Author : Dhaval Desai

Expert Speak India Matters
Published on Feb 17, 2026 Updated 0 Hours ago

शहर बढ़ते जा रहे हैं और जंगल घटते जा रहे हैं जिससे इंसान और तेंदुए आमने-सामने आ रहे हैं. असली वजह सिर्फ भूख नहीं बल्कि अनियोजित बस्तियां और कचरे का फैलाव है. जानें कैसे हरित गलियारों, कचरे के सही प्रबंधन और समुदाय की भागीदारी से इस संघर्ष को रोका जा सकता है.

महाराष्ट्र में तेंदुआ संकट: शहरीकरण का अंधेरा पक्ष

भारत में बड़े नगरों के अनियंत्रित विस्तार और तेज़ शहरीकरण ने प्राकृतिक सुरक्षा कवच को बुरी तरह से कमज़ोर कर दिया है. यह कवच न केवल शहरों को प्राकृतिक आपदाओं से बचाता है बल्कि वन्यजीवों के आवास और इंसानी बस्तियों के बीच सुरक्षित दूरी बनाने में भी मदद करता है. राजमार्गों, अनियोजित बस्तियों, आवासीय कॉलोनियों और औद्योगिक क्षेत्रों द्वारा जंगलों, मैंग्रोव और दलदली ज़मीन को ख़त्म करने के कारण, गुरुग्राम (हरियाणा), बेंगलुरु (कर्नाटक), पलासबाड़ीकलियाबोर (असम)  और बारीपाडा (ओडिशा) जैसे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील हिस्सों से घिरे शहरों में जंगली जानवरों और इंसानों के बीच संघर्ष बढ़ने लगा है. मुंबई महानगर क्षेत्र में इंसानों और मवेशियों पर तेंदुए के बढ़ते हमलों का मुख्य कारण संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान और घनी आबादी वाली इंसानी बस्तियों के बीच की सीमा का ख़त्म हो जाना है.

मगर महाराष्ट्र के कई शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में हाल ही में तेंदुओं के हमले बढ़ने पर असामान्य प्रतिक्रिया देखने को मिली है. राज्य के वन मंत्री ने हर जिले के घनी आबादी वाले इन क्षेत्रों के आसपास के जंगलों में बकरियां छोड़ने की सलाह दी है जिन पर 1 करोड़ रुपये ख़र्च किए जाएंगे. माना जाता है कि ये बकरियां तेंदुओं के लिए शिकार का काम करेंगी जिससे वे भोजन की तलाश में शहरों में नहीं आएंगे. मंत्री ने यह भी बताया है कि राज्य ने तेंदुओं को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची-1 से अनुसूची-2 में शामिल करने का प्रस्ताव दिया है. हालांकि, इससे उनकी कानूनी सुरक्षा काफ़ी हद तक कम हो जाएगी और उनको पकड़ने, स्थानांतरित करने और ज़रूरी अनुमति लेकर मारना आसान हो जाएगा.

महाराष्ट्र के कई शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में हाल ही में तेंदुओं के हमले बढ़ने पर असामान्य प्रतिक्रिया देखने को मिली है. राज्य के वन मंत्री ने हर जिले के घनी आबादी वाले इन क्षेत्रों के आसपास के जंगलों में बकरियां छोड़ने की सलाह दी है जिन पर 1 करोड़ रुपये ख़र्च किए जाएंगे. माना जाता है कि ये बकरियां तेंदुओं के लिए शिकार का काम करेंगी जिससे वे भोजन की तलाश में शहरों में नहीं आएंगे.

निश्चय ही, इन प्रस्तावों में चिंताएं झलक रही हैं लेकिन हमारे नीति-निर्माता और राजनेता शहरी पारिस्थितिकी को किस तरह समझ रहे हैं, उस पर भी सवाल उठाती है. क्या इस तरह के प्रयासों से मानव और जानवरों के संघर्षों का स्थायी समाधान निकल सकता है?

संघर्ष के कारण

तेंदुओं की संख्या के लिहाज़ से मध्य प्रदेश के बाद महाराष्ट्र देश का दूसरा सबसे बड़ा राज्य है. साल 2022 में यहां 1,985 तेंदुए थे. मुंबई महानगर क्षेत्र के बीच में संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान है जहां 54 तेंदुए हैं. यानी, यहां हर 100 वर्ग किलोमीटर पर लगभग 26 तेंदुए रहते हैं जो घनत्व के लिहाज़ से दुनिया में सबसे अधिक हैं. हालांकि, इस उद्यान तक ही तेंदुए सिमटे हुए नहीं हैं. जीपीएस वाले कैमरा-ट्रैप और रेडियो कॉलर से मिले आंकड़े बताते हैं कि वे लगातार मुख्य क्षेत्रों और बफर जोन में घूमते रहते हैं. वे न सिर्फ़ आदिवासी क्षेत्रों को पार कर जाते हैं बल्कि नज़दीक की सोसाइटियों में भी चले जाते हैं.

इसीलिए, इन इलाकों में इंसानों पर तेंदुओं के हमलों को कम करने के लिए उनके शिकार करने की प्रवृत्ति को समझना ज़रूरी है. महाराष्ट्र में तेंदुओं के भोजन पैटर्न का मूल्यांकन करने वाले शोध बताते हैं कि जंगलों के आसपास जमे कचरे से बड़ी संख्या में लावारिस पशु (कुत्ते, सूअर, बिल्ली आदि) वहां जमा होते रहते हैं जिनको देखकर जंगलों से तेंदुए इधर आ जाते हैं. हालांकि, मानव बस्तियों के कारण शिकार की संख्या बढ़ने के बावजूद तेंदुए अभी भी अपनी कुल ज़रूरतों का 80 प्रतिशत शिकार जंगलों में ही करते हैं इसीलिए, यह कहना गलत होगा कि तेंदुए भोजन की तलाश में इंसानी बस्तियों में आते हैं. वास्तव में, भूख नहीं, इंसानों का जंगलों के क़रीब बसना मानव-जानवर संघर्ष का कारण है.

क्या बकरियां तेदुएं संकट का हल हैं?

बकरियां छोड़ने संबंधी इस प्रस्ताव में उस सच की अनदेखी की गई है कि मांसाहारी जानवरों को इस तरह शिकार उपलब्ध कराने से गलत नतीजा निकल सकता है. जैसे- राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के दिशा-निर्देश में चेतावनी दी गई है कि मांसाहारी जानवरों को इस तरह खिलाने से उनमें ‘आदत’ पड़ सकती है और ‘मवेशियों या इंसानों पर हमला जैसी समस्याएं’ पैदा हो सकती हैं.

महाराष्ट्र में तेंदुओं के भोजन पैटर्न का मूल्यांकन करने वाले शोध बताते हैं कि जंगलों के आसपास जमे कचरे से बड़ी संख्या में लावारिस पशु वहां जमा होते रहते हैं जिनको देखकर जंगलों से तेंदुए इधर आ जाते हैं. हालांकि, मानव बस्तियों के कारण शिकार की संख्या बढ़ने के बावजूद तेंदुए अभी भी अपनी कुल ज़रूरतों का 80 प्रतिशत शिकार जंगलों में ही करते हैं इसीलिए, यह कहना गलत होगा कि तेंदुए भोजन की तलाश में इंसानी बस्तियों में आते हैं.

इसके अलावा, बकरियां स्वभाव से पालतू जानवर होती हैं. यदि इन्हें बड़ी संख्या में जंगलों में छोड़ा गया तो वे अपने भोजन की तलाश में शहरों की सीमाओं पर आ सकती हैं या मानव बस्तियां में जा सकती हैं. इससे तेंदुए भी इंसानों के क़रीब आ सकते हैं. इससे वह तर्क गलत साबित होता है कि तेंदुए को खाना मिला तो वे जंगलों के अंदर ही रहेंगे.

जंगलों में बकरियां छोड़ना नैतिकता के ख़िलाफ़ भी है. अध्ययनों से पता चलता है कि घरेलू पशुओं से जंगली जानवरों में ब्रुसेलोसिस और खुरपका-मुंहपका जैसी कई बीमारियां तेज़ी से फैल रही हैं. फिर, जंगली जानवरों को बड़े पैमाने पर शिकार उपलब्ध कराने से उन जानवरों के बीच का नाज़ुक पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ सकता है जो सदियों से अलग-अलग पारिस्थितिक तंत्रों में विकसित हुए हैं. इतना ही नहीं, पालतू पशुओं को शिकार मानना लोगों को भी नाराज़ कर सकता है जैसा कि दिल्ली में आवारा कुत्तों को पकड़कर आश्रय गृहों में रखने या मुंबई में कबूतरों को दाना खिलाने पर प्रतिबंध लगाने संबंधी अदालती आदेशों के ख़िलाफ़ उभरी नाराज़गी से स्पष्ट होता है.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मंत्री जी का प्रस्ताव इस तर्क के बिल्कुल उलट है कि संघर्ष का असल कारण शहरों का अनियंत्रित विस्तार है जिससे कई समस्याएं पैदा हुई हैं। जैसे-  

  • ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की उपेक्षा, जिससे आवारा कुत्तों की बड़ी आबादी पनपने लगी है.

  • वन क्षेत्र के नज़दीक अनौपचारिक बस्तियों का अव्यवस्थित विकास, जिससे कचरा जमा हो रहा है. और,

  • रिहायशी इलाकों और रास्तों में रोशनी की पर्याप्त व्यवस्था न होना

ये सभी कारण भी मानव-वन्यजीव संघर्षों को बढ़ाने में योगदान देते हैं.

तेंदुओं को अनुसूची में नीचे लाना- जोखिम भरा शॉर्टकट

तेंदुओं को अनुसूची-2 में शामिल करने की मांग भी हानिकारक हो सकती है. अनुसूची-1 बाघ सहित सभी लुप्तप्रायः वन्यजीवों को कानूनी सुरक्षा देती है. ऐसे जीवों को पकड़ने, शिकार करने, व्यापार करने आदि पर प्रतिबंध लगा हुआ है. मगर अनुसूची-2 में तेंदुओं को शामिल करने से उनको ज़रूरी अनुमति मिलने के बाद पकड़ना और मारना संभव हो जाएगा.

इस तरह, खतरा बढ़ने पर राज्य का ध्यान संरक्षण से हटकर तेंदुओं को पकड़ने या मारने पर जा सकता है. फिर, तेंदुओं को अंधाधुंध पकड़ने या स्थानांतरित करने से भी अक्सर मानव-पशु संघर्ष बढ़ जाता है, क्योंकि स्थानांतरित तेंदुओं पर किए गए शोध बताते हैं कि कई तेंदुए 25 दिनों के भीतर अपने मूल स्थान पर लौट आते हैं, 250 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय करते हुए भी. इस वापसी में अक्सर उनका सामना इंसानों से होता है.

भारत की शहरी नीति इस तरह बननी चाहिए कि शहर नियोजन के केंद्र में वन्यजीव-शहर अंतर्संबंध हो. इसके लिए, मास्टर प्लान में केवल हरित क्षेत्रों की पहचान कर लेने मात्र से बात नहीं बनेगी.

दुनिया भर में कई ऐसे उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि मांसाहारी जीवों की कानूनी सुरक्षा ख़त्म करने से मनमाफ़िक नतीजे नहीं मिल पाते. जैसे- उत्तरी अमेरिका में मवेशियों की रक्षा के लिए भेड़ियों का कानूनी रूप से शिकार किया जाता है या कई अफ्रीकी देशों में संरक्षण के नाम पर ‘ट्रॉफी हंटिंग’ की जाती है. इन उदाहरणों से हमें सबक लेना चाहिए, और जल्दबाज़ी में उठाया गया हमारा कोई भी कदम तेंदुओं के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है.

आगे का रास्ता

महाराष्ट्र में मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने का एक सफल मॉडल पहले से मौजूद है. साल 2003 से 2015 के बीच, जब तेंदुओं के हमले सबसे अधिक हो रहे थे, तब संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान ने एक रणनीति बनाई, जो भारतीय वन्यजीव संस्थान के सहयोग से किए गए शोध पर आधारित थी. इस रणनीति में तेंदुओं को पकड़ने या स्थानांतरित करने के बजाय आपातकालीन टीमों के प्रशिक्षण, रात में गश्ती, वैज्ञानिक निगरानी और मीडिया व समाज के भागीदारी पर ध्यान लगाया गया था. इस कारण हमलों में काफ़ी कमी आ गई थी. इसलिए, मानव-वन्यजीव संघर्षों में स्थायी कमी लाने के लिए शोध के मुताबिक समुदायों के साथ तालमेल बनाते हुए साझा स्थानों के नाज़ुक पारिस्थितिक समीकरणों को ध्यान में रखना होगा.

मुंबई, पुणे, नासिक या महाराष्ट्र के अन्य शहर ही नहीं, पूरे देश में लोग इस तरह की चुनौती से जूझ रहे हैं. जैसे- जयपुर में तेंदुए अक्सर रिहायशी इलाकों में घुस आते हैं. देहरादून और गुवाहाटी में लोग हाथियों से मुकाबला करते हैं. वहीं, बेंगलुरु के बाहरी इलाकों में सुस्त भालुओं के साथ झड़पें होती रहती हैं. हालांकि, इनको आमतौर पर वन्यजीवों की समस्या के रूप में देखा जाता है, लेकिन इनमें से ज्यादातर संघर्षों का असली कारण जंगली जानवरों के इलाकों में इंसानों का अपनी बस्तियां बसाना है. हम उनके क्षेत्रों का क़ब्ज़ा कर रहे हैं. इसलिए, भारत की शहरी नीति इस तरह बननी चाहिए कि शहर नियोजन के केंद्र में वन्यजीव-शहर अंतर्संबंध हो. इसके लिए, मास्टर प्लान में केवल हरित क्षेत्रों की पहचान कर लेने मात्र से बात नहीं बनेगी.

साफ़ है, सुरक्षित पारिस्थितिक गलियारों का निर्माण, 3R (रिड्यूस, रीयूज़ और रीसाइकिल) के सिद्धांत पर ठोस व तरल कचरे का प्रबंधन, व्यापक जागरूकता अभियान और शहरी स्थानीय निकायों, राज्य वन विभागों, पुलिस व नागरिक समाज संगठनों सहित सभी साझेदारों के प्रयासों की ज़रूरत होगी. तभी इस मानव-वन्यजीव संघर्ष को हम काफ़ी हद तक रोक सकते हैं.


धवल देसाई ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर फेलो और वाइस प्रेसिडेंट हैं.

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