WEO 2025 बताता है कि भविष्य की ऊर्जा कहानी तेल नहीं, बिजली तय करेगी-सोलर, EV और ग्रिड जितने मज़बूत होंगे, उतना ही तेल पीछे जाएगा. नेट ज़ीरो का रास्ता मुश्किल है लेकिन कम खर्चीला और फायदेमंद है- समझिए कैसे भारत जैसे देशों के लिए यह रणनीतिक मौका बन रहा है.
अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) की तरफ से वार्षिक विश्व ऊर्जा दृष्टिकोण (वर्ल्ड एनर्जी आउटलुक या WEO) का प्रकाशन ऊर्जा बाज़ारों और नीति निर्माताओं के साथ-साथ उत्सर्जन पर काम करने वाले हर व्यक्ति के लिए एक प्रमुख अवसर होता है. हर कोई इसकी जानकारी और इसके आंकड़ों को पढ़ता है और उन पर चर्चा करता है.
WEO 2025 में चार परिदृश्य दिए गए हैं: 2050 तक नेट ज़ीरो एमिशन (NZE), खाना पकाने के स्वच्छ साधनों और बिजली सेवाओं के परिदृश्य को गति प्रदान करना (ACCESS), व्यक्त नीति परिदृश्य (STEPS) और वर्तमान नीति परिदृश्य (CPS). NZE और ACCESS मानक हैं. STEPS और CPS खोजपूर्ण हैं. ये अंतर और उनके पीछे की दलीलों के परिदृश्यों के बारे में WEO टीम के शानदार प्री-लॉन्च नोट में स्पष्ट रूप से समझाया गया है.
वैश्विक ऊर्जा मांग अगले दशक में 2035 तक बिजली की मांग में कम से कम दो-तिहाई बढ़ोतरी करेगी. हम बिजली की इस मांग को कैसे पूरा करते हैं और बिजली का उपयोग कैसे करते हैं, ये जलवायु लक्ष्यों के पूरा होने, ऊर्जा का आर्थिक बोझ उठाने और आर्थिक प्रतिस्पर्धा को तय करेंगे.
हैरानी की बात है कि कई मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि CPS परिदृश्य एक बुनियादी स्थिति है जो ये संकेत देता है कि तेल की मांग अनिश्चित समय तक बढ़ती रहेगी. ये एक सतही निष्कर्ष है जो WEO 2025 की प्रमुख जानकारियों को पूरी तरह से अनदेखा करता है.
सबसे पहले, परेशानियों से घिरी दुनिया में हर परिदृश्य के उद्देश्य की विश्वसनीयता समान है. निश्चित रूप से इनमें से कोई भी अन्य की तुलना में अधिक ठोस आधार वाला तर्क नहीं है.
दूसरा, WEO 2025 का प्रमुख समाचार दुनिया में बिजली की मांग में ज़बरदस्त बढ़ोतरी है जिसके साथ STEPS, ACCESS और NZE में ऊर्जा के अंतिम उपयोगों का विद्युतीकरण भी हुआ है. वैश्विक ऊर्जा मांग अगले दशक में 2035 तक बिजली की मांग में कम से कम दो-तिहाई बढ़ोतरी करेगी. हम बिजली की इस मांग को कैसे पूरा करते हैं और बिजली का उपयोग कैसे करते हैं, ये जलवायु लक्ष्यों के पूरा होने, ऊर्जा का आर्थिक बोझ उठाने और आर्थिक प्रतिस्पर्धा को तय करेंगे. वास्तव में तेल का उपयोग तभी बढ़ता है जब सोलर फोटोवोल्टिक (PV) और इलेक्ट्रिक गाड़ियों (EV और हाइब्रिड) का उपयोग कम होता है. पिछले पांच वर्षों में हमने जो रुझान देखे हैं, ये उसके विपरीत होगा.
जलवायु लक्ष्यों को लेकर NZE में अच्छी और बुरी- दोनों ख़बरें हैं. एक तरफ ये लक्ष्य से 1.5°C आगे बढ़ रहा है लेकिन दूसरी तरफ तापमान में ये बढ़ोतरी 2°C से काफी कम है जो पेरिस समझौते की ऊपरी सीमा के मुताबिक है. वास्तव में ये सुरक्षित तापमान बढ़ोतरी की ऊपरी सीमा है. यहाँ ये बताना महत्वपूर्ण है कि “2°C से काफी कम” एक कठोर सीमा है और NZE मुश्किल से ही इसके नीचे है.
NZE की राह एक ऐसी दुनिया है जहां अभूतपूर्व अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की ज़रूरत है. इसके तहत ज़्यादातर देशों को स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों (चीन की तकनीक) के लिए अपने बाज़ार खोलना और देशों (चीन) द्वारा महत्वपूर्ण खनिजों पर एकाधिकार न करना शामिल है. NZE के लिए बौद्धिक संपदा के व्यापक हस्तांतरण के माध्यम से तकनीकी सीख में तेज़ी लाने की भी आवश्यकता है. भू-राजनीति और वास्तविक दुनिया की इंजीनियरिंग की समयसीमा को देखते हुए ये संभव नहीं लगता.
IEA इस बात पर ज़ोर देता है कि “ACCESS व्यावहारिक बाधाओं और समाधानों पर आधारित है जो इस बात की पड़ताल करता है कि अतीत में प्रगति की ऐतिहासिक दर क्या रही है”. इसके बाद वो उन सफलताओं को दोहराने के लिए सभी ईंधनों और तकनीकों का उपयोग करके किफायती और साबित करने वाले साधनों को प्राथमिकता देता है.
लेकिन NZE के लिए आर्थिक प्रोत्साहन मज़बूत है: ये रास्ता 2035 तक STEPS की तुलना में 20% तक कम खर्चीला होने का अनुमान है. इसका मुख्य कारण ऊर्जा दक्षता में सुधार और कम जीवाश्म ईंधन की ख़रीद से बचा पैसा है. सबसे ज़्यादा बचत ऊर्जा ख़रीदने वाले क्षेत्रों यानी वैश्विक अर्थव्यवस्था के ज़्यादातर देशों के लिए है. ये न केवल दीर्घकालिक जीत है बल्कि 2035 तक बचत आज के नीति निर्माताओं के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है.
NZE को हासिल करने के लिए परिवहन, हीटिंग और उद्योग के लगातार विद्युतीकरण की आवश्यकता होगी. इसकी वजह से हर जगह ग्रिड पर भार बढ़ेगा जिससे ग्रिड के विस्तार, डिजिटलाइजेशन और मज़बूती की ज़रूरत पड़ेगी. इलेक्ट्रिक पावर सिस्टम की स्थिरता राजनीतिक रूप से “आवश्यक” है और इसके लिए निवेश के ढांचे और नीतिगत बाज़ार पर ध्यान देने की आवश्यकता है ताकि लचीलापन, पुनर्वितरण और मांग प्रबंधन किया जा सके. स्पष्ट रूप से ये अवसर और चुनौती उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की तेज़ी से बढ़ती ऊर्जा प्रणालियों में सबसे ज़्यादा है. भारत का पावर ग्रिड विश्व का सबसे समकालिक (सिंक्रोनस) सिस्टम है और ये निवेश, तकनीक की सीख एवं व्यापक आर्थिक लाभ के लिए निर्णायक है.
तीसरा, IEA ने महत्वपूर्ण ACCESS परिदृश्य की शुरुआत की है जो 2040 तक खाना पकाने के स्वच्छ साधनों समेत आधुनिक ऊर्जा सेवाओं तक हर किसी की पहुंच के लिए हर देश के आधार पर अपने विश्लेषण में महत्वपूर्ण गहराई लाता है. IEA इस बात पर ज़ोर देता है कि “ACCESS व्यावहारिक बाधाओं और समाधानों पर आधारित है जो इस बात की पड़ताल करता है कि अतीत में प्रगति की ऐतिहासिक दर क्या रही है”. इसके बाद वो उन सफलताओं को दोहराने के लिए सभी ईंधनों और तकनीकों का उपयोग करके किफायती और साबित करने वाले साधनों को प्राथमिकता देता है. साथ ही इसे बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए आवश्यक नीतियों और फंड की बारीकी से जांच करता है.
इसके विपरीत STEPS एक ऐसी दुनिया है जहां अमेरिका स्वच्छ ऊर्जा तकनीक (चीन की तकनीक) को अपने यहां अपनाने से रोकता है लेकिन उभरती अर्थव्यवस्थाएं बिजली की अपनी बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए सोलर और अन्य स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करती हैं. वहीं यूरोप EV समेत स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों को लगातार अपना रहा है और उसे विकसित कर रहा है.
गैस एक निर्णायक फैक्टर है और सभी चारों परिदृश्य में बेहद अप्रत्याशित है.

प्रोफेसर जेसी स्कॉट ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एक वरिष्ठ फेलो हैं, साथ ही 2019 से बर्लिन के हर्टी स्कूल में सहायक संकाय सदस्य भी हैं.
The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.
Professor Jesse Scott is a Senior Fellow at the Observer Research Foundation, as well as adjunct faculty at the Hertie School in Berlin since 2019. ...
Read More +