भारत–ईयू एफटीए पर सहमति हो चुकी है, अब मंजूरी की प्रक्रिया के बाद इसके 2027 तक लागू होने की संभावना है. यूरोप में प्रक्रिया लंबी होती है लेकिन यह समझौता कम विवादित होने से जल्दी आगे बढ़ सकता है. पढ़े विश्लेषण.
जनवरी 2026 के अंत में नई दिल्ली में आयोजित द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन में भारत और यूरोपीय संघ ने एक बड़े मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के राजनीतिक निष्कर्ष की घोषणा की. इस समझौते का पूरा पाठ फरवरी के अंत में प्रकाशित किया गया. हालांकि शिखर सम्मेलन की घोषणा और पाठ का प्रकाशन केवल वार्ताओं के समापन को दर्शाता है-अब प्रश्न यह है कि इस समझौते का अनुमोदन कब होगा और यह वास्तव में कब लागू होगा.
संभावना है कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच होने वाला मुक्त व्यापार समझौता (FTA) 2027 की शुरुआत तक लागू हो सकता है. इसका एक मुख्य कारण यह है कि भारत में अंतरराष्ट्रीय समझौतों को मंजूरी देने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत सरल और तेज़ होती है. आमतौर पर ऐसे समझौतों को केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्वीकृति के बाद आगे बढ़ा दिया जाता है. इसके विपरीत, यूरोपीय संघ में इस तरह के समझौतों को मंजूरी देने की प्रक्रिया थोड़ी लंबी और जटिल होती है, जिसमें अलग-अलग संस्थाओं की भागीदारी होती है और इसमें लगभग एक साल का समय लग सकता है.
अनुमोदन किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया होती है. इस चरण में दोनों पक्ष आधिकारिक रूप से यह स्वीकार करते हैं कि वे समझौते में तय किए गए नियमों और शर्तों का पालन करेंगे. जब यह प्रक्रिया पूरी हो जाती है, तब समझौता औपचारिक रूप से लागू हो जाता है और उसके नियम दोनों पक्षों पर प्रभावी रूप से लागू होने लगते हैं. भारत में व्यापार समझौतों को आमतौर पर संसद की औपचारिक स्वीकृति के बजाय केंद्रीय मंत्रिमंडल की कार्यकारी मंजूरी के माध्यम से अनुमोदित किया जाता है. इस प्रक्रिया में वाणिज्य विभाग के नेतृत्व में विभिन्न मंत्रालयों के बीच परामर्श होता है, कानूनी और राजनीतिक पहलुओं के लिए विदेश मंत्रालय की स्वीकृति ली जाती है, और अंत में समझौते पर हस्ताक्षर से पहले मंत्रिमंडल की अंतिम मंजूरी प्राप्त की जाती है.
शिखर सम्मेलन की घोषणा और पाठ का प्रकाशन केवल वार्ताओं के समापन को दर्शाता है-अब प्रश्न यह है कि इस समझौते का अनुमोदन कब होगा और यह वास्तव में कब लागू होगा.
इसके विपरीत, यूरोप में किसी भी व्यापार समझौते को मंजूरी देने की प्रक्रिया काफी जटिल और समय लेने वाली होती है. यहाँ समझौते को लागू करने से पहले कई संस्थाओं और सदस्य देशों की स्वीकृति जरूरी होती है, इसलिए इसमें अक्सर लंबा समय लग जाता है. कई बार ऐसा भी हुआ है कि कुछ समझौते इसी चरण में अटक गए या कई वर्षों तक पूरे नहीं हो पाए. उदाहरण के लिए, व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौता (CETA) को 2016 में राजनीतिक स्तर पर मंजूरी मिल गई थी, लेकिन इसके बाद भी इसे पूरी तरह लागू होने में काफी समय लगा. मार्च 2026 तक भी यह समझौता पूरी तरह लागू नहीं हो पाया, क्योंकि यूरोपीय संघ के दस सदस्य देश अभी भी इसे पूरी तरह मंजूरी देने की प्रक्रिया में हैं.
इसी तरह यूरोपीय संघ-मर्कोसुर मुक्त व्यापार समझौता (ब्राज़ील, अर्जेंटीना, पैराग्वे और उरुग्वे के दक्षिण अमेरिकी समूह के साथ समझौता) पर 2024 में राजनीतिक सहमति बनी थी, लेकिन मार्च 2026 तक यह भी अनुमोदन से जुड़ी बाधाओं का सामना कर रहा है. जनवरी 2026 में यूरोपीय संसद ने इस समझौते की वैधता की जांच के लिए इसे यूरोपीय न्यायालय (ECJ) के पास भेजने के पक्ष में मतदान किया, जिससे इसकी मंजूरी की प्रक्रिया दो साल तक रुक सकती है.
CETA और ईयू–मर्कोसुर जैसे व्यापार समझौतों को मंजूरी मिलने में कई तरह की समस्याएं सामने आई थीं. इनमें कुछ दिक्कतें नीतियों से जुड़ी थीं, जबकि कुछ प्रक्रिया से संबंधित थीं. इसी वजह से इन समझौतों को लागू करने में काफी समय लगा. लेकिन भारत और यूरोपीय संघ के बीच होने वाले एफटीए के मामले में ऐसी प्रक्रियात्मक समस्या उतनी नहीं हैं. इसके अलावा, जिन मुद्दों पर पहले विवाद हुआ था-जैसे निवेशक-राज्य विवाद निपटान व्यवस्था या यूरोपीय किसानों पर कृषि प्रतिस्पर्धा का प्रभाव-वे भारत के साथ इस समझौते में ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हैं. इसलिए माना जा रहा है कि भारत-ईयू एफटीए को मंजूरी मिलने की प्रक्रिया पहले के कुछ समझौतों की तुलना में अपेक्षाकृत आसान और कम विवादित हो सकती है.
महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत के साथ एफटीए को ईयू संस्थाओं की ‘विशिष्ट अधिकारिता’ के अंतर्गत तैयार किया गया है. इसका अर्थ है कि इस समझौते का अनुमोदन ईयू स्तर पर ही होगा, जिसमें यूरोपीय आयोग, यूरोपीय परिषद और यूरोपीय संसद शामिल होंगी, और इसके लिए ईयू सदस्य देशों की राष्ट्रीय संसदों से अलग-अलग मंजूरी लेने की आवश्यकता नहीं होगी.
यह उम्मीद की जा सकती है कि भारत के साथ FTA की वार्ताओं के दौरान आयोग, सदस्य देशों और यूरोपीय संसद के बीच हुए करीबी समन्वय के कारण राजनीतिक निष्कर्ष के समय सभी पक्षों के बीच सहमति बनी हुई होगी. इसके बाद अनुमोदन की प्रक्रिया अपेक्षाकृत सुचारू रूप से लगभग एक वर्ष में पूरी हो सकती है.
यूरोपीय संघ (ईयू) के नियमों के अनुसार, दूसरे देशों के साथ अलग-अलग तरह के समझौते किए जा सकते हैं. कुछ समझौते ऐसे होते हैं जिनमें ईयू की संस्थाओं के साथ-साथ उसके सभी सदस्य देशों की भी जिम्मेदारी होती है. ऐसे समझौतों को ‘मिश्रित समझौते’ कहा जाता है. इन्हें लागू करने के लिए पहले ईयू स्तर पर और फिर हर सदस्य देश की मंजूरी लेना जरूरी होता है, इसलिए यह प्रक्रिया अक्सर लंबी और जटिल हो जाती है. हालाँकि ईयू कुछ समझौते केवल अपनी विशिष्ट अधिकारिता के अंतर्गत भी कर सकता है. ऐसे मामलों में समझौते ईयू की ओर से यूरोपीय आयोग द्वारा बातचीत करके तैयार किए जाते हैं और उनकी अनुमोदन प्रक्रिया यूरोपीय संघ के कामकाज पर संधि (TFईयू) के अनुच्छेद 218 के तहत तय होती है.
इस प्रक्रिया में पहले यूरोपीय आयोग परिषद से यह अनुमति मांगता है कि वह किसी व्यापारिक साझेदार के साथ वार्ता शुरू कर सके. परिषद से मिले अधिकार के आधार पर आयोग वार्ता करता है और पूरे समय परिषद की व्यापार नीति समिति के साथ समन्वय बनाए रखता है. आयोग यूरोपीय संसद को भी पूरी जानकारी देता है और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों के साथ बैठकें करता है. वार्ता पूरी होने के बाद आयोग समझौते को परिषद और संसद के सामने प्रस्तुत करता है, जिसके बाद परिषद आयोग को समझौते पर हस्ताक्षर करने की अनुमति देती है. ऐसे व्यापार समझौतों के लागू होने से पहले संसद की स्वीकृति भी आवश्यक होती है. संसद के लिए गुणवत्ता मानक अक्सर एक महत्वपूर्ण मुद्दा होते हैं और यदि किसी समझौते से इन मानकों में कमी आती है तो संसद उसे अस्वीकार भी कर सकती है. उदाहरण के लिए, 2012 में यूरोपीय संसद ने जालसाजी विरोधी व्यापार समझौता (ACTA) को अस्वीकार कर दिया था.
कुल मिलाकर यह प्रक्रिया उन स्थितियों की तुलना में काफी सरल और कम समय लेने वाली है, जिनमें ईयू के सभी 27 सदस्य देशों को अपनी-अपनी संवैधानिक प्रक्रियाओं के अनुसार अलग-अलग मंजूरी देनी पड़ती है. आमतौर पर यह उम्मीद की जा सकती है कि भारत के साथ FTA की वार्ताओं के दौरान आयोग, सदस्य देशों और यूरोपीय संसद के बीच हुए करीबी समन्वय के कारण राजनीतिक निष्कर्ष के समय सभी पक्षों के बीच सहमति बनी हुई होगी. इसके बाद अनुमोदन की प्रक्रिया अपेक्षाकृत सुचारू रूप से लगभग एक वर्ष में पूरी हो सकती है.
हालांकि कुछ चुनौतियां भी हो सकती हैं. उदाहरण के लिए, भारत-ईयू एफटीए में कृषि बाजार तक व्यापक पहुँच या निवेशक-राज्य विवाद निपटान तंत्र जैसे मुद्दे शामिल नहीं हैं, इसलिए इन विषयों को लेकर यूरोप में विरोध की संभावना कम है.
नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में अपनाए गए ‘2030 की ओर: संयुक्त यूरोपीय संघ-भारत व्यापक रणनीतिक एजेंडा‘ दस्तावेज़ में भी इस साझेदारी को आगे बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें समृद्धि और स्थिरता को साझा उद्देश्य बताया गया है.
फिर भी यह एक बड़ा समझौता है और इसकी कुछ अन्य महत्वपूर्ण धाराएं भी हैं. चूँकि इसकी वार्ताएँ अपेक्षाकृत तेज़ी से पूरी हुई हैं, इसलिए संभव है कि समझौते का पूरा पाठ प्रकाशित होने के बाद यूरोप के विभिन्न हित समूहों में इसके प्रति अधिक रुचि और चर्चा शुरू हो जाए, विशेषकर यूरोपीय संसद में. एक संभावित चिंता का विषय जलवायु परिवर्तन भी हो सकता है. आमतौर पर ईयू के एफटीए में व्यापार और सतत विकास (TSD) से जुड़े मजबूत प्रावधान होते हैं, लेकिन भारत के साथ समझौते में यह प्रावधान अपेक्षाकृत कमजोर है, जिससे पर्यावरण समूहों और संसद के ग्रीन समूह में कुछ चिंता देखी जा रही है.
इसी संदर्भ में नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में दोनों पक्षों ने जलवायु कार्रवाई के लिए एक यूरोपीय संघ-भारत सहयोग मंच स्थापित करने पर सहमति जताई है, जिसे 2026 की पहली छमाही में शुरू किया जाना प्रस्तावित है. व्यापार विशेषज्ञ यह भी देखेंगे कि यह एफटीए विश्व व्यापार संगठन (WTO) में भारत की नीतियों को किस प्रकार प्रभावित करता है, विशेष रूप से विकास के लिए निवेश सुविधा (IFD) समझौते के संदर्भ में तथा मार्च 2026 में कैमरून के याओंडे में होने वाले डब्ल्यूटीओ मंत्रीस्तरीय सम्मेलन (MC14) में.
ये सभी उदाहरण बताते हैं कि एफटीए का अनुमोदन कोई अलग-थलग प्रक्रिया नहीं होगा. यह समझौता ईयू-भारत संबंधों के व्यापक ढांचे का हिस्सा है. नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में अपनाए गए ‘2030 की ओर: संयुक्त यूरोपीय संघ-भारत व्यापक रणनीतिक एजेंडा‘ दस्तावेज़ में भी इस साझेदारी को आगे बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें समृद्धि और स्थिरता को साझा उद्देश्य बताया गया है. यूरोपीय संसद और यूरो-लेक्स दोनों ही यूरोपीय संघ के मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) की वार्ता और अनुमोदन प्रक्रिया के बारे में स्पष्ट और विस्तृत जानकारी तथा संक्षिप्त विवरण प्रकाशित करते हैं. इनके माध्यम से यह समझना आसान हो जाता है कि यूरोपीय संघ में किसी व्यापार समझौते पर बातचीत कैसे होती है और उसे लागू करने के लिए किन-किन चरणों से गुजरना पड़ता है.
कुल मिलाकर यह मानने की आवश्यकता नहीं है कि अनुमोदन की प्रक्रिया के दौरान होने वाली चर्चा या जांच से भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता (भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता) पटरी से उतर जाएगा. वास्तव में, यूरोपीय संघ की संस्थाएँ और नागरिक समाज खुले और विचार-विमर्श आधारित निर्णय-प्रक्रिया के प्रति प्रतिबद्ध हैं. ऐसी प्रक्रियाओं में अक्सर गहन बहस, अलग-अलग विचार, चुनौतियाँ और मीडिया में सुर्खियां देखने को मिलती हैं, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था का सामान्य हिस्सा हैं. इसी विचार-विमर्श की प्रक्रिया के माध्यम से यूरोपीय संघ के लक्ष्यों और हितों को लेकर व्यापक समझ और मजबूत सहमति भी बनती है. यह सहमति भविष्य में बहुत महत्वपूर्ण साबित होगी, क्योंकि भारत और यूरोपीय संघ अपने द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाते हुए निवेश समझौते से जुड़ी अगली वार्ताओं की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं.
जेसी स्कॉट ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर फेलो हैं, साथ ही 2019 से बर्लिन के हर्टी स्कूल में सहायक प्रोफेसर भी हैं.
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Professor Jesse Scott is a Senior Fellow at the Observer Research Foundation, as well as adjunct faculty at the Hertie School in Berlin since 2019. ...
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