटिव तय करने वाले हैशटैग को बढ़ावा देते हैं. इनके उदाहरण हैं: #SanctionPakistan, #FreeAfghanistanFromPakistan, #PakistaniAggression, #AfghanSovereignty, #HandsoffAfghanistan, #PakistanProxyWar.

स्रोत: X

स्रोत: Vsk Tamil Nadu
मीम की एक और श्रेणी पाकिस्तान को सैन्य रूप से कमज़ोर और रणनीतिक तौर पर अलग-अलग दर्शाती हैं. ये मीम अक्सर पाकिस्तान की क्षेत्रीय नीति (विशेष रूप से अफ़ग़ानिस्तान में “रणनीतिक गहराई” पाने के उसके ऐतिहासिक प्रयास) को नाकाम बताते हैं.

इस तरह के नैरेटिव बार-बार ये संदेश देते हैं कि अफ़ग़ान संघर्ष के दौरान आतंकवादी नेटवर्क के लिए पाकिस्तान के पहले के समर्थन से दीर्घकालिक सुरक्षा नतीजे भुगतने पड़े हैं. ये नैरेटिव अफ़ग़ान राष्ट्रवादियों के बीच मज़बूती से सुनाई देते हैं जहां अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के नेतृत्व वाले दखल (2001-2021) के दौरान पाकिस्तान की भागीदारी की यादें गहराई से जमी हुई हैं. मीम के ज़रिए अक्सर युद्ध के मैदान में होने वाले अपमान को भी दिखाया जाता है. ऐसे नैरेटिव पाकिस्तानी सेना को निशाना बनाते हैं. ये तस्वीरें एक प्रतीकात्मक उद्देश्य को पूरा करती हैं: वो पाकिस्तान की सैन्य विश्वसनीयता को कमज़ोर करने और तालिबान के लड़ाकों को सीमा पार संघर्ष में विजेता के रूप मे पेश करने की कोशिश करती हैं.

स्रोत: Supixy News, X

स्रोत: Hindustan Times and Instagram
अफ़ग़ानी सूचना अभियानों की एक उल्लेखनीय विशेषता है अलग-अलग पक्षों के बीच तालमेल. वैसे तो केंद्रीकृत समन्वय के सीमित साक्ष्य हैं लेकिन संदेश भेजने का तंत्र अक्सर एक पैटर्न का पालन करता है.
पहले तालिबान के आधिकारिक प्रवक्ता सैन्य या राजनीतिक घटनाक्रमों के बारे में बयान जारी करते हैं. ये बयान शुरुआती नैरेटिव स्थापित करते हैं जिसमें आम तौर पर अफ़ग़ानिस्तान की संप्रभुता पर ज़ोर दिया जाता है और बाहरी आक्रमण की निंदा की जाती है. इसके बाद पत्रकार और मीडिया विश्लेषक नैरेटिव को फैलाते हैं, ज़रूरी विश्लेषण प्रदान करते हैं और तालिबान के अधिकारियों के बयानों को फैलाते हैं. उसके बाद कार्यकर्ताओं के नेटवर्क समन्वित हैशटैग को बढ़ावा देते हैं जो X जैसे प्लैटफॉर्म पर दिखने में मदद करते हैं. फिर मीम और विज़ुअल प्रोपेगेंडा को बढ़ावा देने वाले अकाउंट नैरेटिव को आसानी से शेयर होने वाली तस्वीरों में बदलते हैं जिससे संदेश व्यापक लोगों तक पहुंचता है. अंत में, प्रवासी नेटवर्क नैरेटिव को अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक फैलाते हैं जिसमें अक्सर पश्चिमी देशों के लोगों और मानवाधिकार संगठनों तक संदेश पहुंचाया जाता है.
सरकार से जुड़े लोगों के द्वारा इंटरनेट पर मौजूद वायरल अपील को दोहराने की कोशिश हमेशा कामयाब नहीं होती. इसका एक उदाहरण पाकिस्तान के राजनीतिक विश्लेषक और पूर्व सलाहकार बैरिस्टर शहज़ाद वरायच की एक सोशल मीडिया पोस्ट है जिसमें उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान के लोगों को चुनौती दी थी. उन्होंने “अच्छा जी” कहकर पाकिस्तानी सेना के समर्थन में हास्य संदेश के साथ संघर्ष को एक अलग रूप देने का प्रयास किया था.

स्रोत: X, Handle- Badar Shahbaz (@BSWarraich)

स्रोत: X

स्रोत: X, Handle- Badar Shahbaz (@BSWarraich)

स्रोत: X, Handle- Fatima Baluch and Peace Within
लेकिन व्यापक समर्थन मिलने के बदले ये पोस्ट ऑनलाइन मज़ाक का विषय बन गई. कई लोगों ने अपने मीम के ज़रिए इस संदेश का मज़ाक उड़ाते हुए जवाब दिया. वहीं कुछ अन्य लोगों ने हास्य को देशभक्ति के संदेश के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की आलोचना की.
अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के सूचना तंत्र के बीच का अंतर डिजिटल सूचना युद्ध में एक महत्वपूर्ण असमानता को उजागर करता है.
पाकिस्तान की संचार रणनीति, विशेष रूप से ISPR के ज़रिए, संस्थागत और केंद्रीकृत है. आधिकारिक बयान आम तौर पर वेरिफाइड, सावधानी से लिखे गए शब्द होते हैं जो औपचारिक माध्यमों से जारी होते हैं. ये तरीका विश्वसनीयता को मज़बूत करता है लेकिन तेज़ी से बदलते संकट के दौरान नैरेटिव की प्रतिक्रिया में देरी कर सकता है. इसके विपरीत अफ़ग़ान डिजिटल नेटवर्क विकेंद्रित और गतिशील हैं. चूंकि एक्टिविस्ट, पत्रकार और अज्ञात लोग स्वतंत्र रूप से काम करते हैं, ऐसे में किसी घटना के कुछ मिनट के भीतर ही नैरेटिव फैला सकते हैं.
पाकिस्तान के लिए चुनौती सिर्फ लोगों के नैरेटिव का मुकाबला करना नहीं है बल्कि बदले हुए सूचना के माहौल के मुताबिक ख़ुद को बदलना भी है जहां विकेंद्रित डिजिटल किरदार अधिक प्रभावी भूमिका निभाते हैं. सूचना के युग में नैरेटिव पर वर्चस्व की लड़ाई सैन्य अभियान समाप्त होने के साथ ख़त्म नहीं होती है बल्कि ये ऑनलाइन जारी रहती है जहां अगला वायरल मीम लोगों की सोच को किसी आधिकारिक प्रेस बयान की तुलना में ज़्यादा तेज़ी से प्रभावित कर सकता है.
सौम्या अवस्थी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर सिक्योरिटी, स्ट्रेटेजी एंड टेक्नोलॉजी में फेलो हैं.
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Dr Soumya Awasthi is a Fellow, Centre for Security, Strategy and Technology at the Observer Research Foundation. Her work focuses on the intersection of technology and ...
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