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Published on Jan 09, 2026 Updated 0 Hours ago

भारत में बुज़ुर्ग मतदाताओं की बढ़ती ताक़त चुनावी समीकरण बदल रही है. शायद इसीलिए पार्टियां अभी से पेंशन, स्वास्थ्य और देखभाल जैसे मुद्दों पर ज़ोर दे रही हैं. पढ़ें, आने वाले चुनावों में राजनीति में कौन से मुद्दे जगह बना पाएंगे?

चुनाव 2026: चुनावी बहसों का नया चेहरा - बुजुर्ग?

लंबे समय से भारत की सामाजिक नीति में वृद्धावस्था को पारिवारिक मसला और पेंशन को सांकेतिक मुद्दा माना जाता रहा है. चुनावी नज़रिये से यह एक गलत सोच साबित हो सकती है. साल 2026 में असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव होने हैं. यहां पार्टियों की परख उनकी कल्याणकारी योजनाओं के आधार पर हो सकती है क्योंकि बढ़ती उम्र के कारण यहां लोगों की उम्मीदें पहले से ही बदल रही हैं. 

देश में 60 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों की संख्या 2001 में 7.6 करोड़ थी, जो 2011 में बढ़कर 10.3 करोड़ हो गई. 2011 में कुल आबादी में बुज़ुर्गों की हिस्सेदारी 8.6 प्रतिशत थी, जो 2026 तक बढ़कर 11.4 फीसदी होने की उम्मीद है. संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार, 60 साल से अधिक उम्र वाले लोगों की आबादी 2050 तक 20.8 प्रतिशत और 2100 तक एक तिहाई से अधिक हो सकती है.

भारतीय निर्वाचन आयोग ने फरवरी 2025 में ‘एटलस’ जारी किया, जिसके आंकड़े बताते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर, अधिकतर मतदाता कामकाजी वर्ग के हैं और 30-59 वर्ष आयु वाले लोगों का प्रतिशत 60.63 है. इसमें 18-29 आयु-वर्ग के मतदाता 22.78 प्रतिशत हैं जिनमें राज्यवार भिन्नताएं भी खूब दिखती हैं. वहीं, राष्ट्रीय स्तर पर 60-79 आयु-वर्ग के मतदाताओं का प्रतिशत 14.72 है जबकि 80 से अधिक उम्र के मतदाता 1.87 प्रतिशत हैं. इसका अर्थ है कि भारत में लगभग 16.59 प्रतिशत मतदाता 60 वर्ष से अधिक उम्र के हैं. 

भारतीय निर्वाचन आयोग ने फरवरी 2025 में ‘एटलस’ जारी किया, जिसके आंकड़े बताते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर, अधिकतर मतदाता कामकाजी वर्ग के हैं और 30-59 वर्ष आयु वाले लोगों का प्रतिशत 60.63 है.

बुज़ुर्ग मतदाता कई राज्यों में चुनावी गणित को प्रभावित भी करने लगे हैं जैसे केरल में 20.46 प्रतिशत मतदाता 60 से 79 आयु-वर्ग और 2.26 प्रतिशत 80 साल से अधिक उम्र के हैं. गोवा में यह आंकड़ा क्रमशः 19.19 और 2.57 प्रतिशत है जबकि तमिलनाडु में 17.70 और 2.32 प्रतिशत. इन क्षेत्रों में बुज़ुर्ग मतदाताओं की संख्या युवाओं के बराबर या उससे अधिक हो चुकी है जिस कारण बुज़ुर्गों को समर्पित सेवाओं का बंटवारा एक प्रमुख राजनीतिक मसला बन गया है. 

क्या बुज़ुर्ग भारतीय अधिक मतदान करते हैं?

बुज़ुर्ग मतदाताओं का मतदान-प्रतिशत अधिक रहता है इसलिए राजनीतिक रणनीतिकारों को उन्हें प्राथमिकता देनी चाहिए. 60 से 70 वर्ष वाले मतदाताओं की चुनाव में भागीदारी स्थिर रहती है. इसके बाद उनकी संख्या घटती है जिसकी वज़ह शारीरिक बाधाएं हैं. इसलिए, चुनाव आयोग द्वारा हाल ही में किया गया प्रयास महत्वपूर्ण है. उसने 2024 के आम चुनाव में 85 वर्ष से अधिक आयु के मतदाताओं और निर्धारित मापदंडों को पूरा करने वाले दिव्यांग व्यक्तियों के लिए घर पर मतदान की सुविधा उपलब्ध कराई थी. 1.7 करोड़ से अधिक मतदाताओं द्वारा इसका उपयोग कर सकने की संभावना आयोग ने जताई थी जिनमें से 81 लाख मतदाता 85 वर्ष से अधिक उम्र के थे. यह संख्या ‘एटलस’ में बताए गए 80+ आयु-वर्ग से इसलिए मेल नहीं खाती क्योंकि घर पर मतदान की व्यवस्था 85 वर्ष से अधिक उम्र वाले मतदाताओं के लिए की गई थी, न कि 80 वर्ष से अधिक उम्र वाले मतदाताओं के लिए. चूंकि बुज़ुर्गों की अधिक भागीदारी से उनका प्रभाव बढ़ रहा है इसलिए उनको प्रभावित करने वाली नीतियां चुनावी नतीजे भी प्रभावित कर सकती हैं, ख़ास तौर से क़रीबी मुक़ाबलों में.

बुज़ुर्गों के लिए नीतियां और वायदे

स्वास्थ्य नीति इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री-जन आरोग्य योजना, कम आय वाले परिवारों को केंद्र में रखकर शुरू की गई लेकिन राजनीतिक वर्गों ने माना है कि उम्र अपने आप में एक जोखिम वाला कारक है, जो परिवारों के लिए जीवन यापन मुश्किल बना देती है. सरकार ने बीमा के साथ-साथ अन्य प्रयोग भी किए हैं जिसमें बुज़ुर्गों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार और उपेक्षा को भी समझा गया है इसीलिए, 2021 में ELDERLINE (14567) की शुरुआत की गई, जिसमें सूचना और परामर्श तो दिए ही जाते हैं, ज़रूरत पड़ने पर कार्रवाइयां भी की जाती हैं.

2024 के आम चुनाव में 85 वर्ष से अधिक आयु के मतदाताओं और निर्धारित मापदंडों को पूरा करने वाले दिव्यांग व्यक्तियों के लिए घर पर मतदान की सुविधा उपलब्ध कराई थी.

राजनीतिक दल समझने लगे हैं कि बुज़ुर्ग मतदाता निश्चित मासिक राहत के रूप में मिलने वाले लाभों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं. राज्यों की राजनीति में यह दिखता भी है, जब सामाजिक सुरक्षा पेंशन चुनावों के दौरान एक बड़ा मुद्दा बन जाती है. आंध्र प्रदेश का 2019 का चुनाव इसकी मिसाल है. आर्थिक दुश्वारियां भले हों लेकिन राजनीतिक सोच स्पष्ट है कि हर महीने एक निश्चित हस्तांतरण से मतदाताओं के साथ एक स्थायी संबंध बनता है. तेलंगाना की आसरा पेंशन योजना इसी की एक कड़ी है. 

नकद और स्वास्थ्य सेवाओं के अलावा, सरकारों ने अपनी प्राथमिकता दिखाने के लिए ‘जीवन की गुणवत्ता’ से जुड़े लाभ देने के प्रयास भी किए हैं. कई राज्यों ने वरिष्ठ नागरिकों के लिए मुफ्य या किफ़ायती दरों पर यात्रा की सुविधाएं दी हैं. दिल्ली में मुख्यमंत्री तीर्थयात्रा योजना से, जो 2018-19 में शुरू की गई थी, बुज़ुर्ग समूह में तीर्थयात्रा कर रहे थे. मध्य प्रदेश ने भी इसी तरह की पहल की है. यहां तक कि छोटे-छोटे काम भी अब मायने रखते हैं जैसे सार्वजनिक काउंटरों पर बुज़ुर्गों को प्राथमिकता देना, मतदान केंद्रों पर रैंप और व्हीलचेयर की व्यवस्था करना आदि. बेशक, ये देखभाल करने वाली दीर्घकालिक व्यवस्थाओं का विकल्प नहीं हैं लेकिन इनसे बुज़ुर्ग नागरिक समझ सकते हैं कि सरकार उनको किस रूप में देखती है- एक बाधा के रूप में या सेवा के रूप में.

बुज़ुर्ग मतदाताओं के हित में

बुज़ुर्गों की देखभाल के लिए स्थानीय स्तर पर बुनियादी ढांचे बनाए जाने चाहिए. मौजूदा स्वयं सहायता समूहों का भी उपयोग किया जा सकता है और उनके प्रशिक्षित सदस्यों को बुज़ुर्गों की देखभाल में मदद लेनी चाहिए. इतना ही नहीं, राज्य बुज़ुर्गों की देखभाल के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल भी अपना सकते हैं और घर आधारित देखभाल करने, टेलीमेडिसिन-सक्षम फॉलो अप करने, सहायक उपकरण बांटने, समय पर शिकायतों के निपटारे आदि कामों के लिए निजी कंपनियों के साथ करार कर सकते हैं.

दूसरा, बुज़ुर्गों के लिए स्वास्थ्य कवरेज़ को एक स्पष्ट अधिकार के रूप में परिभाषित किया जाना चाहिए. 2024 में उनके लिए आयुष्मान भारत का विस्तार किया गया है, जिससे पता चलता है कि उम्र को अब एक नीतिगत मापदंड माना जा रहा है. ऐसे में, अगला विश्वसनीय कदम आयु-सीमा को 65 या 60 वर्ष से अधिक निर्धारित करना होना चाहिए, जिसमें स्वास्थ्य व समस्या-निवारण से जुड़ी सेवाएं भी शामिल होनी चाहिए.

सरकार ने बीमा के साथ-साथ अन्य प्रयोग भी किए हैं जिसमें बुज़ुर्गों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार और उपेक्षा को भी समझा गया है इसीलिए, 2021 में ELDERLINE (14567) की शुरुआत की गई, जिसमें सूचना और परामर्श तो दिए ही जाते हैं, ज़रूरत पड़ने पर कार्रवाइयां भी की जाती हैं.

तीसरा, अस्पताल में इलाज की सुविधा देने से अधिक ज़ोर ऐसी व्यवस्था बनाने पर होनी चाहिए कि बीमारी से बचने के लिए बुज़ुर्गों को ज़रूरी सेवाएं समुदाय के स्तर पर ही मिल सकें. अब गैर-संक्रामक रोगों वाली दवाइयों की उपलब्धता, हाई बीपी और मधुमेह के लिए नियमित फॉलो-अप, जोखिमों की जांच आदि सुविधाएं प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से बुज़ुर्गों को मिल जानी चाहिए.

चौथा, दिव्यांगता और निर्भरता पर ध्यान देना शासन के लिए अनिवार्य होना चाहिए. दिव्यांगता प्रमाणन, सहायक उपकरणों की आपूर्ति, घरों की रूपरेखा में बदलाव जैसी सेवाएं इनको समय पर उपलब्ध कराना एक भरोसेमंद चुनावी वायदा हो सकता है.

पांचवां, उम्र का ख़्याल रखकर काम करना सरकार के प्रदर्शन का मापदंड बनना चाहिए. फुटपाथ, चौराहे, बैठने की जगह, शौचालय आदि की व्यवस्था करना, क्लीनिक तक परिवहन सुविधा उपलब्ध कराने का प्रयास बुज़ुर्गों की आज़ादी को प्रभावित कर सकते हैं. शहरी स्थानीय निकायों और पंचायतों के लिए आयु-अनुकूल मानकों के प्रति प्रतिबद्धता जताने वाले घोषणा-पत्रों से बुज़ुर्ग ही नहीं, उनके परिजन भी सरकार के वायदे को परख सकेंगे.

साफ़ है, पार्टियां युवाओं को लुभाने की कोशिशें करती रहेंगी, लेकिन अगले चुनाव में यदि लाभ पाना है, तो उनको ऐसी वृद्धावस्था सेवाएं भी उपलब्ध करानी चाहिए, जो स्थानीय हों और आसानी से उपलब्ध भी.


के एस उपलब्ध गोपाल ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के हेल्थ इनीशिएटिव में एसोसिएट फेलो हैं.

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