ईरान-इज़रायल संघर्ष अब सिर्फ क्षेत्रीय दुश्मनी नहीं बल्कि हाई-टेक युद्ध बन चुका है. एक तरफ इज़रायल की उन्नत सैन्य तकनीक है तो दूसरी तरफ ईरान की मिसाइलें और प्रॉक्सी नेटवर्क—जिससे टकराव लगातार गहराता जा रहा है. जानिए आखिर में यह टकराव कहाँ जाकर थमेगा.
ईरान और इज़रायल का रिश्ता केवल दो पारंपरिक क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों की कहानी नहीं है, बल्कि यह युद्ध और सामरिक नीति को लेकर दो बिल्कुल विपरीत सोच का भी प्रदर्शन है. ईरान के पास पारंपरिक सैन्य क्षमताओं का अभाव है, इसलिए वह बैलिस्टिक मिसाइलों व ड्रोनों, विकसित परमाणु क्षमताओं, रणनीतिक लाभ देने वाले विशाल भूभाग और हिज्बुल्लाह, हमास और इराक में शिया मिलिशिया व हूती जैसे आतंकी संगठनों (प्रॉक्सी) पर निर्भर है, जिनको सामूहिकता में ‘प्रतिरोध की धुरी’ कहा जाता है. तो दूसरी ओर, इज़रायल अत्याधुनिक तकनीक में आगे है और अपने उद्देश्यों को पाने के लिए उसके पास उन्नत सैन्य-तकनीक है. संघर्ष के कई मोर्चों पर इन दोनों का यह अंतर इनकी बिल्कुल अलग-अलग रणनीतियों में दिखा है.
तालिका 1 : ईरान और इज़रायल की वायु और मिसाइल सैन्य क्षमताएं
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सिस्टम |
इज़रायल |
ईरान |
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जेट विमानों का बेड |
एफ- 35 |
एफ- 4 |
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एफ- 16 |
एफ- 5 |
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एफ- 15 |
सुखोई- 24 |
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मिग- 29 |
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एफ- 7 |
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एफ- 14 |
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ड्रोन बेड़ा |
ईटन (हेरोन TP) - MALE ड्रोन (मध्यम ऊंचाई पर लंबी सहनशक्ति वाला) - मल्टी-मिशन प्लेटफ़ॉर्म; ISR, लक्ष्य पाने आदि में सक्षम |
अबाबील श्रृंखला (1-5) - ISR ड्रोन - बाद के मॉडलों में हमले की क्षमताएं विकसित की गईं |
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हर्मेस 450 - ISR के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला सामरिक UAV - स्वचालित और मैनुअल, दोनों तरह की उड़ान भरने में सक्षम. |
अराश – लक्ष्य क्षेत्र के ऊपर मंडराने वाला गोला-बारूद - उड़ान दूरी : 2000 किलोमीटर |
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कोचाव (हर्मेस 900) – ISR सॉर्टीज़ के लिए विकसित - उड़ान समय : 36 घंटे - उड़ान ऊंचाई: 30,000 फीट तक - उपग्रह डेटा लिंक और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल इन्फ्रारेड सेंसर से सुसज्जित |
मोहजर (श्रृंखला) - ISR ड्रोन - बाद के मॉडल हथियार ले जा सकते थे. शाहेद शृंखला (129, 136, 149) - आत्मघाती ड्रोन - कुछ मॉडल ISR का काम भी कर सकते हैं. |
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ऑर्बिटर 4 - कम लागत वाला, आसानी से असेंबल होने वाला UAV - मल्टी-मिशन प्लेटफ़ॉर्म - इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, खुफ़िया जानकारी, निगरानी, लक्ष्य प्राप्ति और टोही (ISTAR) मिशनों के लिए उपयोग किया जाता है. |
कर्रार - हमलावर ड्रोन - ISR काम भी कर सकता है - उड़ान सीमा : 700-1,000 किलोमीटर |
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IAI हारोप - यह खुफ़िया जानकारी जुटाने के साथ-साथ लक्ष्य पर हमले कर सकता है - यह इलेक्ट्रो-ऑप्टिकली लोइटरिंग मुनिशन है - मुख्य रूप से रेडियो आवृत्ति उत्सर्जित करने वाले सेंसरों को नष्ट करने के लिए तैनात किया जाता है. |
हमासेह - मध्यम ऊंचाई; मध्यम दूरी - ISR और आक्रमण क्षमताओं से लैस |
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मिसाइल बेड़ा |
हार्पून - सबसोनिक क्रूज़ मिसाइल - रेंज : 90–240 किलोमीटर |
शहाब-1 - कम दूरी वाली बैलिस्टिक मिसाइल (SRBM) - रेंज : 300 किलोमीटर |
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LORA (लॉन्ग रेंज आर्टिलरी) - कम दूरी वाली बैलिस्टिक मिसाइल (SRBM) - रेंज : 280 किलोमीटर |
शहाब-2 - SRBM - रेंज: 500 किलोमीटर |
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गैब्रियल - कम दूरी की एंटी-शिप क्रूज़ मिसाइल - रेंज : 35–400 किलोमीटर |
Qiam-1 - SRBM - रेंज : 500 किलोमीटर |
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जेरिको श्रृंखला (1-3) - जेरिको 1 : SRBM (500 किलोमीटर रेंज) - जेरिको 2 : MRBM (1,500–3,500 किलोमीटर रेंज) - जेरिको 3 : इंटरमीडिएट-रेंज बैलिस्टिक मिसाइल (IRBM) (4,800–6,500 किलोमीटर रेंज) |
फतेह -110 - SRBM - रेंज : 300-500 किलोमीटर |
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डेलिलाह - लैंड अटैक क्रूज़ मिसाइल (LACM) - रेंज : 250-300 किलोमीटर |
फतेह -313 - SRBM - रेंज: 500 किलोमीटर |
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पोपेय - वायु से सतह पर मार करने वाली मिसाइल - रेंज: 75–100 किलोमीटर |
ज़ोल्फ़ाघर - SRBM - रेंज: 700 किलोमीटर |
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देज़फुल - SRBM - रेंज: 1000 किलोमीटर |
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शहाब-3 - मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल (MRBM) - रेंज: 1300 किलोमीटर |
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ग़द्र - MRBM - रेंज: 1600 किलोमीटर |
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इमाद - MRBM - रेंज: 1800 किलोमीटर |
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सेजिल - MRBM - रेंज: 2000 किलोमीटर |
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या अली - भूमि पर हमला करने वाली क्रूज़ मिसाइल (LACM) - रेंज: 700 किलोमीटर |
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पावेह - LACM - रेंज : 1700 किलोमीटर |
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सिमोर्ग - उपग्रह प्रक्षेपण यान (SLV) - रेंज: 5000 किलोमीटर तक |
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वायु रक्षा प्रणाली |
आयरन डोम - कम दूरी वाली प्रणाली (150 किलोमीटर) - रॉकेट, तोप के गोले और मोर्टार हमलों को रोक सकती है |
एस -300 - रूसी मूल की - सतह से हवा में मार करने वाली (SAM) प्रणाली |
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डेविड्स स्लिंग - मध्यम दूरी की प्रणाली (300 किलोमीटर त्रिज्या और इंटरसेप्ट करने की अधिकतम ऊंचाई 15 किलोमीटर) - क्रूज़ और बैलिस्टिक मिसाइलों के साथ-साथ लंबी दूरी के रॉकेटों को भी रोकने के लिए डिज़ाइन की गई है. |
बावर -373 - स्वदेशी रूप से निर्मित - लंबी दूरी की मिसाइल रक्षा प्रणाली |
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एरो - लंबी दूरी की अधिक ऊंचाई वाली प्रणाली - मूल रूप से 1980 के दशक में तैयार; वर्तमान में तैनात संस्करण एरो-2 (2000) और एरो-3 (2017) हैं - एरो 2 : 90 किलोमीटर की दूरी और 50 किलोमीटर की ऊंचाई पर इंटरसेप्ट करने में सक्षम - एरो 3: हिट-टू-किल (HTK) इंटरसेप्टर; 2,400 किलोमीटर तक की दूरी तक इंटरसेप्ट करने में. |
खोरदाद 15 - स्वदेशी निर्मित - मध्यम दूरी की वायु रक्षा प्रणाली; मर्साद - स्वदेशी निर्मित - मध्यम दूरी की वायु रक्षा प्रणाली |
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THAAD (थर्मल हाई-एल्टीट्यूड एरिया डिफेंस) सिस्टम - मिसाइलों को उनके अंतिम उड़ान चरण में ही रोक देता है - इसकी रेंज 150-200 किलोमीटर है. |
मिसाघ शृंखला (1-3) मानव-पोर्टेबल वायु रक्षा प्रणाली (MANPADS) - कम दूरी और कम ऊंचाई वाले ख़तरों के लिए तैयार |
स्रोत:
यह कोई छिपी बात नहीं है कि इज़रायल के पास अत्याधुनिक वायु और मिसाइल रक्षा प्रणाली के साथ-साथ एक बेहतर पारंपरिक हवाई शक्ति भी है. ईरान प्रतिबंधों की वज़ह से इन क्षमताओं की बराबरी करने के लिए संघर्ष कर रहा है. इसके बजाय वह प्रॉक्सी गुटों की मदद करता है, ताकि संघर्ष को ईरानी मुख्य भूमि से दूर रखा जा सके. हालांकि, उसके पास विशाल और विविध मिसाइल भंडार भी हैं, जो इज़रायल के लिए गंभीर ख़तरा हैं. इतना ही नहीं, प्रॉक्सी गुटों के कारण ईरान को यह लाभ भी मिलता है कि वह उनके उन हमलों में खुद के शामिल होने से इंकार कर देता है, जो इज़रायल को नुक़सान पहुंचाते हैं.
दशकों के छद्म युद्ध और कई बार टकराव की स्थिति पैदा होने के बाद 13 जून, 2025 को इज़रायल ने ईरान पर एक बड़ा हवाई हमला किया. ‘राइजिंग लायन’ नामक यह ऑपरेशन वास्तव में तेहरान की मिसाइल और परमाणु क्षमताओं को ख़त्म करने के लिए शुरू किया गया था.
यह दो अन्य ऑपरेशन में बंटा हुआ था. ‘ऑपरेशन रेड वेडिंग’ का लक्ष्य ईरान के वरिष्ठ सैन्य नेतृत्व को निशाना बनाना था, जिसके लिए इज़रायली खुफ़िया एजेंसियों ने प्रमुख ईरानी कमांडरों को एक ही स्थान पर बुलाने के लिए छल का प्रयोग किया था. इसके अलावा, मोसाद के एजेंटों ने कथित तौर पर क्वाडकॉप्टर के पुर्जे ईरान में तस्करी करके पहुंचाए, जिससे खुफ़िया टीमों को जानकारी जुटाने, हवाई सुरक्षा में रुकावट पैदा करने और कुछ ही मिनटों में ईरान के शीर्ष सैन्य कमान के कई लोगों को ख़त्म करने में मदद मिली. दूसरा ऑपरेशन नार्निया था, जिसमें नौ प्रमुख परमाणु वैज्ञानिकों को निशाना बनाया गया.
इज़रायल का एक ही उद्देश्य था, ईरान के भूमिगत परमाणु ढांचे को नष्ट करना. इसके बाद ऑपरेशन मिडनाइट हैमर के तहत हवाई हमले लगातार बढ़ाए गए, जिसमें अमेरिका ने तीनों प्रमुख ठिकानों के ख़िलाफ़ सात B-2 स्पिरिट विमानों को मोर्चे पर लगाया, जो GBU-57 बंकर-बस्टर मिसाइलों से लैस थे.
हालांकि, राइजिंग लायन का मुख्य केंद्र ईरान के परमाणु संयंत्र फोर्डो, नतान्ज़ और इस्फ़हान थे, जिन पर सिलसिलेवार हमले किए गए. करीब 200 विमानों ने एक ही रात में 330 से अधिक मिसाइलें दागीं.
ईरान ने तुरंत जवाबी कार्रवाई करते हुए तेल अवीव और हाकिर्या सैन्य मुख्यलाय की ओर 100 से अधिक हमलावर ड्रोन दागे, जिसके बाद पूरी रात मिसाइलों की बौछार होती रहीं. निश्चय ही, इज़रायल की बहुस्तरीय हवाई रक्षा प्रणाली ने इनमें से अधिकांश को रोक दिया, पर कुछ के तेल अवीव में घुसने के संकेत भी मिले. ईरान की मंशा किसी एक लक्ष्य के बजाय बड़े पैमाने पर हमले की थी, ताकि ड्रोन और मिसाइल हमलों से इज़रायल की इंटरसेप्ट क्षमता को भेदा जाए.
हालांकि, इज़रायल का एक ही उद्देश्य था, ईरान के भूमिगत परमाणु ढांचे को नष्ट करना. इसके बाद ऑपरेशन मिडनाइट हैमर के तहत हवाई हमले लगातार बढ़ाए गए, जिसमें अमेरिका ने तीनों प्रमुख ठिकानों के ख़िलाफ़ सात B-2 स्पिरिट विमानों को मोर्चे पर लगाया, जो GBU-57 बंकर-बस्टर मिसाइलों से लैस थे. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तो ईरानी केंद्रों को पूरी तरह बर्बाद कर देने का दावा किया था, लेकिन अमेरिकी खुफ़िया एजेंसियों ने नुक़सान को काफ़ी, लेकिन अधूरा बताया.
12 दिनों का वह युद्ध एक विराम साबित हुआ, समाधान नहीं. 28 फरवरी, 2026 को अमेरिका और इज़रायल की सेनाओं ने ईरान की परमाणु क्षमताओं को निशाना बनाने और सत्ता परिवर्तन सहित कई रणनीतिक उद्देश्यों को पाने के लिए अपनी संयुक्त कार्रवाई शुरू की. अमेरिका ने इसे ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ कहा, तो इज़रायल ने ‘ऑपरेशन रोरिंग लायन’. दोनों देशों ने ईरान के कई ठिकानों पर हमले किए. ये हमले इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कार्प्स (IRGC) के कमांड और कंट्रोल केंद्र, ईरानी वायु रक्षा प्रणाली, मिसाइल व ड्रोन प्रक्षेपण स्थल और सैन्य हवाई अड्डे पर किए गए. इस अभियान से अमेरिका-इज़रायल सैन्य साझेदारी में आए एक महत्वपूर्ण बदलाव का भी पता चलता है कि अब वाशिंगटन केवल सहायक भूमिका में नहीं, बल्कि आक्रामक अभियानों में सीधी भागीदारी करेगा. इन हमलों का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक परिणाम निकला- ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई कई वरिष्ठ अधिकारियों के साथ मारे गए, जिससे ईरान की राजनीतिक और सुरक्षा व्यवस्था के शीर्ष पर मौजूद कमान और निर्णय लेने की संरचना पूरी तरह टूट गई.
खामनेई के अंत के बाद तेहरान के पास जवाबी कार्रवाई करने के अलावा कोई ख़ास रणनीतिक विकल्प नहीं था, क्योंकि तुरंत कार्रवाई न करना उसकी कमज़ोरी मानी जाती और भविष्य में उस पर हमले की आशंका बढ़ जाती. इसलिए ईरान की कार्रवाई भी बेरोकटोक रही और उसने मिसाइलों व ड्रोन हमलों की ऐसी लहर शुरू कर दी, जो 12 दिनों के युद्ध की तुलना में कहीं अधिक भौगोलिक क्षेत्रों में फैली थी. तेहरान ने बहरीन, इराक, जॉर्डन, कवैत, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात तक के अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले किए. ये हमले अब भी जारी हैं और पूरा मध्य पूर्व इससे गूंज रहा है. इसे दशकों में इस क्षेत्र में हुए सबसे भीषण सैन्य हमलों में से एक माना जा रहा है.
इज़रायल को तकनीक और हवाई हमलों में बढ़त हासिल है, फिर भी वह ईरान की युद्ध नीति और कठिनाइयों से तुरंत बाहर निकलने की रणनीति का मुक़ाबला नहीं कर सकता. वहीं, भारी नुक़सान झेलने के बावजूद ईरान के पास जवाबी कार्रवाई करने, अलग-अलग हिस्सों में बंटने और टिके रहने को क्षमता है.
इज़रायल की नज़र से देखें, तो ईरान उसके अस्तित्व के लिए ख़तरा है. यह ख़तरा तेहरान के विशाल मिसाइल भंडार, क्षेत्रीय प्रॉक्सी नेटवर्क के समर्थन और परमाणु हथियार बनाने की उसकी कोशिशों से और भी बढ़ जाता है. तेल अवीव के मुताबिक, इन सबके पीछे एक ऐसा शासन है, जो वैचारिक रूप से इज़रायल-विरोधी है. ईरान के इज़रायली हमले को इसी पृष्ठभूमि में समझना होगा.
रणनीतिक रूप से ईरान ने अमेरिकी-इज़रायली हमले का मुक़ाबला करने के लिए अपने सभी सैन्य और भू-राजनीतिक कदम उठाए हैं. उसने बड़े पैमाने पर ड्रोन और मिसाइलों से हमलों का सिलसिला जारी रखा है, जिनका मक़सद किसी एक लक्ष्य पर निशाना लगाना नहीं, बल्कि इज़रायल की अत्याधुनिक व कई स्तरों वाली हवाई सुरक्षा प्रणाली को परखना, और उसे पूरी तरह नष्ट कर देना है. ऐसा करके वह अमेरिका और इज़रायल को आर्थिक चोट पहुंचाने की नीति भी अपना रहा है. जैसे- कम कीमत वाले शाहेद ड्रोन का इस्तेमाल, जिसका मूल्य करीब 20 हजार से 50 हजार डॉलर है, पैट्रियट जैसी महंगी इंटरसेप्टर मिसाइलों को ख़त्म करने के लिए किया जाता है, जिसका मूल्य प्रति मिसाइल लगभग 40 लाख डॉलर है. इस तरह, ‘लागत असमानता’ को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, ताकि विरोधी देशों के रक्षा भंडारों को बहुत ही कम ख़र्च पर खाली किया जा सके.
वरिष्ठ नेतृत्व के ख़ात्मे और पारंपरिक सैन्य क्षमताओं पर बढ़ते दबाव ने ईरान को अपने कमान और कंट्रोल ढांचे में बदलाव करने को मजबूर किया है. इसके चलते ‘मोज़ेक सिद्धांत’ को अपनाने की ओर वह बढ़ गया. यह प्लान असल में देश को जान-बूझकर 31 स्वायत्त ऑपरेशनल जोन में बांटता है, जिसमें हर जोन बिना किसी केंद्रीय निर्देश के काम करने के लिए स्वतंत्र होता है. दरअसल, केंद्र यदि कमज़ोर हुआ, तो सीमावर्ती क्षेत्रों को मज़बूत बनाकर ईरान ने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि कोई भी हमला उसके ख़िलाफ़ रणनीतिक रूप से निर्णायक साबित न हो सके.
ईरान का भूगोल इस व्यवस्था को और मज़बूत बनाता है. यह देश किसी प्राकृतिक किले से कम नहीं है, जिसके पश्चिम में ज़ाग्रोस पर्वतमाला है और उत्तर में अल्बोर्ज़ पर्वतमाला. इस कारण तेहरान अपने सैन्य और परमाणु ढांचे को दुर्गम भूभागों में फैला सकता है. इन सबसे वहां जमीनी आक्रमण करना भी बेहद कठिन हो जाता है. हवाई हमले भी उसे बहुत नुक़सान नहीं पहुंचा पाते, क्योंकि पहाड़ी इलाके और विशाल क्षेत्रों में फैले होने के कारण उसके सैन्य संसाधनों को सिर्फ़ हवाई हमलों से पूरी तरह ख़त्म नहीं किया जा सकता.
ईरान-इज़रायल संघर्ष एक नए ख़तरनाक दौर में प्रवेश कर चुका है. यह अब छद्म युद्ध और परोक्ष झड़पों तक सीमित नहीं है, बल्कि अमेरिका की भागीदारी के साथ एक बड़े सैन्य टकराव में बदल चुका है. 2025 के 12 दिनों के युद्ध और अब इस सैन्य अभियान ने यह साफ़ कर दिया है कि किसी भी पक्ष के पास तुरंत और निर्णायक जीत हासिल करने की क्षमता नहीं है. इज़रायल को तकनीक और हवाई हमलों में बढ़त हासिल है, फिर भी वह ईरान की युद्ध नीति और कठिनाइयों से तुरंत बाहर निकलने की रणनीति का मुक़ाबला नहीं कर सकता. वहीं, भारी नुक़सान झेलने के बावजूद ईरान के पास जवाबी कार्रवाई करने, अलग-अलग हिस्सों में बंटने और टिके रहने को क्षमता है. इसलिए, यह संघर्ष एक लंबा और थकाऊ युद्ध भी बन सकता है.
कार्तिक बोम्मकंती ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में स्ट्रैटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में सीनियर फेलो हैं.
मोहम्मद मुस्तफ़ा आयेज़ ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च इंटर्न हैं.
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Kartik is a Senior Fellow with the Strategic Studies Programme. He is currently working on issues related to land warfare and armies, especially the India ...
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Mohammad Mustafa is a Research Intern at the Observer Research Foundation. ...
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