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Published on Mar 30, 2026 Updated 1 Days ago

ईरान-इज़राइल संघर्ष और होर्मुज़ की रुकावट ने दुनिया की तेल-गैस सप्लाई को हिला दिया जिससे कीमतें तेजी से बढ़ गईं. जानें किस तरह इस हलचल के बीच रूस फिर से ऊर्जा बाजार में मजबूत खिलाड़ी बनकर उभरा और उसकी कमाई बढ़ने लगी.

पढ़ें, तेल की जंग में रूस की वापसी की कहानी

ईरान पर अमेरिका-इज़राइल के युद्ध के कारण वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में भारी व्यवधान उत्पन्न हुआ है. ऊर्जा अवसंरचना पर हमलों और ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ को प्रभावी रूप से बंद किए जाने से कमोडिटी की कीमतों में तेज़ उछाल आया है. मॉस्को के लिए-जो दुनिया के तीन सबसे बड़े हाइड्रोकार्बन निर्यातकों में से एक है-यह संकट बढ़ती ऊर्जा कीमतों का लाभ उठाने और अपनी धीमी पड़ती अर्थव्यवस्था को फिर से गति देने का अवसर प्रस्तुत करता है. चूँकि लगभग 20 प्रतिशत तेल और 20 प्रतिशत एलएनजी का प्रवाह इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, जलडमरूमध्य बंद होने से रूसी तेल-गैस की मांग बढ़ी है और हालात ऐसे ही रहे तो एलएनजी की कमी के साथ रूस की ऊर्जा परियोजनाओं व नए मार्गों का महत्व भी बढ़ सकता है.

28 फ़रवरी के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार

संकट शुरू होने से पहले रूस का ऊर्जा क्षेत्र तीन बड़ी चिंताओं का सामना कर रहा था. पहली, फरवरी में रूसी यूराल्स कच्चे तेल का निर्यात मूल्य औसतन 56.2 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल था, जो वैश्विक मांग में कमजोरी को दर्शाता है. दूसरी, रूस की गैस मूल्य शृंखलाओं का बड़ा हिस्सा ऐतिहासिक रूप से यूरोप से जुड़ा रहा है, और यूरोपीय संघ द्वारा 2027 तक रूसी गैस आयात को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के निर्णय ने घरेलू स्तर पर काफी अनिश्चितता पैदा कर दी. तीसरी, साइबेरिया और सुदूर पूर्व के कोयला उत्पादक क्षेत्रों में वैश्विक स्तर पर कोयले की घटती मांग के कारण आर्थिक मंदी के संकेत मिलने लगे. कीमतों में गिरावट का कारण पश्चिमी प्रतिबंधों से उत्पन्न मांग में कमी को माना गया. इसके अलावा, द्वितीयक प्रतिबंधों के कड़े होने से भारतीय रिफाइनरों ने संभावित दंड के डर से रूसी तेल का आयात कम कर दिया था.

मॉस्को के लिए-जो दुनिया के तीन सबसे बड़े हाइड्रोकार्बन निर्यातकों में से एक है-यह संकट बढ़ती ऊर्जा कीमतों का लाभ उठाने और अपनी धीमी पड़ती अर्थव्यवस्था को फिर से गति देने का अवसर प्रस्तुत करता है.

मार्च से वैश्विक ऊर्जा बाजार पर इसके प्रभाव काफी गंभीर रहे हैं. ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में रिफाइनरियों और गैस क्षेत्रों को निशाना बनाया, जबकि इज़राइल और अमेरिका के संयुक्त हमलों ने ईरान की ऊर्जा अवसंरचना को प्रभावित किया. बताया जाता है कि इस संघर्ष के कारण दुनिया की लगभग 20–25 प्रतिशत एलएनजी क्षमता प्रभावित हुई है, जिसके चलते अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने चेतावनी दी है कि यह संकट 1970 के दशक के तेल झटकों से भी अधिक गंभीर प्रभाव डाल सकता है.

वैश्विक ऊर्जा रुझान

अतिरिक्त झटकों की आशंका के कारण ऊर्जा प्रतिबंधों के लागू होने में स्पष्ट रूप से ढील दिखाई दे रही है. अमेरिकी ट्रेजरी ने भारत को रूसी तेल खरीदने की अनुमति देते हुए 30 दिनों की प्रतिबंध छूट की घोषणा की (हालाँकि भारतीय नेतृत्व का कहना है कि इस छूट का उसके तेल खरीद निर्णय पर कोई प्रभाव नहीं है). इसके अतिरिक्त, समुद्र में स्पॉट खरीद के लिए भी छूट दी गई. बढ़ते ऊर्जा झटकों के कारण एशियाई देश रूसी ऊर्जा आपूर्ति हासिल करने के लिए तेज़ी से प्रयास कर रहे हैं. मध्य-पूर्व के कच्चे तेल की तरह, यूराल्स भी एक मीडियम-सौर ग्रेड है, जिससे इसकी मांग अधिक है. भारत और चीन ने अपनी खरीद बढ़ा दी है, जबकि दक्षिण-पूर्व और पूर्वी एशिया के देश भी रूसी तेल का आयात करने लगे हैं.

फरवरी में रूसी यूराल्स कच्चे तेल का निर्यात मूल्य औसतन 56.2 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल था, जो वैश्विक मांग में कमजोरी को दर्शाता है. दूसरी, रूस की गैस मूल्य शृंखलाओं का बड़ा हिस्सा ऐतिहासिक रूप से यूरोप से जुड़ा रहा है, और यूरोपीय संघ द्वारा 2027 तक रूसी गैस आयात को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के निर्णय ने घरेलू स्तर पर काफी अनिश्चितता पैदा कर दी.

मांग में इस बढ़ोतरी से मॉस्को को बड़ा आर्थिक लाभ हुआ है. 20 मार्च को रूसी कच्चे तेल की कीमत 80 प्रतिशत बढ़कर 104 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई. रूस के लिए इससे मिलने वाली अतिरिक्त आय का अर्थ है ऊर्जा किराये (एनर्जी रेंट) की अधिक वसूली और उसके नेशनल वेल्थ फंड का और मजबूत होना. विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि तेल की औसत कीमत 80 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल रहती है, तो रूस को प्रतिदिन 150 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक अतिरिक्त राजस्व मिल सकता है. मार्च के अंत तक रूस को 4 से 5 अरब अमेरिकी डॉलर की अतिरिक्त आय होने का अनुमान है.

रूसी एलएनजी क्षेत्र का हाल  

इसी तरह रूसी एलएनजी की मांग भी बढ़ी है, और यूरोप में प्राकृतिक गैस की कीमतें प्रति हजार घन मीटर 850 अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गई हैं. हालांकि कच्चे तेल के विपरीत, देशों के पास गैस को कुछ महीनों से अधिक समय तक भंडारित करने की क्षमता नहीं होती. आमतौर पर एलएनजी लंबे समय के अनुबंधों के तहत बेची जाती है, जिसका अर्थ है कि पहले से मौजूद समझौतों के कारण मॉस्को एशियाई देशों की बढ़ती गैस मांग को पूरी तरह पूरा नहीं कर पाएगा, क्योंकि वे अपनी लगभग 90 प्रतिशत एलएनजी आपूर्ति के लिए मध्य-पूर्व पर निर्भर रहते हैं.

रूसी एलएनजी परियोजनाओं की डिज़ाइन क्षमता प्रति वर्ष लगभग 42 मिलियन टन तक है, जो क़तर और संयुक्त अरब अमीरात के संयुक्त एलएनजी निर्यात का लगभग आधा है. इन परिस्थितियों को देखते हुए विशेषज्ञों का अनुमान है कि दक्षिण-पूर्व एशिया के देश रूसी कोयले की खरीद बढ़ा सकते हैं.

ईरान के साउथ पार्स गैस क्षेत्र पर इज़राइली हमलों और क़तर के रस लफ़ान एलएनजी संयंत्र पर ईरान के हमलों ने ऊर्जा बाजारों को और अस्थिर कर दिया है. विशेषज्ञों का अनुमान है कि इन सुविधाओं को बहाल करने में तीन से पाँच साल तक का समय लग सकता है. इसके परिणामस्वरूप देश अपनी एलएनजी आयात आवश्यकताओं को अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और रूस जैसे आपूर्तिकर्ताओं की ओर मोड़ सकते हैं.

आमतौर पर एलएनजी लंबे समय के अनुबंधों के तहत बेची जाती है, जिसका अर्थ है कि पहले से मौजूद समझौतों के कारण मॉस्को एशियाई देशों की बढ़ती गैस मांग को पूरी तरह पूरा नहीं कर पाएगा, क्योंकि वे अपनी लगभग 90 प्रतिशत एलएनजी आपूर्ति के लिए मध्य-पूर्व पर निर्भर रहते हैं.

यह मौजूदा संकट यूरोपीय संघ को एक रणनीतिक दुविधा में डाल रहा है. जनवरी 2027 तक रूसी एलएनजी से दूरी बनाने का संकल्प लेने के बावजूद, क़तर से उसकी कुल एलएनजी आपूर्ति में अचानक 15 प्रतिशत की कमी निकट भविष्य में बड़ी बाधाएँ पैदा कर सकती है. इससे सदस्य देश यूरोपीय संघ पर फिर से रूसी एलएनजी खरीदने का दबाव डाल सकते हैं.

मॉस्को के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ  

यूक्रेन से ध्यान हटकर खाड़ी क्षेत्र की ओर जाने के कारण यह संकट मॉस्को को एक रणनीतिक राहत देता है. ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता के चलते प्रतिबंधों में अस्थायी ढील के संकेत दिखाई दिए हैं, जिससे रूसी तेल के स्पॉट व्यापार में वृद्धि होने की संभावना है. प्रतिबंधों की प्रभावशीलता कम होने से मध्यम और दीर्घकाल में रिफाइनर प्रतिबंधों से बचने के लिए अधिक इच्छुक हो सकते हैं. अगर आगे चलकर प्रतिबंध और कड़े होते हैं, तो रूस सस्ता तेल देकर खरीददारों को आकर्षित कर सकता है. इस संकट से कुछ नए समुद्री रास्तों का महत्व बढ़ा है, लेकिन उनका इस्तेमाल मौसम और खर्च पर निर्भर करेगा.

उदाहरण के लिए, संकट से उत्पन्न महंगाई के दबाव के कारण बल्क कैरियर और तेल टैंकरों के मालभाड़े की दरों में वृद्धि हुई है, जबकि इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर के माध्यम से होने वाला परिवहन भी प्रभावित हुआ है. इसके अतिरिक्त, यूक्रेन द्वारा रूसी रिफाइनरियों पर ड्रोन हमले घरेलू ऊर्जा आपूर्ति शृंखलाओं के लिए खतरा बने हुए हैं.

भारत पर प्रभाव  

नई दिल्ली, जिसने पिछले वर्ष नवंबर से अपनी ऊर्जा आपूर्ति रणनीति में बदलाव किया था-जब अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद रिफाइनर फिर से मध्य-पूर्व के कच्चे तेल की ओर लौट गए थे-अब एक बार फिर रूसी तेल की ओर बढ़ रही है. मार्च में आयात बढ़कर लगभग 1.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुँच गया, और रिफाइनरों ने रूस के साथ नई आपूर्ति समझौतों को अंतिम रूप दिया.

इसके अलावा, घरेलू गैस की कमी के कारण नई दिल्ली ने रूस से तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) लेने में रुचि दिखाई है. तीसरे देशों से तेल आयात में विविधता लाने के प्रयासों के बावजूद, मौजूदा संकट ने ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की आवश्यकता को और स्पष्ट कर दिया है, जिसमें रूस की महत्वपूर्ण भूमिका बनी रहेगी. प्रतिबंधों के बावजूद भारत के लिए ऊर्जा आपूर्ति में रूस की अहम भूमिका बनी हुई है.


राजोली सिद्धार्थ जयप्रकाश ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में जूनियर फेलो हैं.

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