जहां मध्य पूर्व का बड़ा हिस्सा अब भी बंटा हुआ और अस्थिर बना हुआ है, वहीं खाड़ी देश उड्डयन, समुद्री शक्ति, आधुनिक बुनियादी ढांचे और डिजिटल नेटवर्क का इस्तेमाल कर कनेक्टिविटी को भू-राजनीतिक प्रभाव के नए स्रोत में बदल रहे हैं
यह लेख 'रायसीना एडिट 2026' श्रृंखला का हिस्सा है।
मई 2011 में अरब स्प्रिंग के चरम पर अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा विदेश विभाग में आए और उन्होंने बागी बनने वाली पीढ़ी की आकांक्षाओं को लेकर बात की. उथल-पुथल से जूझ रहे मध्य पूर्व का सर्वे करते हुए उन्होंने कहा कि जहां एक और “कुछ देश तेल एवं गैस के धन से समृद्ध हैं” वहीं ज्ञान और इनोवेशन से संचालित विश्व में “कोई भी विकास की रणनीति केवल ज़मीन से निकलने वाली चीज़ों पर आधारित नहीं हो सकती.”
एक दशक से ज़्यादा बीत जाने के बाद खाड़ी के अरब देशों ने उसका जवाब इस तरह से दिया है जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की होगी. उन्होंने ये जवाब क्रांति से नहीं बल्कि नई खोज से दिया है. व्यापक मध्य पूर्व का बड़ा हिस्सा जहां बंट गया है और एक व्यापक इलाका “अराजकता और चरमपंथ के लिए खुल गया है” (जैसा कि हेनरी किसिंजर ने लिखा था), वहीं खाड़ी देशों की राजधानी कमज़ोर और नाकाम देशों के बीच अच्छी जगह के रूप में उभरी हैं.
15 साल के भीतर खाड़ी देश आधुनिक इतिहास के सबसे महत्वाकांक्षी आर्थिक कायापलट की राह पर चल पड़े हैं. उन्होंने ख़ुद को वैश्विक व्यापार, पूंजी और प्रतिभा के चौराहे के रूप में पेश किया है. IMF के मुताबिक खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था 2026 में 4.2 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी जो 3.3 प्रतिशत के वैश्विक औसत से अधिक है. इसमें गैर-तेल सेक्टर का सबसे ज़्यादा योगदान होगा.
व्यापक मध्य पूर्व का बड़ा हिस्सा जहां बंट गया है और एक व्यापक इलाका “अराजकता और चरमपंथ के लिए खुल गया है”, वहीं खाड़ी देशों की राजधानी कमज़ोर और नाकाम देशों के बीच अच्छी जगह के रूप में उभरी हैं.
इसका नतीजा है एक सर्वव्यापी कनेक्टिविटी की व्यवस्था जो हवा, समुद्र और ज़मीन के द्वारा वैश्विक व्यापार को जोड़ती है. ओबामा के शब्दों ने न केवल 2011 की हताशा को उजागर किया बल्कि उसके बाद के दशक की राह को भी रेखांकित किया.
खाड़ी की सर्वव्यापी कनेक्टिविटी की कहानी के कई पहलुओं में उड्डयन सबसे ज़्यादा दिखता है और ये वाणिज्यिक रूप से सबसे प्रभावशाली है. इसके केंद्र में एमिरेट्स, क़तर एयरवेज़ और एतिहाद एयरवेज़ हैं. ये देश की ब्रांडिंग, आर्थिक विकास और वैश्विक पहुंच के सबसे शक्तिशाली साधन के रूप में काम कर रही हैं.
दुबई, दोहा और अबूधाबी को केंद्र बनाकर इन तीनों एयरलाइंस ने खाड़ी को दुनिया में पूर्व और पश्चिम को जोड़ने वाला सबसे महत्वपूर्ण कॉरिडोर बना दिया है. अक्टूबर 2025 में इन्होंने 10.5 प्रतिशत की दर से दुनिया के सभी क्षेत्रों में पैसेंजर ट्रैफिक में सबसे ज़्यादा सालाना बढ़ोतरी दर्ज की.
अफ्रीका में इनका रूट केवल वाणिज्यिक नहीं है बल्कि ये उनके इरादे बताते हैं. इन एयरलाइंस ने खामोशी से मानवीय भूमिका भी निभाई है.
उड्डयन भू-राजनीतिक सॉफ्ट पावर का एक साधन बन गया है. खाड़ी-अफ्रीका की धुरी शायद इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है. अफ्रीका में इनका रूट केवल वाणिज्यिक नहीं है बल्कि ये उनके इरादे बताते हैं. इन एयरलाइंस ने खामोशी से मानवीय भूमिका भी निभाई है. 2021 में अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिका की वापसी में क़तर एयरवेज़ शामिल थी और एमिरेट्स ने पिछले साल दिसंबर में श्रीलंका में दितवाह तूफान के बाद 100 टन से ज़्यादा राहत सामग्री पहुंचाई.
समुद्र में भी खाड़ी देशों की महत्वाकांक्षाएं कम चौंकाने वाली नहीं हैं. क़तर, सऊदी अरब और UAE ने तीन अलग-अलग रणनीतियों के माध्यम से ख़ुद को वैश्विक समुद्री नेटवर्क से जोड़ लिया है. पहली रणनीति है बंदरगाह की क्षमता. दुबई में जेबेल अली दुनिया के सबसे व्यस्त पोर्ट में से एक है जो इस क्षेत्र के समुद्री प्रभुत्व का आधार है. 2019 में शुरू सऊदी अरब के किंग अब्दुल्लाह पोर्ट ने 2021 तक दुनिया के सबसे कुशल कंटेनर बंदरगाह के रूप में स्थान प्राप्त करके अपनी एक अलग पहचान बनाई. वहीं क़तर के हमाद पोर्ट ने 2017 और 2021 के बीच अपनी कंटेनर क्षमता के दूसरे चरण का विस्तार किया.
दूसरी बात ये है कि तीनों देशों ने प्रमुख शिपिंग कंपनियों को आकर्षित करने के लिए आक्रामक कदम उठाए हैं. इसके पीछे दलील सीधी है: शिपिंग कंपनियां उन टर्मिनल के ज़रिए सेवा प्रदान करना पसंद करती हैं जहां परिचालन में उनकी हिस्सेदारी होती है. अबू धाबी के खलीफा पोर्ट को दुनिया की चार सबसे बड़ी शिपिंग कंपनियों में से तीन- CSP कॉस्को, MSC और CMA CGM- का साथ मिला है. दूसरी तरफ, दम्माम के किंग अब्दुलअज़ीज़ पोर्ट पर एवरग्रीन की ARPG सर्विस ने सऊदी अरब और एशिया के बड़े बंदरगाहों के बीच सीधा संपर्क बनाया है.
सऊदी की कंपनी रेड सी गेटवे टर्मिनल ने 22 साल के लिए बांग्लादेश में चटगांव के पतेंगा कंटेनर टर्मिनल के प्रबंधन और संचालन का अधिकार हासिल किया है. ये बंगाल की खाड़ी का सबसे व्यस्त कंटेनर पोर्ट है.
अपने समुद्री तटों के अलावा तीनों देशों ने वैश्विक बंदरगाहों में रणनीतिक पकड़ बनाने के लिए कदम उठाए हैं. डीपी वर्ल्ड ने 2019 में P&O के पोर्ट-टर्मिनल व्यवसाय का फिर से अधिग्रहण किया और क़तर ने क्रैमर होल्डिंग- रॉटरडम के कंटेनर टर्मिनल का संचालन करने वाली- में बहुमत का हिस्सा ख़रीदा. ये कोई निष्क्रिय निवेश नहीं हैं बल्कि वैश्विक व्यापार के केंद्र में जानबूझकर शामिल होना है. सऊदी अरब भी इसी रास्ते पर चला है. सऊदी की कंपनी रेड सी गेटवे टर्मिनल ने 22 साल के लिए बांग्लादेश में चटगांव के पतेंगा कंटेनर टर्मिनल के प्रबंधन और संचालन का अधिकार हासिल किया है. ये बंगाल की खाड़ी का सबसे व्यस्त कंटेनर पोर्ट है.
मिडिल ईस्ट में ज़मीनी संपर्क सबसे चुनौतीपूर्ण मोर्चा बना हुआ है. अनसुलझे संघर्षों और क्षेत्रीय विवादों के कारण बहुत ज़्यादा पैसा खर्च करने पर भी इससे पार पाना आसान नहीं है. फिर भी खाड़ी देशों ने इस स्थिति को बदलने की शुरुआत की है. बहरीन और सऊदी अरब के बीच प्रस्तावित दूसरा संपर्क मार्ग किंग हमाद एक्सप्रेसवे सड़क ढुलाई और रेल को एक ही गलियारे में जोड़ेगा. ये खाड़ी देशों के व्यापक रेलवे का हिस्सा है. 2,117 किलोमीटर लंबा ये नेटवर्क सभी छह खाड़ी देशों को जोड़ेगा और 2045 तक सालाना 95 मिलियन टन सामान का परिवहन करेगा. इसके अलावा शहरों के भीतर भी मेट्रो नेटवर्क को बढ़ावा दिया जा रहा है.
ठोस बुनियादी ढांचा अपने आप में कोई अंतिम लक्ष्य नहीं है. ये एक आधार है जिस पर अधिक महत्वाकांक्षी परत का निर्माण किया जा रहा है. रनवे और कंटेनर टर्मिनल के नीचे एक डिजिटल आर्किटेक्चर खामोशी से आकार ले रहा है. खाड़ी देशों के तटों पर मिलने वाले समुद्र के नीचे स्थित केबल नेटवर्क, हाइपरस्केल डाटा सेंटर और AI इंफ्रास्ट्रक्चर में 66 अरब अमेरिकी डॉलर निवेश करने वाले सॉवरेन वेल्थ फंड ऊर्जा की प्रचुरता को अगले ज़माने के लिए कंप्यूटिंग पावर में बदल रहे हैं.
उड्डयन, शिपिंग लेन, रेल कॉरिडोर और फाइबर केबल- इन सभी को मिलाकर खाड़ी देशों ने ख़ुद को ऊर्जा निर्यातकों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण साबित कर दिया है. अब वो दुनिया के सबसे प्रमुख परिवहन और लॉजिस्टिक केंद्र हैं.
अभी तक नहीं चुना गया रास्ता इस तस्वीर को और भी अधिक आकर्षक बना देता है. 2023 के G20 शिखर सम्मेलन के दौरान घोषित इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) तब से महत्वाकांक्षा और गतिरोध के बीच झूलता रहा है और उसी क्षेत्रीय अस्थिरता का बंधक बना हुआ है जिसकी पहचान ओबामा ने 2011 में की थी. खाड़ी देश इसके सबसे भरोसेमंद समर्थक बने हुए हैं. अगर व्यापक मध्य पूर्व में स्थायी शांति स्थापित हो जाती है तो IMEC इस बात की सबसे स्पष्ट झलक पेश करता है कि बेहद तेज़ रफ्तार से चलने वाली कनेक्टिविटी क्या प्रदान कर सकती है.
क्लेमेंस चाय ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन मिडिल ईस्ट में भू-राजनीति के वरिष्ठ फेलो हैं.
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Dr Clemens Chay is Senior Fellow for Geopolitics at ORF Middle East. His research focuses on the history and politics of the Gulf Arab states ...
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