Author : Chaitanya Giri

Expert Speak Raisina Debates
Published on Mar 19, 2026 Updated 23 Hours ago

पश्चिम एशिया में लड़ाई के बीच सैटेलाइट तस्वीरों पर रोक लगने से (जैसे प्लैनेट लैब्स का फैसला) दुनिया को जमीन की असली स्थिति साफ दिखनी बंद हो गई. इससे साफ है कि अब जंग सिर्फ हथियारों से नहीं बल्कि जानकारी और डेटा पर कंट्रोल से लड़ी और जीती जाएगी.

जियोस्पेशल शटर: जंग का नया और अदृश्य हथियार

10 मार्च, 2026 को पश्चिम एशिया में फारस की खाड़ी के आर-पार दोनों तरफ से मिसाइलें चल रही थीं तभी अमेरिका की जियोस्पेशल कंपनी प्लैनेट लैब्स ने बिना अमेरिकी रक्षा विभाग के हुक्म के जियोस्पेशल तस्वीरों की सेल और रीसेल 14 दिन तक रोक दी. कहा गया कि यह ऐसा इसलिए कि गया ताकि अमेरिका के खिलाफ इनका इस्तेमाल न हो सके. यह कदम जियोस्पेशल ‘शटर कंट्रोल’की एक मिसाल है. 

आज हाल यह है कि पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका के बड़े हिस्से पर ऐसा शटर कंट्रोल लागू है. इसके चलते खुफिया जानकारी इकट्ठा करने वाली सरकारी एजेंसियां और प्लैनेट जैसे प्लेटफॉर्म पर टिकी निजी कंपनियां लगभग अंधी हो गई हैं. शटर कंट्रोल ने होर्मुज और बाब-अल-मंदब के से जुड़ी कारोबारी कंपनियों को भी अंधेरे में डाल दिया है. रिपोर्टिंग के लिए प्लैनेट पर टिके दुनिया भर के मीडिया की खबरों से भी ऐसी जियोस्पेशल तस्वीरें एकदम गायब हैं.

होर्मुज और बाब-अल-मंदब जैसे अहम रास्तों पर क्या हो रहा है, इसका साफ अंदाजा लगाना मुश्किल हो गया है. दुनिया भर का मीडिया, जो पहले सैटेलाइट तस्वीरों के सहारे सच दिखाता था, इस बार खाली नजर आ रहा है. सवाल उठता है- क्या हम वही देख रहे हैं जो हमें दिखाया जा रहा है? या असली कहानी छिपा दी गई है?

प्लैनेट से पेंटागन तक

प्लैनेट दुनिया के जियोस्पेशल मार्केट में एक बड़ा नाम है. चूंकि मौजूदा टकराव में इस्राइल और अमेरिकी फौजी कार्रवाई शामिल है इसलिए यह शटर कंट्रोल शायद 1997 के काइल-बिंगमैन अमेंडमेंट के तहत हो जो नेशनल डिफेंस ऑथराइजेशन एक्ट का हिस्सा है. इस अमेंडमेंट के मुताबिक इस्राइल की हाई-रेजोल्यूशन तस्वीरें बेचने पर रोक है. अमेरिका का राष्ट्रपति चाहे तो इंटरनैशनल इमरजेंसी इकॉनमिक पावर्स एक्ट का इस्तेमाल भी कर सकता है. 

इन पाबंदियों को देखते हुए अमेरिका और यूरोप की दूसरी जियोस्पेशल कंपनियां भी कमोबेश इसी रास्ते पर हैं. टकराव के हिसाब से शटर कंट्रोल और बढ़ सकता है. ऐसे में पेंटागन पूरा कंट्रोल अपने हाथ में ले सकता है.  जब जियोस्पेशल तस्वीरों को ‘डिफेंस सर्विस’ मान लिया जाए, तो उनका इस्तेमाल सिर्फ जानकारी नहीं, बल्कि हथियार बन जाता है.

फिर अमेरिकी हुकूमत ITAR यानी इंटरनेशनल ट्रैफिक इन आर्म्स रेगुलेशंस के सहारे काम कर सकती है. जियोस्पेशल तस्वीरें देना ‘तकनीकी डेटा’ वाली ‘डिफेंस सर्विस’ के तहत भी आ सकता है, जिस पर पाबंदी लग सकती है. इन पाबंदियों को देखते हुए अमेरिका और यूरोप की दूसरी जियोस्पेशल कंपनियां भी कमोबेश इसी रास्ते पर हैं. टकराव के हिसाब से शटर कंट्रोल और बढ़ सकता है. ऐसे में पेंटागन पूरा कंट्रोल अपने हाथ में ले सकता है. जब जियोस्पेशल तस्वीरों को ‘डिफेंस सर्विस’ मान लिया जाए, तो उनका इस्तेमाल सिर्फ जानकारी नहीं, बल्कि हथियार बन जाता है. ITAR जैसे नियम दिखाते हैं कि तस्वीरें भी अब कंट्रोल के दायरे में हैं. ऐसे में क्या आने वाले वक्त में डेटा ही सबसे बड़ा हथियार बन जाएगा?

भारत की तैयारी

12 मार्च 2026 को भारत के इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ ने एक दस्तावेज जारी किया, जिसका नाम था ‘डिफेंस फोर्सेज विजन 2047 ए रोडमैप फॉर ए फ्यूचर रेडी इंडियन मिलिट्री’. इसमें एक नई डिफेंस जियोस्पेशल एजेंसी बनाने की योजना का एलान किया गया. यह एजेंसी ऐसे वक्त में बनाई जा रही है, जब जियोस्पेशल खुफिया जानकारी इकट्ठा करने के तरीके तेजी से बदल रहे हैं. एआई, सेंसर डेटा- जैसे सिग्नल इंटेलिजेंस (SIGINT), इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस (ELINT), मेजरमेंट एंड सिग्नेचर इंटेलिजेंस (MASINT), और साथ ही टारगेट पहचानने, उसका पीछा करने और उससे जुड़ी क्षमताओं में भी तेजी से तरक्की हो रही है.

हाल के दिनों में भारत की फौज ने प्लैनेट, मैक्सर (अब वांटार), ब्लैकस्काई, हॉकआई 360 और एयरबस जैसी कमर्शियल सैटेलाइट कंपनियों से मिलने वाली तस्वीरों का इस्तेमाल शुरू किया. लेकिन एक बात साफ है, डिफेंस जियोस्पेशल एजेंसी का एलान और अमेरिका का शटर कंट्रोल भले ही अलग-अलग बातें हों, लेकिन आगे चलकर इनके असर एक साथ दिख सकते हैं.

पश्चिम एशिया में टकराव शुरू होने के बाद से भारत लगातार वहां रहने वाले बड़े भारतीय समुदाय की सलामती को लेकर चिंता जताता रहा है. अब जब अमेरिकी कंपनियों से मिलने वाली जियोस्पेशल मदद भारत को नहीं मिल पा रही, तो राहत कार्य छोटी इमेज देने वाली कंपनियों की मदद से करने पड़ेंगे.

पश्चिम एशिया में टकराव के बीच भारत अपने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर चिंतित है. लेकिन जब बड़ी कंपनियों से सैटेलाइट मदद नहीं मिल रही, तो राहत और बचाव के काम भी प्रभावित हो सकते हैं. क्या भारत ऐसे हालात के लिए पूरी तरह तैयार है, या अभी और तैयारी बाकी है? पश्चिम एशिया में टकराव शुरू होने के बाद से भारत लगातार वहां रहने वाले बड़े भारतीय समुदाय की सलामती को लेकर चिंता जताता रहा है. अब जब अमेरिकी कंपनियों से मिलने वाली जियोस्पेशल मदद भारत को नहीं मिल पा रही, तो राहत कार्य छोटी इमेज देने वाली कंपनियों की मदद से करने पड़ेंगे. यह भारत के हित में नहीं है.

टकराव की नई तस्वीर

पश्चिम एशिया के इस टकराव ने एक नई चीज भी दिखा दी है. जंग के मैदान में जियोस्पेशल खुफिया जानकारी को एआई बहुत तेजी से मजबूत बना रहा है. अमेरिका ने जब ऑपरेशन एपिक फ्यूरी शुरू करने के कुछ ही समय बाद हांगझोउ की कंपनी मिजारविजन ने अमेरिका के फौजी ठिकानों की तस्वीरें सार्वजनिक करनी शुरू कर दीं. कुछ दिन बाद फ्लोरिडा की कंपनी पलांटिर ने भी ऐसा ही एक मावेन एआई सिस्टम दिखाया, जो अब अमेरिकी सेंट्रल कमांड की मदद कर रहा है. 

इन एआई प्लेटफार्मों के पीछे एक बुनियादी चीज जरूरी है, जियोस्पेशल तस्वीरों की लगातार सप्लाई. इन्हीं के दम पर बदलाव पकड़ने से लेकर टारगेट पहचानने तक हर काम किया जाता है. ये दोनों सिस्टम दुनिया भर की अलग-अलग कमर्शियल कंपनियों, जैसे वांटार, प्लैनेट और एयरबस से तस्वीरें इकट्ठा करते हैं. साथ ही इनके पास अपने मुल्क के सैटेलाइट नेटवर्क का मजबूत बैकअप भी होता है. अमेरिका और चीन दोनों के पास अपने-अपने सैटेलाइट नेटवर्क हैं, इसलिए उन पर असर सीमित रहता है. लेकिन जो देश या कंपनियां इन पर निर्भर हैं, उनके लिए हालात मुश्किल हो सकते हैं. यह नई तरह की ताकत की लड़ाई है, जहां सिर्फ वही टिकेगा जिसके पास अपना डेटा होगा.

अमेरिका और चीन दोनों के पास अपने-अपने सैटेलाइट नेटवर्क हैं, इसलिए उन पर असर सीमित रहता है. लेकिन जो देश या कंपनियां इन पर निर्भर हैं, उनके लिए हालात मुश्किल हो सकते हैं.

अमेरिका के लिए यह आसान है कि वह अपने इलाके में मौजूद कमर्शियल कंपनियों से सीधे तस्वीरें मंगवा लें. वह चीन को भी इन कंपनियों से तस्वीर लेने से रोक सकता है. लेकिन मिजारविजन के पास चीन के अपने सैटेलाइट नेटवर्क, जैसे जिलिन, गाओफेन और सुपरव्यू, का मजबूत सहारा मौजूद है. इसी वजह से मिजारविजन जैसी कंपनियों को ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचता. असल असर उन लोगों पर पड़ता है जो इस टकराव का हिस्सा नहीं हैं.

बदलते तरीके

जब पलांटिर और मिजारविजन दोनों ने टेक्नोलॉजी दिखाकर एक तरह का शॉक देने की कोशिश की, तब जंग में जियोस्पेशल खुफिया के तौर-तरीकों में दो बड़े बदलाव साफ नजर आए.

पहला, एआई के साथ जुड़ी जियोस्पेशल जानकारी यानी एआई-जीओइंट अब कच्ची तस्वीरों को बहुत तेजी से काम की चीज में बदल सकती है. इसे अब एआई एनोटेशन कहा जाता है. इस तरीके में सिस्टम खुद ही टारगेट को पहचान लेता है. इसी के सहारे ऑटोमेटिक हथियार सिस्टम सटीक तरीके से निशाना लगा सकते हैं.

दूसरा, एआई का इस्तेमाल जियोस्पेशल जानकारी के साथ छेड़छाड़ करने के लिए भी किया जा सकता है. यानी नकली तस्वीरें बनाई जा सकती हैं, जिन्हें असली से अलग पहचानना मुश्किल हो जाता है. ऐसी चीजें दुश्मन के फैसले लेने की क्षमता को गड़बड़ा सकती हैं.

अगर यह साबित हो जाए कि तस्वीरें नकली हैं, तो यह सिर्फ जंग नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन भी बन सकता है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या एआई जंग को जीतने का जरिया बनेगा, या पूरी व्यवस्था को ही गैर भरोसेमंद बना देगा?

लेकिन इसका एक खतरा भी है. इससे भरोसा टूट सकता है. सबसे गंभीर बात यह है कि इसे इंटरनेशनल ह्यूमैनिटेरियन लॉ, खासकर जेनेवा कन्वेंशन के तहत धोखे वाली हरकत माना जा सकता है. इस तकनीक का सबसे बड़ा खतरा भरोसे का टूटना है. अगर यह साबित हो जाए कि तस्वीरें नकली हैं, तो यह सिर्फ जंग नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन भी बन सकता है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या एआई जंग को जीतने का जरिया बनेगा, या पूरी व्यवस्था को ही गैर भरोसेमंद बना देगा?

क्या करें भारत

इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ को चाहिए कि वह इन चीजों पर तुरंत कदम उठाए .

- डिफेंस जियोस्पेशल एजेंसी के पास ऐसी सैटेलाइट तस्वीरों तक पहुंच होनी चाहिए, जो एक या ज्यादा ऐसे सैटेलाइट नेटवर्क से आएं जिन पर पूरा कंट्रोल उसी एजेंसी का हो. 

- डिफेंस जियोस्पेशल एजेंसी को स्पेस-बेस्ड सर्विलांस-III के 52 सैटेलाइट वाले नेटवर्क को तेजी से तैनात करना होगा.  

- इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ को ऐसे हालात के लिए भी तैयार रहना होगा, जो अब पहले से ज्यादा मुमकिन लगते हैं. साथ ही नकली तस्वीरों से निपटने के लिए अलग-अलग एजेंसियों के बीच मजबूत तालमेल बनाना होगा.

भारतीय फौज के लिए अब ‘जीरो-ट्रस्ट’ ही सबसे बड़ा नियम होना चाहिए. हर तस्वीर पर सवाल, हर जानकारी की जांच- क्योंकि भविष्य की जंग में जीत उसी की होगी, जिसके पास सही तस्वीर होगी. अब वक्त आ गया है कि भारत अपनी जियोस्पेशल ताकत खुद के कंट्रोल में लाए.

भारतीय फौज की कार्रवाई अब काफी हद तक जियोस्पेशल खुफिया जानकारी पर टिकी हुई है. उसे सभी तस्वीरों को इस्तेमाल करने से पहले ‘जीरो-ट्रस्ट’ का उसूल अपनाना होगा. आने वाले वक्त में जंग सिर्फ हथियारों से नहीं जीती जाएगी, बल्कि इससे तय होगी कि मैदान की तस्वीर पर किसका कंट्रोल है? भारत के लिए इसलिए जीरो-ट्रस्ट जियोस्पेशल ताकत कोई ऑप्शन नहीं है, बल्कि मुल्क की हिफाजत की बुनियादी जरूरत है.


चैतन्य गिरि ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर सिक्यॉरिटी, स्ट्रेटेजी एंड टेक्नोलॉजी में फेलो हैं.

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