होर्मुज़ में तनाव ने दक्षिण कोरिया की ऊर्जा ‘लाइफ़लाइन’ पर सीधा असर डाला- तेल से लेकर चिप उद्योग तक सब दबाव में आ गए. समझते हैं कि क्यों यह संकट सियोल के लिए बड़ी चेतावनी बन गया है और अब उसे किन नए ऊर्जा स्रोतों व रणनीतियों पर ध्यान देना होगा.
होर्मुज़ संकट ने एशियाई देशों को बुरी तरह प्रभावित किया है क्योंकि ऊर्जा सुरक्षा के लिए खाड़ी देशों पर उनकी निर्भरता बढ़ रही है. इससे सबसे अधिक परेशान दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशियाई देश हैं लेकिन इस क्षेत्र के अन्य देश भी आपूर्ति शृंखला में रुकावटों के कारण कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. सर्वाधिक प्रभावित देशों में दक्षिण कोरिया भी शामिल है जो ऊर्जा और आपूर्ति संकट से लगातार जूझ रहा है. इससे उसकी आर्थिक सुरक्षा और विकास ख़तरे में पड़ गई है, जिसके गंभीर नतीजे निकल सकते हैं. हालांकि, यह दक्षिण कोरिया के लिए एक मौका भी है कि वह अपनी ऊर्जा-संबंधी नीतियों और साझेदारियों पर फिर से गौर करे.
कई एशियाई देशों की तरह, दक्षिण कोरिया भी कच्चे तेल के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है. अनुमान है कि वह अपनी ज़रूरत का 70.7 प्रतिशत कच्चा तेल और 20.4 प्रतिशत एलएनजी पश्चिम एशिया से ही मंगवाता है. अमेरिका-ईरान संघर्ष के कारण कई विदेशी कंपनियों ने ‘फोर्स मेज्योर’ (अपरिहार्य घटना) का हवाला दिया है, जिस कारण आपूर्ति शृंखला बाधित हुई है. इससे महत्वपूर्ण औद्योगिक गतिविधियां प्रभावित हुई हैं और पूरे देश में चिंताएं बढ़ गई हैं.
सर्वाधिक प्रभावित देशों में दक्षिण कोरिया भी शामिल है जो ऊर्जा और आपूर्ति संकट से लगातार जूझ रहा है. इससे उसकी आर्थिक सुरक्षा और विकास ख़तरे में पड़ गई है, जिसके गंभीर नतीजे निकल सकते हैं. हालांकि, यह दक्षिण कोरिया के लिए एक मौका भी है कि वह अपनी ऊर्जा-संबंधी नीतियों और साझेदारियों पर फिर से गौर करे.
नेफ्था और हीलियम गैस पर निर्भर उद्योग भी दबाव में हैं. नेफ्था पेट्रोकेमिकल क्षेत्र का एक प्रमुख कच्चा माल है, जिसे ‘उद्योग का चावल’ भी कहा जाता है. दक्षिण कोरिया अपनी ज़रूरत का लगभग 45 प्रतिशत नेफ्था आयात करता है और अब इसकी कमी होने लगी है. उधर, हीलियम के आयात में आई रुकावटों ने एआई उद्योग में चिंताएं बढ़ा दी हैं. यह वह गैस है, जिसका इस्तेमाल सेमीकंडक्टर चिप उद्योग में होता है. 2025 में कोरिया ने लगभग दो-तिहाई हीलियम का आयात कतर के रास लाफ़ान औद्योगिक परिसर से किया था. हालांकि, अभी कोरिया के पास इसका पर्याप्त भंडार है, जो जून तक की ज़रूरतें पूरी कर सकता है.
होर्मुज़ संकट को देखते हुए, सरकारी कर्मचारियों के लिए पहले से ही निर्देश जारी किए जा चुके हैं, जिनको अब आम नागरिकों पर भी लागू करने की तैयारी चल रही है, जैसे- गाड़ी चलाने पर रोक लगाना. आपूर्ति शृंखला में आई रुकावटों का प्रभाव उर्वरक, प्लास्टिक, एल्यूमीनियम और ऑटोमोबाइल निर्यात सहित अन्य दूसरे क्षेत्रों में दिखने लगा है. शेयर बाज़ार में भी हलचल तेज़ है और डॉलर के मुकाबले कोरियाई वॉन कमज़ोर हो गया है. कोरियाई नीति-निर्माता ईरान द्वारा होर्मुज़ से गुजरने वाले जहाज़ों से 20 लाख डॉलर प्रति जहाज़ वसूलने वाली घोषणा से चिंतित हैं. यदि यह व्यवस्था स्थायी हो जाती है, तो तेल की क़ीमतों, लॉजिस्टिक, बीमा लागत और उद्योगों के संचालन व लाभ पर बड़ा असर पड़ेगा.
अन्य सभी क्षेत्र भी इनसे प्रभावित हो सकती हैं. अगर महंगाई, तेल की क़ीमतें और विनिमय दरें ज़्यादा बनी रहीं, तो ‘स्टैगफ्लेशन’ की आशंका बढ़ जाएगी, यानी वह स्थिति, जिसमें महंगाई ज़्यादा रहेगी, आर्थिक वृद्धि कमज़ोर हो जाएगी और बेरोज़गारी अधिक दिखेगी. इससे आर्थिक सुरक्षा पर ख़तरा बढ़ सकता है और मुद्रास्फीति अधिक हो सकती है. हालांकि, इस संकट ने दक्षिण कोरिया को अपनी कुछ नीतियों पर फिर से विचार करने का मौका भी दिया है.
ऊर्जा क्षेत्र की बात करें, तो संकट के दौरान सरकार ने कोयला और परमाणु ऊर्जा नीति में कई बदलाव किए हैं. परमाणु ऊर्जा का उपयोग 70 प्रतिशत से बढ़ाकर करीब 80 प्रतिशत कर दिया गया है और जून की शुरुआत तक पांच अन्य इकाइयों को भी फिर से शुरू करने का फैसला लिया गया है. इसी तरह, कोयला आधारित बिजली उत्पादन की 80 प्रतिशत की सीमा को हटा लिया गया है, ताकि ऊर्जा आपूर्ति बढ़ाई जा सके.
शेयर बाज़ार में भी हलचल तेज़ है और डॉलर के मुकाबले कोरियाई वॉन कमज़ोर हो गया है. कोरियाई नीति-निर्माता ईरान द्वारा होर्मुज़ से गुजरने वाले जहाज़ों से 20 लाख डॉलर प्रति जहाज़ वसूलने वाली घोषणा से चिंतित हैं. यदि यह व्यवस्था स्थायी हो जाती है, तो तेल की क़ीमतों, लॉजिस्टिक, बीमा लागत और उद्योगों के संचालन व लाभ पर बड़ा असर पड़ेगा.
दो महीने का तेल भंडार रहने के कारण दक्षिण कोरिया ने अफ्रीका, अमेरिका और मध्य एशियाई देशों की ओर रुख़ किया है, ताकि कच्चे तेल के अन्य स्रोत तलाशे जा सकें. इस बीच, उसने 24 मिलियन बैरल कच्चा तेल जुटा लिया है, जिसमें से 6 मिलियन बैरल की आपूर्ति मध्य अप्रैल तक संयुक्त अरब अमीरात से होने की उम्मीद है. सरकार ने एक अस्थायी उपाय के रूप में तेल की अदला-बदली कार्यक्रम की भी घोषणा की है, जिसके तहत भविष्य में आपूर्ति की शर्त पर रिफाइनरियों को अभी कच्चे तेल का भंडार उधार दिया जा रहा है. रूस से कच्चे तेल की ज़रूरत पूरी करने में भले सफलता नहीं मिल सकी, पर सियोल ने 2022 के बाद पहली बार 27,000 टन रूसी नेफ्था का सफलतापूर्वक आयात किया है. दक्षिण कोरिया ने नेफ्था देने का अनुरोध भारत से भी किया है. इसके अलावा, उसने अपने निर्यात पर पांच महीने का प्रतिबंध लगा दिया है. आर्थिक झटकों से उबरने के लिए राष्ट्रपति ने कई उपायों की घोषणा की है, जिनमें 3.58 करोड़ आम लोगों को 48 लाख वॉन की नकद सहायता पहुंचाना भी शामिल है. यह आमदनी के लिहाज़ से निचले 70 प्रतिशत लोगों को दी जाएगी. इसके अलावा, ईंधन की क़ीमतों पर नियंत्रण के लिए 5 ट्रिलियन वॉन, युवा स्टार्टअप और रोज़गार सहायता के लिए 1.9 ट्रिलियन वॉन, स्थानीय स्तर की सरकारों की आर्थिक ज़रूरतों के लिए 9.7 ट्रिलियन वॉन और सरकारी बॉन्ड के पुनर्भुगतान के लिए 1 ट्रिलियन वॉन देने का एलान भी राष्ट्रपति ने किया है.
कोरियाई युद्ध की समाप्ति के बाद से दक्षिण कोरिया ने अपनी सैन्य और विदेश नीति को काफ़ी हद तक अमेरिका के साथ मिलकर आगे बढ़ाया है. इस साझेदारी के कारण सियोल को आर्थिक फ़ायदा मिला और उत्तर कोरिया के ख़िलाफ़ सैन्य बढ़त भी हासिल हुई. फिर भी, इस गठबंधन से उसे नुक़सान हुआ है, जिसमें हालिया होर्मुज़ संकट भी शामिल है. कोविड-19 महामारी की तरह, इस संकट ने भी दक्षिण कोरिया को अपनी ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा को फिर से परखने के लिए मजबूर किया है. अब वह अपनी आपूर्ति शृंखलाओं पर विचार कर सकता है, यानी यह संकट दक्षिण कोरिया और अमेरिका के रिश्ते को प्रभावित कर सकता है.
हिंद-प्रशांत के सहयोगियों की आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा की राष्ट्रपति ट्रंप की अनदेखी ने गठबंधन की कलई खोल दी है. अभी दक्षिण कोरियाई सरकार ऊर्जा संकट को दूर करने पर अपना ध्यान लगा रही है, लेकिन आश्चर्य नहीं कि ईरान युद्ध के कारण भविष्य में साझेदारियों को भी नए तरीक़े से तैयार किया जाएगा.
अमेरिका के बार-बार अनुरोध करने, धमकियां देने के बावजूद यूरोपीय और खाड़ी देशों ने ईरान के ख़िलाफ़ अपने युद्धपोत नहीं भेजे. यह घटनाक्रम संभवतः एक मिसाल बनेगा, जिससे सियोल को अपनी कूटनीतिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने और ताइवान जलमार्ग व उत्तर-पूर्वी एशिया में संघर्ष छिड़ने की स्थिति में रणनीति बनाने में मदद मिल सकेगी. इसी तरह, खाड़ी के अमेरिकी ठिकानों पर ईरान के हमलों को भी दक्षिण कोरिया नज़रंदाज़ नहीं कर रहा. भविष्य में किसी आपात स्थिति में दक्षिण कोरिया और अमेरिकी सेना की संभावित भूमिकाओं को तय करते वक़्त इसे ध्यान में रखा जा सकता है.
अमेरिका-ईरान युद्ध से दक्षिण कोरिया को कोई फ़ायदा तो नहीं हुआ, बल्कि इससे उसकी अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा पर लंबे समय तक ख़तरा जरूर पैदा हो गया है. इसके अलावा, हिंद-प्रशांत के सहयोगियों की आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा की राष्ट्रपति ट्रंप की अनदेखी ने गठबंधन की कलई खोल दी है. अभी दक्षिण कोरियाई सरकार ऊर्जा संकट को दूर करने पर अपना ध्यान लगा रही है, लेकिन आश्चर्य नहीं कि ईरान युद्ध के कारण भविष्य में साझेदारियों को भी नए तरीक़े से तैयार किया जाएगा.
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Abhishek Sharma is a Junior Fellow with ORF’s Strategic Studies Programme. His research focuses on the Indo-Pacific regional security and geopolitical developments with a special ...
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