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सिंधु नदी पर भारत-पाकिस्तान के जल संबंध अब जलवायु बदलाव से प्रभावित हैं. लेख में संधि के पुराने नियम और अचानक बदलावों की चुनौतियाँ बताई गई हैं.
दिसंबर 2025 में पाकिस्तान ने सिंधु नदी प्रणाली, विशेष रूप से चिनाब नदी के जल प्रवाह में असामान्य और अचानक बदलाव को लेकर चिंता जताई. इस्लामाबाद का आरोप है कि बिना पूर्व सूचना के जल प्रवाह में आए इन उतार-चढ़ावों से निचले इलाकों में पानी की उपलब्धता प्रभावित हो रही है. भारत–पाकिस्तान जल संबंधों में ऐसे आरोप नए नहीं हैं लेकिन इस बार उनका समय खास मायने रखता है. यह विवाद ऐसे समय उभरा है जब दक्षिण एशिया में जलवायु अस्थिरता नदियों की जल-प्रणाली को बदल रही है और अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि (IWT) स्वयं अनिश्चितता के दौर में है.
1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में हस्ताक्षरित सिंधु जल संधि एक ऐसे दौर में बनी थी जब विभाजन के बाद विस्थापन, खाद्य संकट और राजनीतिक स्थिरता सबसे बड़ी प्राथमिकताएँ थीं. दशकों की दुश्मनी, युद्धों और कूटनीतिक तनावों के बावजूद इस संधि का टिके रहना अक्सर इसकी सफलता के रूप में देखा जाता है. लेकिन टिकाऊ होना हमेशा प्रासंगिक होना नहीं होता. आज जब जलवायु परिवर्तन के कारण नदियों का प्रवाह ऐसे तरीकों से बदल रहा है जिन पर न भारत का पूरा नियंत्रण है और न पाकिस्तान का, तब अचानक बदलावों को लेकर होने वाले विवाद अपवाद नहीं बल्कि सामान्य घटना बनते जा रहे हैं.
भारत इस समय बढ़ते जल संकट, जनसंख्या दबाव और तेज़ होते जलवायु परिवर्तन के संगम पर खड़ा है. देश की वार्षिक जल मांग 700 अरब घन मीटर से अधिक हो चुकी है जिसमें कृषि की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है. 2030 तक यह मांग बढ़कर लगभग 1,500 अरब घन मीटर तक पहुँचने का अनुमान है. इस जरूरत को पूरा करने में भारत को केवल आंतरिक कुप्रबंधन और भूजल के अत्यधिक दोहन की ही नहीं बल्कि सिंधु जल संधि की संरचनात्मक सीमाओं की भी चुनौती झेलनी पड़ रही है.
यह विवाद ऐसे समय उभरा है जब दक्षिण एशिया में जलवायु अस्थिरता नदियों की जल-प्रणाली को बदल रही है और अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि (IWT) स्वयं अनिश्चितता के दौर में है.
संधि के तहत पाकिस्तान को सिंधु प्रणाली के लगभग 80 प्रतिशत पानी पर अधिकार प्राप्त है क्योंकि तीन पश्चिमी नदियों पर उसका विशेष नियंत्रण है जबकि नदी घाटी का लगभग 40 प्रतिशत क्षेत्र भारत में स्थित है. 1960 के दशक में यह व्यवस्था राजनीतिक रूप से भले ही व्यवहारिक रही हो लेकिन आज की परिस्थितियों में यह असंतुलन और भी स्पष्ट हो जाता है- खासतौर पर तब, जब जलवायु परिवर्तन के कारण नदियों में मौसमी और उप-मौसमी उतार-चढ़ाव बढ़ रहे हैं जिनका हवाला पाकिस्तान अब दे रहा है.
जलवायु परिवर्तन इस असंतुलन को और गहरा कर रहा है. हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र, जिसे दुनिया का ‘तीसरा ध्रुव’ कहा जाता है, वैश्विक औसत से लगभग दोगुनी गति से गर्म हो रहा है. अनुमान है कि 2100 तक हिमालयी हिमनदों का 75 प्रतिशत तक हिस्सा समाप्त हो सकता है. यहां तक कि 2030 तक भी सिंधु नदी घाटी में कई अहम समयों पर 50 प्रतिशत तक जल की कमी हो सकती है. भारत के लिए, जहां प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता पहले ही 1,500 घन मीटर से नीचे आ चुकी है, ऐसी अस्थिरता खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा उत्पादन और दीर्घकालिक आर्थिक विकास के लिए गंभीर खतरा पैदा करती है. नीति आयोग का आकलन है कि यदि जल संकट पर काबू नहीं पाया गया तो 2050 तक भारत की जीडीपी में छह प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है. आज चुनौती केवल ऊपरी और निचले प्रवाह के अधिकारों की नहीं है बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि मौजूदा संस्थागत व्यवस्थाएँ जलवायु से पैदा हो रही अनिश्चितताओं को संभाल सकें-बिना उन्हें राजनीतिक तनाव में बदले.
यदि सिंधु जल संधि (IWT) को आधुनिक बनाने की कोई गंभीर कोशिश करनी है तो उसकी शुरुआत इस स्वीकारोक्ति से होनी चाहिए कि सिंधु नदी घाटी में उभरते जल संकट की सबसे बड़ी वजह अब जलवायु परिवर्तन है. तेज़ी से पिघलते हिमनद, अनियमित वर्षा और बदलते हिमपात के पैटर्न पहले ही चरम जल घटनाओं का रूप ले चुके हैं. 2014 की कश्मीर बाढ़ इसका स्पष्ट उदाहरण है, जहां जलवायु अस्थिरता के साथ-साथ अव्यवस्थित शहरीकरण ने तबाही को और बढ़ा दिया.
नीति आयोग का आकलन है कि यदि जल संकट पर काबू नहीं पाया गया तो 2050 तक भारत की जीडीपी में छह प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है.
इसके बावजूद, सिंधु जल संधि जलवायु जोखिमों पर पूरी तरह मौन है. यह संधि ऐसे समय में बनी थी, जब जल बंटवारे को एक सख्त, शून्य-योग (zero-sum) दृष्टिकोण से देखा जाता था और नदियों के प्रवाह को स्थिर मान लिया गया था. आज यह धारणा पूरी तरह बदल चुकी है. भारत में बढ़ता जल संकट इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है. दुनिया का सबसे बड़ा भूजल दोहनकर्ता होने के नाते भारत हर साल लगभग 251 अरब घन मीटर भूजल निकालता है, जो वैश्विक दोहन का एक चौथाई है. पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में भूजल स्तर हर साल 0.3 से 1 मीटर तक गिर रहा है. यदि सिंधु ढांचे को नए सिरे से संतुलित किया जाए और सतही जल तक बेहतर पहुंच मिले, तो यह दबाव कम किया जा सकता है और खेती को अधिक टिकाऊ बनाया जा सकता है.
अंतरराष्ट्रीय जल कानून भी अब इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है. संयुक्त राष्ट्र का वाटरकोर्सेज़ कन्वेंशन (2014) न्यायसंगत और विवेकपूर्ण उपयोग पर ज़ोर देता है और स्पष्ट करता है कि सीमापार जल प्रबंधन में जलवायु, जल-वैज्ञानिक और पारिस्थितिक पहलुओं को शामिल किया जाना चाहिए. यह भारत को एक मजबूत नैतिक और कानूनी आधार देता है जिससे वह यह तर्क रख सके कि सिंधु जल संधि को समय के अनुरूप बदलना अनिवार्य है.
संधि की एक बड़ी कमजोरी यह भी है कि वह ऐतिहासिक जल आंकड़ों पर आधारित है. पुराने प्रवाह को आधार मानकर किए गए जल आवंटन आज की बदलती जलवायु वास्तविकताओं को नजरअंदाज करते हैं.
सिंधु जल संधि की सबसे गंभीर कमी उसकी कठोरता है. इसमें न तो नियमित समीक्षा का प्रावधान है, न संशोधन के स्पष्ट संकेतक, और न ही असाधारण जलवायु घटनाओं से निपटने की व्यवस्था.
भारत को एक ऐसे व्यापक, जलवायु-संवेदनशील निगरानी ढांचे की वकालत करनी चाहिए, जिसमें हिमनदों के पिघलने, बर्फ की मोटाई में बदलाव और वर्षा के रुझानों को शामिल किया जाए. रियल-टाइम सैटेलाइट निगरानी, उच्च-स्तरीय जल मॉडलिंग और जलवायु अनुमानों को भविष्य के जल आवंटन का आधार बनाया जाना चाहिए.
सिंधु जल संधि की सबसे गंभीर कमी उसकी कठोरता है. इसमें न तो नियमित समीक्षा का प्रावधान है, न संशोधन के स्पष्ट संकेतक, और न ही असाधारण जलवायु घटनाओं से निपटने की व्यवस्था. भविष्य में, जब जलवायु झटके आम होंगे, तब यही कठोरता सामान्य जल प्रवाह के बदलावों को कूटनीतिक टकराव में बदल सकती है. आधुनिक सीमापार जल समझौते लचीलापन अपनाते हैं. मेकांग समझौता नियमित पुनर्मूल्यांकन को अनिवार्य बनाता है और राइन व्यवस्था में जलवायु अनुमानों को सीधे शासन में शामिल किया गया है. भारत के भीतर भी संसदीय समितियाँ जल बंटवारे की व्यवस्थाओं की हर 5-10 साल में समीक्षा की सिफारिश कर चुकी हैं.
भारत के लिए सिंधु जल संधि पर पुनर्विचार अब केवल कूटनीतिक विकल्प नहीं रहा-यह जल सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और जलवायु अनुकूलन के लिए एक रणनीतिक आवश्यकता बन चुका है.
आगे का रास्ता स्पष्ट है. भारत को सिंधु जल संधि को तीन स्तरों पर नए सिरे से गढ़ने का नेतृत्व करना होगा-जलवायु-संवेदनशील और न्यायसंगत जरूरतों के आधार पर जल आवंटन, साझा और मजबूत जलवायु डेटा ढांचा, और ऐसी शासन व्यवस्था जिसमें समीक्षा और बदलाव की गुंजाइश हो.
सिंधु नदी प्रणाली दक्षिण एशिया में करोड़ों लोगों की जीवनरेखा है. यदि इसके संचालन का ढांचा समय के साथ नहीं बदला, तो “असामान्य बदलावों” को लेकर विवाद और अधिक बार, अधिक राजनीतिक और अधिक अस्थिर रूप में सामने आएंगे. भारत के लिए सिंधु जल संधि पर पुनर्विचार अब भविष्य की तैयारी का सवाल है-एक ऐसे दौर में, जहां जलवायु अनिश्चितता ही नई स्थिरता बनती जा रही है.
अपर्णा रॉय ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी (सीएनईडी) में फेलो और जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा की प्रमुख विशेषज्ञ हैं.
राधे वधवा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च इंटर्न हैं.
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