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Published on Mar 26, 2026 Updated 1 Days ago

अमेरिका–ईरान  युद्ध ने दिखाया कि अमेरिका हर मोर्चे पर एक साथ कितना टिक सकता है, ताकत के बावजूद सीमाएँ साफ हो रही हैं. लेख के जरिए समझें कि कैसे यह संघर्ष अमेरिकी विदेश नीति की प्राथमिकताओं, गठबंधनों और वैश्विक भूमिका को बदल रहा है.

ईरान युद्ध: अमेरिका की रणनीतिक भूल?

ईरान के साथ युद्ध ने पहले से अस्थिर पश्चिम एशिया में केवल नया मोर्चा नहीं खोला बल्कि अमेरिकी विदेश नीति की सीमाएं भी उजागर कर दी हैं. अमेरिका अब भी सैन्य शक्ति, औद्योगिक क्षमता और मजबूत गठबंधनों वाला महाशक्ति देश है लेकिन इस संघर्ष ने दिखाया कि हर क्षेत्र में एक साथ सक्रिय रहना आसान नहीं रहा. वॉशिंगटन को अब अपने रणनीतिक मोर्चों, प्राथमिकताओं और वादों के बीच अधिक सावधानी से संतुलन बनाना पड़ रहा है. इससे स्पष्ट हुआ है कि शक्ति होना और हर जगह स्वतंत्र कार्रवाई कर पाना अलग बातें हैं.

इस संकट की जड़ें लंबी और कड़वी रही हैं. 1953 में अमेरिका ने शाह की सत्ता की बहाली में मदद की, राजशाही के दौर में ईरान का समर्थन किया, और फिर 1979 की क्रांति और बंधक संकट के बाद संबंधों को टूटते हुए देखा. वॉशिंगटन ने कभी दबाव, कभी प्रतिरोध (डिटरेंस) और कभी बातचीत के बीच रास्ता बदला, लेकिन तेहरान के साथ स्थायी समझ बनाने में वह कभी सफल नहीं हो पाया.

2026 की शुरुआत तक अमेरिका और इज़राइल ने ईरान के खिलाफ बड़े पैमाने पर अभियान शुरू कर दिया था, जिसके जवाब में खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी ठिकानों पर हमले हुए और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में व्यवधान पैदा हुआ. यही बदलाव असली कहानी है. युद्ध केवल शक्ति की परीक्षा नहीं लेते; वे उसकी सीमाओं को भी उजागर कर देते हैं.

इसका अधिक तात्कालिक मोड़ पहले के परमाणु ढांचे के टूटने से आया. 2015 का संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA) ईरान के यूरेनियम संवर्धन को सीमित करता था और उसके ‘ब्रेकआउट टाइम’ को लंबा करता था, लेकिन 2018 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को इस समझौते से बाहर निकाल लिया और ‘मैक्सिमम प्रेशर’ नीति को फिर से लागू कर दिया. इसके बाद के वर्षों में ईरान ने संवर्धन बढ़ाया, क्षेत्रीय तनाव तेज हुए, और अमेरिका असहज संतुलन (कंटेनमेंट) की स्थिति से आगे बढ़कर सीधे सैन्य बल के इस्तेमाल की ओर बढ़ गया. 2026 की शुरुआत तक अमेरिका और इज़राइल ने ईरान के खिलाफ बड़े पैमाने पर अभियान शुरू कर दिया था, जिसके जवाब में खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी ठिकानों पर हमले हुए और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में व्यवधान पैदा हुआ. यही बदलाव असली कहानी है. युद्ध केवल शक्ति की परीक्षा नहीं लेते; वे उसकी सीमाओं को भी उजागर कर देते हैं.

अमेरिकी विदेश नीति

ईरान के साथ चल रहे युद्ध ने अमेरिकी विदेश नीति की दिशा और शैली दोनों को बदल दिया है. इस संघर्ष ने अमेरिका को पहले से अधिक प्रत्यक्ष, महंगी और राजनीतिक रूप से प्रतिबद्ध भूमिका में ला खड़ा किया है. अब अमेरिका की विश्वसनीयता केवल ईरान को रोकने तक सीमित नहीं रही, बल्कि उस व्यापक युद्ध को प्रभावित करने से भी जुड़ गई है जो परमाणु जोखिम, ऊर्जा आपूर्ति, गठबंधन राजनीति और पूरे क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित कर रहा है.

इसका सबसे बड़ा असर अमेरिका के अपने सहयोगियों और साझेदारों के साथ संबंधों पर दिखाई दे रहा है. भले ही अमेरिकी गठबंधन अब भी उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत माने जाते हैं, लेकिन ईरान युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सभी सहयोगी तनाव बढ़ाने को एक जैसी नजर से नहीं देखते. कई देशों की लागत और जोखिम उठाने की क्षमता और इच्छा भी अलग-अलग है. इससे पहले परमाणु समझौते से अमेरिका के हटने के बाद यूरोप के साथ मतभेद सामने आ चुके थे. यह स्थिति दिखाती है कि गठबंधन केवल सैन्य शक्ति से नहीं चलते, बल्कि भरोसे, संवाद और स्पष्ट रणनीतिक उद्देश्य पर टिके रहते हैं.  

इज़राइल, स्वाभाविक रूप से, इस संदर्भ में अलग स्थान रखता है. 2026 की राष्ट्रीय रक्षा रणनीति में ईरान के जवाब में इज़राइल को मजबूत करना एक केंद्रीय कदम बताया गया है और उसे ‘मॉडल सहयोगी’ कहा गया है, साथ ही अन्य क्षेत्रीय साझेदारों से भी अधिक जिम्मेदारी उठाने का आग्रह किया गया है. यह रुख साफ संकेत देता है कि वॉशिंगटन अब भी पश्चिम एशिया में इज़राइल को अपना सबसे भरोसेमंद सैन्य साझेदार मानता है, जबकि अन्य क्षेत्रीय देशों से अधिक जिम्मेदारी उठाने की अपेक्षा कर रहा है. दूसरी ओर, खाड़ी की राजशाहियाँ एक असहज मध्य स्थिति में हैं. अमेरिका ने ईरान को रोकने के लिए क्षेत्रीय समन्वय बढ़ाने की कोशिश की है, जिसमें मिसाइल और ड्रोन खतरों से निपटने को लेकर कई देशों के बीच सहयोग शामिल है. फिर भी खाड़ी देशों को आशंका है कि अमेरिका-ईरान सीधा टकराव होने पर वे खुद निशाना बन सकते हैं. इसलिए उन्हें अमेरिकी सुरक्षा भी चाहिए और उससे जुड़े जोखिम से दूरी भी. ईरान युद्ध का असर एशियाई सहयोगियों पर भी साफ दिखाई दे रहा है. जब अमेरिका ने अपने कुछ सैन्य संसाधन एशिया से हटाकर ईरान मोर्चे पर लगाए, तो चीन के पड़ोस में मौजूद सहयोगी देशों में चिंता बढ़ गई कि इससे इंडो-पैसिफिक में निरोध की क्षमता कमजोर न हो जाए. खासकर तब, जब वॉशिंगटन खुद चीन को अपनी सबसे बड़ी दीर्घकालिक चुनौती बताता रहा है. इसी कारण यह संघर्ष अब केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अमेरिका की वैश्विक प्रतिबद्धताओं की परीक्षा बन गया है.

खाड़ी देशों को आशंका है कि अमेरिका-ईरान सीधा टकराव होने पर वे खुद निशाना बन सकते हैं. इसलिए उन्हें अमेरिकी सुरक्षा भी चाहिए और उससे जुड़े जोखिम से दूरी भी. ईरान युद्ध का असर एशियाई सहयोगियों पर भी साफ दिखाई दे रहा है.

2026 की राष्ट्रीय रक्षा रणनीति भी इस दबाव को दिखाती है. इसमें सबसे पहले घरेलू सुरक्षा, फिर चीन के विरुद्ध सोच , उसके बाद सहयोगियों की अधिक भागीदारी और अंत में रक्षा औद्योगिक आधार को प्राथमिकता दी गई है. साथ ही संकेत दिया गया है कि रूस के मामले में यूरोप को आगे आना होगा, जबकि अमेरिका सहयोगी की भूमिका निभाएगा. यहीं से अमेरिका की महाशक्ति वाली छवि और जटिल दिखाई देने लगती है. महाशक्ति होना केवल युद्ध लड़ने की क्षमता तक सीमित नहीं है, बल्कि एक क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए दूसरे क्षेत्रों में भी प्रभाव बनाए रखने की क्षमता पर निर्भर करता है. ईरान के आसपास अमेरिका की बड़ी सैन्य तैनाती और हमले उसकी शक्ति प्रक्षेपण क्षमता दिखाते हैं, लेकिन यह संघर्ष यह भी बता रहा है कि एक साथ कई मोर्चों को संभालना अब पहले जितना आसान नहीं रहा. विशेषज्ञों के अनुसार, वर्चस्व बनाए रखने के लिए अब अमेरिका को अपनी प्राथमिकताएं तय करनी पड़ रही हैं.

इसका असर अमेरिकी घरेलू राजनीति पर भी पड़ा है. ट्रंप के कुछ सहयोगियों और ‘अमेरिका फर्स्ट’ धड़े ने क्षेत्र में अतिरिक्त सैनिक भेजे जाने के बाद जमीनी युद्ध की आशंका पर चिंता जताई है. उनका तर्क है कि हवाई और मिसाइल हमले बढ़ने के साथ ही समुद्री मार्गों की सुरक्षा, सैन्य ठिकानों की रक्षा और रसद का विस्तार जैसी चुनौतियां भी बढ़ती हैं. यही मुद्दा अब वॉशिंगटन में बड़ी बहस का विषय बना हुआ है.

ईरान युद्ध का महत्व 

एक और महत्वपूर्ण परिणाम अमेरिका की उस भूमिका से जुड़ा है जिसमें वह रक्षा उत्पादों और सुरक्षा प्रणालियों का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है. मार्च 2026 में प्रकाशित SIPRI के 2025 रुझानों के आँकड़ों के अनुसार, 2021–25 के दौरान वैश्विक प्रमुख हथियार निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी 42 प्रतिशत रही, जो पिछले पाँच वर्षों की अवधि के 36 प्रतिशत से अधिक है. यह केवल औद्योगिक आँकड़ा नहीं, बल्कि एक अहम भू-राजनीतिक सच्चाई भी है. हथियारों का निर्यात अमेरिका को अपने सहयोगियों से लंबे समय तक जोड़ता है और उसके प्रभाव को युद्धक्षेत्र से आगे तक बढ़ाता है. लेकिन ईरान युद्ध ने इस भूमिका की चुनौतियां भी सामने रखी हैं. अलग-अलग क्षेत्रों में हथियार देने वाले देश को अपने भंडार भरने, उत्पादन बढ़ाने और समय पर आपूर्ति बनाए रखने की जिम्मेदारी निभानी पड़ती है. आज महाशक्ति का आकलन केवल सैन्य अड्डों से नहीं, बल्कि उसकी औद्योगिक क्षमता से भी होता है.

इस संघर्ष ने यह भी दिखाया कि अमेरिका तेजी से सैन्य कदम उठा सकता है, लेकिन उसका ध्यान सीमित है और एक क्षेत्रीय संकट उसकी प्राथमिकताओं को बदल सकता है. कई सहयोगियों की असली चिंता कमजोरी नहीं, बल्कि यही है कि कहीं अमेरिका का ध्यान बँट न जाए.

ईरान के साथ युद्ध ने एक पुराने सवाल को फिर तेज कर दिया है, क्या अमेरिका हर क्षेत्र में सक्रिय रहना चाहता है या केवल वहीं जहाँ उसके हित सबसे अधिक हैं. वॉशिंगटन अब भी प्रमुख क्षेत्रों में प्रभाव बनाए रखने और जरूरत पड़ने पर सैन्य कार्रवाई करने की क्षमता रखता है. लेकिन साथ ही वह सहयोगियों से अधिक खर्च और जिम्मेदारी उठाने की अपेक्षा भी कर रहा है. संकेत साफ है कि अमेरिकी वर्चस्व की पुरानी नीति खत्म नहीं हुई, बल्कि बदलते हालात के अनुसार उसे नया रूप दिया जा रहा है.

इस नजरिए से ईरान युद्ध अमेरिका के लिए वैसा ही सबक बन सकता है जैसा कभी इराक युद्ध बना था, हालांकि अलग संदर्भ में. यह संघर्ष दिखा रहा है कि एक साथ प्रभुत्व बनाए रखते हुए जोखिम घटाना आसान नहीं है. वॉशिंगटन लंबी और खुले दायित्वों से बचना चाहता है, लेकिन रणनीतिक क्षेत्रों में विरोधी बदलाव भी स्वीकार नहीं कर सकता. वह सहयोगियों से बड़ी भूमिका की अपेक्षा करता है, जबकि वास्तविकता यह है कि कई देश अब भी अमेरिकी खुफिया, रसद, नौसैनिक शक्ति और उन्नत हथियारों पर निर्भर हैं.

अमेरिकी शक्ति अब भी असाधारण मानी जाती है, लेकिन वह पहले की तरह निर्बाध नहीं रही. ईरान युद्ध ने यह स्पष्ट किया है कि अमेरिका की महाशक्ति की भूमिका खत्म नहीं हुई, मगर अब उसे कड़ी रणनीतिक सीमाओं, सहयोगियों की बढ़ती निगरानी और औद्योगिक दबाव के बीच काम करना पड़ रहा है. इस संघर्ष ने यह भी दिखाया कि अमेरिका तेजी से सैन्य कदम उठा सकता है, लेकिन उसका ध्यान सीमित है और एक क्षेत्रीय संकट उसकी प्राथमिकताओं को बदल सकता है. कई सहयोगियों की असली चिंता कमजोरी नहीं, बल्कि यही है कि कहीं अमेरिका का ध्यान बँट न जाए. अंत में रणनीति का मतलब केवल अधिक करना नहीं होता, बल्कि यह तय करना होता है कि अब क्या नहीं किया जा सकता.


राजदूत संजय कुमार वर्मा आरआईएस के पूर्व अध्यक्ष, कनाडा में भारत के पूर्व उच्चायुक्त और जापान और सूडान में भारत के पूर्व राजदूत थे.

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