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भारत की नौसेना अब सिर्फ़ युद्ध ही नहीं करती बल्कि इंडो-पैसिफ़िक में समुद्री सुरक्षा और कूटनीति की जिम्मेदारियाँ भी निभा रही है. जानें कैसे, नई तकनीक और रणनीति के साथ, यह हिंद महासागर में निगरानी, गश्त और सुरक्षा की नई मिसाल कायम कर रही है.
भारत की समुद्री सुरक्षा नीति अब पहले से कहीं अधिक व्यापक और बहुआयामी हो गई है. जैसे-जैसे भारत पूरे इंडो-पैसिफ़िक क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था को आकार देने में अहम भूमिका निभा रहा है, वैसे-वैसे भारतीय नौसेना-जो देश की मुख्य समुद्री सुरक्षा संस्था है-कई अलग-अलग मोर्चों पर सक्रिय हो गई है. आम तौर पर यह माना जाता है कि नौसेनाओं की भूमिका केवल सैन्य कार्यों तक सीमित होती है लेकिन भारतीय नौसेना ने अब समुद्री क्षेत्र में कूटनीतिक और पुलिसिंग (कांस्टेबुलरी) जिम्मेदारियाँ भी संभालनी शुरू कर दी हैं.
आम तौर पर यह माना जाता है कि नौसेनाओं की भूमिका केवल सैन्य कार्यों तक सीमित होती है लेकिन भारतीय नौसेना ने अब समुद्री क्षेत्र में कूटनीतिक और पुलिसिंग (कांस्टेबुलरी) जिम्मेदारियाँ भी संभालनी शुरू कर दी हैं.
भारत के लिए नौसेना की यह बदली हुई भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है. हिंद महासागर में भारत की केंद्रीय स्थिति और इंडो-पैसिफ़िक समुद्री सुरक्षा ढांचे में उसकी बढ़ती अहमियत के कारण, नई दिल्ली की नौसैनिक तैयारियाँ अब सिर्फ़ राष्ट्रीय हितों तक सीमित नहीं रहीं बल्कि पूरे क्षेत्र की समुद्री सुरक्षा को मज़बूत करने पर भी केंद्रित हैं. इसी संदर्भ में, नौसेना की कूटनीतिक और कांस्टेबुलरी भूमिका विशेष महत्व रखती है.
एक कूटनीतिक उपकरण के रूप में, भारतीय नौसेना ने समान विचारधारा वाले देशों के साथ रक्षा कूटनीति, संयुक्त सैन्य अभ्यासों और अंतर-संचालन क्षमता (इंटरऑपरेबिलिटी) को मज़बूत करते हुए सहयोग बढ़ाया है ताकि इंडो-पैसिफ़िक में अनुकूल समुद्री सुरक्षा वातावरण को आकार दिया जा सके. इसमें उन देशों के साथ सहयोग का विस्तार भी शामिल है जो अब तक भारत की कूटनीतिक पहुँच में अपेक्षाकृत हाशिये पर रहे थे. परिणामस्वरूप, भारत की विदेश नीति ने अपने पड़ोस की अवधारणा को व्यापक बनाते हुए इंडो-पैसिफ़िक के साझा समुद्री क्षेत्र में स्थित तटीय (लिटोरल) देशों को भी शामिल किया है.
इसके साथ ही, नौसेना ने अपनी कांस्टेबुलरी (पुलिसिंग) भूमिका को सुदृढ़ करने पर विशेष बल दिया है. समुद्री क्षेत्र शासन और मानक-निर्धारण (नॉर्म-मेकिंग) का एक महत्वपूर्ण मंच है, जहाँ महासागरों में नियम-आधारित व्यवस्था को बनाए रखना व्यापार, संपर्कता और समुद्री संसाधनों के सतत उपयोग के लिए अनिवार्य है. इसने सुरक्षा की अवधारणा में महासागरों की पुलिसिंग की एक महत्वपूर्ण कांस्टेबुलरी भूमिका को शामिल करने का मार्ग प्रशस्त किया है. भारत के लिए, कांस्टेबुलरी कार्य अब उसकी समुद्री सुरक्षा तैयारी का एक केंद्रीय आयाम बनकर उभरा है. इस आयाम के विकास को भारतीय नौसेना द्वारा अपनी समुद्री सुरक्षा रणनीति को मज़बूत करने के तीन विशिष्ट प्रयासों के माध्यम से समझा जा सकता है.
2008 के मुंबई आतंकी हमलों के बाद भारतीय तटरक्षक बल (इंडियन कोस्ट गार्ड) को भारतीय नौसेना के साथ अधिक सघन रूप से जोड़ा गया.
पहला, 2008 के मुंबई आतंकी हमलों के बाद भारतीय तटरक्षक बल (इंडियन कोस्ट गार्ड) को भारतीय नौसेना के साथ अधिक सघन रूप से जोड़ा गया. अरब सागर के रास्ते आतंकियों द्वारा अपनाए गए मार्ग ने समुद्री और स्थलीय सुरक्षा के गहरे अंतर्संबंध को उजागर किया. कांस्टेबुलरी कार्य की ज़िम्मेदारी संभालने वाले तटरक्षक बल का नौसेना के साथ यह समन्वय, महासागरों की पुलिसिंग भूमिका को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण संस्थागत बदलाव को दर्शाता है.
दूसरा, भारतीय नौसेना द्वारा संचालित इन्फ़ॉर्मेशन फ़्यूज़न सेंटर – इंडियन ओशन रीजन (IFC-IOR) की स्थापना ने समुद्री डोमेन जागरूकता के माध्यम से सहयोग को बढ़ावा देने के प्रयासों को सशक्त किया है. नई तकनीकों के आगमन के साथ सूचना संग्रह, आदान-प्रदान और प्रसार समुद्री सुरक्षा तैयारी को आकार देने में केंद्रीय भूमिका निभाने लगे हैं. IFC-IOR के ज़रिये भारत ने व्यापक इंडो-पैसिफ़िक में समुद्री सुरक्षा तैयारी के कांस्टेबुलरी आयाम में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का प्रयास किया है.
तीसरा, हाल के वर्षों में नौसेना ने समुद्र में निगरानी और अवरोधन क्षमताओं को मज़बूत करने के लिए नई समुद्री परिसंपत्तियों को शामिल किया है. INS माहे, INAS 335 (ऑस्प्रे) और ICGS अमूल्य का कमीशनिंग इसी रणनीतिक बदलाव को दर्शाता है. इंडो-पैसिफ़िक में बिगड़ते सुरक्षा माहौल और हिंद महासागर में चीन की बढ़ती, दोहरे उपयोग वाली गतिविधियों के कारण समुद्री निगरानी और पर्यवेक्षण भारत की समुद्री सुरक्षा रणनीति का अनिवार्य तत्व बन गया है.
हिंद महासागर क्षेत्र में तटरक्षक व्यवस्था का व्यापक संस्थागत पुनर्संयोजन—जिसमें भारतीय नौसेना के साथ इसका गहन एकीकरण और IFC-IOR का बढ़ता महत्व शामिल है—भारत की समुद्री सुरक्षा तैयारी में डोमेन निगरानी की केंद्रीयता को रेखांकित करता है.
24 नवंबर को नौसेना ने INS माहे को कमीशन किया, जो नई माहे-श्रेणी के उथले जल में पनडुब्बी-रोधी युद्ध (ASW) के लिए बनाए गए पहले पोतों में से एक है. यह पोत तटीय रक्षा की पहली पंक्ति को मज़बूत करने तथा उथले तटीय जल में पनडुब्बियों की निगरानी और निष्क्रियकरण के लिए तैनात किया गया है. स्वदेशी रूप से विकसित यह पोत पनडुब्बी-रोधी निगरानी, तटीय गश्त और तटीय चोकपॉइंट्स पर माइन बिछाने की क्षमताओं को सुदृढ़ करता है.
17 दिसंबर को नौसेना ने INAS 335 (ऑस्प्रे) को भी शामिल किया जो MH-60R हेलीकॉप्टरों का संचालन करने वाला दूसरा भारतीय नौसैनिक वायु स्क्वाड्रन है. इससे नौसेना की कांस्टेबुलरी क्षमताओं को उल्लेखनीय बढ़ावा मिला है. नौसैनिक विमानन, अपनी बहुआयामी युद्ध और निगरानी क्षमताओं के कारण, कांस्टेबुलरी भूमिका का एक मुख्य स्तंभ बना हुआ है. INAS 335 पनडुब्बी-रोधी अभियानों को अंजाम देने के साथ-साथ खोज और बचाव (SAR) अभियानों को भी सुदृढ़ करता है.
इंडो-पैसिफ़िक में उभरते जटिल और बहुआयामी सुरक्षा परिदृश्य के संदर्भ में, कांस्टेबुलरी भूमिका यह संकेत देती है कि भारत का समुद्री सुरक्षा दृष्टिकोण निरंतर विकसित हो रहा है.
19 दिसंबर को भारतीय तटरक्षक बल ने ICGS अमूल्य को अपने बेड़े में शामिल किया, जो आठ एडम्या-श्रेणी के फास्ट पेट्रोल पोतों में से तीसरा है. ICGS अमूल्य को निगरानी और तटीय गश्त, खोज और बचाव, अवरोधन तथा तस्करी-रोधी अभियानों सहित विविध प्रकार के परिचालन कार्यों के लिए डिज़ाइन किया गया है. समुद्री सुरक्षा के कांस्टेबुलरी आयाम में तटरक्षक बल की केंद्रीय भूमिका को देखते हुए, इस पोत का शामिल होना महासागरों की पुलिसिंग और समुद्री निगरानी को दी जा रही प्राथमिकता को रेखांकित करता है.
हिंद महासागर क्षेत्र में तटरक्षक व्यवस्था का व्यापक संस्थागत पुनर्संयोजन—जिसमें भारतीय नौसेना के साथ इसका गहन एकीकरण और IFC-IOR का बढ़ता महत्व शामिल है-भारत की समुद्री सुरक्षा तैयारी में डोमेन निगरानी की केंद्रीयता को रेखांकित करता है. साथ ही, इन तीन नई परिसंपत्तियों का शामिल होना कांस्टेबुलरी आयाम की बढ़ती प्रासंगिकता को और मज़बूत करता है. इंडो-पैसिफ़िक में उभरते जटिल और बहुआयामी सुरक्षा परिदृश्य के संदर्भ में, जहाँ नौसेना एक प्रमुख कूटनीतिक अभिनेता और समुद्री सैन्य शक्ति के रूप में उभर रही है, कांस्टेबुलरी भूमिका यह संकेत देती है कि भारत का समुद्री सुरक्षा दृष्टिकोण बिगड़ते क्षेत्रीय सुरक्षा वातावरण के साथ-साथ निरंतर विकसित हो रहा है.
सायंतन हलदार ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन (ORF) के स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में एसोसिएट फ़ेलो हैं.
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Sayantan Haldar is an Associate Fellow with ORF’s Strategic Studies Programme. At ORF, Sayantan’s work is focused on Maritime Studies. He is interested in questions of ...
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