Author : Soumya Bhowmick

Expert Speak Raisina Debates
Published on Apr 04, 2026 Updated 2 Days ago

जिस तरह दुनिया में युद्ध और तनाव का माहौल बढ़ रहा है, वैसे-वैसे देशों का सैन्य खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है. पढ़िए किस तरह इसका सीधा असर विकास कार्यों पर पड़ रहा है और 2030 एजेंडा के सतत विकास लक्ष्यों की प्रगति धीमी होती दिख रही है. 

2.7 ट्रिलियन डॉलर का सैन्य खर्च: पीछे छूट रहा विकास?

2015 में, संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों ने सतत विकास के लिए 2030 एजेंडा को अपनाया. ये दुनियाभर के लोगों और धरती पर शांति और समृद्धि को बढ़ावा देने के लिए तैयार की गई एक महत्वाकांक्षी योजना है. इसके मूल में 17 सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) हैं जो आर्थिक विकास, सामाजिक समावेश और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाते हैं. इन लक्ष्यों के ज़रिए गरीबी उन्मूलन, असमानताओं को कम करने और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक सार्वभौमिक अपील की गई है. संयुक्त राष्ट्र ने इन परस्पर जुड़े लक्ष्यों की दिशा में प्रगति को तेज़ करने के लिए 2020 के दशक को "कार्रवाई का दशक" घोषित किया था, लेकिन ऐसा लगता है कि कार्रवाई के दशक के नारे को वैश्विक समुदाय ने अल ही अर्थ में ले लिया है. अब जलवायु शिखर सम्मेलनों में बातचीत के बदले सक्रिय युद्धक्षेत्रों में जंग लड़ी जा रही है. गरीबी उन्मूलन के बदले हथियारों की खरीद को प्राथमिकता दी जा रही है. 

हालांकि, ये विडंबना काफ़ी हैरान करने वाली है. इसका संदेश स्पष्ट है कि, दुनिया अब पीछे की ओर लौट रही है. 2030 एजेंडा बहुपक्षीय सहयोग, स्थिर व्यापार नेटवर्क और पूर्वानुमानित वित्तपोषण पर बहुत ज़्यादा निर्भर करता है. हाल की भू-राजनीतिक अस्थिरता ने इन तीनों ही कारकों को बाधित कर दिया है, जिससे दुनिया का ध्यान मानव विकास से हटकर तात्कालिक सैन्य सुरक्षा पर केंद्रित हो गया है. जब किसी देश के बुनियादी अस्तित्व के लिए पैसे  की भारी कमी होती है, तो वैश्विक पूंजी को संघर्ष की दिशा में मोड़ दिया जाता है. इस बात को मापे जाने की गारंटी होती है, जिससे एसडीजी 1 (गरीबी उन्मूलन), एसडीजी 4 (गुणवत्तापूर्ण शिक्षा) और एसडीजी 13 (जलवायु कार्रवाई) जैसे मूलभूत लक्ष्य एक खंडित विश्व व्यवस्था के अंतिम शिकार बन जाते हैं.

इन लक्ष्यों के ज़रिए गरीबी उन्मूलन, असमानताओं को कम करने और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक सार्वभौमिक अपील की गई है. संयुक्त राष्ट्र ने इन परस्पर जुड़े लक्ष्यों की दिशा में प्रगति को तेज़ करने के लिए 2020 के दशक को "कार्रवाई का दशक" घोषित किया था, लेकिन ऐसा लगता है कि कार्रवाई के दशक के नारे को वैश्विक समुदाय ने अल ही अर्थ में ले लिया है.

युद्ध की ओर झुकती वैश्विक अर्थव्यवस्था

जिस पूंजी का इस्तेमाल सामाजिक विकास की योजनाओं पर किया था, उसका एक बड़ा हिस्सा रक्षा क्षेत्र की तरफ उपयोग किया किया जा रहा है. सामूहिक विकास पर ज़ोर देने की बजाए क्षेत्रीय और वैचारिक विवादों को प्राथमिकता दी जा रही है. इससे राष्ट्र की पूंजी स्वास्थ्य सेवा और बुनियादी ढांचे से से हटकर रक्षा ज़रूरतों की ओर जा रही है. वैश्विक सैन्य खर्च 2.7 ट्रिलियन डॉलर से ज़्यादा हो गया है, जो शीत युद्ध के ख़ात्मे के बाद से सबसे तीव्र वृद्धि है. ये सैन्यीकरण ग्लोबल साउथ के देशों के लिए बहुत ज़्यादा विनाशकारी साबित हो रहा है. जैसे-जैसे पूंजी युद्ध में लगाई जा रही है, वैसे-वैसे विकासशील देशों को 2024 तक सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के वित्तपोषण में लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर के सालाना अंतर का सामना करना पड़ रहा है.

चित्र 1: विकासशील देशों में एसडीजी के वित्तपोषण में सालाना अंतर (अरब डॉलर में)

The Irony Of Action How Global Volatility Is Regressing The 2030 Agenda

Source: Matzner and Steininger 2024

रूस-यूक्रेन युद्ध इस वित्तीय विस्थापन के पैमाने को दर्शाता है, जहां एक यूरोपीय देश में बारूदी सुरंगों को हटाने, आवासों के पुनर्निर्माण और बिजली ग्रिडों को बहाल करने के लिए बहुत अधिक धन की ज़रूरत पड़ रही है. इसके लिए आवश्यक पूंजी कई विकासशील देशों के वार्षिक सकल घरेलू उत्पाद से ज़्यादा है. ये सच है कि वर्तमान में कई बड़े सैन्य संघर्ष वैश्विक व्यवस्था को खंडित कर रहे हैं. इनमें से हर जंग स्थानीय स्तर पर तबाही मचा रही है, और इससे सीमाओं के पार भी आर्थिक अस्थिरता फैल रही है.

तालिका 1: बड़े वैश्विक संघर्ष और सतत विकास पर उनका प्रभाव

संघर्ष, क्षेत्र और समयसीमा

प्राथमिक कारक और वृद्धि

मानवीय और आर्थिक प्रभाव

एसडीजी को प्रत्यक्ष नुकसान

डीआरसी / एम23 विद्रोह (मध्य अफ्रीका, 2021 से संघर्ष)

 

संसाधनों की प्रतिस्पर्धा और स्थानीय शासन संबंधी चुनौतियों पर केंद्रित जटिल आंतरिक और क्षेत्रीय गतिशीलता.

 

लाखों लोग आंतरिक रूप से विस्थापित हुए. वैश्विक हरित ऊर्जा परिवर्तन के लिए  बहुत ज़रूरी महत्वपूर्ण खनिज आपूर्ति श्रृंखलाओं (जैसे कोबाल्ट और तांबा) में व्यवस्थित व्यवधान उत्पन्न हुआ.

 

एसडीजी 13 (जलवायु कार्रवाई), एसडीजी 16 (शांति और संस्थाएं)

 

म्यांमार गृहयुद्ध (दक्षिणपूर्व एशिया, 2021 से)

 

आंतरिक राजनीतिक परिवर्तनों के कारण व्यापक घरेलू अशांति और लंबे समय तक चलने वाला सशस्त्र संघर्ष हुआ.

 

भीषण आर्थिक मंदी; सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा प्रणालियों का पूरी तरह ध्वस्त होना; बड़े पैमाने पर सीमा पार विस्थापन से पड़ोसी अर्थव्यवस्थाओं में अस्थिरता आना.

 

एसडीजी 3 (अच्छा स्वास्थ्य), एसडीजी 4 (गुणवत्तापूर्ण शिक्षा), एसडीजी 8 (आर्थिक विकास)

 

रूस-यूक्रेन युद्ध (पूर्वी यूरोप, 2022 से शुरू)

 

बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और क्षेत्रीय विवादों के कारण एक बड़े क्षेत्रीय संघर्ष में तब्दील हुआ. इससे यूरोपीय सुरक्षा परिदृश्यों में बदलाव आ रहा है

अंतर्राष्ट्रीय सहायता तेज़ी से सक्रिय सतत विकास के बजाय आवासीय, औद्योगिक और ऊर्जा योजनाओं की बहाली के लिए प्रतिबद्ध होती जा रही है; उदाहरण के लिए, यूक्रेन के पुनर्निर्माण के लिए अनुमानित 486 अरब डॉलर की आवश्यकता है.

 

एसडीजी 2 (भुखमरी समाप्त करना), एसडीजी 7 (स्वच्छ ऊर्जा), एसडीजी 9 (बुनियादी ढांचा)

 

इज़राइल-ग़ाज़ा संघर्ष (मध्य पूर्व, 2023 से तेज़ हुआ)

 

लंबे समय से चले आ रहे ऐतिहासिक तनावों का चरम बिंदु तीव्र संघर्ष में बदल गया है. इसकी वजह से बुनियादी ढांचे और मानवीय पहलू की गंभीर चुनौतियां उत्पन्न हो गई हैं.

 

ग़ाज़ा के भौतिक और सामाजिक बुनियादी ढांचे का लगभग पूर्ण विनाश, दशकों के मानवीय विकास का मिट जाना और क्षेत्रीय पूंजी को सक्रिय सैन्य लामबंदी में खींच लेना.

 

एसडीजी 8 (आर्थिक विकास), एसडीजी 10 (असमानताओं में कमी), एसडीजी 16 (शांति और संस्थाएं)

 

सूडान गृहयुद्ध (उत्तरी अफ्रीका, 2023 से)

 

एक संक्रमणकालीन राजनीतिक काल के दौरान शासन की संरचनाओं और संसाधन आवंटन को लेकर गुटों के बीच आंतरिक संघर्ष.

 

सक्रिय संघर्ष विनाशकारी घरेलू नुकसान को जन्म देते हैं. गृहयुद्ध के कारण जीडीपी में अनुमानित 42% की गिरावट और औद्योगिक क्षेत्र में अरबों डॉलर का नुकसान हुआ. इससे सीधे तौर पर संस्थागत विफलता, व्यापक भुखमरी और गहरी क्षेत्रीय गरीबी उत्पन्न हुई.

 

एसडीजी 1 (गरीबी उन्मूलन), एसडीजी 2 (भूखमरी उन्मूलन), एसडीजी 3 (बेहतर स्वास्थ्य)

 

ईरान संकट और खाड़ी क्षेत्र में तनाव में वृद्धि (मध्य पूर्व में 2026 से तनाव में वृद्धि)

 

मध्य पूर्व में कई राज्य और नॉन-स्टेट एक्टर्स से जुड़े क्षेत्रीय तनाव और समुद्री सुरक्षा संबंधी चुनौतियां बढ़ गई हैं.

 

लाल सागर और होर्मुज स्ट्रैट में समुद्री जहाजों के यातायात में भारी व्यवधान पैदा होने से वैश्विक तेल/एलएनजी के 20% हिस्से पर ख़तरा मंडरा रहा है. इससे वैश्विक माल ढुलाई लागत और मुद्रास्फीति बढ़ रही है, जिसका विकासशील देशों की क्रय शक्ति पर असमान रूप से प्रभाव पड़ रहा है.

 

एसडीजी 7 (स्वच्छ ऊर्जा), एसडीजी 8 (आर्थिक विकास), एसडीजी 12 (जिम्मेदार उपभोग)

 

 स्रोत: कई स्रोतों से लेखक द्वारा खुद जुटाई गई जानकारी

डिस्क्लेमर: इस लेख में प्रस्तुत जानकारी और डेटा कई स्रोतों से संकलित किए गए हैं और लेखक द्वारा स्वतंत्र रूप से तथ्यों की जांच की गई है, साथ ही जेमिनी 3 एआई का उपयोग इस शोध को अंतिम तालिका प्रारूप में व्यवस्थित और संरचित करने के लिए किया गया है.

युद्धों से हिलती वैश्विक सप्लाई चेन  

आधुनिक युद्ध भौगोलिक सीमाओं तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि भुखमरी की समाप्ति (एसडीजी 2) और आर्थिक विकास (एसडीजी 8) के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए आवश्यक वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को भी बाधित करता है. वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य ने व्यापार मार्गों, ऊर्जा निर्यात और कृषि उत्पादों को दबाव बनाने के साधन के रूप में तेज़ी से विकसित किया है. इस समस्या का एक स्पष्ट उदाहरण अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच चल रहा 2026 का संघर्ष है, जिसने होर्मुज स्ट्रैट में समुद्री यातायात को बुरी तरह प्रभावित किया है. वैश्विक तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) आपूर्ति के लगभग 20 प्रतिशत हिस्से पर ख़तरा मंडरा रहा है, जिसके चलते ब्रेंट क्रूड की कीमतें तुरंत 80 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गईं. ईरान युद्ध से उत्पन्न ऊर्जा संकट वैश्विक मुद्रास्फीति को बढ़ाकर, उभरती अर्थव्यवस्थाओं के चालू खाता संतुलन पर ज़बरदस्त दबाव डालेगा. जीवाश्म ईंधन यानी कच्चे तेल की सुरक्षा के लिए विभिन्न देशों की होड़ के बीच हरित ऊर्जा परिवर्तन की गति को धीमा करके विकासात्मक उद्देश्यों के पटरी से उतरने की आशंका पैदा हो गई है. यूक्रेन में युद्ध के कारण वैश्विक अनाज और उर्वरक बाज़ार में व्यवधान पैदा हुआ. इसने ये दिखाया कि कैसे एक क्षेत्रीय संघर्ष ग्लोबल साउथ के देशों में खाद्य सुरक्षा को तुरंत ख़तरे में डाल सकता है.

सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए वैश्विक प्राथमिकताओं में एक मौलिक बदलाव की आवश्यकता है. हालांकि, ये भी सच है कि दीर्घकालिक अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा को सतत आर्थिक और मानवीय विकास से अलग नहीं किया जा सकता है.

एसडीजी 16 (शांति, न्याय और सशक्त संस्थाएं) 2030 एजेंडा के बाकी हिस्से के लिए एक ज़रूरी शर्त है. जब देशों की संस्थाएं नाकाम हो जाती हैं, तो उससे पैदा होने वाली अस्थिरता बड़े पैमाने पर पलायन, आर्थिक मंदी और मानव पूंजी के भारी नुकसान का कारण बनती है. इससे पैदा होने वाला विस्थापन एक वैश्विक शरणार्थी संकट को जन्म देता है, जो मेजबान देशों के संसाधनों, शिक्षा प्रणालियों और स्वास्थ्य सेवा के ढांचे पर दबाव डालता है. कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि "कार्रवाई का दशक" तो आगे बढ़ रहा है, लेकिन इसके लक्ष्यों को वर्तमान में विकास योजनाओं की बजाय बाधित आपूर्ति श्रृंखलाओं और बढ़ते सैन्य बजट के संदर्भ में मापा जा रहा है. सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए वैश्विक प्राथमिकताओं में एक मौलिक बदलाव की आवश्यकता है. हालांकि, ये भी सच है कि दीर्घकालिक अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा को सतत आर्थिक और मानवीय विकास से अलग नहीं किया जा सकता है. जब तक वैश्विक पूंजी और राजनीतिक ध्यान युद्ध के मैदान से हटाकर विकास की ओर नहीं मोड़ा जाता, तब तक सतत विकास के लक्ष्य व्यवस्थित रूप से हमारी पहुंच से बाहर रहेंगे.


सौम्य भौमिक ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में सेंटर ऑफ न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी के वर्ल्ड इकोनॉमीज और सस्टेनेबिलिटी में फेलो और लीड हैं.

The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.