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Published on May 12, 2026 Updated 1 Days ago

ब्रिटेन के NHS में 5.7 करोड़ लोगों के स्वास्थ्य डेटा को एआई प्लेटफॉर्म से जोड़ने की योजना ने दुनिया भर में बहस छेड़ दी है. सवाल यह है कि भविष्य में अस्पताल डॉक्टर चलाएंगे या डेटा और एल्गोरिदम नियंत्रित करने वाली बड़ी टेक कंपनियां- जानिए इस बदलती हेल्थ टेक दुनिया की पूरी कहानी.

NHS से भारत तक: हेल्थ एआई पर बढ़ती बहस

आधुनिक अस्पताल तेजी से ऐसे स्थान में बदल रहे हैं, जहाँ स्वास्थ्य सेवाओं का संचालन अब कोड और एल्गोरिद्म के आधार पर पुनर्गठित किया जा रहा है. इंग्लैंड में यह बदलाव राजनीतिक स्वरूप भी ले चुका है, क्योंकि एनएचएस इंग्लैंड के फेडरेटेड डेटा प्लेटफॉर्म (FDP) में पालंटिर की भूमिका को लेकर विवाद बढ़ा है. इस प्रणाली का उद्देश्य अस्पतालों के डेटा को जोड़ना, स्वास्थ्य योजना को बेहतर बनाना, प्रतीक्षा सूचियों को कम करना और स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाना है. इंग्लैंड की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था, नेशनल हेल्थ सर्विस (NHS), का कहना है कि मरीजों का डेटा सार्वजनिक नियंत्रण में ही रहेगा. फिर भी विवाद इसलिए बना हुआ है क्योंकि मामला केवल डेटा सुरक्षा तक सीमित नहीं है. किसी भी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की नींव विश्वास पर टिकी होती है, और यह विश्वास तब कमजोर पड़ने लगता है जब उसके केंद्र में मौजूद सॉफ्टवेयर ऐसी कंपनी द्वारा उपलब्ध कराया जाए जिसकी पहचान रक्षा, खुफिया और निगरानी से जुड़े कार्यों से बनी हो.

यह दिखाता है कि बड़ी एआई कंपनियाँ अब सार्वजनिक और संवेदनशील क्षेत्रों में तेजी से प्रभाव बढ़ा रही हैं. तो भारत को यह पूछना होगा कि उसका ऑपरेटिंग सिस्टम कौन लिख रहा है. एआई संप्रभुता की शुरुआत इसी प्रश्न से होती है, क्योंकि कोई भी स्वास्थ्य प्रणाली वास्तव में सार्वजनिक नहीं रह सकती यदि उसकी मूल कार्यप्रणाली सार्वजनिक नियंत्रण से बाहर निर्मित हो रही हो.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की चेतावनी दिखाती है कि विदेशी एआई पर निर्भर अस्पताल और स्वास्थ्य प्रणालियाँ अब साइबर खतरे और सुरक्षा जोखिम का कारण बन सकती हैं. Google DeepMind पहले ही भारत सरकार और स्थानीय संस्थानों के साथ विज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में साझेदारियों की घोषणा कर चुका है. यह दिखाता है कि बड़ी एआई कंपनियाँ अब सार्वजनिक और संवेदनशील क्षेत्रों में तेजी से प्रभाव बढ़ा रही हैं. तो भारत को यह पूछना होगा कि उसका ऑपरेटिंग सिस्टम कौन लिख रहा है. एआई संप्रभुता की शुरुआत इसी प्रश्न से होती है, क्योंकि कोई भी स्वास्थ्य प्रणाली वास्तव में सार्वजनिक नहीं रह सकती यदि उसकी मूल कार्यप्रणाली सार्वजनिक नियंत्रण से बाहर निर्मित हो रही हो.

क्या हेल्थ डेटा सुरक्षित हाथों में है?

एनएचएस से जुड़ा विवाद सबसे पहले उसके विशाल आकार और दायरे से शुरू होता है. एनएचएस इंग्लैंड की एक अलग सिक्योर डेटा एनवायरनमेंट परियोजना, फोरसाइट एआई इस पूरे तंत्र के पैमाने का अंदाजा देती है. इसमें 5.7 करोड़ से अधिक लोगों के डी-आइडेंटिफाइड रिकॉर्ड, 10 अरब से अधिक स्वास्थ्य घटनाएँ और भर्ती, निदान, प्रक्रियाओं, दवाओं तथा टीकाकरण से जुड़े 40,000 से अधिक प्रकार के डेटा शामिल हैं. पालंटिर-नेतृत्व वाले समूह ने 2023 में एफडीपी का अनुबंध जीता, जिसकी कीमत सात वर्षों में 33 करोड़ पाउंड तक हो सकती है और जिसका दायरा 240 एनएचएस संगठनों तक फैल सकता है.

एनएचएस इंग्लैंड ने इस व्यवस्था को लेकर स्पष्ट सीमाएँ तय करने की कोशिश की है. पालंटिर को केवल ‘डेटा प्रोसेसर‘ बताया गया है. डेटा सुरक्षा के नियम मौजूद हैं, लेकिन निजी तकनीक पर ज्यादा भरोसा बढ़ने से धीरे-धीरे सरकार का नियंत्रण कम हो सकता है. पालंटिर को लेकर चिंता इसलिए भी बढ़ती है क्योंकि कंपनी पहले खुफिया और सुरक्षा से जुड़े कामों में रही है, इसलिए स्वास्थ्य क्षेत्र उसकी एंट्री को राजनीतिक रूप से संवेदनशील बनाता है, भले ही अनुबंध की शर्तें सीमित क्यों न हों. हाल ही में कंपनी की घोषणापत्र जैसी भाषा को वेस्टमिंस्टर में ‘किसी सुपरविलेन की बड़बड़ाहट‘ कहा गया था. यह विवाद इसलिए प्रभावी हुआ क्योंकि उसने देखभाल-आधारित संस्थानों में ‘हार्ड-पावर टेक्नोलॉजी’ की मानसिकता लाए जाने को लेकर व्यापक असहजता को सामने ला दिया. ऑस्ट्रेलिया में पालंटिर के सरकारी अनुबंधों की ऑडिट या सीमित करने की मांग यह दिखाती है कि यह चिंता अब अन्य लोकतंत्रों में भी फैल रही है.

लोगों को चिंता है कि उनकी निजी जानकारी ऐसी कंपनी के सिस्टम में जा सकती है, जिस पर वे पूरी तरह भरोसा नहीं करते. ‘नो पालंटिर इन आवर एनएचएस‘ अभियान ने एनएचएस ट्रस्ट्स और इंटीग्रेटेड केयर बोर्ड्स से अपील की है कि वे कंपनी के व्यापक सैन्य और सुरक्षा कार्यों को देखते हुए पालंटिर की तकनीक को अस्वीकार करें.

जब एनएचएस ने पहली बार पालंटिर का अनुबंध सार्वजनिक किया, तब उसकी 586 पृष्ठों में से 417 पृष्ठ पूरी तरह ब्लैकआउट कर दिए गए थे. इसके बाद गुड लॉ प्रोजेक्ट ने इतनी व्यापक गोपनीयता के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की. बाद में एनएचएस ने कम संशोधनों के साथ अनुबंध को दोबारा प्रकाशित करने पर सहमति जताई, जिसमें व्यक्तिगत डेटा सुरक्षा से जुड़ी सामग्री भी शामिल थी. लेकिन जिस प्लेटफॉर्म की सफलता सार्वजनिक विश्वास पर निर्भर हो, उसके लिए यह शुरुआत काफी नुकसानदेह साबित हुई.

पालंटिर के खिलाफ हो रहा विरोध सिर्फ निजी तकनीक के विरोध तक सीमित नहीं है. कई सामाजिक संगठनों और अभियान चलाने वाले समूहों का कहना है कि एनएचएस ऐसी डेटा व्यवस्था बना रहा है, जिसके लिए लोगों की सही सहमति और भरोसा नहीं लिया गया. उनका मानना है कि स्वास्थ्य से जुड़ी इतनी बड़ी व्यवस्था में जनता की राय और विश्वास बहुत जरूरी है. लोगों को चिंता है कि उनकी निजी जानकारी ऐसी कंपनी के सिस्टम में जा सकती है, जिस पर वे पूरी तरह भरोसा नहीं करते. ‘नो पालंटिर इन आवर एनएचएस‘ अभियान ने एनएचएस ट्रस्ट्स और इंटीग्रेटेड केयर बोर्ड्स से अपील की है कि वे कंपनी के व्यापक सैन्य और सुरक्षा कार्यों को देखते हुए पालंटिर की तकनीक को अस्वीकार करें. मेडैक्ट (Medact) के अनुसार, ब्रिटिश मेडिकल एसोसिएशन (BMA) ने अपनी 2025 की वार्षिक बैठक में एफडीपी (FDP) के विस्तार का विरोध किया था. वहीं संसद को भेजी गई एक सार्वजनिक याचिका में आगे विस्तार से पहले व्यापक परामर्श और स्पष्ट राष्ट्रीय ‘ऑप्ट-आउट’ व्यवस्था की मांग की गई.

सरकार की ओर से कहा गया कि ‘नेशनल डेटा ऑप्ट-आउट’ उन स्थितियों में लागू नहीं होता, जहाँ डेटा प्रोसेसिंग ‘प्रत्यक्ष उपचार, कानूनी आवश्यकता या अनामिकरण’ से जुड़ी हो. मरीज बेहतर इलाज के लिए अपनी जानकारी अस्पतालों और डॉक्टरों के बीच साझा होने को मान सकता है. लेकिन वह यह जरूरी नहीं मानता कि उसका डेटा ऐसी कंपनी के सिस्टम में जाए, जिसका संबंध पहले निगरानी, सुरक्षा या सैन्य कामों से रहा हो. लोगों को डर होता है कि उनके स्वास्थ्य डेटा का गलत इस्तेमाल हो सकता है, इसलिए सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में भरोसा बहुत जरूरी है.

स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई से जुड़ी अन्य विफलताएँ भी दिखाती हैं कि यह क्षेत्र कितना संवेदनशील और नाजुक है. डीपमाइंड के रॉयल फ्री प्रकरण में 16 लाख मरीजों के रिकॉर्ड तक पहुँच शामिल थी, जिस पर बाद में ब्रिटेन के सूचना आयुक्त ने पारदर्शिता और कानूनी आधार को लेकर आलोचना की. अमेरिका के अस्पतालों में इस्तेमाल किए गए एपिक सेप्सिस मॉडल ने स्वतंत्र परीक्षणों में कमजोर प्रदर्शन किया. 38,455 अस्पताल भर्ती मामलों पर आधारित एक वैलिडेशन अध्ययन में इसका एयूसी (AUC) स्कोर केवल 0.63 दर्ज किया गया. इसी तरह सिग्ना के PxDx सिस्टम ने एक और जोखिम उजागर किया, जहाँ रिपोर्टों के अनुसार दो महीनों में 3 लाख से अधिक दावों को औसतन 1.2 सेकंड प्रति केस की गति से अस्वीकार कर दिया गया. भारत को स्वास्थ्य एआई को केवल सुविधा नहीं, बल्कि उससे बढ़ने वाली निर्भरता और नियंत्रण के नजरिए से भी देखना चाहिए.

हेल्थकेयर में नई एआई चुनौती  

भारत के पास यह सुविधा नहीं है कि वह स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई को भविष्य की नियामकीय समस्या मानकर टाल दे. बाजार पहले ही राज्य से तेज़ी से मरीजों की प्रारंभिक अनिश्चितता तक पहुँच चुका है. बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG) के 15 देशों में किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि इंटरनेट से जुड़े लगभग 60 प्रतिशत उपभोक्ता स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के लिए एआई टूल्स का उपयोग कर रहे थे, जबकि इसी अध्ययन की एक रिपोर्ट में भारत का आँकड़ा 85 प्रतिशत बताया गया. मरीज अब चिकित्सकों के पास जाने से पहले अपनी स्वास्थ्य संबंधी शंकाएँ सॉफ्टवेयर से पूछ रहे हैं.

भारत को बाहरी तकनीकी मदद की जरूरत होगी, लेकिन स्वास्थ्य सेवाएँ ऐसे सिस्टम पर निर्भर नहीं होनी चाहिए जिन्हें सरकार समझ या नियंत्रित न कर सके. नियामकों को एआई प्लेटफॉर्म की कार्यप्रणाली समझनी चाहिए और मरीजों को गलत फैसलों के खिलाफ शिकायत करने का अधिकार मिलना चाहिए. वरना बढ़ती तकनीकी निर्भरता बाद में बड़ा जोखिम बन सकती है.

बड़ी तकनीकी कंपनियाँ भी इस क्षेत्र में तेजी से प्रवेश कर रही हैं. OpenAI ने ‘चैटजीपीटी हेल्थ‘ पेश किया, यह बताते हुए कि हर सप्ताह 23 करोड़ से अधिक स्वास्थ्य-संबंधी प्रश्न पूछे जाते हैं. इसके साथ उपयोगकर्ताओं को अपने मेडिकल रिकॉर्ड और वेलनेस ऐप्स जोड़ने की सुविधा भी दी गई. गूगल डीपमाइंड का मेडजेम्मा पहले ही अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के साथ आउटपेशेंट ट्रायेज और त्वचा रोग जांच पर काम कर रहा है. वहीं गूगल, राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण के साथ मिलकर बिखरे हुए मेडिकल रिकॉर्ड को एफएचआईआर (FHIR) मानक में बदलने पर काम कर रहा है, जिससे स्वास्थ्य प्रणालियों के बीच डेटा साझा करना आसान हो सके.

माइक्रोसॉफ्ट के एआई डायग्नोस्टिक ऑर्केस्ट्रेटर (MAI-DxO) ने जटिल एनईजेएम (NEJM) मामलों में OpenAI के o3 मॉडल के साथ मिलकर 85.5 प्रतिशत सटीकता दर दर्ज की, जबकि उसी परीक्षण में चिकित्सकों की सटीकता केवल 20 प्रतिशत रही. ये आँकड़े दिखाते हैं कि मरीजों की चिंता और चिकित्सकीय निर्णय के बीच एक नई डिजिटल परत तैयार हो रही है. जो भी इस परत को नियंत्रित करेगा, वही यह तय करेगा कि लोग जोखिम और उपचार की आवश्यकता को कैसे समझते हैं.

भारत ने सुरक्षा उपायों की शुरुआत तो कर दी है, लेकिन अब उन्हें बाध्यकारी बनाना होगा. ‘स्ट्रेटेजी फॉर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इन हेल्थकेयर फॉर इंडिया’ (SAHI) नीति ढाँचा प्रदान करता है, जबकि आईआईटी कानपुर और राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (NHA) द्वारा शुरू किया गया ‘बेंचमार्किंग ओपन डेटा प्लेटफॉर्म फॉर हेल्थ एआई’ (BODH) विविध अनामिक वास्तविक स्वास्थ्य डेटा पर एआई मॉडलों के परीक्षण का रास्ता तैयार करता है. किसी भी एआई सिस्टम को सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने से पहले उसकी सही और जरूरी जांच करना अनिवार्य होना चाहिए.

स्वास्थ्य एआई सिस्टम लेते समय सरकार को पूरी सावधानी रखनी चाहिए. विदेशी कंपनियों को तभी अनुमति मिले जब उनका डेटा इस्तेमाल और काम करने का तरीका साफ हो. डेटा के गलत उपयोग पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए. अस्पताल जरूरत पड़ने पर आसानी से दूसरा सिस्टम अपना सकें. मरीजों के लिए एआई टूल भारतीय भाषाओं में काम करें और किसी गलती पर शिकायत करने का आसान तरीका भी हो. 

स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई संप्रभुता का मतलब विदेशी तकनीक को पूरी तरह रोकना नहीं है. भारत को बाहरी तकनीकी मदद की जरूरत होगी, लेकिन स्वास्थ्य सेवाएँ ऐसे सिस्टम पर निर्भर नहीं होनी चाहिए जिन्हें सरकार समझ या नियंत्रित न कर सके. नियामकों को एआई प्लेटफॉर्म की कार्यप्रणाली समझनी चाहिए और मरीजों को गलत फैसलों के खिलाफ शिकायत करने का अधिकार मिलना चाहिए. वरना बढ़ती तकनीकी निर्भरता बाद में बड़ा जोखिम बन सकती है.


के.एस. उपलाभ गोपाल ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में हेल्थ इनिशिएटिव के एसोसिएट फेलो हैं.
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Author

K. S. Uplabdh Gopal

K. S. Uplabdh Gopal

Dr. K. S. Uplabdh Gopal is an Associate Fellow with the Health Initiative at the Observer Research Foundation. He writes and researches on how India’s ...

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