Author : Ashish Upreti

Expert Speak Raisina Debates
Published on Mar 23, 2026 Updated 0 Hours ago

बलोच संघर्ष अब सिर्फ जमीन की नहीं बल्कि कहानियों और सोशल मीडिया की लड़ाई बन गया है- जानिए, हर घटना के साथ यहां नई नैरेटिव गढ़ी जा रही है. BLA वीडियो और संदेशों के जरिए अपनी बात दुनिया तक पहुँचा रहा है लेकिन हिंसा इसे और जटिल बना रही है.

कहानी, कैमरा और नैरेटिव: नया बलोच आंदोलन

बलोच लिबरेशन आर्मी (BLA) और पाकिस्तानी राज्य के बीच लंबे समय से चल रहा टकराव अब एक नए दौर में प्रवेश करता दिखाई दे रहा है, जहाँ BLA की ओर से न केवल रणनीतिक बल्कि कथानक (नैरेटिव) स्तर पर भी स्पष्ट बदलाव देखने को मिल रहे हैं. हाल ही में BLA ने अपने नेता बशीर ज़ेब के कई वीडियो जारी किए, जिनमें वे बिना चेहरा ढके शांत और संयमित अंदाज़ में समर्थकों और बाहरी दुनिया को संबोधित करते नजर आते हैं. एक वीडियो में उन्हें कठिन पहाड़ी इलाकों से मोटरसाइकिल पर गुजरते हुए ऑपरेशन हेरोफ-2 का नेतृत्व करते दिखाया गया. यह दृश्य दिखाने के लिए तैयार किया गया था कि संगठन सक्रिय है, संगठित है और पाकिस्तानी राज्य को खुली चुनौती दे रहा है. इसके जरिए यह संदेश भी दिया गया कि उनका संघर्ष केवल नारों पर नहीं, बल्कि नैतिक और राजनीतिक तर्कों पर आधारित है. अब बलोच संघर्ष में एक बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है. यहाँ केवल हमले करना ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह भी उतना ही जरूरी हो गया है कि उन हमलों को कैसे समझाया और पेश किया जाए. खासकर मजीद ब्रिगेड जैसे गुट अब सूचना युद्ध का इस्तेमाल कर रहे हैं, जहाँ वीडियो, बयान और कहानियों के जरिए लोगों की सोच और धारणा को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है. 

किनारे से आवाज़ उठने की शुरुआत 

दशकों तक बलोच संघर्ष मुख्यधारा के मीडिया कवरेज से काफी हद तक बाहर रहा. पत्रकारों की पहुँच सीमित थी, कार्यकर्ता गायब हो जाते थे और हिंसा को अक्सर केवल आँकड़ों तक सीमित कर दिया जाता था. इन क्षेत्रों में जगह बनाने की कोशिश करने के बजाय, बलोच उग्रवादी समूहों ने धीरे-धीरे अपना खुद का सूचना तंत्र बनाना शुरू कर दिया.

हाल के वर्षों में यह बदलाव और तेज हुआ है. मार्च 2025 में जाफर एक्सप्रेस पर हुए हमले जैसे घटनाक्रमों के बाद अब विस्तृत बयान जारी किए जाते हैं, जिनमें लक्ष्य के चयन, अभियान के उद्देश्य और राजनीतिक कारणों की व्याख्या की जाती है. वीडियो, जो अक्सर बिना ज्यादा संपादन और कच्चे रूप में होते हैं, समन्वित हमलों, योजनाबद्ध पीछे हटने और लड़ाकों के भावनात्मक अंतिम संदेशों को दिखाते हैं. कई सोशल मीडिया अकाउंट एक ही सामग्री को एक साथ साझा करते हैं, जिससे राज्य एजेंसियों द्वारा हटाए जाने के बावजूद वह सामग्री फैलती रहती है.

यह संदेश भी दिया गया कि उनका संघर्ष केवल नारों पर नहीं, बल्कि नैतिक और राजनीतिक तर्कों पर आधारित है. अब बलोच संघर्ष में एक बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है. यहाँ केवल हमले करना ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह भी उतना ही जरूरी हो गया है कि उन हमलों को कैसे समझाया और पेश किया जाए.

यह पूरी तरह लोगों के दिमाग पर नियंत्रण नहीं है, बल्कि ऐसा हो रहा है कि हर हिंसक घटना के साथ उसकी कहानी और कारण भी फैलाए जा रहे हैं. सोशल मीडिया की चर्चा से लगता है कि बलोच और बाहर रहने वाले लोगों पर इसका असर दिख रहा है.

फिदायीन का मानवीकरण

अब केवल छोटे लिखित दावों की बजाय वीडियो और अन्य मल्टीमीडिया के जरिए संदेश दिए जा रहे हैं, जिनमें खासकर आत्मघाती हमलावरों को भी मानवीय रूप में दिखाया जा रहा है. मजीद ब्रिगेड के सदस्यों, जिन्हें अक्सर फिदायीन कहा जाता है, को वैचारिक नारों के बजाय उनकी व्यक्तिगत कहानियों और जीवन परिचय के माध्यम से दिखाया जाता है. दर्शकों के सामने प्रतिभागियों का विविध समूह प्रस्तुत किया जाता है-छात्र, इंजीनियर, महिलाएँ, विवाहित जोड़े और यहाँ तक कि बुजुर्ग लोग भी-जो उग्रवाद की पारंपरिक छवि को चुनौती देता है.

इस तरह उग्रवाद को बाहरी साज़िश नहीं, बल्कि लंबे समय से हो रही परेशानियों और दुख का नतीजा बताया जाता है. इससे संघर्ष का कारण विचारधारा की बजाय लोगों की समस्याएँ दिखती हैं. महिलाओं और परिवारों की भागीदारी से लगता है कि यह संघर्ष अब समाज और घरों तक भी पहुँच गया है.

हिंसा को सही ठहराने की कोशिश  

कई उग्रवादी समूह अपने हमलों के बारे में ज्यादा नहीं बताते, लेकिन बलोच समूह अपने हमलों की वजह समझाते हैं. वे कहते हैं कि उनके निशाने वे लोग या संस्थाएँ हैं जो उनके खिलाफ कार्रवाई में शामिल हैं. इससे वे अपनी हिंसा को सही ठहराने की कोशिश करते हैं. ‘जस्ट वॉर थ्योरी’ के अनुसार, जब किसी कारण से बल प्रयोग को उचित माना जाता है, तो उसे वैध बताया जाता है. इसलिए वे अपने हमलों को बचाव और मजबूरी में उठाया गया कदम बताते हैं. लेकिन ऐसा करने से उन पर नैतिक सवाल भी उठते हैं. फिर भी वे मानते हैं कि संघर्ष को जारी रखने के लिए लोगों का समर्थन जरूरी है.

कहते हैं कि उनके निशाने वे लोग या संस्थाएँ हैं जो उनके खिलाफ कार्रवाई में शामिल हैं. इससे वे अपनी हिंसा को सही ठहराने की कोशिश करते हैं. ‘जस्ट वॉर थ्योरी’ के अनुसार, जब किसी कारण से बल प्रयोग को उचित माना जाता है, तो उसे वैध बताया जाता है.

हाल में BLA नेताओं का खुले तौर पर सामने आना एक नया बदलाव है. इससे वे दिखाना चाहते हैं कि उनका संगठन मजबूत है और संघर्ष जारी है. हमलों के वीडियो भी साझा किए जाते हैं, ताकि लोग देखें कि क्या हुआ और उनकी बात पर विश्वास करें. ये संदेश एक तरफ बलोच लोगों और बाहर रहने वाले समर्थकों के लिए होते हैं, और दूसरी तरफ दुनिया तक अपनी बात पहुँचाने की कोशिश भी करते हैं. सख्त सरकारी नियंत्रण में यह भी एक तरह का विरोध बन जाता है.

सूचना क्षेत्र में ‘क्रेसेंडो प्रभाव’

अगर इन सब चीज़ों-लोगों की कहानियाँ, विदाई संदेश, नेताओं के बयान, हमलों के वीडियो और अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर एक साथ फैलाए गए संदेश-को साथ देखें, तो यह जानकारी के स्तर पर धीरे-धीरे बड़ा असर पैदा करते हैं. हर नई घटना के बाद संदेश और वीडियो फैलाए जाते हैं, जिससे संघर्ष की कहानी बार-बार समझाई जाती है. इससे एक तरफ अपने समर्थकों को जोड़कर रखा जाता है और दूसरी तरफ दुनिया को भी अपनी बात बताने की कोशिश की जाती है.

सूचना युद्ध हिंसा के संदर्भ को समझाने में मदद कर सकता है, लेकिन वह बार-बार होने वाली अंधाधुंध हिंसा के बीच नैतिक वैधता के दावों को लंबे समय तक कायम नहीं रख सकता. जब ऐसे विरोधाभास बढ़ते हैं, तो सहानुभूति रखने वाले दर्शकों के बीच भी कथानक की विश्वसनीयता कमजोर होने लगती है.

पाकिस्तान की प्रतिक्रिया मुख्य रूप से बलोच संघर्ष को बाहरी समर्थन से संचालित आतंकवाद के रूप में पेश करने की रही है. ऐसे लेबल संघर्ष को बाहरी साज़िश बताकर अंदरूनी असंतोष को कमजोर दिखाते हैं और कठोर सैन्य कार्रवाई को सही ठहराते हैं. लेकिन सूचना के स्तर पर यह तरीका कम असरदार हो रहा है, क्योंकि मजबूत सरकारी कहानी न होने से बलोच पक्ष अपनी कहानी फैलाने में सफल हो रहा है.

जोखिम और विरोधाभास

यह रणनीति पूरी तरह सुरक्षित नहीं है. हाल के समय में बलोच उग्रवादियों द्वारा गैर-बलोच नागरिकों पर हमलों और जातीय पहचान के आधार पर निशाना बनाने की घटनाओं ने उस नैतिक ढाँचे पर दबाव डाला है जिसे वे स्थापित करना चाहते हैं. सूचना युद्ध हिंसा के संदर्भ को समझाने में मदद कर सकता है, लेकिन वह बार-बार होने वाली अंधाधुंध हिंसा के बीच नैतिक वैधता के दावों को लंबे समय तक कायम नहीं रख सकता. जब ऐसे विरोधाभास बढ़ते हैं, तो सहानुभूति रखने वाले दर्शकों के बीच भी कथानक की विश्वसनीयता कमजोर होने लगती है.

अंत में यह साफ दिखता है कि बलोच संघर्ष अब सिर्फ ज़मीन या इलाके की लड़ाई नहीं रहा, बल्कि यह बातों, कहानियों और लोगों की सोच को प्रभावित करने की लड़ाई भी बन गया है. जब बातचीत, अंतरराष्ट्रीय मदद या समाधान की उम्मीद कम होती है, तब अपने संघर्ष को रिकॉर्ड करना और दिखाना ही एक तरह की जीत जैसा माना जाने लगता है.

इससे एक बड़ा सबक भी मिलता है कि कई संघर्ष जमीन पर छोटे या सीमित दिख सकते हैं, लेकिन जानकारी और मीडिया की दुनिया में वे काफी सक्रिय रहते हैं. इन बदलावों को समझना जरूरी है, क्योंकि इससे पता चलता है कि ऐसे संघर्ष लंबे समय तक कैसे चलते रहते हैं और समय के साथ अपने तरीके कैसे बदलते रहते हैं.


आशीष उप्रेती भारतीय सेना के एक सेवारत अधिकारी हैं, जिन्हें संचालन, संकट प्रबंधन और रणनीतिक संचार में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव है. 

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Ashish Upreti

Ashish Upreti

Ashish Upreti is a serving Indian Army officer with over 25 years of experience in operations, crisis management and strategic communications. He has represented India ...

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