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Published on Feb 18, 2026 Updated 1 Days ago

मालदीव ने चागोस द्वीपों पर मॉरीशस का अधिकार मानना बंद कर दिया है जिससे भारत की सुरक्षा की स्थिति जटिल हो गई है. जानिए राष्ट्रवादी रुख और सेना को मजबूत करने के कदमों से मालदीव अब किस तरह हिंद महासागर में अधिक सक्रिय भूमिका निभा रहा है.

चागोस विवाद: भारत और मालदीव के लिए नया सिरदर्द

2 फरवरी 2026 को अपने संसदीय संबोधन में मुइज्जू ने घोषणा की कि मालदीव अब मॉरीशस की चागोस द्वीपसमूह पर संप्रभुता को मान्यता नहीं देगा और ओवरलैपिंग समुद्री क्षेत्रों को अपने विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में शामिल करेगा. यह पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम सोलिह की उस नीति से उलट है जिसमें मॉरीशस की संप्रभुता को स्वीकार किया गया था और यह 2023 में International Tribunal for the Law of the Sea (ITLOS) द्वारा किए गए समुद्री सीमा निर्धारण की अनदेखी का संकेत देता है. यह कदम स्थानीय परिषद चुनावों से पहले राष्ट्रवादी राजनीति और बदलते वैश्विक परिदृश्य की प्रतिक्रिया को दर्शाता है, लेकिन यह मालदीव की विदेश नीति और भारत सहित व्यापक क्षेत्र पर इसके प्रभाव को लेकर महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है.

चागोस विवाद: तीन पक्षों के बीच जटिल मामला

चागोस द्वीपसमूह को 1965 में यूनाइटेड किंगडम  ने मॉरीशस से अलग कर दिया था. सामरिक महत्व के कारण यह द्वीपसमूह ब्रिटेन के नियंत्रण में रहा और इसके डिएगो गार्सिया द्वीप को अमेरिका को सैन्य अड्डे के रूप में पट्टे पर दिया गया. हालांकि, इसका विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) इसके उत्तरी पड़ोसी मालदीव के साथ निर्धारित नहीं हुआ था. चागोस पर ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच संप्रभुता के विवादित दावों ने मालदीव की नीति को भी प्रभावित किया. 1992 में मालदीव और ब्रिटेन ने EEZ को समान रूप से विभाजित करने पर बातचीत की, लेकिन समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए. 2009 और 2010 में मॉरीशस और मालदीव दोनों ने संयुक्त राष्ट्र के कॉन्टिनेंटल शेल्फ सीमा आयोग (CLCS) को प्रारंभिक जानकारी सौंपी और 200 नॉटिकल मील EEZ का दावा किया. दोनों देशों ने समुद्री सीमा निर्धारण पर द्विपक्षीय वार्ता भी शुरू की, लेकिन विशेष प्रगति नहीं हुई.

चागोस पर ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच संप्रभुता के विवादित दावों ने मालदीव की नीति को भी प्रभावित किया. 1992 में मालदीव और ब्रिटेन ने EEZ को समान रूप से विभाजित करने पर बातचीत की, लेकिन समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए.

मानचित्र 1: मालदीव और मॉरीशस के बीच समुद्री क्षेत्र के दावों का परस्पर टकराव

The Maldives Chagos Claim Implications For India

Source: International Tribunal for the Law of the Sea (ITLOS)

2017 मेंसंयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय  (ICJ) से चागोस द्वीपों की संप्रभुता पर परामर्शात्मक राय मांगी. दो साल बाद ICJ ने एक गैर-बाध्यकारी राय जारी कर मॉरीशस के पक्ष का समर्थन किया और चागोस पर ब्रिटेन के निरंतर प्रशासन की आलोचना की. इसके बाद UNGA ने चागोस के उपनिवेशवाद-मुक्ति का आह्वान करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया, जिसके पक्ष में 116 देशों ने मतदान किया और छह ने विरोध किया. मालदीव ने इसके खिलाफ मतदान करते हुए कहा कि मामला संबंधित पक्षों के बीच संवाद से सुलझना चाहिए और ICJ ने उसके EEZ संबंधी पूर्व दावों पर विचार नहीं किया.

बाद में मॉरीशस ने ITLOS में समुद्री सीमा निर्धारण का मामला दायर किया. इस बीच अंतरराष्ट्रीय समर्थन बढ़ने पर ब्रिटेन ने चागोस की संप्रभुता पर मॉरीशस से बातचीत शुरू की. कानूनी लड़ाई कमजोर पड़ने और वैश्विक समर्थन के चलते तत्कालीन राष्ट्रपति सोलिह ने चागोस पर मॉरीशस की संप्रभुता को मान्यता दी. 2022 में उन्होंने मॉरीशस के प्रधानमंत्री को औपचारिक पत्र भेजा. इसके बाद ITLOS ने विवादित क्षेत्रों का सीमांकन किया, जिसमें 47,232 वर्ग किमी मालदीव को और 45,331 वर्ग किमी मॉरीशस को मिले.

मालदीव का बदलता रुख

हालांकि मालदीव को EEZ का बड़ा हिस्सा मिला, फिर भी सरकार की आलोचना हुई कि उसने समुद्री क्षेत्र छोड़ दिया. विपक्ष, जो ‘इंडिया आउट’ राष्ट्रवादी अभियान चला रहा था, ने सरकार की आलोचना की और समुद्री क्षेत्र वापस लेने का वादा किया. इसी राष्ट्रवादी लहर पर सवार होकर मुइज्जू 2023 में राष्ट्रपति बने और ITLOS के फैसले को चुनौती देने की बात कही.

UNGA ने चागोस के उपनिवेशवाद-मुक्ति का आह्वान करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया, जिसके पक्ष में 116 देशों ने मतदान किया और छह ने विरोध किया. मालदीव ने इसके खिलाफ मतदान करते हुए कहा कि मामला संबंधित पक्षों के बीच संवाद से सुलझना चाहिए और ICJ ने उसके EEZ संबंधी पूर्व दावों पर विचार नहीं किया.

हालिया संसदीय भाषण में मुइज्जू ने कहा कि उन्होंने सोलिह द्वारा भेजा गया पत्र वापस ले लिया है और देश के अधिकारों की रक्षा के लिए ऐसा करना जरूरी था. उन्होंने EEZ के विस्तार और समुद्री सीमाओं को परिभाषित करने के लिए एक विशेष कार्यालय बनाने की बात कही. साथ ही सोलिह के निर्णय की जांच के लिए आयोग भी बनाया जाएगा. मालदीव राष्ट्रीय रक्षा बल (MNDF) को विवादित क्षेत्रों सहित समुद्री निगरानी का निर्देश दिया गया है और उसने उस क्षेत्र में विशेष अभियान चलाकर अवैध मछली पकड़ने वाले दो जहाजों को रोका. यद्यपि यह माना जाता रहा है कि चागोस और मालदीव के बीच सांस्कृतिक व ऐतिहासिक निकटता है, लेकिन पहले किसी मालदीवी सरकार ने इस द्वीपसमूह पर संप्रभुता का दावा नहीं किया था.

मुइज्जू ने अब संप्रभुता का दावा कर विवाद को समुद्री सीमा से आगे बढ़ा दिया है. यह तब हो रहा है जब ब्रिटेन और मॉरीशस चागोस के हस्तांतरण को अंतिम रूप देने की दिशा में बढ़ रहे हैं, जिसके तहत ब्रिटेन 99 वर्षों तक डिएगो गार्सिया पर अमेरिकी सैन्य अड्डा बनाए रखेगा और मॉरीशस को प्रतिवर्ष लगभग 138 मिलियन डॉलर देगा. मालदीव ने इस हस्तांतरण पर आपत्ति जताई है और ब्रिटेन से कहा है कि उसका दावा अधिक मजबूत है. मुइज्जू ने यह भी आश्वासन दिया कि यदि मालदीव को संप्रभुता मिलती है तो अमेरिकी सैन्य अड्डा चलता रहेगा.

यह घटनाक्रम अप्रैल 2026 के स्थानीय परिषद चुनावों से पहले आया है, जिन्हें सरकार की लोकप्रियता की मध्यावधि परीक्षा माना जाता है. हाल के महीनों में सरकार ने रूढ़िवादी वर्ग को साधने के लिए कई कदम उठाए हैं-महिला कर्मचारियों और छात्राओं की वर्दी में बदलाव, गेस्टहाउस द्वीपों पर पर्यटकों के लिए नए प्रतिबंध, और मादक पदार्थ तस्करी पर मृत्युदंड की शुरुआत. चागोस मुद्दा मुइज्जू को राष्ट्रवादी नेता के रूप में प्रस्तुत करने का नया अवसर देता है.

वैश्विक घटनाक्रम भी इस रुख को प्रभावित करते दिखते हैं. विश्व व्यवस्था में बदलाव, ट्रंप का प्रशांत पर जोर, ग्रीनलैंड खरीद प्रस्ताव, बहुपक्षीय संस्थाओं की अनदेखी और चागोस पर यूके-मॉरीशस वार्ता की आलोचना-इन सबने मुइज्जू को अंतरराष्ट्रीय मानकों से ऊपर राष्ट्रीय हित रखने के लिए प्रेरित किया होगा.

विदेश नीति और क्षेत्रीय सुरक्षा पर प्रभाव

यह प्रकरण मुइज्जू प्रशासन की एक स्थायी कमजोरी दिखाता है-विदेश नीति पर घरेलू राजनीति को प्राथमिकता देना. इस दावे को अब तक अंतरराष्ट्रीय समर्थन नहीं मिला. ट्रंप ने कहा कि डिएगो गार्सिया को ‘फर्जी दावों” से कमजोर नहीं होने दिया जाएगा. ब्रिटेन ने भी कहा कि संप्रभुता का प्रश्न केवल ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच है. मुइज्जू द्वारा अमेरिकी अड्डा चलाने की पेशकश से चीन भी चकित हो सकता है.

भारत की लाल रेखाओं को लेकर भी चिंता है. भारत दक्षिण एशिया में किसी भी विदेशी सैन्य अड्डे का विरोध करता रहा है. हालांकि मॉरीशस के तहत डिएगो गार्सिया में अमेरिकी उपस्थिति को वह स्वीकार करता है और चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने में उसे उपयोगी मानता है, लेकिन मालदीव की जमीन से विदेशी अड्डा चलने की संभावना उसकी सामरिक सोच पर गंभीर असर डालेगी. यह भी प्रश्न उठता है कि जो नेता पहले लगभग 80 निहत्थे भारतीय कर्मियों की उपस्थिति का विरोध करता था, वह अब अमेरिकी अड्डे को क्यों स्वीकार कर रहा है.

अल्पकालिक रूप से यह रुख राष्ट्रवादी समर्थन और चुनावी फायदा दिला सकता है, लेकिन इसके दूरगामी प्रभाव पूरे हिंद महासागर क्षेत्र की स्थिरता पर पड़ सकते हैं. यह कदम एक साथ भारत और चीन-दोनों को चौंकाने वाला है, पर विशेष रूप से भारत में मालदीव सरकार की विश्वसनीयता और नीति निरंतरता पर प्रश्न खड़े करता है.

1965 में स्वतंत्रता के बाद से मालदीव ने अपनी सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए मुख्यतः कूटनीति और संतुलित विदेश नीति पर भरोसा किया. लेकिन राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू के दौर में यह रुख बदलता दिखाई दे रहा है. सरकार अब रक्षा आधुनिकीकरण पर अधिक जोर दे रही है और विशेष रूप से तुर्किये से बढ़ती रक्षा खरीद ने उसकी सामरिक क्षमता और आत्मविश्वास दोनों को बढ़ाया है. उन्नत सैन्य उपकरण, समुद्री निगरानी और सुरक्षा सहयोग के कारण मालदीव क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों में अधिक सक्रिय भूमिका निभाना चाहता है. वहीं चागोस द्वीपसमूह के निकट भौगोलिक स्थिति और सैन्य सुदृढ़ीकरण का मेल पड़ोसी देशों में संदेह, प्रतिस्पर्धा और संभावित तनाव को भी बढ़ा सकता है.

यह स्थिति भारत को भी कठिन संतुलन की स्थिति में रखती है. दशकों से भारत मॉरीशस के उपनिवेशवाद-मुक्ति प्रयासों का समर्थक रहा है और संप्रभुता हस्तांतरण समझौते का स्वागत करता है. चागोस का नियंत्रण मिलने के बाद मॉरीशस को दूरस्थ जलक्षेत्र की सुरक्षा के लिए भारत से सहयोग चाहिए होगा. मॉरीशस ने भारत से वहां जहाज भेजकर ध्वज फहराने का अनुरोध भी किया है. भारत–मॉरीशस संबंध मजबूत होंगे, पर उसे दोनों द्वीपीय पड़ोसियों के साथ संतुलन रखना होगा. मालदीव की किसी भी दुस्साहसी कार्रवाई से भारत की ‘नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ की भूमिका जटिल हो सकती है और बाहरी शक्तियों के लिए जगह बन सकती है.

चागोस मुद्दे पर मालदीव का हालिया नीति परिवर्तन राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़्ज़ू की विदेश नीति की एक प्रमुख कमजोरी को फिर उजागर करता है-घरेलू राजनीतिक लाभ के लिए जोखिमपूर्ण और जल्दबाज़ी वाले रणनीतिक कदम उठाना. अल्पकालिक रूप से यह रुख राष्ट्रवादी समर्थन और चुनावी फायदा दिला सकता है, लेकिन इसके दूरगामी प्रभाव पूरे हिंद महासागर क्षेत्र की स्थिरता पर पड़ सकते हैं. यह कदम एक साथ भारत और चीन-दोनों को चौंकाने वाला है, पर विशेष रूप से भारत में मालदीव सरकार की विश्वसनीयता और नीति निरंतरता पर प्रश्न खड़े करता है.

साथ ही, रक्षा आधुनिकीकरण की तेज़ रफ्तार और तुर्किये के साथ बढ़ते सैन्य संबंधों को अब मॉरीशस और भारत अधिक सतर्क दृष्टि से देखेंगे. चागोस द्वीपसमूह पहले से ही एक संवेदनशील सामरिक क्षेत्र रहा है. ऐसे में आक्रामक दावों और सैन्य क्षमताओं के विस्तार का संयोजन अविश्वास बढ़ा सकता है और क्षेत्र को और अधिक सैन्यीकृत करने का जोखिम पैदा करता है, जिससे क्षेत्रीय संतुलन और सहयोग दोनों प्रभावित हो सकते हैं.


आदित्य गौडारा शिवमूर्ति ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रेटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में एसोसिएट फेलो हैं.

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